Ghost stories in hindi-खूनी सपने का राज़,सफ़र की चुडैल 

Ghost stories in hindi

Ghost stories in hindi- खूनी सपने का राज़ 

रीति अपनी कॉलेज की पढ़ाई ख़त्म कर आज ही विलायत से लौटी थी, घर पंहुचते पंहुचते शाम सी हो गयी थी, वो अपने बंगले की गैलरी में अपने बंगले के आस पास के दृश्य का मज़ा ले ही रही थी कि तभी उसकी नज़र घर के सामने खड़ी दो लड़कियों की ओर गयी, वो दोनों उसे अपने पास आने का इशारा कर रही थीं। प्रीति बड़ी हैरान थी कि वो तो आज लगभग पहली बार अपने इस बंगले में आयी है तो ये दोनों आखिर कौन हैं पर उन दोनों के बारे में एक  अजीब सी बात प्रीति को हैरान परेशान कर रही थी। वो अजीब सी बात ये थी कि उन दोनों लड़कियों के सर आपस में जुड़े हुए थे। प्रीति को लगा कि सफ़र की थकान कुछ ज़्यादा ही उसके दिमाग़ पर चढ़ गयी है। और थोड़ा फ्रेश होने के लिए वो नहाने चली गयी। कुछ आधे घंटे बाद ही प्रीति नहा धोकर अपने कमरे में आ कर बैठ गयी और कुछ देर आराम करने को आँखे मूंदने को ही थी कि तभी उसे लगा कि सामने बिस्तर पर रखी सफ़ेद चादर हवा में तैर रही है, ऐसा लगा जैसे किसीने उस चादर की तह खोलकर उसे सर से पाँव तक पहन लिया है, और कमरे में टहल रहा है, ध्यान से देखा तो कोई एक नहीं बल्कि ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई दो लोग हैं, प्रीति हैरान थी, वह विलायत से पढ़ कर आयी थी तो वो भूत प्रेत वगेरह जैसी दकियानूसी बातों में बिलकुल नहीं मानती थी, आज के युग में ये सब बातें उसे कोरी गप्प हीं लगतीं थीं, पर जो आँखों से दिख रहा था उसे झुठलाया भी नहीं जा सकता था। तभी उसे सीढ़ी से किसीके ऊपर आने की आहट सुनायी दी, ये और कोई नहीं उसकी माँ रेवती ही थी। प्रीति अपनी माँ रेवती याने उस रियासत के राज परिवार की दूसरी बहू जिनसे मनीष राज ने अपनी पहली पत्नी रजनी की अचानक हुई मौत के बाद शादी कर ली थी, उनकी इकलौती बेटी थी। प्रीति सिर्फ ३-४ साल की रही होगी जब उसकी माँ, रेवती ने उसे देश के बाहर अपने एक रिश्तेदार के पास रहने और पढ़ने भेज दिया था। 

ऊपर आते ही प्रीति ने देखा कि उसकी माँ बुरी तरह घबरायी हुई है, इससे पहले कि प्रीति कुछ पूछे, उसकी माँ बोली “चल बेटा जल्दी से खाना खा ले, यहाँ सब आठ, साढ़े आठ तक सो जाते हैं।” “पर माँ, मुझे तो अभी अपना समान अन्पैक करना है और कुछ पढ़ना भी है। ” प्रीति ने जवाब दिया। “बेटा, तुझे जो करना है सुबह उठ कर करना, जल्दी से नीचे खाना खाने चल” और ये कहते हुए रेवती, प्रीति को लगभग खींचते हुए अपने साथ नीचे ले गयी। प्रीति ने अपने माता पिता के साथ खाना खाया और सोने के लिए वापिस ऊपर अपने कमरे में आने लगी तो उसकी माँ ने कहा “बेटा तुम्हें नीचे ही सोना है।”, “पर मेरा कमरा तो ऊपर है न माँ, मैं ऊपर अपने बिस्तर पर सो जाऊँगी, और आप चिंता मत कीजिए साढ़े आठ से पहले मैं पक्का सो जाऊँगी”। 

उसकी ये बात सुन उसके पिता मनीष राज गम्भीर हो उठे और बोले “नहीं बेटी तुम ऊपर नहीं सो सकती। आओ यहाँ हमारे पास आओ।” और इसके साथ ही वो उसे अपने साथ नीचे अपने कमरे में ले आए। वहाँ जो प्रीति ने देखा उसे देख वो बुरी तरह काँप गयी। नीचे उन सबके सोने के लिए अलग अलग तीन क़बें थीं। उन्मे से तहख़ाना नम एक क़ब्र का दरवाज़ा खोल मनीष राज ने उसे नीचे क़ब्र में लगा बिस्तर दिखाया और बोले, “तुम्हें यहाँ सोना होगा, हमारे साथ, देखो हमारे बिस्तर भी यहीं हैं, इन क़बरों के दरवाज़ों में छोटे छूटे छेद हैं जिनसे तुम्हें साँस लेने में दिक्कत नहीं होगी, आओ, सब सो जाएँ, रात बढ़ती जा रही है।” प्रीति की कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर ये सब क्या है? कोई ज़िंदा इंसान इस तरह से ज़मीन के नीचे कब्रों में भी सोता है, अभी वो ये सोच ही रही थी कि उसे एक भयानक चीख़ सुनायी दी। उसके चेहरे पर डर के साथ साथ कई सवाल उभरे पर शायद उनके जवाब जानने का समय नहीं ङ्केथा। उसकी माँ ने लगभग उसे धकेलते हुए उसकी जान में उतार दिया और दरवाज़ा बंद कर उसके माता पिता दोनों अपनी अपनी क़ब्रों में सोने के लिए उतर गए। आख़िर क्या था ज़मीन के नीचे बने इन कबरनुमा बिस्तरों का राज? क्यों ये पूरा परिवार इन क़बरों में सोने को मजबूर था? 

घोर असमंजस याने कन्फ़्यूज़न कि स्थिति थी साथ ही उसके कमरे में तैरती चादर पहनकर टहलते बच्चे, ये दर्दनाक चीख़ और क़ब्र का बिस्तर, इस सबने उसे इतना थका दिया था जितना कि वो पूरे सफ़र में नहीं थकी थी। 

कुछ ही देर में प्रीति को लगा जैसे उसकी क़ब्र में चारों ओर से खून भरना शुरू हो गया है। चारों ओर से रिस रिस कर कनुमा बिस्तर में खून टपक रहा है और उसे भारत जा रहा है, उसके हाथ पैर सुन्न पड़ चुके हैं और वो चाह कर भी हिल नहीं पा रही। खून टपक टपक कर उसके बाल,कपड़े, बल्कि उसका पूरा बदन लाल कर दे रहा है, यहाँ तक की उसके नाक कान और मुँह से उसके अंदर घुसना शुरू हो गया है पर उसके मुँह से चाह कर भी कोई आवाज़ नहीं निकल रही। उसके लिए साँस लेना भी मुश्किल हो रहा था। साथ ही साथ बाहर कहीं से आतीं चीख़ों की आवाज़ भी बढ़ती जा रही थी। प्रीति को लगा जैसे एक ही पल में उसकी जान निकल जाएगी कि तभी एक झटके से उसकी आँख खुल गयी। ये और कुछ नहीं बल्कि दिल दहला देने वाला एक भयानक सपना ही था। प्रीति ने सर से पैर तक ख़ुद को छूकर देखा तो वो पसीने से तर-ब-तर थी पर खून का नमो निशान नहीं था। इतने में रेवती ने उसके कबरनुमा बिस्तर का पल्ला खोला और उसे बाहर निकला। घबरायी हुई प्रीति, रेवती के गले से लग फूट फूट कर रो पड़ी। “क्या तुमने चारों ओर से खून रिसता हुआ देखा? क्या तुम्हें लगा कि तुम्हारे शरीर के पोर पोर से वो तुम्हारे अंदर दाख़िल हो रहा है?” रेवती ने प्रीति के सर पर हाथ फेरते हुए पूछा। “हँ हाँ माँ पर आपको कैसे मालूम?” प्रीति ने हैरान होते हुए सवाल किया। 

