पौराणिक कथाएं-गयासुर की कथा 

पौराणिक कथाएं-गयासुर की कथा 

पौराणिक कथाएं-गयासुर की कथा 

धर्म, सदाचार, नीति, न्याय, और सत्य का बोध कराने वाली प्राचीन कथाएं। यह प्राचीन कथा है हमारे जीवन के लिए प्रेरणादायक होती है।

अनोखा बलिदान

वैदिक काल में ब्रह्माजी जब सृष्टि की रचना कर रहे थे तो असुर कुल में ‘गय’ का जन्म हुआ, पर उसमें आसुरी वृत्ति नहीं थी। वह परम वैष्णव तथा दैवज्ञ था। वेद संहिताओं में जिन असुरों का नाम आया है, उसमें गय प्रमुख है। 

एक बार उसकी इच्छा हुई कि वह अच्छे कार्य कर इतना पुण्यात्मा हो जाए कि लोग उसके दर्शन करके ही सब पापों से मुक्त हो जाएं तथा मृत्यु के बाद उन्हें स्वर्ग में स्थान मिले। 

ऐसा विचार कर उसने कोलाहल पर्वत पर समाधि लगाकर भगवान विष्णु की तपस्या करनी प्रारंभ की। वर्ष पर वर्ष बीतते गए, उसकी तपस्या चलती रही। 

पौराणिक कथाएं-गयासुर की कथा 

उसके कठोर तप से प्रभावित होकर भगवान विष्णु प्रगट हुए और गय की समाधि भंग करते हुए कहा-“महात्मन गय, उठो! तुम्हारी तपस्या पूर्ण हुई। किस उद्देश्य के लिए इतना कठोर तप किया? अपना इच्छित वर मांगो।” गय ने आंखें खोली तो देखा, सामने चतुर्भुज भगवान विष्णु खड़े हैं। गय ने चरणों में दण्डवत प्रणाम कर कहा-“भगवन! आपके चतुर्भुज रूप का दर्शन कर मेरे सब पाप दूर हो गए। मुझे ऐसा लगता है कि आप इसी रूप में मेरे अन्दर समा गए हैं। अब तो यही इच्छा है, आप इसी रूप में मेरे शरीर में वास करें तथा जो मुझे देखे, उसे मेरे बहाने आपके दर्शन का पुण्य मिले तथा उसके सभी पाप नष्ट हो जाएं और वह इतना पुण्यात्मा हो जाए कि मृत्यु के बाद उस जीव को स्वर्ग में स्थान मिले। मेरे इस तप का फल उन सबको प्राप्त हो जो मेरे माध्यम से आपके अप्रत्यक्ष दर्शन करें।”

गय की इस सार्वजनिक कल्याण-भावना से भगवान विष्णु बहुत प्रभावित हुए और हाथ उठाकर बोले-‘तथास्तु!” ऐसा कहते ही भगवान अन्तर्धान हो गए। 

अब गय एक स्थान पर न बैठकर सर्वत्र घूम-घूम कर लोगों से मिलता। फलस्वरूप जो भी उसे देखता, उसके पापों का क्षय हो जाता और वह मरणोपरान्त स्वर्ग का अधिकारी हो जाता। 

इससे यमराज की व्यवस्था में व्यवधान आ गया। अब किसी के कर्मफल का लेखा-जोखा वे क्या रखें, जब गय के दर्शन होते ही उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं तथा वह स्वर्ग का अधिकारी हो जाता है तो फिर नरक दूतों का क्या कार्य रहा। 

उन्होंने ब्रह्मा जी के सामने यह समस्या रखी। ब्रह्मा जी ने कहा-“ठीक है, इसका कुछ उपाय करते हैं। कर्मफल का विधान बना रहना चाहिए। हम इसके शरीर पर एक यज्ञ का आयोजन करते हैं तथा मैं और अन्य सारे देवता इसकी पीठ पर पत्थर रखकर, उस पर बैठकर उसे अचल कर देंगे। फिर यह कहीं आ-जा न सकेगा।”

