जीवन में सफलता के सूत्र-सफलता ही प्रभुता है (Success is Second Name of God) 

formula for success in life

जीवन में सफलता के सूत्र- सफलता ही प्रभुता है (Success is Second Name of God) 

1.सत्य ही सर्वशक्तिमान है, सत्य ही नित्य है. यदि आप सत्य के मार्ग पर चल रहे हैं तो सफलता सुनिश्चित है. सत्य पर आधारित सफलता में ही प्रभुता निहित है. अर्थात् सत्यता ही प्रभुता है, प्रभुता ही सफलता है और सफलता ही प्रभुता है. आप तो बस सत्यता के साथ सफलता की ओर कदम दर कदम बढ़ाते रहें, प्रभुता की चिन्ता न करें. प्रभुता तो स्वतः ही उपलब्ध हो जायेगी.

2. हर व्यक्ति पर प्रकृति और समाज का बहुत बड़ा कर्ज होता है. कर्ज चुकाते रहना ही व्यक्ति का सबसे बड़ा फर्ज होता है. और फर्ज निभाने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही पड़ता है. हमें अपने कार्यक्षेत्र में अच्छी बुरी सभी परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है. किन्तु जब हम हर कार्य को ईश्वरीय कार्य समझते हुए शुद्ध मानसिकता के साथ सम्पन्न करते हैं, तब हम प्रभुता के अत्यधिक निकट होते हैं, और यह निकटता ही हमारी सफलता है.

3. सफलता ईश्वरीय प्रेरणा और संवेदनशीलता पर निर्भर करती है. यदि हम सफलता को ही आराध्य की आरती समझ लें तो हमें अलग से किसी पूजा-पाठ की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. काम में विश्वास करना ही हमारी आस्तिकता है और काम को नकार देना ही नास्तिकता है. इसलिए पूर्ण आस्तिकता के साथ अपना काम करते रहना चाहिए, तब किसी पूजा स्थल पर जाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी.

4. यदि आपको किसी साकार भगवान के दर्शन हो जाये तो क्या मांगोगे ? निश्चित रूप से कोई न कोई सफलता ही मांगोगे. मांगोगे अवश्य, क्योंकि अब तक पत्थर की मूर्तियों से भी कुछ न कुछ मांगते ही आये हैं. याद रखें, जब तक मांग है, तब तक ईश्वर के दर्शन जरा कठिन ही है. इसलिए पहले मांग समाप्त करो और मांग सफलता प्राप्त होने पर ही समाप्त हो सकती है. अर्थात् अपनी कल्पनाओं को साकार करो, सफलताओं को साकार करो, फिर संभवतः किसी साकार भगवान की आवश्यकता ही नहीं रहेगी.

5. अगर गहराई से देखा जाय तो यहाँ परमात्मा किसी को नहीं चाहिए. परमात्मा तो बस एक बहाना है, यहाँ तो किसी को भी सफलता के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहिए. साधु-संत, यशस्वी-तपस्वी, ज्ञानी-ध्यानी, योगी को भी कोई न कोई सिद्धि चाहिए, कोई न कोई प्रसिद्धि चाहिए. जिस प्रकार परमात्मा एक रहस्य है, उसी प्रकार सफलता भी एक रहस्य है. जिस प्रकार परमात्मा आपके सबसे निकट है, उसी प्रकार सफलता भी सबसे निकट ही है. जिस प्रकार परमात्मा को शब्दों में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार सफलता को भी अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता. दोनों ही अनुभव की वस्तुयें हैं. और इनमें से किसी एक की अनुभूति ही दूसरे की अनुभूति है.

6. जिस प्रकार कोई दूसरा व्यक्ति आपको परमात्मा के दर्शन नहीं करवा सकता, उसी प्रकार कोई दूसरा व्यक्ति आपको सफलता भी नहीं दिलवा सकता. आपको केवल तरीका बताया जा सकता है. मार्ग भी आपको ही चुनना पड़ेगा, उस पर चलना भी आपको ही पड़ेगा. चलने पर जो समस्यायें आयेंगी, वे आपकी अपनी समस्यायें होंगी और उन समस्याओं से जूझना भी आपको ही पड़ेगा. किसी न किसी रास्ते पर चल कर तो देखिए, सभी रास्ते सफलता तक ही जाते हैं.

7. यह भी सच है कि किसी निश्चित प्रयोजनार्थ ही हमें इस धरती पर भेजा गया है. प्रकृति और समाज द्वारा हमें किसी विशेष प्रयोजनार्थ ही सहेजा गया है. उस विशेष प्रयोजन की पहचान करना ही बुद्धत्व प्राप्त करना है. अगर दुनिया एक दुर्घटना है तो आदमी भी उसी दुर्घटना की उपज है. जिस प्रकार दुनिया की हर वस्तु सहज एवम् सक्रिय है, उसी प्रकार हर व्यक्ति भी सहज एवम् सक्रिय है. याद रखें, व्यक्ति जब तक सक्रिय है, तब तक ही वह दुनिया का हिस्सा है. वस्तुतः व्यक्ति की सक्रियता ही प्रभुता है.