Ghost stories in hindi- खूनी सपने का राज़ 

“इस रियासत में रहने वाला हर बाशिंदा हर रात अपने क़ब्र के बिस्तर पर लेटा एक ही सपना देखता है बेटी” पीछे से प्रीति के पिता मनीष राज की आवाज़ सुनायी दी। “यही दर्द भरा सपना हमारी फूटी क़िस्मत बन चुका है, हम सब के सब इस खूनी सपने के कैदी बन चुके हैं और जीते जी हमारा इससे निजात पाना ना-मुमकिन है” मायूस सी आवाज़ में अपनी बात ख़त्म कर मनीष वहाँ से चले गए। प्रीति रात को ही कई सवाल लेकर अपने बिस्तर पर गयी थी और रात ने उसे आराम की नींद देने के बजाए उसके दिन का चैन भी छीन लिया था। इसके साथ ही उसकी माँ भी वहाँ से चलीं गयीं, शायद प्रीति के ज़हन में उबलते सवालों के जवाब उन दोनों के पास या तो थे नहीं या वो देना नहीं चाहते थे, और दोनों ही बातें प्रीति को परेशान किए दे रहीं थीं। आख़िर वो पूछती भी तो किससे। तभी किसी नौकर की आवाज़ आयी “माताजी नियाज़ आया है”। “श श श श श, रेवती ने उस नौकर को चुप करते हुए कहा, धीरे बोलो, प्रीति आ गयी है, उसे इस बारे में ज़्यादा कुछ मालूम नहीं होना चाहिए, बस इतना ही मालूम हो कि वो हमारा खानसामा है। ” इतना कहकर उसने इशारे से नियाज़ को अंदर लाने को कहा। पर प्रीति ने छुपकर सब सुन लिया था। उसने छुपके से देखा तो काफ़ी देर नियाज़ और रेवती में कुछ बातें होती रहीं जिनके बारे में इतनी दूर से कुछ भी अंदाज़ा लगा पाना नामुमकिन था। 

नियाज़ ने जब रसोई में काम शुरू कर दिया तो उसके बार प्रीति ने अपनी माँ रेवती से पूछा कि ये कौन है? तो इस बारे में रेवती ने यही कहा की नियाज़ मामू हैं, ये शादी के समय ही हमारे साथ रह रहे हैं, हमारे खाने पीने का सारा काम यही सम्भालते हैं। तुम्हें भी कुछ बनवाना हो तो बात देना। प्रीति काफ़ी देर तक ये सोचती रही कि इनकी जिंदगी में इतने अजीब और भयानक वाक़ये पेश आ रहे हैं फिर भी ये इतनी नोर्मल कैसे हैं? ये चीखें, ये क़बरों में सोना, ये खूनी सपने, ये सब तो जैसे इनके लिए साधारण सी बात लग रही है। आखिर इतनी भयानक ज़िंदगी होते हुए भी कोई ऐसा अनजानों सा बर्ताव कैसे कर सकता है कि जैसे कुछ हुआ ही न हो। उसे लगा इतने बरस विलायत में चैन से बिताने के बाद वो बेकार ही यहाँ आयी। काश ये बात उसे उस रियासत में घुसने से पहले ही मालूम हो जाती तो वो कभी यहाँ न आती पर हो न हो इन सबके पीछे कोई गहरा राज ज़रूर है। प्रीति को उसके पिता की बात याद आयी कि इस रियासत का हर बाशिंदा एक ही सपना देखता है तो उसने दिन में अपने बंगले से निकल कर कई लोगों से इस बारे में बात करने की कोशिश की पर किसीने कोई जवाब नहीं दिया। पर एक औरत ने बड़े गुस्से में कहा “हमसे क्या पूछती है? अपनी माँ से पूछ, उसके गुनाहों के जवाब हम बेगुनाहों के पास क्या होंगे।” इससे पहले कि प्रीति अपनी माँ के बारे में ग़लत बात करनेवाली औरत को कोई जवाब दे इतना कहकर बुरा सा मुँह बनाते हुए वो औरत वहाँ से चली गयी। 

लगभग शाम के वक़्त प्रीति घर पंहुची तो उसने देखा कि नियाज़ घर के पीछे की तरफ़ कहीं जा रहा है। प्रीति ने छुपते छुपाते उसका पीछा करने का फैसला किया और सधे क़दमों से उसके पीछे चल पड़ी। बंगले के पिकचले हिस्से में कोई रास्ता बंगले के नीचे की ओर जा रहा था उसने देखा नियाज़ वहीं उतर गया है। कुछ पल रुकने के बाद वो नियाज़ के पीछे पीछे वहीं उतर गयी। लगभग ४०-५० सीधी उतरने के बाद उसने देखा कि उस अंधेरे तहख़ाने के कोने में एक कमरे से लालटेन की रौशनी आ रही थी। उसने पास जाकर देखा तो वहाँ दो लड़कियाँ लेटी थीं जिनके सर आपस में जुड़े हुए थे। डर के मारे उसका खून जम गया। ये ये तो वही लड़कियाँ थीं जो कल शाम को उसके घर के बाहर खड़ी उसे बुला रहीं थीं। ये यहाँ तहख़ाने में बंद क्या कर रहीं थीं। उस तहख़ाने में उसके आगे उतरे नियाज़ का भी कोई नमोनिशान नहीं था। उसने देखा कि सामने रखी लालटेन कुछ देर को बुझी और फिर ख़ुद ब ख़ुद ही जल पड़ी। तभी उसके सर पर किसीने बहुत ज़ोर से वार किया और वो बेहोश हो गयी। 

जाने कितना समय निकला होगा पर जब उसे हल्का सा होश आया तो वो अपने कमरे के बिस्तर पर पड़ी थी और कोई मर्दाना आवाज़ उसके कानों में गूंज रही थी “इसके पाँव रोक कर रखें रानी साहिबा वरना आज तक जो राज़ रखा है, वो कब हवा हो जाएगा हमें मालूम नहीं चलेगा, वैसे ही रियासत में लोग उलटी सीधी अटकलें लगने से बाज़ नहीं आते, तुम्हारी ये विलायत से पढ़ी बेटी सारा भंडा फोड़ कर रख देगी”। प्रीति को आधे होश में ऐसा लगा कि हो न हो कोई उसकी माँ से ही बात कर रहा है। वो समझ गयी कि कुछ तो है जो उसकी माँ उससे छुपा रही है। हो न हो कोई बड़ा राज इसके पीछे छिपा है। 

