पानीपत का प्रथम युद्ध |First Battle of Panipat history in hindi

पानीपत का प्रथम युद्ध |

पानीपत का प्रथम युद्ध (First Battle of Panipat) (20 अप्रैल, 1526 ई०) 

बाबर एक महत्वाकांक्षी योद्धा था। उसने समरकन्द के बाद बुखारा, उजबेकों का काफी सारा इलाका, ट्रांस आक्सियाना का विशाल क्षेत्र, जीतने के बाद काबुल को 1504 ई० में फतह कर लिया था। उसके मन में इस बात की लालसा थी कि उसके पूर्वजों तैमूर और चंगेज खां ने भारत तक फतह हासिल की थी। वह हिन्दुस्तान विजय का इरादा कर काबुल से निकल पड़ा। 

सन् 1519 को वह बाजौर और भेड़ा की विजय करता हुआ सिन्धु नदी के तट पर आ पहुंचा। उस समय सिन्धु नदी में भीषण बाढ़ आयी हुई थी, जिसकी वजह से कई माह तक बाबर की सेना पार न उतर सकी। वहां रुककर समय बर्बाद करने के बजाय बाबर बदख्शां पहुंचा। उसे जीतने के बाद वह कांधार के अविजित प्रदेशों को जीतता रहा। इस सब में तीन साल का अरसा लग गया था। उसने 1520-23 के बीच हिन्दोस्तान विजय का पुनः प्रयास करते हुए अपनी सेना आगे बढ़ाई। उस बीच उसकी सेना की शक्ति काफी बढ़ गयी थी। उसने भेड़ा का क्षेत्र पार किया ही था कि अच्छे संयोग से दौलत लोदी तथा अलाउद्दीन लोदी उससे आकर मिले। ये दोनों इब्राहीम लोदी के रिश्तेदार थे और दिल्ली की सल्तनत पर विराजमान इब्राहीम लोदी से असन्तुष्ट थे। उन्होंने बाबर को भारत पर आक्रमण के लिए आमंत्रित करते हुए आश्वस्त किया कि युद्ध के समय वे उसे सहायता देंगे। 

सन् 1534 ई० में बाबर ने लाहौर को जीता। लाहौर से दक्षिण की ओर कूच कर दीबालपुर जीता। 11 दिसम्बर, 1525 ई० को उसे हिन्दोस्तान की पहाड़ी और मैदानी इलाकों में छापामार करके लूट-पाट करने वाले जाट और गूजरों से युद्ध करना पड़ा। 

3 जनवरी, 1526 को बाबर की सेना ने मेवात फतह कर लिया। उसके बाद बाबर की सेना, दिल्ली के सिंहासन पर आसीन सुल्तान इब्राहीम लोदी की सेना से भिड़ने के लिए बढ़ने लगी थी। बाबर ने सुन रखा था कि इब्राहीम लोदी के पास 1,00,000 (एक लाख) की पैदल और घुड़सवार तथा एक हजार विशालकाय हाथियों की सेना है। बाबर की सेना ने दोआब (Twin Water) क्षेत्र पारकर, युद्ध के मैदान में उतरने की तैयारी की। उसने युद्ध में भिड़ने से पूर्व अपनी सेना को नए ढंग से सजाया। दाहिनी और बायीं ओर की टुकड़ियों के मध्य खासे अनुभवी योद्धाओं को शामिल किया। उसने दो पहियों वाली 700 गाड़ियों (बैल विहीन बैल गाड़ियों) की व्यवस्था की और पानीपत के मैदान में आ जमा। 

इस युद्ध में बाबर ने तुगलमा युद्ध नीति को अपनाया। यह युद्ध नीति भारत के लिए एकदम नवीन युद्ध पद्धति थी। इसमें बैलगाड़ियों को मजबूत रस्सियों से बांधकर आगे रखा गया। बैल गाड़ियों के पीछे तोपों को लगाया गया। बैलगाड़ियों के दाएं-बाएं योद्धाओं को सजाया गया। 

