विश्व मंच पर हिन्दी अथवा क्या हिन्दी विश्व भाषा बनने में सक्षम है?हिंदी का वैश्विक परिदृश्य

हिंदी का वैश्विक परिदृश्य

विश्व मंच पर हिन्दी अथवा क्या हिन्दी विश्व भाषा बनने में सक्षम है? हिंदी का वैश्विक परिदृश्य 

हिन्दी एक अद्भुत भाषा है। इसे अद्भुत बनाने वाली इसकी अनेकानेक विशेषताएं हैं। हिन्दी उर्वरा है, इसमें गेयता एवं भाव प्रवणता है, लचीली है, तो व्याकरण से अनुशासित भी है। यह वह भाषा है, जिसमें गद्य एवं पद्य दोनों का प्रवाह देखते ही बनता है, जो कि एक जीवंत भाषा का लक्षण है। यह एक वैज्ञानिक ढंग से व्यवस्थित भाषा है। इसकी लिपि ‘देवनागरी’ भी अत्यंत व्यवस्थित है, जिसमें ध्वनियों का क्रम पूर्णतः वैज्ञानिक है। संस्कृत से जन्मी हिन्दी कोई नई-नवेली भाषा भी नहीं है। इसकी प्राचीनता एवं गतिशीलता से हम-आप सभी परिचित हैं। यह वह भाषा है, जिसने सदैव विकास के पायदानों पर कदम आगे बढ़ाए और ऐसा करते हुए समन्वयवादी आचरण बनाए रखा। गैरों को अपना बनाया। इस प्रकार अपनी समृद्धि को भी विस्तार दिया। उर्दू से तो इसने सगी बड़ी बहन जैसा रिश्ता बनाकर अपने औदार्य को दर्शाया। संस्कृत से तो यह जन्मी ही है, तो उर्दू के साथ-साथ अरबी, फारसी, तुर्की, अंग्रेजी, रूसी, 

पुर्तगाली, फ्रांसीसी, चीनी एवं जापानी को भी गले लगाया, जो इसकी सार्वभौमिकता का परिचायक है। इतनी भाषाओं का समागम किसी अन्य भाषा में देखने को कहां मिलता है। 

अब आते हैं हिन्दी के फलक पर। इसका फलक व्यापक है। यह भारत की तो सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा यानी देश भाषा तो है ही, देशांतरण भी कर चुकी है। हिन्दी का वैश्विक विस्तार उन लोगों को मुंह चिढ़ाने के लिए पर्याप्त है, जो इसे राजभाषा से राष्ट्रभाषा नहीं बनने देना चाहते। चीनी (मंदारिन) के बाद यह विश्व की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। यह विज्ञान, व्यापार, कामकाज एवं साहित्य की भाषा तो है ही, प्रेम की भी भाषा है। यही प्रेम हिन्दी का आकर्षण है, और इसी प्रेम से हिन्दी सभी को प्रेमपाश में बांधने में सक्षम है। जिस भाषा में इतनी खूबियां हों, उसकी स्थिति विश्व मंच पर सुदृढ़ एवं मुखर तो होगी ही। 

हिन्दी ने विश्व मंच पर न सिर्फ अपनी श्रेष्ठ पहचान बनाई है, अपितु यह उस पर मजबूती से खड़ी भी है। इससे साबित होता है कि इसमें विश्व भाषा बनने की अद्भुत क्षमता है। एक अच्छी सपक भाषा होने के सारे गुण हिन्दी में विद्यमान हैं। इन्हीं ने हिन्दी को सार्वभौमिक बनाया है। कुछ देश तो ऐसे हैं, जहां हिन्दी का रुतबा देखते ही बनता है। जैसे, मारीशस एवं सूरीनाम। जो लोग हिंदी के विश्व मंच पर प्रतिष्ठापित होने को लेकर संशकित रहते हैं, उन्हें यह याद रखना चाहिए कि हम 10 जनवरी को ‘विश्व हिंदी दिवस’ अकारण नहीं मनाते हैं। हिन्दी को वैश्विक पहचान दिलाने एवं विश्व मंच पर इसे स्थापित करने के उद्देश्य से वर्ष 1975 में 10 से 14 जनवरी तक नागपुर में पहला ‘विश्व हिन्दी दिवस’ आयोजित किया गया था। इस उपलक्ष्य में प्रति वर्ष 10 जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस मनाने का निर्णय वर्ष 2006 में हमारे विदेश मंत्रालय द्वारा लिया गया था। इसके पीछे का मकसद साफ है, विश्व मंच पर हिन्दी की अलख जगाना। 