यहाँ तहख़ाने में दिन रात वो लालटेन जलती रहती थी, उस बंगले के नीचे की गुफा में कितना भी अँधेरा हो पर कोई रूहानी ताक़त ही थी जिसके रहते उस लालटेन की लौ ख़ुद ब ख़ुद बार-बार जल उठती थी, उस लालटेन में तो सालों से किसीने तेल भी नहीं डाला था। इसके साथ ही वहाँ रखी एक काली खोपड़ी का रंग खूनी लाल हो उठता और वो बुरी तरह चीख़ना शुरू कर देती। लाल हो चुकी उस खोपड़ी से निकलतीं वो दहला देने वाली चीखें दूर दूर तक सुनायी देतीं और दूर दूर तक बाहर घूमने वाले अपने अपने घरों में रात भर के लिए दफ़्न हो जाते । कोई और चारा नहीं था, पूरी रियासत के हर घर में कब्रनुमा तहख़ाने थे, चीखें सुनते ही जिंदा शरीर ख़ुद ही मुर्दो की तरह घर के फ़र्श के नीचे बनी अपनी अपनी क़ब्रों में जाकर लेट जाते और नींद उन्हें अपने पंजों में ऐसे जकड़ लेती जैसे जिंदगी को मौत, पूरी की पूरी रियासत का हर बाशिंदा हर रात, पूरी रात एक ही सपना देखता था। उस कँपा देने वाले डरावने सपने में सब के सब लोग रात भर अपने घर की दीवारों से, कपड़ों से, अपने आस पास रखी हर चीज़ से खून रिसता देखते थे । सपना इतना गहरा हो जाता था कि कुछ लोगों की तो आँखों से भी खून रिसना शुरू हो जाता था। पर इस बारे में कोई किसीसे बात नहीं करता था। डर की ये रिवायत उस रियासत में कई सालों से ऐसे ही चल रही थी। 

प्रीति इस डर के महल में बिलकुल भी खुश नहीं रह पा रही थी। वो सोच रही थी की आख़िर क्या फ़ायदा हुआ उसके वापिस आने से? इससे तो वो सात समंदर पार ही अच्छी थी काम से कम उसके माँ बाप उसके दिल के क़रीब तो थे, यहाँ इतना लम्बा सफ़र तय कर अपनी माँ का ऐसा रूप देख इस घर में रहने का उसका बिलकुल मन नहीं था। इस सब से परेशान होकर उसने एक छोटा सा प्लान बनाया।उसे अभी ज़्यादा लोग यहाँ नहीं जानते थे और इतना वो समझती थी कि यहाँ का कन्नों भी आसानी से किसी ऐरे गैरे की शिकायत पर कोई कारवाई नहीं करेगा। विलायत में रहने की वजह से उसकी अंग्रेज़ी तो अच्छी थी ही। उसने इंटर्नेट से देखकर एक फ़िरंगी न्यूज़ चैनल का नक़ली आयडेंटिटी कार्ड बनाया और पोलिस के पास पंहुच गयी। उसने बताया कि मीडिया को शक है कि इस हवेली में कुछ ग़लत हो रहा है। आजकल तो मीडिया के डर से सच का झूठ और झूठ का सच बनने में आख़िर कितनी देर लगती है? कितना अच्छा होता कि लोग मीडिया और सोशल मीडिया का इस्तेमाल अफ़वाहों की जगह प्यार और भाईचारा फैलाने में करते? खैर, उसकी निशानदेही पर पोलिस को काम से कम एक सर्च वॉरंट तैय्यार करना पड़ा और अचानक आयी इस मुसीबत के लिए रेवती बिलकुल तैय्यार नहीं थी। रेड शाम को पड़ी, तहख़ाने से नियाज़ को गिरफ़्तार किया गाय और उन बेचारी जिंदा लाशों को उस ख़ौफ़नाक कैद से छुड़वा लिया गया। मार के डर से नियाज़ ने सारा राज उगलना शुरू कर दिया।

नियाज़ ने बताया कि रेवती एक बहुत ही चालाक औरत थी। वो कुछ भी कर के सारी जायदाद पर अपना क़ब्ज़ा कर लेना चाहती थी। और इसके लिए उसने पूरी तैय्यारी करनी शुरू कर दी थी। उसके अपने मायके से अपनी माँ के बहकाने पर वो एक खानसामा याने रसोईया अपने साथ लाई थी। जिसका नाम था नियाज़, कहने को तो नियाज़ सिर्फ एक रसोईया याने कुक था पर असल में वो काले जादू का माहिर था। उसके क़ब्ज़े में ऐसी ऐसी शैतानी ताक़तें थीं कि वो उनसे अपना चाहा हुआ कोई भी काम करवा सकता था। हर रात जब सब सो जाया करते थे तो नियाज़ अपने असली रूप में आ जाता था। रेवती उसको रात को तहख़ाने में बने एक ऐसे छुपे कमरे में पनाह देती थी जिसके बारे में सब को ये ही मालूम था कि वहाँ इस रियासत का एक पुराना श्राप बंद है। कुछ लोग इस बारे में जानते थे और कुछ नहीं। बहुत से लोग इस बारे में बिलकुल बात करना पसंद नहीं करते थे क्यों कि उन्हें लगता था कि इस तरह से श्राप के बारे में बात करने से कहीं उनपर ही कोई मुसीबत न आन पड़े। पर ये श्राप मनीष राज की पहली पत्नी रजनी से जुड़ा था। 

रेवती के पति और प्रीति के पिता मनीष राज की पहली पत्नी से उनकी दो बेटियाँ थीं। बदनसीबी आदमी का ओहदा या उसकी जेब में कितने पैसे हैं ये देख कर नहीं आती। बड़े बड़े राजघराने और रजवाड़े जिन जिन बदकिस्मतों का शिकार रहे हैं उनका ब्योरा देना बड़ा कठिन है और इसी तरह की एक बदनसीबी मनीष राज के परिवार में भी थी। दरअसल, मनीष राज की पहली पत्नी रजनी से उनकी दो बेटियाँ थीं पर वो दोनों माँ के पेट से ही एक अजीब सी बीमारी का शिकार थीं। उन दोनों बेचारी बच्चियों के सर आपस में जुड़े हुए थे। उस ज़माने में विज्ञान इतना विकसित नहीं था तो हर कोई इस तरह से जुड़े सर वाली लड़कियों को देख यही समझा कि ये की पुराना श्राप है या कोई भयानक काला जादू है जो इस परिवार पर किया गया है। ये बच्चियाँ दिखने में किसी इंसान की संतान नहीं बल्कि सीधी नर्क से गिरी दिखती हैं। रेवती की माँ का राजपरिवार के साथ अच्छा उठना बैठना था तो उसने रेवती का रिश्ता मनीष राज से करने के लिए एक मनघडंत कहानी तैय्यार की और इन मासूम बच्चियों को एक तांत्रिक के सहारे तहख़ाने में एक कमरे में रखवा दिया। साथ ही साथ रजनी के बारे में उलटी सीधी बातें मनीष राज और उसके परिवार के माँ में डाल दीं। ये दो बच्चियाँ क्या पैदा हुईं कि रजनी की क़िस्मत ही फूट गयी। हालाँकि पहली बार सर जुड़ी बच्चियों को देख उसके भी होश उड़ गए थे पर फिर भी औलाद तो औलाद ही होती है। चाह कर भी रजनी को उन बच्चियों से मिलने नहीं दिया जाता था। बल्कि तंग आकर एक दिन रेवती की माँ ने मनीष राज से रजनी को कहलवा दिया कि बच्चियाँ मर चुकी हैं। रजनी का कलेजा ये सुनकर फट पड़ा और उसने बिस्तर पकड़ लिया। इसके बाद उसी तांत्रिक के सहारे रजनी को काले जादू का शिकार बनाया गया और मनीष राज से अपनी बेटी रेवती की शादी का रास्ता उसने साफ़ कर दिया। राजपरिवार में रेवती की शादी होते ही होते ही रेवती की माँ ने चालाकी से उस तांत्रिक को भी मरवा दिया। 

