बच्चों की मनोरंजक कहानियाँ-अक्लमंद में मेढक

बच्चों की मनोरंजक कहानियाँ

बच्चों की मनोरंजक कहानियाँ-अक्लमंद में मेढक

किसी जंगल में एक खूबसूरत तालाब था। उसके आसपास बहुत सुंदर पेड़ों का झुरमुट था। तालाब में कमल के फूल खिलते थे। उस तालाब में बहुत से जीव रहते थे। उनमें तीन दोस्त भी थे- दो मछलियां और एक मेंढक। मछलियां बहुत सुंदर और सयानी थीं। मेंढक बदसूरत था पर उसमें भी दिमाग की कमी नहीं थी। वे हर रोज मिलते और अपने जीवन के अनुभवों को आपस में एक-दूसरे को सुनाते। मछलियों को मेंढ़क के किस्से सुनने में बहुत आनंद आता था, पर वे हर बात में अपनी अक्लमंदी के बारे में याद दिलाना नहीं भूलती थीं।। 

एक दिन तीनों दोस्त आपस में बातें कर रहे थे कि उन्होंने कुछ मछुआरों को वहां से जाते हुए देखा। उनके हाथ में मछलियों से भरी टोकरियां थीं। वे वहां कुछ देर आराम करने के लिए ठहर गए। उन्होंने देखा कि तालाब मछलियों से भरा हुआ था। उनमें से एक ने कहा, “देखो भई! यहां कितनी मछलियां भरी पड़ी हैं। हमें कल यहां आ कर मछलियां पकड़नी चाहिए। इस तरह हमारे हाथ अच्छा खासा माल लग जाएगा।” बाकी सबने भी हामी भर दी। मछुआरों ने अपनी टोकरी और जाल उठाए और वहां से चल दिए। 

मेंढक और दोनों मछलियों ने भी सारी बात सुनी और वे बहुत परेशान हो गए। वे आपस में बात करने लगे कि इस परेशानी से कैसे बचा जाए। “ये तो बहुत बुरी बात है। अब हम क्या करेंगे!” घबराए और डरे हुए मेंढक ने कहा, “बेहतर होगा कि हम यहां से चले ही जाएं। इसी तरह हमारी जान बच सकती है।

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” परंतु मछलियों को डर नहीं लग रहा था। उन्हें पूरा यकीन था कि वे इस तरह की समस्याओं से निपट सकती हैं। एक बोली, “हद हो गई! डरपोक मत बनो। देखना, वे लोग यहां आएंगे ही नहीं। हमें हर संकट का सामना बहादुरी से करना चाहिए। पीठ दिखा कर भागना तो कायरों की निशानी है।”

जब अपनी जान ही संकट में हो तो ऐसे में भागना ही सबसे बड़ी अक्लमंदी होती है,” मेंढ़क ने उन्हें समझाना चाहा। 

“मेंढ़क महाराज! मैं बहुत सयानी हूं। किसी को भी अपनी बातों के जाल में उलझा सकती हूं। मुझे किसी से डर नहीं है। किसी को भी अपनी चालाकी से मूर्ख बना सकती हूं। इस तरह मैं खुद को और अपने परिवार को बचा लूंगी,” दूसरी मछली बोली। 

मेंढक ने इस बारे में सोचा और बोला, “हो सकता है कि तुम ठीक कह रही हो। पर देखो, मैं तुम दोनों की तरह चतुर और बहादुर नहीं हूं। मेरे पास न तो ज्ञान है, न ही बुद्धि इसलिए मेरे लिए बेहतर होगा कि मैं अपने परिवार को ले कर यहां से किसी दूसरे तालाब में चला जाऊं। कुछ दिन बाद मैं तुम दोनों से मिलने यहां आऊंगा।” उन लोगों ने आपस में विदा ली और मेंढक अपने घर चला गया। उसने अपने परिवार को सारी बात बताई और कुछ ही देर में वे दूसरे तालाब में रहने चले गए। 

अगली सुबह मछुआरे अपने जाल ले कर आ गए और देखते ही देखते तालाब के सारे जीव उनके जाल में फंस गए। असल में, मछुआरों ने जाल इस तरह बिछाए थे कि किसी के भी बच निकलने का सवाल ही पैदा नहीं होता था। अगर कोई जीव जाल से बच निकलने में सफल भी हो जाता, तो मछुआरे उसे छोटे जाल में फंसा लेते। इस तरह दोनों मछलियां अपने परिवार व अन्य मेंढकों, केकड़ों व कछुओं के साथ जाल से बाहर आने के लिए तड़प रही थीं लेकिन अब उनके पास बचने का कोई उपाय नहीं था। 

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मेंढक अपने नए घर में बैठा था। उसने मछुआरों को वहां से जाते देखा। उनमें से एक के जाल में उसकी दोस्त मछलियों के परिवार बंदी बने हुए थे। उसने उन्हें देख कर उदासी से कहा, “काश! उन्होंने मेरी बात मान ली होती।” 

उसकी पत्नी बोली, “हां, उनकी सारी बुद्धि और प्रतिभा भी उन्हें बचा नहीं सकी।” हमें सही समय पर उचित निर्णय लेना सीखना चाहिए वरना पछतावे के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता। 

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