गय की पीठ पर यज्ञ हो, यह तो और पुण्य का काम है, गय ने ब्रह्मा के इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया। ब्रह्मा जी यमराज सहित सारे देवताओं को लेकर, पत्थर से दबाकर उस पर बैठ गए। अपने ऊपर इतना भार होने पर भी गय अचल नहीं हुआ। देवगणों को चिन्ता हुई तो ब्रह्मा ने कहा-‘इसे भगवान विष्णु ने वरदान दिया है, इसलिए हम विष्णु जी की शक्ति का आह्वान करें तथा उन्हें भी इस शिला पर अपने साथ बैठाएं, तब यह अचल होगा।” 

ब्रह्मा समेत सब देवों ने विष्णु का आह्वान किया तथा अपनी और यमराज की समस्या बताई। विष्णु इस पर विचार कर जब सबके साथ उस पर बैठे तब कहीं जाकर वह अचल हुआ। 

विष्णु को अपने ऊपर आकर बैठे देखकर उसने देवताओं से कहा-“आप सब तथा भगवान विष्णु की मर्यादा के लिए मैं अब अचल होता हूं तथा घूमकर लोगों को दर्शन देकर जो उनका पाप क्षय करता था, उस कार्य को समाप्त करता है। पर आप सबके इस प्रयास से भी भगवान विष्णु का यह वरदान व्यर्थ सही जाएगा। भगवन, अब आप मुझे पत्थर-शिला के रूप में परिवर्तित कर यहीं अचल रूप से स्थापित कर दें।” 

गय का यह मर्यादित त्याग देखकर भगवान विष्णु प्रसन्न हो उठे और बोले-गय! तुम्हारा यह त्याग व्यर्थ नहीं जाएगा। इस अवस्था में भी तुम्हारी कोई इच्छा हो तो वह कहो, मैं उसे पूर्ण करूंगा।” 

गय ने कहा-“नारायण ! मेरी इच्छा है कि आप इन सभी देवताओं के साथ अपरोक्ष रूप से इसी शिला पर विराजमान रहें और यह स्थान मरणोपरान्त धार्मिक कृत्य के लिए तीर्थस्थल बन जाए। जो व्यक्ति यहां अपने पितरों का श्राद्ध करें, तर्पण-पिण्ड दान आदि करें, उन मृतात्माओं को नरक की पीड़ा से मुक्ति मिले। यह सारा क्षेत्र ऐसी ही पुण्य-भूमि बन जाए।” 

विष्णु ने कहा-“गय! तुम धन्य हो! तुमने अपने जीवन में भी जन कल्याण के लिए ऐसा ही वर मांगा और अब मरण-अवस्था में मृत आत्माओं की मुक्ति के लिए भी ऐसा ही वर मांग रहे हो। तुम्हारी इस जन-कल्याण भावना से हम सब बंध गए। ऐसा ही होगा। इस क्षेत्र का नाम तुम्हारे नाम गयासुर के अर्धभाग ‘गया’ से विख्यात होगा। इस क्षेत्र में आने वाले तथा इस शिला के दर्शन कर यहां श्राद्ध तर्पण-पिण्ड दान करने वालों के पूर्वजों को जीवन में जाने-अनजाने किए गए पाप कर्मों से मुक्ति मिलेगी। यहां स्थित पर्वत ‘गयशिर’ कहलाएगा। गयशिर पर्वत की परिक्रमा, फल्गू नदी में स्नान तथा इस शिला का दर्शन करने पर पितरों का तो कल्याण होगा ही, जो यहां इस उद्देश्य से आएगा, उसके पुण्य में भी श्रीवृद्धि होगी।” 

भगवान विष्णु से ऐसा वर पाकर गय संतुष्ट होकर शान्त हो गया। बिहार प्रदेश में स्थित ‘गया’ पितरों के श्राद्ध पिण्ड-दान का महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान है। यहां स्थित विष्णु मंदिर के पृष्ठ भाग में पत्थर की एक अचल शिला आज भी स्थित है। 

जो जन-कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित करते हैं, उनका यश ऐसे ही चिरकाल तक स्थायी तथा स्थिर होता है। जो केवल अपने लिए न जीकर समष्टि के लिए जीते हैं, उनका जन्म-मरण दोनों सार्थक होता है। 


Mythology – Legend of Gaiasur

Ancient stories providing religion, morality, policy, justice, and realization of truth. This ancient story is inspiring for our lives.