यूँ तो राजपरिवार हमेशा से अपनी रियासत की ज़मीनों का तक़ाज़ा करते आए हैं पर इस बार रेवती ने अपनी माँ के सुझाने पर एक किसान को उसका लगान हमेशा के लिए माफ़ करने का लालच देकर बिन माँ की बच्चियों की चौकीदारी पर लगा दिया। न चाहते हुए भी उस किसान को अपना लगान बचाने के लिए उन बच्चियों का ध्यान रखना पड़ता था, हालाँकि पूरी रियासत में यही कहलवाया गया था कि ये बच्चियाँ मनहूस हैं पर जब उस किसान ने उन बच्चियों के साथ वक़्त बिताना शुरू किया तो उसे धीरे धीरे समझ आने लगा कि इसके पीछे कोई बड़ा षड्यंत्र है। क्योंकि, उस किसान के वहाँ होने के दौरान, उन बच्चियों ने ऐसी कोई भी हरकत नहीं की थी जिससे लगता कि उनके इरादे शैतानी हैं बल्कि वो इतनी मासूम थीं कि उसी तहख़ाने में, जबकि उन्हें मुश्किल से एक समय का खाना ही दिया जाता था फिर भी एक दूसरे के साथ खुश रहा करती थीं। ज़िंदगी वैसे भी उनके लिए कम दर्दनाक नहीं थी पर उन मासूम बच्चियों को ज़िंदगी से कोई गिला या शिकवा नहीं था शायद दो वजह से, एक तो उन्होंने उस तहख़ाने से बाहर की ज़िंदगी कभी नहीं देखी नहीं थी और दूसरी, वो बहुत छोटी थीं ये जानने के लिए कि जिंदगी जीने के और भी रास्ते हो सकते हैं। दिन रात वो बेचारी बच्चियाँ अंधेरे तहख़ाने में पड़ी रहतीं पर वो किसान बार बार उनके लिए तहख़ाने में रखा लालटेन जलाया करता था, बस एक 

आँखों ही से तो वो कुछ ठीक से महसूस कर सकतीं थीं, बोलना तो अभी ठीक से सीखा नहीं था और हाथ पैर उनके धीरे धीरे कमज़ोर पड़ते जा रहे थे। 

जब उस किसान ने उन दो मासूम जिंदगियों को इस तरह कैद में भी हँसता खेलता देखा तो उसका मन परेशान हो उठा, उसने सोचा कि ये मासूम अंधेरे में इतनी खुश हैं तो बाहर उजाले में निकल कर कितनी ख़ुश होंगी। एक रात मौक़ा देख वो मनीष राज के पास पंहुच और उससे गुज़ारिश की कि इन बच्चियों का कोई कुसूर नहीं है आप इन्हें तहख़ाने से निकाल लीजिए। पर मनीष राज इस बात का कोई जवाब दें उससे पहले ही रेवती ने ये सब सुन लिया और उस किसान को चेतावनी दी कि मनीष राज के पास जाकर उसने ठीक नहीं किया। 

इसपर वो किसान फिर बोला “ज़मीन से ऊपर की खेती देखना मेरा काम है पर ये राजघराने की जो खेती ज़मीन के नीचे तुम दफ़्न रही हो ये मैं देख नहीं पाऊँगा। इन दो मासूमों के बचपन को इस तरह सूरज के अंधेरे से दूर रख तुम्हें क्या मिलेगा। क्या तुम लालच में इतनी अंधी हो चुकी हो कि ये भी नहीं देख सकती कि जैसे सूरज की रोशनी न मिलने से फ़सल सड़ जाती है उसी तरह एक तो ये बच्चियाँ पहले से ही बीमार हैं और अब तहख़ाने के अंधेरे में पड़ी पड़ी धीरे-धीरे अपंग होती जा रहीं हैं। उनके हाथ पैर ढीले पड़ चुके हैं। अगर जल्दी ही इन्हें किसी वैद्य या हकीम को नहीं दिखलाया गया तो ये बेचारी मर जाएँगी। रेवती के साथ उस किसान को जुबान तराज़ी करता देख मनीष राज गुस्से से पागल हो उठा और सामने दीवार पर टँगी एक दुधारी तलवार उसने उस किसान की गर्दन से सटा दी। इसपर वो किसान बोला “जिस पर पहले से ही एक दुधारी तलवार लगी हो तुम इस तलवार से क्या डराओगे? एक तरफ़ किसान होने के नाते मुझे अपनी ज़मीन का लगान बचाना है और दूसरी तरफ़ एक इंसान होते हुए मुझे इन बच्चियों को, मुझे नहीं लगता तुम्हें उन बच्चियों का बाप होते हुए भी उनकी कोई परवाह है। मैं तुम्हें आगाह कर रहा हूँ कि ये तुम्हारी पत्नी एक बहुत बुरी औरत है और अपने स्वार्थ के लिए ये किसी भी हद तक गिर सकती है।” 

उसकी ये बात सुन रेवती गुस्से से पागल हो गयी और बोली “तुझे उन बच्चियों के अंधेरे में रहने की बहुत चिंता है न तो जा तू भी आज से इसी अंधेरे में कैद रह।” और इसके साथ ही गुस्से से पागल हुई रेवती ने मनीष राज के हाथ से वो दुधारी तलवार छीन कर उस किसान की दोनों आँखें फोड़ डाली और बोली “ये ले, आज से तू भी उन्हीं बच्चियों के साथ उस तहख़ाने का कैदी बनकर रहेगा, तेरी ज़मीन हमारी होगी और वो जेल तेरी। दर्द से कराहते उस किसान ने रेवती के हाथ में पकड़ी वो तलवार सीधे अपने पेट में उतार ली और रेवती से बोला “ठीक है रेवती, तू अपनी ताक़त के गुरुर में पागल हो चुकी है और इस हरकत के साथ इंसान होने की अपनी सारी हदें पार कर चुकी है, तूने आज से मुझे हमेशा के लिए अंधेरों में कैद कर दिया है, आँखें खोलने और बंद करने के मेरे लिए अब कोई मायने नहीं रह गए। 

ऐसी जिंदगी से तो मौत भली, याद रख मैं तो मर रहा हूँ पर आज के बाद तेरे परिवार के साथ साथ इस रियासत में हर आदमी जब अपनी आँख मूंदेगा तो उसे ज़मीन के नीचे ही होना होगा, अगर आज के बाद इस रियासत का कोई भी बाशिंदा ज़मीन के ऊपर सोया तो वो उसकी आख़री नींद होगी, पर ज़मीन के नीचे सोने वाला भी मेरे श्राप से पूरी तरह मुक्त नहीं होगा, जैसे मेरी आँखें रिसते खून को देखती बंद हो रहीं हैं, उसी तरह रात को आँख मूंदने वाली हर आँख अपने चारों ओर खून को रिसता देखेगी” और इसके साथ ही उस किसान ने दम तोड़ दिया। 