इब्राहीम लोदी की सेना भी मैदान में आ डटी थी। पर उसने बाबर की सेना की शक्ति को परखने में लगभग एक सप्ताह का समय लगा दिया। वह चाहता था कि बाबर की सेना पहले आक्रमण करे। 

लेकिन ऐसा न करते देखकर उसने 21 अप्रैल, 1526 ई० को अपनी सेना को हमले का आदेश दे दिया। 

बाबर की यही चाह थी। उसने गाड़ियों का अवरोध खड़ा करके तोपों को उसके पीछे इसलिए लगाया था ताकि दुश्मन की सेना जब बढ़कर हमला करे तो गाड़ियों के अवरोध के कारण एकदम से उसकी सेना को नुकसान न पहुंचा सके तथा हमला करती सेना को तोपों की मार से धराशायी कर दिया जाए। तोपों की मार से जब दुश्मन की सेना बौखला कर पीछे कदम सरकाए तो बाबर की दोनों पावो में लगी सेना, दुश्मन सेना पर हमला करके मार-काट मचा दे। 

बाबर के पास कुल 10,000 की सेना थी। दस हजार की सेना, एक लाख की सेना के सामने बहुत कम थी-उस युद्ध को जीतने के लिए तुगलमा युद्ध पद्धति ही कारगर हो सकती थी। बाबर की युक्ति काम कर गयी थी। इब्राहीम लोदी की सेना जैसे ही जोश में भरी हुई हमला करने बढ़ी, बाबर के तोपची, उस्ताद कुली खां ने तोपों का मुंह खोल दिया। 

पानीपत का प्रथम युद्ध |

इब्राहीम लोदी की सेना तोपों की मार सह न सकी। हजारों सैनिक मौके पर ही मारे गए। जिससे पीछे की सेना के पैर उखड़ गए। भागती सेना को बाबर की सेना ने आगे बढ़कर कत्ले आम करना आरम्भ कर दिया। 

घमासान युद्ध होने लगा था। युद्ध का वह क्षण काफी निर्णायक साबित हुआ, जबकि दायीं ओर से इब्राहीम लोदी खुद लड़ता हुआ अपने योद्धा सैनिकों के साथ बाबर की सेना के सामने आ गया। वह घोड़े पर था और अपने योद्धा होने का परिचय देता हुआ बाबर की सेना में तबाही मचाए हुए था। 

बाबर खुद भी घोड़े पर था और इब्राहीम लोदी के सामने पहुंच उससे तलवार टकरा कर अपने योद्धा होने का परिचय देना चाहता था। 

परन्तु बाबर को ऐसा अवसर चाह कर भी न मिल पा रहा था क्योंकि दुश्मन की दस गुनी सेना ने उसे घेर रखा था-बाबर मार-काट मचाता तो आगे हाथियों की सेना उसके मार्ग में अवरोध रूप में सामने आ जातीं। 

इब्राहीम लोदी अपने अंग रक्षकों से घिरा हुआ युद्ध कर रहा था इस स्थिति में पहले अवरोध विशालकाय हाथियों की शृंखला थी तो दूसरे अवरोध इब्राहीम लोदी के अंगरक्षक। 

अचानक, बाबर के तीरन्दाजों ने उस समय युद्ध का नक्शा बदल दिया-जबकि उसने अपने बादशाह का उद्देश्य समझ, बाबर और इब्राहीम लोदी के बीच दुश्मनों की सेना पर तीरों की वर्षा कर दी…। उस समय, बाबर के तीरन्दाजों की ओर से छोड़े गए तीर इतनी अधिक संख्या और इतनी तीव्रता से फेंके जा रहे थे कि ‘तीरों की वर्षा के कथन को पूरी तरह चरितार्थ कर दिया था। 

तीरों ने दुश्मन सेना के हाथियों के मस्तक को बेधना आरम्भ किया, वे चिंघाड़ते हुए पीछे पलटने और अपने ही सैनिकों को रौंदने लगे। 

दुश्मन सेना में चीत्कार मच गयी। बीच का मैदान खाली पड़ गया था। बाबर ने दुश्मनों की गिरी हुई लाशों पर से घोड़ा कुदा, तलवार लहराते हुए बिजली की चमक के साथ इब्राहीम लोदी के अंगरक्षक पर हमला बोल दिया। 

