ग्लोबल होती हिन्दी 

ग्लोबल होती हिन्दी 

ग्लोबल होती हिन्दी 

यदि यह कहा जाए कि भूमंडलीकरण के इस दौर में हिन्दी का समृद्ध स्वरूप विश्व स्तर पर आच्छादित हो रहा है, तो शायद इसमें अतिशयोक्ति जैसी कोई बात न होगी। हिन्दी न सिर्फ गतिशील हुई है, अपितु इसने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहुंच को साबित कर दिखाया है। यही कारण है कि कल तक जो हिन्दी से मुंह फेरते थे, अब उन्हें यह एहसास हो गया है कि हिन्दी को स्वीकार करना ही पड़ेगा। नेताओं, अभिनेताओं, व्यापारियों और उद्योगपतियों का एक बड़ा तबका, जो कल तक हिन्दी से परहेज करता था, आज उसकी तरफ उन्मुख है। हिन्दी के प्रति जागरूकता बढ़ी है। इसका विस्तार हो रहा है। 

पठन-पाठन, व्यापार, मीडिया, विज्ञापन आदि क्षेत्रों में हिन्दी की पकड़ मजबूत हुई है। सूचना एवं सम्प्रेषण का सशक्त माध्यम बन चुकी है हिन्दी। इसका फलक दिनोंदिन विस्तृत हो रहा है। विदेशों में न सिर्फ हिन्दी जानने वालों की संख्या बढ़ रही है, अपितु इसके बोलने वालों की संख्या भी बढ़ी है। हिन्दी का विश्व फलक पर प्रभावी उपस्थिति दर्ज करवाना यकीनन एक गैरमामूली घटना है। रुपये को अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक मिलने को भी हिन्दी के बढ़ते कदमों से जोड़कर देखा जा रहा है। शनैः-शनैः हिन्दी गति और लय पकड़ रही है |

पिछले कुछ वर्षों में विदेशों में हिन्दी का दबदबा बढ़ा है। विदेशी विश्वविद्यालयों में खल रहे हिन्दी संकायों से यह साबित होता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी की स्वीकार्यता बढ़ी है तथा हिन्दी के महत्त्व को समझा जा रहा है। खास बात यह है कि जिन देशों के विश्वविद्यालयों में हिन्दी विभाग खुल रहे हैं, उनमें पढ़ाने वाले सभी | शिक्षक बाहर से नहीं बलाए गए हैं। उनमें से कई तो स्थानीय ही हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर न सिर्फ पठन-पाठन के क्षेत्र में हिन्दी का दबादबा बढ़ा है, बल्कि इस भाषा को सीखने की ललक भी बढ़ी है। विभिन्न कारणों से विदेशी नागरिक हिन्दी की ओर उन्मुख हैं। 

चीन, जापान, अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों में हिन्दी सीखने वालों का प्रतिशत बढ़ा है। जहां ब्रिटेन में हिन्दी का अच्छा खासा माहौल निर्मित हो रहा है, वहीं अमेरिका तो बकायदा अपने राष्ट्रवासियों से हिन्दी सीखने की अपील तक कर चुका है। हिन्दी वैश्विक स्वीकृति की तरफ अग्रसर है। हिन्दी की इससे बड़ी सफलता और क्या होगी कि अंग्रेजी के विश्वस्तरीय शब्द कोशों में ‘चटनी’, ‘इडली’, ‘छोला-भटूरा’ और ‘डोसा’ जैसे शब्द स्थान पा चुके हैं। यह हिन्दी में आई तेजी का ही परिणाम है कि रसियन चैनल तक हिन्दी के रंग में रंगे दिख रहे हैं। 