रेवती गुस्से से पागल थी, उसने गुस्से में उस किसान की लाश उसी तहख़ाने में, जहाँ बच्चियाँ कैद थीं, वहीं रखवा दी, वो मासूम बच्चियाँ उस लाश के पास बैठी रहने को मजबूर थीं। पर कहते हैं मारने के बाद भी उस किसान ने उनका ख़याल रखना बंद नहीं किया। आख़िर इन्हीं मासूमों के लिए तो उसने अपनी जान दे दी थी और अब तो उसे रोकने वाला कोई नहीं था। अब तो उस किसान की आत्मा हर तरह से उन बच्चियों का ध्यान रखने लगी। यहाँ तक की अभी भी अंधेरे तहख़ाने में रखी लालटेन रोज़ ख़ुद ही जल जाया करती थी। पर इसपर भी रेवती को संतोष नहीं था, उसने मेरे हाथों उस किसान की आत्मा को कैद कर लेने का हुक्म दिया। 

मैंने उसकी लाश को भूनकर उसकी खोपड़ी निकलवा ली और उसपर काले इल्म का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। धीरे धीरे मेरा चलाया काला जादू उस खोपड़ी में नुमायाँ होने लगा यानी दिखाई पड़ने लगा और उस खोपड़ी का रंग काला पड़ता चला गया, क़िस्मत की मार उन दोनों बहनों पर बदस्तूर, याने लगातार पड़ती रही पर ऊपर वाले का करम कहें या क्या कि उनकी जिंदगी उनके सर से जुड़े शरीरों में अभी भी दौड़ रही थी। पर उनकी उम्र और शरीर बढ़ने के साथ साथ उनपर रेवती के जुल्म भी बढ़ते चले गए। कभी उन्हें दिनों दिनों खाना न मिलता तो कभी उनपर कोड़े बरसाए जाते। जब भी उनपर कोई ज़ुल्म होता तो उस तहख़ाने में रखी वो खोपड़ी काली से लाल हो जाती और बुरी तरह चिल्लाती, उन लड़कियों के सामने कोई इंसानी बात चीत नहीं होती थी तो वो बात करना भी नहीं सीख पायीं, आज भी वो यही समझती थीं कि ये दर्द उनकी ज़िंदगी का ही एक हिस्सा है पर उस किसान की आत्मा उनका दर्द नहीं झेल पाती थी, काली से लाल हो चुकी उसकी खोपड़ी चिल्ला चिल्ला कर उन बच्चियों को बचाने की गुहार लगती थी। 

अपनी पहली साँस से आज तक तहख़ाने में पड़े रहने से उन बच्चियों में धीरे धीरे अजीब सी ताक़त आ गयी थी। भले ही वो दिन रात दर्द में डूबी रहतीं थीं पर जिंदगी जीने की उनकी इच्छा इतनी बड़ी थी कि उन्हें मालूम ही नहीं चला कि उन्हें रात को अपने शरीर से बाहर निकल कर घूमने की सिद्धि मिल गयी थी। उनके शरीर वहीं पड़े रहते और वो दोनों अपने शरीरों से निकल रात भर बाहर घूमतीं, रात में तो पूरा इलाक़ा सुनसान ही होता था पर फिर भी वो यहाँ 

वहाँ घूम कर अपना दिल बहलाती थीं और सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही उनकी आत्माएँ वापिस अपने शरीरों में आ जातीं थीं।” 

नियाज़ के इस बयान और तहख़ाने में मिले सबूतों के बाद किसीको कोई शक नहीं था। इसके साथ ही प्रीति ने अपनी सच्चाई पोलिस वालों को बात दी और अफ़सोस ज़ाहिर किया कि वो ऐसे घिनौने माँ बाप की बेटी है। पोलिस ने उसकी हिम्मत की तारीफ़ की और अगले दिन के तो क्या अगले कई हफ़्तों की टी वी रिपोर्ट्स और अख़बार इस बेरहम ख़बर से भरे पड़े थे। प्रीति को अपनी बहनों के साथ बीती अनहोनी का इतना अफ़सोस था कि उसने पोलिस से उन दोनों को अपने साथ वापिस विलायत ले जाने की पर्मिशन माँगी और उनका इलाज विलायत में शुरू हो गया। रेवती, मनीष और नियाज़ के कर्मों का फल वो आज भी हवालात की चारदीवारी में काट रहे हैं। 

प्रीति की दोनों बहनो के सर ऑपरेशन से अलग कर दिए गए हैं और आज वो खुली हवा में साँस ले रही हैं। उम्मीद है इसके साथ ही उस किसान और रेवती की आत्मा को भी शांति मिल गयी होगी। 

Ghost stories-सफ़र की चुडैल 

क्या बात कर रहे हो मियाँ? क्या चलती ट्रेन में भी ऐसा हो सकता है? मुकुंद ने रफ़ीक से बड़ी ही हैरानी से पूछा। 

हाँ मुकुंद भाई, कोई माने या ना माने जिन्न, जिन्नातों, चुडैलों, डायनों, और काले जादू में ऐसी कई ताक़तें हैं जो चलती ट्रेन को भी मौत का फ़रमान भी बना सकती हैं। मेरे गाँव के पास कई ऐसी कहानियाँ मौजूद हैं जिन्हें सुनकर ख़ौफ़ से खून जम जाता है और अभी तुम और मैं यहाँ बैठ कर इस बारे में बात कर रहे हैं तो उस बारे में सोच कर ही मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं। 

Ghost stories-सफ़र की चुडैल 

वैसे तो कई सुने सुनाए क़िस्से हैं जो इस डरावनी रेल के बारे में मशहूर हैं पर एक वाक़या है जो हमारे साथ पेश आया था। उसे सोच कर आज भी बदन में बिजली सी दौड़ जाती हुआ क्या था रफ़ीक भाई? 

“दर-असल, अब्बू हमारे बहुत चाहते थे कि हमारी बहन अच्छे से पढ़ जाए और हो सके तो वकालत करे, अब बड़ी बात नहीं कि बहुत लोग उनके इस फैसले के ख़िलाफ़ भी थे। कोई बड़ी बात नहीं है किसीके ख्वाबों के परिंदों के पर कतरना, अब सड़क के किनारे सोने वाले भी चाँद पर 

तो थूक ही सकते हैं फिर भले ही वो दुगनी तेज़ी से आकर वापिस मुँह पर क्यों न गिरे। 

पर मेरे अब्बू किसीसे डरें या किसीके बहकावे में आएँ ऐसे नहीं थे।” 

“थे? थे मतलब?” 

