भारत में खाद्य सुरक्षा की स्थितियाँ निबंध |Food Security Situations in India

भारत में खाद्य सुरक्षा की स्थितियाँ

भारत में खाद्य सुरक्षा की स्थितियाँ निबंध

भारत विकास रिपोर्ट (World Development Report 1986) ने खाद्य सुरक्षा की परिभाषा “सभी व्यक्तियों के लिए। सभी समय पर एक सक्रिय, स्वस्थ जीवन के लिए पर्याप्त भोजन द की उपलब्धि” के रूप में की है। किन्तु खाद्य एवं कृषि संस्था । (FAO) ने खाद्य सुरक्षा की परिभाषा “सभी व्यक्तियों को सभी । समय पर उनके लिए आवश्यक बुनियादी भोजन के लिए है भौतिक एवं आर्थिक दोनों रूप में उपलब्धि के आश्वासन के रूप में की है।” खाद्य सुरक्षा के लिए किसी देश की समग्र जनसंख्या के खाद्य की भौतिक उपलब्धि आवश्यक है। किन्तु । सभी को पर्याप्त खाद्य उपलब्ध कराने के लिए यह जरूरी है । कि लोगों के पास पर्याप्त क्रयशक्ति हो ताकि वे अपनी जरूरत । के लिए खाद्य-पदार्थ हासिल कर सकें। स्वस्थ जीवन के लिए: उपलब्ध खाद्य, गुणवत्ता (Quality) और मात्रा दोनों रूप में ३ पर्याप्त होने चाहिए ताकि वे पोषण सम्बन्धी आवश्यकता को पूरा कर सकें। कोई राष्ट्र किसी समय-विशेष पर स्वावलम्बिता । प्राप्त कर सकता है परन्तु खाद्य सुरक्षा की अवधारणा इस बात । पर बल देती है कि प्रत्येक समय विश्वसनीय और पोषण की। दृष्टि से खाद्य का पर्याप्त संभरण दीर्घकलिक आधार पर । उपलब्ध होना चाहिए। इसका अभिप्राय यह कि किसी राष्ट्र के । खाद्य-संभरण (Food supply) की इतनी वृद्धि दर आश्वस्त । करनी होगी कि इससे न केवल जनसंख्या की वृद्धि का ध्यान द रखा जा सके बल्कि इसके साथ-साथ लोगों की आय में वृद्धि के परिणामस्वरूप खाद्य की मांग में वृद्धि की भी पूर्ति की जा सके। आम तौर पर खाद्य सुरक्षा की अवधारणा की चर्चा समग्र जनसंख्या के लिए खाद्यान्नों की न्यूनतम मात्रा उपलब्ध कराने – के रूप में की जाती हैं इस दृष्टि से ये अवधारणा संकुचित है। परन्तु एक गतिशील और विकासमान अर्थव्यवस्था में खाद्य – सुरक्षा की अवधाणा में समाज द्वारा प्राप्त विकास की अवस्था र में परिवर्तन के साथ तब्दीली होती रहती है। इस दृष्टि से खाद्य । सुरक्षा कई अवस्थाएं है। जैसे- प्रथम अवस्था मानवीय जीवन । को कायम रखने के लिए सभी के अनाज के रूप में पर्याप्त । मात्रा उपलब्ध होनी चाहिए। जबकि द्वितीय अवस्था में खाद्य । सुरक्षा के रूप में अनाजों एवं दालों की पर्याप्त उपलब्धि अनिवार्य होनी चाहिए व तृतीय अवस्था में खाद्य सुरक्षा में २ अनाज, दालों, दूध एवं दूध के पदार्थ, सब्जियां और फल, मछली अण्डे और गोश्त शामिल कर सकते हैं। 