हिन्दी का यह विस्तार अकारण नहीं है। हिन्दी नितांत समृद्ध भाषा है। दुनिया की तमाम आधुनिक भाषाओं से कहीं अधिक श्रेष्ठ है यह भाषा। शब्दों का अतुल भंडार है हिन्दी के पास। मजबूत व्याकरण ने इसे तराशा है। हिन्दी नीरस नहीं, जीवंत भाषा है। यह सरल भी है और उदार भी है। हिन्दी की श्रीवृद्धि में संस्कृत का महत्त्वपूर्ण योगदान है। संस्कृत ने इसे समृद्ध बनाया। हिन्दी ने अपनी समृद्धि के लिए दूसरी भाषाओं से भी शब्द लिए, उन्हें आत्मसात किया और प्रचलन में लाकर प्रवाह दिया। अंग्रेजी, फारसी, अरबी, पुर्तगाली, फ्रांसीसी, चीनी, तुर्की तथा जापानी आदि भाषाओं के अनेक शब्दों को हिन्दी ने अपनाया। इन भाषाओं के अनेक शब्द हिन्दी में घुल-मिल कर प्रचलन के प्रवाह में आ चके हैं। जो लचक हिन्दी में है, वह विश्व की किसी अन्य भाषा में नहीं है। कुछ लोगों ने यह हौवा जरूर पैदा किया कि कम्प्यूटर की भाषा अंग्रेजी है, हिन्दी जानने वाले इससे कैसे ताल-मेल बैठाएंगे। यह एक भ्रामक बात है, जिसे कुछ ज्यादा ही प्रचारित किया गया। भारत में कंप्यूटर की पहुंच को देखकर यह कहा जा सकता है कि हमारे यहां कंप्यूटर क्रांति का सूत्रपात हो चुका है। इस कंप्यूटर क्रांति ने ही इस भ्रामक प्रचार को आईना दिखा दिया है। आज हमारे यहां ‘ई चौपालें’ लग रही हैं। भारतीय मेधा ने हिन्दी के उपयोगी सॉफ्टवेयर विकसित कर लिए हैं। जो देवनागरी लिपि में हिन्दी नहीं लिख पाते, वे रोमन लिपि में हिन्दी का प्रयोग कर विचारों का आदान-प्रदान कर रहे हैं। सात समन्दर पार भी कंप्यूटर पर हिन्दी किसी न किसी रूप में काबिज है। कार्यों का संचालन और प्रतिपादन भली-भांति हिन्दी में हो रहा है। सब कुछ बहुत सरलता से हो रहा है। कहीं कोई अवरोध नहीं है। हिन्दी का दायरा इंटरनेट के जरिये भी दिनों-दिन बढ़ रहा है। ब्लॉग, वेबसाइटों और सोशल मीडिया पर हिन्दी ने मजबूत पकड़ बनाई है। सच तो यह है कि नेट ने हिन्दी को नये आयाम दिए हैं। हिन्दी की ग्लोबल पहुंच बनाने में भी इंटरनेट का अप्रतिम योगदान है। यह माध्यम हिन्दी भाषियों को जोड़ने के लिए सेतु का काम कर रहा है। आज एक लाख से भी ज्यादा ब्लॉग हिन्दी में उपलब्ध हैं। 15 से अधिक खोज इंजन हिन्दी में उपलब्ध हैं। अनेक हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं के संस्करण इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। हिन्दी के उदीयमान लेखक लेखिकाओं के लिए इंटरनेट ‘लांचिग पैड’ का काम कर रहा है। और तो और सात समंदर पार श्रीरामचरितमानस जैसी लोकप्रिय पुस्तकें इंटरनेट पर पढ़ी जा रही हैं। 

हिन्दी की व्यापकता को देखते हुए यह कहना असंगत न होगा कि यह सम्पर्क भाषा बनने की ओर अग्रसर है। कई माध्यमों से इसने खुद को विस्तार दिया है। माध्यम चाहे बोलचाल का हो, व्यापार का हो या फिर मनोरंजन का, हिन्दी की चादर फैलती ही जा रही है। 