8. एक निश्चित आरामदेह सुरक्षा, एक गहन आन्तरिक शांति एवम् सहज सुखद अनुभूति व्यक्ति की तन्त्रिकाओं को शान्त करती है. जब व्यक्ति समूची धार्मिकता के साथ अपने काम में डूब जाता है, तब शांति के माध्यम से ही सफलता बरसती है. याद रखें, परमात्मा की तरह ही सफलता भी आपके भीतर ही है. यदि सबसे दूर कोई है, तो वह आप खुद ही हैं. अपने आपसे अपनी दूरी घटाइए, सफलता पाइए. महान वैज्ञानिक एडीसन थोड़ा ऊँचा सुनते थे. एक बार किसी मित्र ने मजाक में पूछ लिया-‘आपको परमात्मा से शिकायत तो होगी ही कि दिमाग तो पूरा दिया, किन्तु सुनने की शक्ति थोड़ी कम दी ?’ इस पर एडीसन ने हँसते हुए जवाब दिया-‘परमात्मा ने ऐसा करके मुझ पर बहुत बड़ी कृपा की है. अगर मैं दुनिया की सुनता तो बिखर जाता. दिल की सुनकर ही मैंने कुछ किया है, मेरे लिए तो सफलता ही प्रभुता है. इससे अधिक मुझे परमात्मा से और क्या चाहिए ?’

दृष्टान्तएक बार एक व्यक्ति सुबह-सुबह बुद्ध के पास आया और पूछने लगा-‘महाराज आपने अब तक कितने व्यक्तियों को मोक्ष का रास्ता बताया है ? कितनों को निर्वाण का तरीका समझाया है ? कितनों को सत्य का दिग्दर्शन करवाया है ?’ बुद्ध ने गंभीरतापूर्वक जवाब दिया-‘तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर मैं शाम को दूंगा. इस बीच तुम्हें एक काम करना पड़ेगा. इस गाँव के प्रत्येक वयस्क व्यक्ति के पास जाकर पूछना है कि वह क्या चाहता है ? सबके जवाब लिखते जाना और शाम को आकर मुझे बताना.’ इस पर जिज्ञासु गाँव के हर व्यक्ति के पास पहुँचा. गाँव छोटा ही था. वयस्क व्यक्ति करीब सौ ही थे. सबसे पूछता गया और जवाब लिखता गया. किसी ने कहा, उसे धन चाहिए, किसी को पुत्र चाहिए, किसी को आरोग्य चाहिए, किसी को मकान चाहिए, किसी को जमीन चाहिए, किसी को अच्छी फसल चाहिए, किसी को धन्धे में लाभ चाहिए, किसी को सुन्दर पत्नी चाहिए. किन्तु किसी ने भी मोक्ष, निर्वाण, सत्य या परमात्मा की इच्छा जाहिर नहीं की. जिज्ञासु बड़ा हैरान था, किन्तु उसके प्रश्नों के जवाब मिल चुके थे. वह शाम को लौट कर बुद्ध के पास नहीं आया. अर्थात् सबको सफलता ही चाहिए. 

सम्पूर्णता का रास्ता ही सफलता तक जाता है (The Path of Perfection Leads to Success) 

1.आप जो भी काम करें, उसे पूर्ण दक्षता, पूर्ण क्षमता, पूर्ण प्रतिबद्धता एवम् पूर्ण समयबद्धता के साथ करें. आप जब भी काम करें, अपने काम के प्रति पूर्णतः समर्पित होकर ही करें. अपने कार्य को इतनी पूर्णता दें कि ‘कर्ता’ और ‘कार्य’ क बीच कोई द्वैत ही न रहे. याद रखें, द्वैत के मिटने पर ही आप सफलता को उपलब्ध हो सकते हैं.

2. सोने-जगने, घूमने-फिरने, व्यायाम-प्राणायाम, नहाने-धोने, सजने-संवरने, खाने-पीने, मिलने-जुलने जैसे दैनिक कार्यों को भी पूर्ण तन्मयता, समयबद्धता और आनन्द के साथ सम्पन्न करें. पारिवारिक एवम् सामाजिक सम्बन्धों का सौहार्दपूर्ण एवम् सम्पूर्ण विश्वास के साथ निर्वहन करें. थोड़ा-सा अधूरापन ही दिन भर के कार्यों को प्रभावित कर देता है.

3. जिस प्रकार पानी के बड़े से बड़े टेंक को खाली करने के लिए एक छोटा-सा छेद ही पर्याप्त होता है, उसी प्रकार बड़ी से बड़ी सफलता को विफलता में बदलने के लिए कोई छोटा-सा अधूरापन ही पर्याप्त होता है. इसलिए आधे-अधूरे मन से कोई काम न करें और किसी कार्य में कोई अधूरापन न छोड़ें.

