पहला कर्नाटक युद्ध |First Carnatic War History in hindi

पहला कर्नाटक युद्ध (First Carnatic War)

प्रथम कर्नाटक युद्ध (First Battle of Karnataka) (1746-1748) 

प्रथम कर्नाटक युद्ध भारत की धरती पर दो योरोपीय देशों ब्रिटेन और फ्रांस के बीच हुआ। इस युद्ध में दोनों देशों की सेनाएं मैदान में उतरीं और जबरदस्त युद्ध और दूसरे का संहार करके वर्चस्व की लड़ाई लड़ी। 

कर्नाटक प्रथम युद्ध का विवरण प्रस्तुत करने से पूर्व इस बात पर प्रकाश डालना आवश्यक है कि आखिरकार भारत की धरती पर दो यूरोपीय देश युद्ध करने कहां से आ गए? 

इसके लिए थोड़ा पूर्व में, इन दोनों देशों के भारत में प्रवेश के काल का वर्णन करना रोचक है। 

अंग्रेजों का भारत आगमन

पहला कर्नाटक युद्ध (First Carnatic War) 

अंग्रेजों का भारत में प्रथम आगमन 1608 ई० में हुआ। कैप्टन हाकिन्स ब्रिटेन के सम्राट प्रथम राजदूत के रूप में बादशाह जहांगीर से आकर मिला। कैप्टन हाकिन्स फारसी भाषा का ज्ञाता था। वह तीन वर्ष आगरा में रहा। उससे प्रसन्न होकर जहांगीर ने उसे 400 मनसब (400 सैनिकों को अपने साथ रखने का आज्ञा पत्र) तथा जागीर प्रदान की। 

उसके बाद 1615 ई० में ब्रिटेन के सम्राट जेम्स प्रथम ने सर टामस रो को अपना राजपूत बनाकर जहांगीर के पास भेजा, उसे गुजरात के तत्कालीन सूबेदार खुर्रम से व्यापारिक कोठियां बनाने का आज्ञा पत्र प्राप्त हुआ। 

सर टामस रो के भारत से वापस जाने से पूर्व सूरत, आगरा, अहमदाबाद, भड़ौच में अंग्रेजों की व्यापारिक कोठियां स्थापित हो गयी थीं। 

सन् 1632 ई० में गोलकुण्डा के सुल्तान से राज्य के बन्दरगाहों में व्यापार करने की अनुमति अंग्रेजों को मिल गयी थी। सन् 1639 ई० में मद्रास (वर्तमान में चेन्नई) में तथा 1651 ई० में हुगली में अंग्रेजों की व्यापारिक कोठियां स्थापित हुईं। 

इस तरह, धीरे-धीरे अंग्रेज भारत की धरती पर व्यापार करने के बहाने अपना प्रभुत्व स्थापित करते चले जा रहे थे। 

फ्रांसीसियों का भारत आगमन 

फ्रांसीसियों का भारत आगमन, व्यापार के बहाने ही हुआ। ये डेनमार्क के निवासी थे। सन् 1616 में फ्रांस के सम्राट लुई 14वें के मंत्री ऑकोलापर्ट के सहयोग से इनकी कम्पनी भारत में स्थापित हुई। फ्रांसीसी कम्पनी, ईस्ट इण्डिया कम्पनी फ्रांस सरकार के संरक्षण तथा उसके द्वारा दी जाने वाली सहायता पर निर्भर करती थी। इसलिए इसे ‘सरकारी व्यापारिक कम्पनी’ भी कहा गया। 

भारत में फ्रांसीसियों की पहली कोठी फ्रैंको कैरो नामक फ्रांसीसी द्वारा 1668 ई० में सूरत में स्थापित की गई। 

सन् 1673 ई० में फ्रांस्वा मार्तिन तथा बेलागर दे लेप्सिन ने वलिकेण्डपुरम् के मुस्लिम सूबेदार शेर खां लोदी से एक छोटा-सा गांव पुर्दुचेरी प्राप्त किया। पुर्दुचेरी में ही फ्रांसीसियों ने पाण्डिचेरी की नींव डाली। सन् 1693 में डचों ने फ्रांसीसियों के कब्जे से पाण्डिचेरी को छीन लिया था, पर बाद में समझौते के तहत वापस कर दिया। 

सन् 1721 में मारीरास, 1725 ई० में मालाबार तट पर स्थित माही एवं 1739 ई० में कारीकल पर फ्रांसीसियों ने अपना अधिकार जमाया। 

सन् 1742 से पूर्व फ्रांसीसियों का मूल उद्देश्य व्यापारिक लाभ कमाना था, परन्तु 1742 ई० के बाद लार्ड डूप्ले पाण्डिचेरी का गवर्नर नियुक्त होकर आया तब उसका उद्देश्य राजनीतिक भी हो गया। 

डूप्ले की यह महत्वाकांक्षा ही प्रथम कर्नाटक युद्ध का कारण बनी। आइए अब प्रथम कर्नाटक युद्ध पर निगाह डालें। 

प्रथम कर्नाटक युद्ध 1746 ई० तक दो साल तक फ्रांस और ब्रिटेन के बीच हुआ। यूरोप ने फ्रांस और ब्रिटेन एक-दूसरे के प्रबल विरोधी थे, भारत में जब ये व्यापार में आमने-सामने हुए तो उनकी प्रतिद्वन्द्विता और स्पर्धा खुलकर सामने आ गयी। ये दोनों एक-दूसरे का पैर भारत भूमि से उखाड़ने के प्रयास में लग गए। 

अंग्रेज अधिकारी बर्नेट ने पाण्डीचेरी के समुन्द्री भू-भाग में कुछ फ्रांसीसी जहाजों पर बलात् कब्जा कर लिया। पाण्डीचेरी के तत्कालीन फ्रांसीसी गवर्नर डूप्ले ने मॉरीशस के गवर्नर ला बू?ने का सहयोग प्राप्त कर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। यह युद्ध दो वर्ष तक चला। अन्ततः 21 सितम्बर, 1746 को मद्रास में अंग्रेजों ने हार के बाद फ्रांसीसियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।

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