अत्यन्त तीव्रता के साथ दुश्मन का सर कलम करते, उनकी लाशें बिछाते हुए वह इब्राहीम लोदी तक पहुंचने के करीब था कि उसकी सेना के तीरन्दाजों ने उसका काम आसान करने के लिए इब्राहीम लोदी के अंगरक्षकों की टुकड़ी पर तीरों का रुख मोड़ दिया। 

बाबर ने इब्राहीम लोदी से तलवार टकरायी ही थी कि अचानक इब्राहीम लोदी घोड़े से गिरकर नीचे आया और वीरगति को प्राप्त हो गया। बाबर के तीरन्दाजों ने अपना काम कर दिखाया था। 

सुल्तान के मारे जाने का शोर उठा तो दुश्मन सेना के पैर उखड़ गए। आधे दिन में ही युद्ध का निर्णय हो गया। 

तोपों की मार ने हाथियों को बेहाल कर दिया। बाबर ने विजेता रूप में घूमकर देखा तो एक ओर पांच-छः हजार तथा दूसरी ओर दस-पन्द्रह हजार दुश्मन के सैनिक मरे पड़े थे। 

जहां घमासान युद्ध हुआ था वहां बीस से पच्चीस हजार इब्राहीम लोदी के सैनिक मौत के घाट उतर गए थे। इस तरह युद्ध भूमि में काम आने वाले इब्राहीम लोदी के सैनिकों की संख्या 50 हजार के आस-पास थी। शेष सेना भागती हुई जंगलों और पहाड़ियों में छुपकर अपनी जान बचाने का प्रयास कर रही थी। 

उस युद्ध में बाबर के साथ उसका ज्येष्ठ पुत्र हुमायूं भी शामिल हुआ था।

दिल्ली और आगरा पर अधिकार 

इस युद्ध में बाबर की सेना के बहुत कम सैनिक दुश्मन सेना के हाथों मारे गए थे। उसके युद्ध भूमि में जख्मियों और मृत्यु को प्राप्त होने वाले सैनिकों की संख्या एक हजार से भी कम थी। 

युद्ध विजय के बाद बाबर ने हुमायूं को घुड़सवार सेना के साथ शीघ्रता से आगरा पर अधिकार पाने के लिए भेजा। खुद उसने दिल्ली का रास्ता पकड़ा। उसने इस बात की अपने साथ के सैनिकों को सख्त हिदायत दी थी कि वे दिल्ली के शाही खजाने पर सबसे पहले पहुंचते ही कब्जा जमाएं। 

बाबर का यह उद्देश्य पूरा हो गया। आगरा पहुंचने वाले हुमायूं ने ग्वालियर के राजा विक्रमादित्य के परिवार से कोहनूर हीरा हासिल किया था। विक्रमादित्य इब्राहीम लोदी के पक्ष में युद्ध करता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ था। उसका परिवार कोहनूर हीरे तथा अन्य बहुमूल्य हीरे-जवाहरातों के साथ आगरा से कूच करने की तैयारी में था तभी हुमायूं पहुंच गया था। 

दिल्ली पहुंचने वाले बाबर ने शाही खजाने पर कब्जा जमाया। उसने इस बात की सदाशयता दिखायी कि दिल्ली और आगरा में किसी का भी कत्ल न किया। 

उसने इब्राहीम लोदी की माता तथा अन्य परिवारी सदस्यों को ससम्मान आगरा से दो मील दूर स्थित एक परगना देकर उन्हें वहां निवास के लिए भेज दिया। 

इब्राहीम लोदी की मां और उसके परिवारी सदस्यों के साथ अच्छा व्यवहार करके उसने दिल्ली और आगरा की जनता का दिल जीत लिया था। उसने इस बात का संदेश दिया कि वह हिन्दोस्तान पर हुकूमत करने आया है ना कि लूटमार करने। इस तरह वह दिल्ली के सिंहासन पर सिंहासनासीन हुआ। 

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