“थे मतलब अब हमारे सर पर उनका साया नहीं है। अल्लाह उनको जन्नत नसीब करे, हमारे अब्बू के चट्टान जैसे इरादे समाज के दकियानूसी तूफ़ान से टकराने को काफ़ी थे और हमारी बहन नफ़ीसा भी कम कहाँ थी। एक बार अब्बू ने उसे आसमान का पता दे दिया तो वो भी एक लम्बी उड़ान भरे बिना लौटने वाली कहाँ थी। अब इरादों को इरादों की महक लगती है मियाँ। अब्बू ने नफ़ीसा को गाँव से निकाल कर लड़कियों के एक हॉस्टल में दाखिल दिलाने का सोच लिया था। अब्बू कहते थे कि बंद दमागों की चाबियाँ तालीम की किताबों में ही छुपी हैं मेरे बच्चों, जाओ जाकर ढूँढ लो। 

और हम और अब्बू, नफ़ीसा को लेकर माडर्न गल्र्ज़ हॉस्टल के लिए निकल पड़े, हॉस्टल के लिए रात भर का ट्रेन का सफ़र तय करना था, ठीक नौ बजे घर से ही खाना पैक करवाकर हम प्लाटफ़ोर्म पर पंहुच गए थे। अब्बू थोड़े उदास से थे पर फिर नफ़ीसा ने समझाया कि शादी नहीं हो रही अब्बू मेरी बस पढ़ाई ख़त्म कर वापिस आ जाऊँगी, तो अब्बू ने कहा नहीं बेटी मैं तुम्हारे जाने से दुखी नहीं हूँ बल्कि इस बात से दुखी हूँ की आज भी हमारे कई बच्चे तालीम से महरूम हैं, जाने कब हम तालीम की ज़रूरत को तवज्जो देंगे और तुम्हारी तरह सबकी बेटियाँ और बेटे पढ़ाई के लिए किताबें खोलेंगे। उनकी बात सुन नफ़ीसा और मेरा सर फक्र से ऊँचा हो गया था। नफ़ीसा ऐसे अब्बू पाकर बहुत खुश थी क्योंकि वक़ील बनकर वो सिर्फ़ खुद की ही नहीं बल्कि किसी और की मदद भी कर सकती थी। अभी हम बातें कर ही रहे थे कि ट्रेन प्लाट्फोर्म पर पंहुच गयी। 

 

ट्रेन में अपनी अपनी बर्थ लेकर हम जम गए। ऊपर की बर्थ पर नफ़ीसा थी और नीचे खिड़की वाली बर्थ के पास हम और अब्बू। ऊपर की चौथी बर्थ अभी ख़ाली ही थी। खैर टिकट चेकर आया और टिकट चेक करने के लिए हमसे टिकट माँगा। टिकट एक शहर मराँखा के लिए थे। “कहाँ जाओगे मराँखा में? बस स्टेशन पर ही उतरेंगे भाई साहब? ट्रेन तो स्टेशन से आगे जाएगी नहीं न? वैसे आप चाहें तो हमें माडर्न गर्ज़ हॉस्टल छोड़ दीजिएगा? हम वहीं उतर जाएँगे। हमने चुटकी लेते हुए जवाब दिया। टी०सी० ने या तो चुटकुला समझा नहीं या उसका मूड ख़राब था समझ नहीं आया बस बुरा सा मुँह बनाकर बोला “वापसी रात की ट्रेन मत लेना वहाँ से, जहाँ जाओ रात वहीं रुक जाना”। “प पर क्यों? अब्बू ने पूछा तो उसने कोई जवाब नहीं दिया और टिकेटों पर पेन के निशान बना कर चला गया। 

आख़िर कुछ १५-२० मिनट बाद ट्रेन ने हमारा स्टेशन छोड़ और हमने राहत की साँस ली। हम तीनों ने घर से लाया खाने का डिब्बा खोला और खाने के साथ साथ ट्रेन की खिड़की से दिखते नज़ारे का मज़ा लेने लगे। कभी धीमे कभी तेज़ पर अंधेरे में भी बाहर से झाँकते पेड़, मद्धम रोशनियाँ, खेत, सड़कें,खलिहान, सबकुछ हल्के गहरे काले रंग में सिमटा सा था, दिन में दिखने वाला नीला आसमान, हरे खेत, रंग-बिरंगे घर, सब किसी जादूगर ने काले रंगों में पोत दिए थे पर फिर भी सब अलग अलग दिख रहे थे। क्या कुदरत है, बेमिसाल, हर पहर के साथ हर चीज़ रंग बदल लेती है पर हमारे दिमागों की फ़िजूल की मचमच हमें कुछ देखने ही नहीं देती। मैं अपने ख़यालों में खोया ही था कि तभी नफ़ीसा की आवाज़ गूंजी “अब्बू वो देखो?” “क क्या, कहाँ?” अब्बू ने पूछा। वो, वहाँ पीछे एक बड़ी सी औरत थी। दिखने में एकदम लम्बी, लम्बे सफ़ेद बाल, चमकती आँखें, जब तक मैं उसे देख रही थी वो मुझे ही घूर रही थी। 

“बज गए पौने दस और हो गयी बहन हमारी पागल, अब्बू ये लिख के रख लो, पौने दस बजे बहन को पागलपन का दौरा पड़ता है।” “पागलों वाली बात मत करो रफ़ीक। बड़ी बहन से ऐसे पेश आते हैं?” अब्बू ने डाँटते हुए हमें चुप करवा दिया। अभी इस बात को हुए कुछ पाँच ही मिनट हुए होंगे की फिर नफ़ीसा चिल्लायी “अब्बू वो देखो वो, वो उसकी बात कर रही थे मैं।” वो देखो और थोड़ी पास आ गयी है। अब्बू और मैंने तपाक से बाहर देखा तो वहाँ कोई नहीं था। मैं धीरे से बोला “पौने दस” और जवाब में नफ़ीसा ने मेरे सर पर कस कर एक तमाचा लगा दिया। 

कुछ देर बाद हमने अपनी अपनी बर्थ का रख किया और जल्दी ही सोने की कोशिश करने लगे। किसी झूले की तरह ट्रेन के झटके और खिड़की से आती बाहर की ठंडी हवा ने जल्द ही अब्बू और शायद नफ़ीसा दोनों को सुला दिया था। मैं भी नींद के झोंके ले ही रहा था पर बीच बीच में बाहर से कोई अजीब सी धुन आती हुई सुनाई दे रही थी। कुछ ही देर में मुझे लगा कि मेरे होश खो रहे हैं। 

रात के कुछ पौने दो बजे होंगे जब किसीके आवाज़ देने से नफ़ीसा की नींद खुली। सामने एक लम्बा चौड़ा टिकट चेकर खड़ा था। “टिकट निकाल लड़की” उसकी अजीब सी आवाज़ गूंजी, साथ ही वो कोई अजीब सी सीटी बजा रहा था। बहुत हल्की सी रोशनी होने के कारण उसका चेहरा ठीक से दिख नहीं रहा था। नफ़ीसा बहुत घबरा गयी 

और चिल्लायी “अब्बू?” “रफ़ीक?” 

जवाब में उसी टिकेट चेकर की भद्दी आवाज़ गूंजी “वो यहाँ नहीं हैं लड़की” 

“क, क्या? वो यहाँ नहीं हैं। प पर टिकट तो उन्हीं के पास 

एक पल को सन्नाटा हो गया 

पटरी पर भागती ट्रेन कि सीटी अपनी तीखी आवाज़ से दूर दूर की वीरानी को चीर रही थी और नफ़ीसा के दिल की धड़कन चलती ट्रेन की आवाज़ से ताल मिला रही थी। सन्नाटे में उस टिकट चेकर की आवाज़ और भयावनी लग रही  थी और साथ ही साथ नफ़ीसा पर अजीब सी बेहोशी और कमज़ोरी छा रही थी। 

वो टिकट चेकर नीचे मुँह कर कुछ लिखता रहा। पर हैरानी की बात थी उसका चेहरा कुछ ठीक से दिख नहीं रहा था। काफ़ी देर वो ऐसे ही कुछ लिखता रहा। 

वो धीरे से मुड़ा और डिब्बे का एक चक्कर लगाकर वापिस आ गया और उसी डरावनी आवाज़ में बोला “ये डिब्बा तो बिलकुल ख़ाली है लड़की, कहाँ हैं सब?” 