आर्थिक आयोजन की प्रक्रिया के अपनाने के साथ ही, भारतीय आयोजकों ने खाद्यानों में स्वावलम्बिता प्राप्त करने को, आयोजन का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य स्वीकार कर लिया था। सरकार ने यह अनुभव किया था कि जो देश खाद्य अतिरेक (Food sur plus) वाले देश हैं वे अपनी खाद्य अतिरेक्ता को एक ऐसे हथियार के रूप में प्रयोग करते हैं जिससे कोई भी बड़ी से बड़ी अर्थव्यवस्था उनके सामने घुटने टेकने के लिए मजबूर हो जाती है। भारत ने यह भी अनुभव किया कि खाद्यों के बारे में संधि करना, विदेशी ताकतों को देश क आंतरिक मामलों, नीति निर्माण एवं कई अहम फैसलों को प्रभावित करने का एकाधिकार देने के बराबर होता है। प्रधानमंत्री जवारहलाल नेहरू ने राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए अपने प्रसारण में यह साफ शब्दों में कहा : “हमने विदेशों से सहायता प्राप्त की है और हम आवश्यकता पड़ने पर ऐसा करते रहेंगे परन्तु मेरे मन में अब यह बात पूर्णतया दृढ़ रूप धारण कर गयी है कि अपनी मूल जरूरत के लिए विदेशों पर निर्भर रहना कितना खतरनाक है। जैसे ही हम खाद्य में आत्मनिर्भर हो जाते है, तभी हमारे लिए अपनी प्रगति और विकास करना सम्भव होगा। अन्यथा, परिथितियों का बदस्तूर दबाव बना रहेगा, इससे संकट और दुःख ही उत्पन्न होगा और कई बार तो लज्जा और अपमान भी सहन करना होगा।” 

पिछले 70 वर्षों में भारत की खाद्य समस्या में उतार-चढ़ाव आते रहे हैं जैसे-आजादी के समय भारत में चावल और गेहूँ का अभाव हो गया इसलिए सरकार ने उत्पादन बढाकर और ज्यादा अभावों द्वारा घरेलू आपूर्ति के बढ़ाने पर जोर दिया। पचास के दशक में (1956 में) भारत सरकार ने खाद्य आपूर्ति के उद्देश्य से संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ एक खाद्य सहायता समझौता किया जिसे पी.एल. 480 समझौता कहा जाता है। साठ के दशक (1965 से 1966) में भारत में भयंकर सूखा पड़ा, उस स्थिति में अमरीकी राष्ट्रपति लिंडन जासन ने भारत को सबक सिखाने के लिए पी.एल. 480 प्रोग्राम के अधीन खाद्य सहायता को मासिक आधार पर सीमित कर दिया। इस अवधि में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में नई कृषि कार्य योजना लागू की गयी जिसके अन्तर्गत बीज-पानी-उर्वरक तकनीक को अपनाया गया जिसे लोकप्रिय भाषा में “हरित क्रांति” का नाम दिया गया इस नीति के परिणमस्वरूप भारत को खाद्यान्न आयात को समाप्त करने में सहायता मिली इसके साथ ही देश में अनाज की प्रति व्यक्ति उपलब्धता में भी वृद्धि हुई। हरित क्रान्ति का सार्वाधिक प्रभाव पंजाब हरियाणा और उत्तर प्रदेश में देखने को मिला। इन राज्यों ने देश में कभी खाद्य समस्या उत्पन्न नहीं होने दिया है। सत्तर के दशक में सरकार ने 50 लाख टन खाद्यान्नों के संचयन की नीति अपनायी। अस्सी के दशक के दौरान सरकार ने बफर भंडार में 4 करोड़ टन 

खाद्यानों को जमा कर लिया था। इस विशाल भंडार के द्वारा ही सरकार ने तीन वर्षों तक खाद्यानों के खराब उत्पादन का मुकाबला किया। नब्बे के दशक (1997-2002) में इस बात पर बल दिया गया कि – “देश का सबसे पहला प्रयास खाद्य सुरक्षा प्रणाली का निर्माण करना था ताकि अकाल का खतरा देश से एकदम समाप्त किया जा सके। इन प्रयासों की सफलता का सबसे प्रखर प्रमाण यह है कि पिछले पाँच दशकों में देश में कोई अकाल या घोर भुखमरी बड़े पैमाने पर नहीं देखी गयी। 

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