Unique sacrifice

In the Vedic period, when Brahmaji was creating the universe, ‘Gay’ was born in the Asura clan, but there was no devilish instinct in him. He was supreme Vaishnava and divine. Gayas are prominent among the Asuras whose names have appeared in Veda Samhita.

Once he wished that he would become so pious by doing good works that people would be free from all sins after seeing him and after death he would get a place in heaven.

Thinking like this, he started austerities of Lord Vishnu by putting a tomb on Mount Babel. Year after year, his penance continued.

Impressed by his harsh austerity, Lord Vishnu appeared and dissolved the tomb of Gaya, saying, “Mahatma Gaye, wake up! Your penance is complete. For what purpose did such a severe penance? Ask for your desired groom.” Guy opened his eyes and saw, Lord Vishnu standing in front of the quadrilateral. Gaye bowed prostrately at the feet and said- “Lord! After seeing your quadrilateral form, all my sins were removed. It seems to me that you have penetrated me in this form. Now this is the desire, that you dwell in my body in this form and that what I see, let me have the virtue of your philosophy under my pretext and all its sins be destroyed and it will become so holy that after death, that creature in heaven Places found. The fruits of this tenacity should be received by all those who see you indirectly through me. “

Lord Vishnu was very impressed by this public welfare feeling of Guy and raised his hand and said – ‘Tattastu!’

Now Gaya did not sit in one place and roamed around everywhere. As a result, whoever saw him, his sins would wane and he would posthumously inherit heaven.

This disrupted Yamraj’s system. Now what should they keep account of one’s karma, when the sins of the cow are destroyed and all its sins destroyed and it becomes the possessor of heaven, then what is the work of the messengers of hell.

He kept this problem in front of Brahma Ji. Brahma ji said- “Okay, let’s do some remedies for this. The law of karma should be maintained. We organize a yagna on its body and I and all other gods place stones on its back, sit on it and immovable it. Will give. Then it will not be able to go anywhere. “

If there is a yajna on the back of the cow, it is a work of more virtue, the cow gladly accepted this offer of Brahma. Lord Brahma took all the gods, including Yamaraja, pressed them with stone and sat on them. Even after having so much weight on himself, the song did not become immovable. When the gods were worried, Brahma said – “Lord Vishnu has given this boon, so let us invoke the power of Vishnu and let him also sit with us on this rock, then it will be immovable.”

All the gods, including Brahma, invoked Vishnu and told about the problem of himself and Yamaraja. Vishnu considering it and sitting on it with everyone, then he went somewhere and became immovable.

Seeing Vishnu sitting on top of himself, he said to the gods- “I am immovable now for the dignity of all of you and Lord Vishnu and by walking around and giving a vision to the people, which was causing their sins to end, they end the work. But all of you Even with this effort, this boon of Lord Vishnu will be in vain. Bhagavan, now you convert me into a stone and rock and establish it here in real time. “

Lord Vishnu was pleased to see this decent sacrifice of Gaye and said – Gaye! This sacrifice of yours will not go in vain. Even at this stage, if you have any desire, say that, I will fulfill it. “

Guy said- “Narayana! I wish that you would sit with all these gods indirectly on this rock and this place would become a place of pilgrimage for a religious act posthumously. Those who pay obeisance to their ancestors here, donate the offerings Etc., let those demons be freed from the agony of hell. This whole area should become such a virtuous land. “

Vishnu said- “Guy! You are blessed! You have asked for such a boon for public welfare in your life as well and now you are asking for the same boon for the salvation of dead souls in death.” We are all tied up. That will be so. The name of this region will be known by the name ‘Gaya’, half of Gaya’s name. The ancestors of those who come to this area and visit this rock, donate shraadh tarpan-pind here in life. You will get freedom from sinful acts known or unknown. The mountain situated here will be called ‘Gayashir’. The circumambulation of Gayashir mountain, bathing in the river Falgu and visiting this rock will benefit the fathers, who will come here for this purpose. There will also be Shree Vriddhi in virtue. “

After getting such a boon from Lord Vishnu, Guy became satisfied and satisfied. ‘Gaya’ located in the state of Bihar is an important pilgrimage place for the shraddha pind-dan of the ancestors. An immovable stone rock in the back of the Vishnu temple is still located here.

The fame of those who dedicate their lives for the welfare of the people is permanent and stable for such a long time. Those who live for the whole world by living not only for themselves, their birth and death are both meaningful.

 

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