वस्तुतः भूमंडलीकरण के दौर में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने के लिए एक जीवंत भाषा जरूरी है। ऐसी भाषा हिन्दी हो सकती है। पूरी दुनिया में यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि कंप्यूटर और इंटरनेट विश्व में ज्ञान के एकमात्र स्रोत हैं और जिनकी भाषा अंग्रेजी है। इसलिए यह कहा जा रहा है कि जो अंग्रेजी नहीं जानेगा वह ज्ञान के इस अक्षय कोष से वंचित रह जायेगा। यह सच नहीं, एक भ्रम मात्र है। यदि सच भी होता, तो अपनी गतिशीलता एवं समय के साथ अनुकूलन की अपनी प्रकृति से हिन्दी इसे झुठला चुकी होती। हिन्दी तो व्यवहार की भाषा है, विज्ञान की भाषा है और अपनी इस खूबी के कारण इसने अंतरजाल (Internet) से तादात्म्य बैठा लिया है। भारतीय मेधा ने हिन्दी के सॉफ्टवेयर विकसित कर लिए हैं और भारत के गांवों में ‘ई चौपालें’ लगने लगी हैं। 

भूमंडलीकरण के मौजूदा दौर में हिंदी वैश्विक बाजार की सशक्त भाषा बन चुकी है। पहले राष्ट्रीय आदोलन और फिर हिंदी फिल्मों ने इस देश की संपर्क भाषा बना दिया है। हाल के दिनों में आईटी प्रोफशनल हिंदी का पश्चिमी देशों तक ले गए हैं। दुनियाभर में उसका प्रसार हो रहा है। उधर टीवी चैनल हों या विज्ञापन उद्योग बाजारवादी अर्थव्यवस्था पर हिंदी का जादू सिर चढ़कर बोल रहा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां बड़े पैमाने पर अपने उत्पादों के विज्ञापन न सिर्फ हिंदी में तैयार करवा रही हैं, बल्कि उनमें क्षेत्रीय लहजा अपनाने पर जोर दे रही हैं। अभिप्राय यह है कि बाजार ने अपनी जरूरतों को ध्यान में रखकर हिंदी जैसी भाषा को ज्यादा संप्रेषणीय बनाया है। 

विश्व मंच पर हिन्दी के सशक्त उदय एवं विश्व भाषा बनने की इसकी सक्षमता को ध्यान में रखकर ही जहां वर्ष 2007 में न्यूयार्क में संपन्न हुए आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में चर्चा का केंद्रीय विषय ‘विश्व मंच पर हिन्दी रहा, वहीं वर्ष 2012 में जोहान्सबर्ग में संपन्न हुए नौवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में ‘भाषा की अस्मिता और हिन्दी का वैश्विक संदर्भ विषय पर मुख्य चर्चा केंद्रित रही। वैचारिक मंथन का यह लब्बोलुबाब निकला कि हिन्दी को विश्व स्तरीय भाषा बनाया जाए तथा विश्व मंच पर इसे सम्मानपूर्वक स्थापित करने के लिए समा प्रयास किए जाएं। इस संदर्भ में आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में एक दस सूत्रीय घोषणा पत्र भी जारी किया गया था। इस घोषणा पत्र  खास बात यह थी कि इसके जरिये विश्व के समस्त हिन्दी प्रेमियों प्रवासी भारतीयों तथा विदेशों में कार्यरत भारतीय नागरिकों से यह अपील की गई थी, कि वे विदेशों में हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार में अपना योगदान सुनिश्चित करें। इस घोषणा पत्र में इस बात पर भी बल दिया गया था कि हिन्दी में ज्ञान-विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं तकनीकी विषयों पर सरल एवं उपयोगी हिन्दी पुस्तकों के सृजन को प्रोत्साहित किया जाए, साथ ही हिन्दी में सूचना एवं प्रौद्योगिकी को लोकप्रिय बनाने के प्रभावी उपाय किए जाएं। इस घोषणा पत्र में इस बात पर विशेष जोर दिया गया था कि हिन्दी को साहित्य के साथ-साथ आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और वाणिज्य की भाषा के रूप में विकसित किया जाए। साथ ही अनुवाद के माध्यम से हिन्दी का संपर्क विश्व की भाषाओं के साथ बढ़ाए जाने की जरूरत है।

जहाँ तक संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिंदी की मान्यता का सवाल है तो इस संदर्भ में यह सर्वविदित है कि संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी को मान्यता दिलाने का सवाल पिछले चार दशकों से विश्व के हिंदी प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय बना रहा है। प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन से लेकर दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन में इस आशय के संकल्प पारित हुए हैं। लेकिन अब तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आ सका है। 

यह आवश्यक है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिंदी को प्रवेश दिलाने के लिए केन्द्र सरकार के पास एक निश्चित और समयबद्ध एजेंडा होना चाहिए। 

