शिक्षा का मौलिक अधिकार पर निबंध | Essay on The Fundamental Right to Education in Hindi

शिक्षा का मौलिक अधिकार पर निबंध

शिक्षा का मौलिक अधिकार पर निबंध | Essay on The Fundamental Right to Education in Hindi अथवा भारत में शिक्षा का मौलिक अधिकार  

 “संसार में जितने प्रकार की प्राप्तियां हैं, उनमें शिक्षा सबसे बढ़कर है।”-पं. सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ 

शिक्षा का महत्त्व सर्वोपरि है। शिक्षा न सिर्फ हमारे व्यक्तित्व का विकास करती है, अपितु हमें आत्मनिर्भर भी बनाती है। समाज और राष्ट्र के निर्माण में भी शिक्षा का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। कोई भी देश या समाज उन्नति के शिखर पर तब तक नहीं पहुंच सकता, जब तक वहां शिक्षा का उजाला न हो। उन्नत, आदर्श और व्यवस्थित समाज के लिए साक्षरता का शत-प्रतिशत होना नितांत आवश्यक है। शिक्षा, ज्ञान और संस्कार दोनों का माध्यम है। यही कारण है कि 

हमारे वेद और धर्मग्रंथ शिक्षा की महत्ता से भरे पड़े हैं। महान विचारकों ने भी समय-समय पर शिक्षा के महत्त्व को अपने-अपने नजरिए से रेखांकित किया है। ऐसे में यह आवश्यक है कि बच्चे, जो देश का भविष्य होते हैं, भावी कर्णधार होते हैं, शिक्षा से वंचित रहने न पाएं। यदि बच्चे ही अज्ञानता और अशिक्षा की गर्त में समा जाएंगे, तो देश का समाज का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। 

“शिक्षा, ज्ञान और संस्कार दोनों का माध्यम है। यही कारण है कि हमारे वेद और धर्मग्रंथ शिक्षा की महत्ता से भरे पड़े हैं।”

बच्चों के लिए शिक्षा के महत्त्व को सर्वप्रथम गोपाल कृष्ण गोखले ने समझा और उन्होंने वर्ष 1917 में भारत में स्कूली शिक्षा को अनिवार्य किए जाने की मांग की। वर्ष 1937 में महात्मा गांधी एवं डॉ. जाकिर हुसैन ने भारत में स्कूली शिक्षा को अनिवार्य किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया। स्कूली शिक्षा के महत्त्व को ध्यान में रखकर ही हमारे संविधान निर्माताओं द्वारा भी इस दिशा में पहल की गई। संविधान के प्रारंभ में, अनुच्छेद 45 में नीति के निदेशक तत्वों के अधीन राज्य का यह कर्त्तव्य निर्धारित किया गया कि वह बालकों को प्रारंभिक शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराएगा। नीति निदेशक तत्वों में स्थान पाने के कारण इसकी विधिक महत्ता तो नहीं रही, तथापि समय-समय पर केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारों द्वारा इस दिशा में कदम उठाए जाते रहे, जो कि पर्याप्त सिद्ध नहीं हुए। 1966 में कोठारी आयोग ने देश के सभी बच्चों को अनिवार्य रूप से स्कूली शिक्षा दिए जाने की सिफारिश की थी। परंतु दुर्भाग्यवश आयोग की इस संस्तुति पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। 1974 में घोषित बाल नीति, 1986 की शिक्षा नीति तथा 1990 की नई शिक्षा नीति में इस दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रयास किए गए, पर दृढ़ इच्छा शक्ति तथा निरंतरता के अभाव में इस क्षेत्र में कोई विशेष उपलब्धि नहीं हासिल हो पाई। 

देश में शिक्षा की संतोषजनक व्यवस्था को न देखते हुए ही शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाए जाने की मांग उठनी शुरू हुई। उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के वाद में 1993 में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि संविधान के खंड 4 के अनुच्छेद 45 को खंड 3 के अनुच्छेद 21 के साथ मिलाकर पढ़ा जाना चाहिए। अनुच्छेद 45 में यह प्रावधान था कि राज्य 14 वर्ष तक के बालकों को अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रयास करेगा जबकि अनुच्छेद 21 प्राण व दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण का प्रावधान करता है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त जीने के अधिकार का एक अवयव है। मोहिनी जैन बनाम कर्नाटक राज्य के मामले में भी सर्वोच्च न्यायालय ने इसी आशय का निर्णय देते हुए कहा था कि प्राथमिक शिक्षा पाने का अधिकार अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है। न्यायालय के इन अभूतपूर्व निर्णयों ने शिक्षा के अधिकार को मूल अधिकार में शामिल किए जाने की मांग को बलवती किया। अंततः 86वें संविधान संशोधन अधिनियम 2002 द्वारा संविधान में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन कर प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त और अनिवार्य बनाते हुए इसे मौलिक अधिकार का दर्जा प्रदान किया गया। इसके द्वारा- 

(i) अनुच्छेद 21 में खंड (क) जोड़कर यह प्रावधान किया गया कि राज्य 6 से 14 वर्ष के आयु के समस्त बालकों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध करायेगा। 

(ii) अनुच्छेद 45 में प्राथमिक शिक्षा संबंधी उपबंध का लोप कर यह प्रावधान किया गया कि राज्य 6 वर्ष से कम आयु के बालकों की देखरेख तथा शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रयत्न करेगा। 

(iii) अनुच्छेद 51क(ट) जोड़कर माता-पिता या संरक्षकों का यह दायित्व निर्धारित किया गया कि वे 6 से 14 वर्ष के बालकों को शिक्षा का अवसर प्रदान करेंगे। 