4. स्वस्थ तन, स्वस्थ मन, स्वस्थ धन और स्वस्थ वातावरण के माध्यम से ही आप स्वस्थ सफलता का वरण कर सकते हैं. जो भी कार्य हाथ में है, उसे पूर्ण स्वच्छता, स्वस्थता और लग्नता के साथ करते रहें, सम्पूर्णता तो अपने आप ही उपलब्ध होती चली जायेगी. यदि आप दूसरों की निष्क्रियता और अयोग्यता के आधार पर सफल होना चाहेंगे तो ऐसी सफलता अधूरी एवम् अस्थायी ही होगी.

5. क्या आप अपने आधे शरीर के साथ काम पर जा सकते हैं ? क्या आप अपने आधे-अधूरे दिमाग के साथ परीक्षा भवन में जा सकते हैं ? क्या आप अपने अधूरे मन के साथ काम करते हुए पूरी सफलता पा सकते हैं ? हर्गिज नहीं. इसलिए जो भी कार्य करें, पूरे तन, मन और मस्तिष्क के साथ करें. यही समग्रता है और समग्रता ही सफलता है.

6. हमारी आन्तरिक शक्तियाँ हमें कठिनाइयों से उबारने में सक्षम हैं, बशर्ते कि हम इनका समग्र, समुचित और सही समय पर सदुपयोग करने में दक्ष हों. हमारी दक्षता ही हमारे कार्यों की गुणवत्ता का मापदण्ड होती है, और दक्षता काम करने पर ही अर्जित हो सकती है. इसलिए अपने उपलब्ध संसाधनों के साथ समग्रता से कार्य करते चलें, दक्षता तो स्वतः ही प्राप्त होती चली जायेगी और दक्षता के आगे आपकी छोटी-मोटी कमजोरियाँ गौण हो जायेंगी.

7. खण्ड, खण्ड नहीं, अखण्ड को स्वीकार करें. पिण्ड, पिण्ड नहीं, समुचे ब्रह्माण्ड को अंगीकार करें. पूर्णता के मार्ग में विद्यमान पाखण्ड रूपी अवरोधों को अपनी अखण्डता से पार करें. याद रखें, अखण्ड ही खण्डित होने पर विस्फोटक बन जाता है. इसलिए अपने किसी भी कार्य को विस्फोटक न बनायें. समग्रता के साथ अपनी अखण्डता को उपयोगी बनाते चलें.

8. अपनी क्षमताओं का समग्र विकास करें, अपनी दक्षताओं पर पूरा विश्वास करें. पूरा काम करें और पूरा विश्राम करें. एक-एक क्षण का सदुपयोग करते हुए अपने चौबीस घण्टों में अड़तालीस घण्टों का काम करें. याद रखें, समग्रता के बिना व्यस्तता व्यर्थ है. और महज व्यस्त रहने से ही सफलता नहीं मिलती, समग्रता के साथ व्यस्त रहने वाला ही कुछ सार्थक कर सकता है. अपने ‘काम’ पर विश्वास करें, किन्तु दूसरों को राम भरोसे रहने की शिक्षा न दें.

9. अपने वर्तमान को समग्रता के साथ जीयें. हर बून्द को सागर समझ कर पीएं. और तब जो कुछ भी उपलब्ध होगा, वह सम्पूर्णता से आबद्ध होगा. याद रखें, आपकी सभी निधियों को चुराया जा सकता है, किन्तु सिद्धियों और प्रसिद्धियों को चुराया नहीं जा सकता. आपका सब कुछ चुराया जा सकता है, किन्तु आपकी क्षमताओं और दक्षताओं को चुराया नहीं जा सकता. जो भी करें, समग्रता के साथ करें. भले ही चूहे-दानियाँ ही सही, अगर आप इन्हें दूसरों से बेहतर बनाते हैं तो आपकी चूहे-दानियाँ औरों से अधिक बिकेंगी.

दृष्टान्त- महान वैज्ञानिक मैडम क्यूरी एक सवाल को कई दिनों से हल कर रही थी, किन्तु हल नहीं हो पा रहा था. एक दिन सोने से पहले मैडम ने सवाल को हल करना चाहा. कागज पर बार-बार कुछ लिखा, किन्तु पूरी तरह हल नहीं हुआ. हल के नजदीक तो पहुँच गई थी, किन्तु गणना में कहीं गड़बड़ी थी. हार कर मैडम ने कागज को सिरहाने रखा और सो गई. सुबह उठने पर जब मैडम क्यूरी ने कागज उठा कर देखा तो हैरान रह गई. सवाल तो हल हो चुका था. समझ में नहीं आ रहा था कि रात में इसे हल किसने किया ? लेकिन जब गौर से देखा तो पता चला कि कागज पर लिखावट उसी की थी. इस पर मैडम और भी आश्चर्य चकित थी कि उसने कब और कैसे लिखा ? उसे तो कुछ याद भी नहीं था, किन्तु यह सच ही था कि सवाल मैडम ने ही हल किया था. रात को कोई सपना आया होगा और सपने में ही हल मिल गया होगा. मैडम ने नींद में ही कागज पर कुछ लिखा और सो गई. अर्थात् सफलता के लिए पूर्ण समर्पण अपेक्षित है. 

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