“ज जी, क्या कह रहे हैं, या अल्लाह?” नफ़ीसा घबरायी हुई सी बोली। 

“बकवास मत कर लड़की, टिकट दिखा, तू झूठ बोल रही 

और इसके साथ ही उस टिकट चेकर ने अपनी गर्दन उठायी, जिसे देखते ही नफ़ीसा का दिल धक्क से रह गया। उस टिकट चेकर का चेहरा हू-बहू उस सफ़ेद औरत से मिलता था जो नफ़ीसा ने कुछ देर पहले बाहर देखी थी। लम्बे लम्बे सफ़ेद बाल और आँखें पुरज़ोर चमक रहीं थीं। वो ऐसे चमक रही थी कि लगा एक पल को पूरे डिब्बे में अँधेरा हो गया है। यानी ये कोई टिकट चेकर नहीं बल्कि वो औरत ही थी जो उसका भेस लेकर डिब्बे में घुस आयी थी। 

“अ आप कौन हैं और यहाँ कैसे आयीं?” 

अब तक उसका पूरा रूप बदल चुका था। उसने अपने दोनों सफ़ेद चमकते हाथ मेरी ओर बढ़ाए और नफ़ीसा को खींच कर नीचे उतरने पर मजबूर कर दिया, नफ़ीसा बुरी तरह चिल्ला रही थी पर उसके ख़ौफ़ से नफ़ीसा के गले से कोई आवाज़ नहीं फूट रही थी, उसकी आँखें डर से फटीं थीं और हलक सूख चुका था। 

वो ख़ौफ़नाक औरत अभी भी वही भयानक सीटी बजा रही थी। साथ ही उसके सफ़ेद हाथ उस धुन का साथ देते-देते हवा में लहरा रहे थे। 

नफ़ीसा दुबक कर खिड़की के पास घुसकर बैठ तो गयी पर अभी भी बुरी तरह काँप रही थी 

बड़ी हिम्मत कर उसने पूछा “आप यहाँ कैसे आयीं, म मुझसे क़ क्या काम है?” 

इतने में वो और ज़ोर से हँसते हँसते नाचने लगी और पल भर में वहाँ से ग़ायब हो गयी। 

एक पल बाद ही वो खिड़की के बाहर हवा में ट्रेन के साथ साथ दौड़ने लगी। 

फिर बाहर से ग़ायब होकर वापिस अंदर चमकने लगी 

“अंदर, बाहर, अंदर, बाहर” 

“देख मैं कहीं भी आ जा सकती हूँ।” 

इसके साथ ही उसके पैर लम्बे हुए और ऊपर की बर्थ पर बैठ गयी। फिर पैर वापिस सिकुड़ गए और अब वो ट्रेन के डिब्बे की छत से उलटी लटकी उसे घूर रही थी। 

नफ़ीसा को काटो तो खून नहीं। उसके खून का क़तरा क़तरा जम चुका था। 

सर से पाँव तक बदन में जैसे चींटियाँ काट रहीं थीं 

तभी सामने से छत पर चलते चलते ही एक और चुडैल पहली वाली के साथ आकर उलटी लटक गयी और दोनों भयानक आवाज़ में उलटी लटकी सीटी बजाने लगीं। 

अब डर हद के पार हो चुका था। नफ़ीसा के गले से दिल दहला देने वाली चीख निकली जो उस चलती ट्रेन के शोर में भी साफ़ साफ़ सुनायी दी। उसके चीखते ही दोनों चुडेलें वहाँ से ग़ायब हो गयीं। 

अब्बू और रफ़ीक भागते हुए वापिस आए और उनके साथ उस डिब्बे के सारे लोग भी थे। 

“क्या हुआ बेटी?” अब्बू ने घबराते हुए पूछा 

“व वो वही औरत जो हमने बाहर देखी थी न अब्बू व वही अंदर चली आयी थी, जाने कैसे हमने जब चीख़ त तो व वो यहाँ से ग़ायब हो गयी। व वो दो थीं अब्बू। आ आप और रफ़ीक और ये सब लोग कहाँ थे?” नफ़ीसा ने घबराते उड़ पूछा 

“अरे बेटी यहाँ साथ के डिब्बे से एक भयानक चीख़ आयी थी, क्या माजरा है ये देखने हम वहाँ चले गए थे। वहाँ भी एक लड़की के साथ ऐसा ही एक वाक़या पेश आया था, तो इस गहमा-गहमी में हम भी जल्दी में घबरा कर देखने पूछने ही गए थे पर क्या मालूम था यहाँ भी ऐसा होगा। 

ये सारा शोर सुनकर किसी ने डिब्बे की चेन खींच दी, ट्रेन रोकी गयी पर इसके बाद भी टिकट चेकर या रेल्वे का कोई कर्मचारी वहाँ नहीं आया। कुछ पाँच-दस मिनट ट्रेन वहीं रुकी रही। कुछ लोग ट्रेन से नीचे उतरे कि क्या माजरा है? 

कुछ गिने चुने ही थे। ज़्यादातर या तो सो रहे थे या डरे बैठे थे। 

हमने खिड़की से बाहर झाँका तो हमें भी कुछ दिखा नहीं। बस किसी मीलों लम्बे अजगर के कंकाल की हड्डी की तरह दूर दूर तक फैली साथ वाली रेल की पटरी दिख रही थी। खैर घबरायी परेशान नफ़ीसा को हमने पानी पिलाया और अब्बू ने हमें ऊपर की बर्थ पर जा कर लेटने का फ़रमान जारी कर दिया। 

कुछ देर बाद इंजन की सीटी बजी और नीचे उतरे सारे मुसाफ़िर घर लौटते परिंदों की तरह वापिस ट्रेन में लौट पड़े। ट्रेन ने एक झटका लिया और किसी साँप की तरह पटरी पर फिर रेंगनी शुरू हो गयी। 

कोई ख़तरनाक मसला है? मैंने मन ही मन सोचा। ऊपर लेटे हुए बोरियत सी महसूस हो रही थी और इस ख़तरनाक वाक़ये के बारे में सुनकर डर के मारे मेरी पलकों ने बंद होने से मन कर दिया था। 

कुछ देर गुज़री होगी अब हमारी भी हल्की सी आँख लग गयी थी। पर कुछ देर बाद स्टील के बर्तनों की खड़खड़ाहट से हमारी नींद टूटी। जैसे, शायद किसीने स्टील का टिफ़िन खोला था। अब ये रात के तीन बजे किसे भूख लगी है? हैरान परेशान हो मैंने आँख खोली ही थी की मैं वहीं लेटे बुत बन गया था। सामने की बर्थ पर अपने लम्बे पैर लटकाए एक भयानक सफ़ेद औरत हमारा घर से लाया हुआ टिफ़िन खोल कर चाट रही थी। 

खुदा खैर करे, आख़िर ये क्या बला है? 