पहले व्यापार को ही लें। जो बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ कल तक हिन्दी से दुराव करती थीं, आज उन्हें यह इल्म हो चुका है कि हिन्दी के बगैर बाजार के समीकरण गड़बड़ा सकते हैं। ये कंपनियां हिन्दी की तरफ उन्मुख हैं। प्रचार-प्रसार का माध्यम हिन्दी को बना रही हैं। विज्ञापन हिन्दी में छपवा रही हैं और अपने यहां हिन्दी जानने वालों को सम्मान दे रही हैं। अपने ब्रांड को अखिल भारतीय बनाने के लिए मल्टीनेशनल कंपनियां हिन्दी की शरण में हैं। इस तरह संवाद के नये रास्ते तो खुल ही रहे हैं, अंतर्राष्ट्रीय बाजार पर हिन्दी का वर्चस्व भी बढ़ रहा है। यह वर्चस्व भाषा की समृद्धि से जुड़ रहा है। हिन्दी की सम्प्रेषणीयता बढ़ रही है। एक ऐसा प्रवाह हिन्दी में दिख रहा है, जो अभूतपूर्व है। एक नये कलेवर में हिन्दी विश्व स्तर पर आकार ले रही है। कारपोरेट जगत को यह समझ में आ चुका है कि अगर गांव गांव तक पहुंच बनानी है, तो हिन्दी को अपनाना ही होगा। 

मीडिया ने भी हिन्दी की ग्लोबल पहुंच बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है, खासतौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया ने। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि भारतीय मूल के या यूं कहें कि हिन्दी भाषी संस्कारों के लोग दुनिया के हर मुल्क में पहुंच चुके हैं। वे इन मुल्कों में प्रवास कर रहे हैं। उन्हें विदेश में रहकर भी खबरें हिन्दी में ही सुनना अच्छा लगता है। वे वहां रहकर हिन्दी न सिर्फ सुनते हैं, 

बल्कि लिखते-पढ़ते भी हैं। हिन्दी की अनेक साहित्यिक पत्र-पत्रिकाए विदेशों में प्रकाशित हो रही है। अनेक संस्थाएं हिन्दी के उन्नयन का लेकर सक्रिय हैं। माहौल हिन्दीमय बन रहा है। 

यह कहना भी गलत न होगा कि विश्व स्तर पर मनोरंजन ने हिन्दी को इसके अभीष्ट आयामों में प्रतिष्ठापित किया है। माध्यम चाहे हिन्दी सिनेमा हो, टीवी चैनल हों या मंचीय कार्यक्रम, हिन्दी ने मजबूती से पांव जमाए हैं। हिन्दी सिनेमा का आंतरिक परिदृश्य चाहे जैसा हो, मगर विश्व मंच पर हिन्दी को स्थापित करने में इसके योगदान को नकारा नहीं जा सकता। हिन्दी सिनेमा को अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिल चुकी है। टीवी चैनलों पर प्रसारित हिन्दी के मनोरंजक कार्यक्रम विदेशों में खासे लोकप्रिय हो रहे हैं। इन्हें पूरे चाव से देखा जा रहा है। इसके अलावा मुशायरों-कवि सम्मेलनों का जादू भी विदेशों में बरकरार है। इनमें हिन्दी जानने वाले उत्साहपूर्वक सम्मिलित होते हैं। प्रवासी भारतीय हिन्दी कवियों को बराबर अपने यहां आमंत्रित करते हैं। भारतीय कलाकार विदेशों में बढ़-चढ़ कर ‘स्टेज शो’ कर रहे हैं। इनमें हिन्दी का ही बोलबाला है। कुल मिलाकर, एक उत्साहजनक वातावरण हिन्दी को लेकर बन रहा है। हिन्दी ग्लोबल संवाद के नये आयाम बना रही है। अब दुनिया के माथे पर हिन्दी दमक रही है। विश्व फलक पर हिन्दी ने अंग्रेजी को पीछे ढकेल दिया है। टोक्यो विश्वविद्यालय के प्रो. होजुमितनाका ने एक अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष दिया है कि विश्व में चीनी के बाद सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा के रूप में हिन्दी सामने आई है। अंग्रेजी तीसरे स्थान पर चली गई है। दुनिया के 50 से अधिक देशों में तकरीबन 500 केंद्रों पर हिन्दी पढ़ाई जा रही है। अमेरिका में हिन्दी यूएस नाम की संस्था हिन्दी के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय कार्य कर रही है। यह संस्था 35 पाठशालाओं का संचालन करती है तथा हिन्दी में सालाना परीक्षाएं आयोजित करती है। यह इस संस्था के प्रयासों से ही संभव हुआ है कि अमेरिका में दुकानों के साइन बोर्ड अब हिन्दी में भी दिखने लगे हैं। ब्रिटेन की यूके हिन्दी समिति भी वहां हिन्दी की अलख जगाए है। वहां करीब एक दर्जन ऐसी संस्थाएं हैं, जो नियमित रूप से हिन्दी के प्रचार-प्रसार में संलग्न है। खाड़ी के मुल्कों में भी हिन्दी को लेकर चेतना बढ़ी है और धीरे-धीरे यहां हिन्दी सामान्य बोलचाल की भाषा बन रही है। पड़ोसी देश श्रीलंका, मारीशस, गुयाना, त्रिनिदाद एंड टोबैगो, सूरीनाम, फीजी और नीदरलैंड में भी – हिन्दी का दबदबा बढ़ा है। 