मूल बात यह कि विश्व हिंदी सम्मेलन करने और संयक्त राष्ट्रसंघ से मान्यता मिल जाने से जिम्मेदारियां खत्म नहीं हो जाती। भाषा के रूप में हिंदी के विकास को लेकर सरकार, जनता, बुद्धिजीवी और साहित्यकारों को और अधिक जागरूक और संवेदनशील होना होगा। फिर विश्व हिंदी सम्मेलन में एक विंग की स्थापना की जाय जो यह देखे कि विश्व के विभिन्न देशों में हिंदी के पठन-पाठन में क्या मुश्किलें हैं। इसके साथ ही विदेशों में स्थित भारतीय दूतावासों और उनसे संबद्ध कार्यालयों में समृद्ध हिंदी पुस्तकालयों की स्थापना करके हिंदी के पठन-पाठन की एक संस्कृति विकसित की जाय। यह भी जरूरी है कि हिन्दी को इंटरनेट की मजबूत भाषा के रूप में विकसित किया जाए तथा इससे जुड़ी व्यावहारिक दिक्कतों को दूर किया जाए। अच्छे सॉफ्टवेयर एवं सर्च इंजन विकसित कर हम हिन्दी की वैश्विक स्थिति को और सुदृढ़ कर सकते हैं। विश्व मंच पर हिन्दी को अधिक लोकप्रिय बनाने के लिए एक अच्छा उपाय यह भी हो सकता है कि हम एक तरफ प्रवासी भारतीय लेखकों की किताबों को भारत के शैक्षणिक पाठ्यक्रम में शामिल करें, तो दूसरी तरफ जिन देशों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है, उनके लिए मानक पुस्तकें तैयार करवाएं। साथ ही ऐसे प्रयास किए जाएं कि विदेशी विश्वविद्यालयों में हिन्दी पीठों की स्थापना हो सके। हिन्दी की वैश्विक लोकप्रियता के लिए यह भी आवश्यक है कि हम इसे शुद्धतावादियों से बचाएं। इसे लचीला एवं व्यावहारिक बना कर इसके विस्तार को बढ़ाएं। बहुत अधिक तत्समता और व्याकरणिक जकड़बंदियां हिन्दी के मार्ग में अवराधक बन सकती हैं। हिन्दी के कुछ मठाधीशों की सबसे बड़ी कमी यह है कि वे प्रयोग से डरते हैं, हिन्दी के परातन रूप को ही बार-बार सामने लाने की हिमायत करते हैं, जबकि सही तरीका बह है कि बदलती सोच एवं बदलते वक्त को देखते हुए समय के साथ भाषा का भी अनुकूलन आवश्यक है। इसमें कोई दो राय नहीं कि इंटरनेट, विज्ञान, प्रौद्योगिकी आदि के क्षेत्र में अब तक हिन्दी यह साबित कर चुकी है, वह समय के बदलावों के अनुरूप स्वयं को ढालने में सक्षम है और यह बात हिन्दी की मजबूत होती वैश्विक स्थिति की द्योतक है। 

वास्तव में हिंदी विश्वास और प्रेम की भाषा है। चीनी (मंदारिन) के बाद दुनिया में सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली जुबान है। भारत में लगभग 70 करोड़ और अन्य देशों में लगभग 10 करोड़ लोग हिंदी बोलते और समझते हैं। मॉरीशस में तकरीबन 7 लाख और दक्षिण अफ्रीका में 9 लाख हिंदीभाषी हैं। विश्व के कई देशों में हिंदी पढ़ाई जा रही है। हिंदी फिल्मों और गानों की दुनिया भर में धूम है। विश्व के कुछ विश्वविद्यालयों में हिंदी फिल्मों के माध्यम से हिंदी पढ़ाई जाती है। हिंदी एक सशक्त-समर्थ भाषा है जो संपर्क की, गजकाज की, प्रशासन की, व्यापार की, शिक्षा एवं शिक्षण की, पाठ्यपुस्तकों के माध्यम की, परीक्षा व्यवस्था की मीडिया की… सिनेमा की, साहित्य सृजन की तथा निर्देशों की भाषा तो है ही, कलात्मक अभिव्यक्ति की भाषा भी है। ये बातें हिन्दी को विश्व मंच पर स्थापित करने में संबल प्रदान कर रही हैं। 

यकीनन वैश्विक संदर्भो के परिप्रेक्ष्य में हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल व स्वर्णिम दिख रहा है। आने वाले दिनों में यह न सिर्फ विश्व की सबसे बड़ी पंचायत ‘संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनेगी, अपितु विश्व मंच को भी अपनी महक से सुरभित करेगी, यह विश्वास हिन्दी प्रेमियों में जाग चुका है। इससे पूर्व यह आवश्यक है कि हम अपने देश में हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दकर इसे महिमामंडित करें, ताकि वैश्विक समुदाय को हमारी तरफ अगुली उठाने का मौका न मिले। विश्व मंच पर हिन्दी को स्थापित करने के लिए हम संकल्पबद्ध हैं तथा सम्यक एवं समवेत रूप से प्रयत्नशील भी हैं। विश्व मंच पर हिन्दी की वैजयंती लहराने का समय अब बहुत नजदीक है। 

Click here -HINDI NIBANDH FOR UPSC  

वर्तमान विषयों पर हिंदी में निबंध

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.

11 + 10 =