 

BHOOT

जाने मेरे अंदर किस शैतान का भूत घुसा मैं वहाँ बर्थ से सीधा नीचे कूदा और डिब्बे के बाहर भाग लिया। रात के तीन बजे मेरे कूदने और भागने की आवाज़ पटरी पर सरसराती ट्रेन के झटकों में दब कर रह गयी होगी। भाग कर मैं डिब्बे के दरवाज़े के पास पंहुचा और घबरा कर ट्रेन के टायलट में घुस कर दरवाज़ा बंद कर लिया। टाँगें बुरी तरह काँप रहीं थीं। 

साथ ही किसी ने ज़ोर ज़ोर से टायलेट का दरवाज़ा बुरी तरह बजाना शुरू कर दिया था। मैं बुरी तरह चीख़ रहा था पर ट्रेन अपनी पूरी गति पकड़ चुकी थी। बाहर कोई इंसान है या वही चुडैल ये पता लगाना मुश्किल था। तभी दरवाज़े का हैंडल अपने आप घूमने लगा। मैंने कस कर हैंडल पकड़ 

दरवाज़े को खुलने से रोकने की कोशिश की पर उतने ज़ोर से किसी इंसान का लड़ पाना शायद नामुमकिन था। 

इस जद्दोजहद से मेरे हाथ बुरी तरह छिल चुके थे। मजबूरन मेरे हाथ की पकड़ ढीली हो गयी और धड़ाक से वो दरवाज़ा खुल गया और मेरे पैरों पर इतनी ज़ोर से लगा कि दर्द से बिलबिलाता मैं सीधा बाहर डिब्बे के दोनों दरवाज़ों के बीच जा गिरा। 

एक पल को लगा सीधा किसी भयानक अजगर के पेट में जा पड़ा हूँ। पैर के दर्द से मेरा बुरा हाल था। कुछ देर तक पैर को मसलने के बाद जब तक उठने की हालत हुई तो देखा डिब्बे के खुले दरवाज़े पर एक बहुत खूबसूरत लड़की बैठी थी। एक तरफ़ से दिखता उसका चेहरा बहुत ही हसीन लग रहा था। मैं ट्रेन के फ़र्श पर पड़ा उठने की कोशिश कर ही रहा था कि वो बिना मेरी ओर देखे उठी और उसी टायलेट में जा घुसी जहाँ मैं बैठा था और इससे पहले कि मैं कुछ बोलूँ उसने दरवाज़ा बंद कर लिया। मैंने चीख़ कर उसे रोकने की कोशिश की पर शायद कोई फ़ायदा नहीं होता। न ट्रेन सुनने देने के मूड में थी और न वो लड़की सुनने के। 

कुछ देर बाद मैं थोड़ी हिम्मत कर वहीं ट्रेन के फ़र्श पर बैठ गया। शायद इस सब में कोई आधा घंटा बीत गया था। मैं हैरान था कि आख़िर वो लड़की अभी तक बाहर क्यों नहीं आयी। मैंने उठ कर टायलेट का दरवाज़ा खटखटाया पर कोई जवाब नहीं आया। पर एक पल बाद ही उआ टायलेट के दरवाज़े का हैंडल घूमता सा महसूस हुआ और एक बार फिर धड़ाक से दरवाज़ा सपाट खुल गया। पर टायलेट के अंदर कोई नहीं था। डर से मुझे चक्कर आ गया था। मैं वापिस डब्बे की ओर भागने को पलटा तो ट्रेन की छत की ओर कुछ सफ़ेद सा चमक रहा था, देखा तो वहाँ वही लड़की आराम से छत पर उलटी ऐसे लेटी थी जैसे कोई अपने बिस्तर पर। मुझे उसकी ओर देखता देख वो छत से ही रेंगती हुई ट्रेन के दरवाज़े से बाहर तैर गयी। मैं वहीं अपने होश खो बैठा। 

सुबह कोई पाँच बजे मैंने देखा तो अब्बू, नफ़ीसा, वो टिकट चेकर और ट्रेन का एक और कर्मचारी मेरे आसपास बैठे मुझ पर पानी छिड़क रहे थे। मैंने अपने साथ गुज़र वाक़या उन्हें बताया तो उस टिकट चेकर के चेहरे पर कोई हरकत नहीं 

उसका चेहरा देख मेरे अब्बू झल्लाए, “क्या पागलपन है साहब, क्या आपने लड़के की बात नहीं सुनी और रात चेन खिंचने के बाद भी आपकी ट्रेन का कोई नुमाइंदा हाज़िर नहीं हुआ, ये माजरा क्या है?” 

“ज़रूर आप लोगों को कोई वहम हुआ है” उसने टका सा जवाब दिया और जाने लगा 

पर तब अब्बू ने उसे नफ़ीसा और साथ वाले डब्बे में किसी 

और लड़की के साथ गुज़रे हादसे के बारे में बताया तो वो बोला “भाई साहिब, आप और आपके बच्चे जिंदा हैं बस 

शुक्र मनाइए, हम तो पेट पालने के लिए रोज़ जान ख़तरे में डालते हैं, हर रात १०-११ बजे के बाद ये बेख़ौफ़ पूरी ट्रेन में घूमतीं हैं। ऐसा लगता है जैसे इस ट्रेन पर इंसानों का नहीं इन्हीं चुडैलों का राज है। 

“किसी कमीने ने अपनी बीवी और शादी लायक़ बेटी को रात के सफ़र में चलती ट्रेन से धक्का दे दिया या कोई औरत और लड़की एक साथ ट्रेन से कूद गयीं नहीं मालूम, पर दोनों की शिनाख्त नहीं हो पायी थी क्योंकि दोनों बिना ताक़त सफ़र कर रहीं थीं। एक बेचारी तो कई किलोमीटर घिसटती चली गयी थी। उनकी लाशें इस हालत में मिलीं थीं कि पहचानना भी मुश्किल था। अब किसी ने मारा या ये ख़ुदकुशी थी ये कोई नहीं जानता, इनसे घबराकर हमने इंजन के साथ वाले डिब्बे में हनुमानजी का एक मंदिर बनाया है, हममें से बारी-बारी कोई न कोई जाग कर हनुमान चालीसा पढ़ता रहता है और रात भर कुछ भी हो हम उस डिब्बे से बाहर नहीं निकलते, हर रात इनका ख़ौफ़ इस ट्रेन के साथ इन पटरियों पर दौड़ता है पर अब कौन जान खतरे में डाले” 

“अब तो आप समझ गए होंगे कि मैंने वापसी में रात की ट्रेन लेने से क्यों मना किया था” 

इतना कहकर वो वहाँ से चला गया। 

कुछ ही देर में हमारा स्टेशन आते ही हम उतर गए, वापसी की रात की टिकटें केंसिल करवा अगले दिन सुबह की 

करवायिन और ऊपर वाले का नाम लेते हुए वहाँ से किसी तरह माडर्न कॉलेज पंहुचे। 

उसका अड्मिशन कर अब्बू और हम घर लौट आए और बहन हमारी वकालत पढ़ने लगीं। गर्ज़ हॉस्टल था तो अब्बू भी निफ़राम हो लिए और अम्मी को समझा दिया कि घबराने की कोई बात नहीं है लड़की एकदम दुरुस्त जगह पर है। अम्मी अब्बू की हर बात पर ऐसे भरोसा करतीं थीं जैसे फ़सल बारिश पर। अपनी आँखें मूंद अम्मी ने अल्लाह का शुक्र किया, रास्ता दिखाने की दुआ की और हमारी ओर देख कर बोलीं कि तुम्हारी बहन तो वक़ील बनेगी और तुम क्या बनोगे? आवारा? पता चला उसकी सारी उम्र तुम्हारी बे सिरपैर के मुक़द्दमे लड़ते बीत गयी। आवारागर्दी बंद करो मियाँ और थोड़ा पढ़ाई में ध्यान दो, दसवीं के पर्चे सर पर नाच रहे हैं। 

और हम भी गुलटू सी गर्दन घुमाए नज़रें बचाते हुए किताबों की शेल्फ से धूल झाड़ने लगे। 

 

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