86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 के बाद वर्ष 2009 के अगस्त माह में संसद में ‘निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा विधेयक’ (Right to Free and Compulsory EducationBill) पारित किया गया, जो कि अधिनियमित होने के बाद वर्ष 2010 के अप्रैल माह से प्रभावी हुआ। इस अधिनियम में इस बात के भरसक प्रयास किए गए कि 6 से 14 वर्ष के बच्चे शिक्षा से वंचित न रहें। 

“86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 के बाद वर्ष 2009 के अगस्त माह में संसद में ‘निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा विधेयक’ (Right to Free and Compulsory Education Bill) पारित किया गया, जो कि अधिनियमित होने के बाद वर्ष 2010 के अप्रैल माह से प्रभावी हुआ।” 

इस अधिनियम के तहत बच्चों को शिक्षा के दायरे में लाने तथा शिक्षा के प्रति उनमें आकर्षण पैदा करने के यथेष्ट उपाय किए गए। यह सुनिश्चित किया गया कि 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को शिक्षित बनाने का दायित्व सरकारों का होगा तथा केंद्र और राज्य सरकारें मिलजुल कर इस दिशा में प्रयास करेंगी। अधिनियम के क्रियान्वयन में आर्थिक दिक्कतें न आड़े आएं, इस बात को ध्यान में रखकर जहा आर्थिक योगदान की 55 प्रतिशत जिम्मेदारी राज्य सरकारों को सौंपी गई, वहीं 45 प्रतिशत की केंद्र सरकार को। बच्चे को जहां निकट के स्कूल में दाखिले का हकदार बनाया गया, वहीं यह व्यवस्था भी दी गई कि दाखिला देने से मना नहीं किया जा सकेगा। इसी क्रम में निजी स्कूलों पर शिकंजा कसते हुए यह व्यवस्था दी गई कि उन्हें निचली कक्षाओं में 25 प्रतिशत सीटें गरीब एवं उपेक्षित तबके के बच्चों के लिए आरक्षित रखनी होंगी। बच्चे शिक्षा से मुंह न मोड़ें | इसके लिए भी उपाय किए गए हैं। मसलन, न तो उन्हें प्रवेश परीक्षा | देनी होगी और न ही पठन-पाठन में रुचि न लेने के कारण उन्हें । दंडित ही किया जाएगा। इतना ही नहीं, रिजल्ट खराब होने पर बच्चे स्कूल से निकाले नहीं जाएंगे। उन्हें अगली कक्षा में प्रोन्नत किया जाएगा। सत्र के दौरान किसी भी समय बच्चे प्रवेश ले सकेंगे तथा प्रवेश के दौरान जन्म प्रमाण-पत्र आदि की बाध्यता नहीं रहेगी। इस विधेयक के कार्यान्वयन पर समुचित निगरानी रखी जा सके, इस बात को ध्यान में रखकर एक राष्ट्रीय बुनियादी शिक्षा आयोग का भी गठन किया गया है। कुल मिलाकर, ऐसे बंदोबस्त किए गए हैं, जिससे नौनिहाल शिक्षा से वंचित न रहने पाएं। शिक्षा का सुलभ आकर्षण उन्हें खींचे। बच्चे स्कूलों में पहुंचे और भविष्य को संवारें। 

हमने 86वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा तो दे दिया तथा ‘निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिनियम के जरिए इस मौलिक अधिकार को प्राप्त करने का पथ भी प्रशस्त कर दिया, किंतु यह कितना परिणाममूलक सिद्ध होगा, यह स्पष्ट नहीं है। इसकी मुख्य वजहें निम्नवत हैं 

  • शिक्षा का अधिकार सशर्त है। अनुच्छेद 21 क के अनुसार शिक्षा का यह अधिकार उस रीति से दिया जाएगा जो राज्य, विधि द्वारा अवधारित करे।
  • शिक्षा प्रणाली में व्याप्त असमानता को दूर करने के भी समुचित प्रयास नहीं किए गए हैं।
  • स्कूल पूर्व शिक्षा के बारे में कोई पारदर्शी व्यवस्था नहीं की गई है।
  • बालकों को प्राथमिक शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना माता पिता एवं संरक्षकों का मौलिक कर्त्तव्य ठहराया गया है, जो कि भारत जैसे गरीब देश में संभव नहीं है। 
  • मुफ्त शिक्षा का अधिकार आठवीं कक्षा के बाद खत्म हो जायेगा। उसके बाद गरीब बच्चे फिर सड़कों पर आ जायेंगे क्योंकि अपने अभिभावकों के बूते वे हाईस्कूल की पढ़ाई जारी नहीं रख पाएंगे। ध्यातव्य है कि जनवरी, 2019 में केंद्र सरकार ने आरटीई अधिनियम (RTE Act) को संशोधित कर दिया। इस संशोधन में यह कहा गया है कि अब प्रत्येक शैक्षणिक वर्ष में पांचवीं एवं आठवीं कक्षा में नियमित रूप से परीक्षा ली जाएगी। हालांकि परीक्षा में फेल होने पर विद्यार्थियों को एक मौका और मिलेगा। 

कुल मिलाकर, इस तस्वीर का दूसरा रुख साफ नहीं है। एक तो हम देर से आए हैं, उस पर भी दुरुस्त नहीं आए हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि देश में शिक्षा को प्रोत्साहित करने की यह अब तक की सबसे बड़ी पहल है, किन्तु इसमें कई कमजोर पक्ष भी हैं, जिन्हें दूर करने के बाद ही इसका पूरा लाभ मिल सकेगा और हमारा देश साक्षरता के पथ पर अग्रसर होगा। 

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