जिस तरह से आज हिन्दी विश्व फलक पर विस्तारित हो रही है, उससे यही ध्वनित हो रहा है कि इस भाषा ने ग्लोबल भाषा बनने की सक्षमता हासिल कर ली है। कल तक जो लोग राष्ट्रीय भाषा के संदर्भ में हिन्दी को लेकर चिंतित रहते थे, अब उन्हें चिंता करने की कोई जरूरत नहीं, क्योंकि हिन्दी अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में सशक्त होकर उभर रही है। इसकी ग्राह्यता अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ी है। इसका स्वरूप निखरा है। वैश्विक हितों को देखते हुए यह एक शुभ संकेत है। 

एक तसल्लीबख्श बात और देखने को मिल रही है। विदेशों में अनेक ऐसे लोग हिन्दी के पक्षधर बन रहे हैं, जो भारतीय मूल के नहीं हैं। ऐसे समर्पित हिन्दी विद्वानों की बदौलत भी हिन्दी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर परवान चढ़ रही है। विदेशी मूल के अनेक विद्वान हिन्दी को हृदयंगम कर रहे हैं। विदेशों में हिन्दी पर महत्त्वपूर्ण कार्य हो रहा है, खासियत यह है कि वहीं के लोग इस काम को अंजाम दे रहे हैं। विदेशी भाषा वैज्ञानिकों का ध्यान हिन्दी पर केन्द्रित हुआ है। डच के भाषाविद् केटलर ने हिन्दी व्याकरण पर महत्त्वपूर्ण कार्य किया। अंग्रेजी के विद्वान ग्रियर्सन ने हिन्दी सहित अन्य भारतीय भाषाओं पर महत्त्वपूर्ण शोधपरक कार्य किया है। इन गतिविधियों से जहां विश्व फलक पर हिन्दी की पताका ऊंची हुई है, वहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी का भविष्य भी उज्ज्वल दिख रहा है। 

हिन्दी का अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ता दबदबा उन लोगों के लिए काबिल-ए-गौर हो सकता है, जो इससे विमुख हैं। बेहतर होगा कि अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भारतीय प्रतिनिधि, राजनयिक, नेता और नौकरशाह हिन्दी का इस्तेमाल करें और भाषा को लेकर आत्महीनता की ग्रंथियां मन में न पालें। उन्हें यह समझना होगा कि हिन्दी को वैश्विक पहचान मिल चुकी है। अतएव उन्हें अपने आचरण से इस पहचान को और पुख्तगी देनी होगी, ताकि कोई यह न कह सके कि आप हिन्दी के लिए अंतर्राष्ट्रीय मान्यता की बात तो करते हैं, मगर खुद उससे परहेज क्यों करते हैं। 

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