राष्ट्र निर्माण के नकारात्मक पूर्वसंकेतों का सामना करते हुए 

राष्ट्र निर्माण के नकारात्मक पूर्वसंकेतों का सामना करते हुए 

राष्ट्र निर्माण के नकारात्मक पूर्वसंकेतों का सामना करते हुए (Facing the Negative Portents of Nation Building) 

उदार पूँजीवाद की से उपजी आकांक्षाओं को वाशिंगटन सहमति के ध्वस्त होने की आशंका ने झुठला दिया है। अनेक लोगों का मानना है कि अहस्तक्षेप की अर्थव्यवस्था के अख्रश्य हाथों ने लम्बे समय से अधोमुखी रिसाव, यानी अमीरों से गरीबों की ओर धन के प्रवाह को ढककर रखा है। 1990 के दशक में शीतयुद्ध की समाप्ति के पश्चात राज्य को अर्थव्यवस्था से कदम खींचने का जो जोरदार आह्वान किया गया था अब उसका जैसे कोई महत्व नहीं रह गया है। आज हमारी राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था सहित सारा विश्व एक तरह के आर्थिक संकट से त्रस्त कहा जा रहा है और परिणामी निराशामय स्थिति ने सामाजिक क्षेत्र को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करना प्रारम्भ कर दिया है। देश के कुछ हिस्सों में हुए साम्प्रदायिक/नस्लीय दंगे और कुछ बहुत ही महानगरों से लोगों का भारी संख्या में अनुगामी पलायन ने यथाशब्द उन्हें बुरी स्थिति में डाल दिया है। 

ऐसा ही हाल में भारत की वाणिज्यिक राजधानी मुम्बई में हुआ था जब कुछ तत्वों ने उत्तर भारत के प्रवासियों और बसने वालों के खिलाफ हंगामा खड़ा किया था और ये भारतीय मजदूर मुम्बई छोड़कर अपने-अपने मूल स्थानों पर वापस चले गए। मुम्बई और महाराष्ट्र का एक बड़ा हिस्सा वास्तव थोड़े समय के लिए ठप्प पड़ गया था जैसा कि बंद कारखानों से दिखलाई पड़ता था यदि हम कुछ कई छोटी सेवाओं की बात नहीं भी करें तो जो भी बुरी तरह प्रभावित हुए थे। मुम्बई में लुन्गीवाला/उत्तर भारतीय बनाम मराठी बहस थमने से पहले की लम्बे समय तक चली। आखिरकार, यह भी हमारी राष्ट्र निर्माण प्रक्रिया की कमजोरी को दर्शाता है। जवाहरलाल नेहरू सहित हमारे देश निर्माताओं ने एक लम्बे स्वतंत्रतता आन्दोलन के माध्यम से जिस भारत को हँढ निकाला था अभी भी हमें उसे आत्मसात करना बाकी है। 

यदि हम सब के संयुक्त प्रयासों से अपने राष्ट्र की नींव को सशक्त और ठोस न करें तो हम तीसरे विश्व के बहुत सारे विकासशील देशों से कुछ अलग नहीं हो पाएँगे। इन देशों में कई अभी भी अपनी राज्य निर्माण प्रक्रिया में, राष्ट्र निर्माण की तो बात ही छोड़ दें, विवेक और एकता के एक सादृश्य को ढूँढने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यदि हम अपनी राज्य व्यवस्था का पीछा करते इन क्षुद्र लेकिन गुत्थीदार मुद्दों का हल न निकाल लें तो भारत नामक जिस सभ्य हस्ती की महानता का गौरव हमें प्राप्त है वह जल्द ही खो जाएगा।

 यदि आने वाली सदी एशियाई सदी कहलाने वाली है तो हमें सुनिश्चित करना चाहिए कि भारत उसमें एक अहम भूमिका अदा करे। एक ऐसे समय में जब हमें अपनी ताकत को आतंरिक और बाहरी और बड़ी समस्याओं से लड़ने में लगाना चाहिए, एक नकारात्मक और बीमार मानसिकता अन्धकार की सारी शक्तियों को का नेतृत्व करे और निदेशित करने अत्यंत सक्रिय दिखलाई पड़ रही है। यह निश्चित रूप से हमें एक प्रगतिशील समाज के रूप में कमजोर दिखलाता है, हम उस सबक को भूल जाते हैं जो पाकिस्तान को भेदभाव और वंचित करने के मुद्दे पर पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लादेश के रूप में अलग होने के रूप में मिला। हमें यह भूलना नहीं चाहिए कि ऐसी मानसिकता हमेशा राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाती है। हमारे सामने ऐसी अनुत्पादक, व्यर्थ लेकिन ऐसी कमजोर बनाने वाली क्षुद्रताओं पर अपना दिमाग खराब करने की अपेक्षा हल करने के लिए कही और बड़ी समस्याएँ हैं। 

हालाँकि, चारों ओर फैली नकारात्मकताओं के बावजूद, अभी भी आशा की एक किरण बाकी है। कुछ महानगरों से उत्तर भारतीयों के भारी पलायन के बाद देश भर के हमारे राजनीतिज्ञों सहित भारतीयों द्वारा प्रदर्शित आगे बढ़कर की गई पहलों और सकारात्मक भावनाओं को कोई कैसे भूल सकता है? राज्य सरकारें, विभिन्न राजनीतिक दलों के जिम्मेदार नेता, गैर सरकारी संस्थाएं और सामान्य नागरिकों ने इन नागरिको को उन महानगरों में वापस आने के लिए मनाने में सामान्य से अधिक किया और क्यों नहीं? आखिरकार, भारतीय संविधान ने अनुच्छेद 19 भाग III में देश में कहीं भी काम करने का एक मौलिक अधिकार प्रदान किया है। 

यदि हम उस सामाजिक  समझौते को तोड दें जो हमने 15 अगस्त, 1947 को किया था. यह वास्तव में हमारे प्रिय अपगुशन साबित हो सकता है। यदि हम मिले जले समाज, जो भारत बन चका है, की वास्तविक सच्चाई को स्वीकार नहीं करते हैं हम केवल स्वयं को ही चोट पहुँचाएंगे। हमें इस तथ्य को भी स्वीकारना और पहचानना चाहिए कि कि अंतर्राष्ट्रीय श्रम विभाजन की तरह एक राष्ट्रीय श्रम विभाजन भी धीरे-धीरे उभरा है। हम लोग अपने सिर पर ही गोली मारेंगे यदि हमने कभी भी ऐसी एक प्रक्रिया में दखलअंदाजी करने की कोशिश की जो वास्तव में और व्यापक राष्ट्र निर्माण प्रक्रिया का ही एक हिस्सा है। 

दु:ख की बात यह है कि ऐसी असहिष्णु भावनाएँ केवल भारत तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि इनकी अभिव्यक्ति दुनिया भर में हो रही है। तामिलनाडु में श्रीलंका के नागरिकों पर आक्रमण और उन्हें बाहर निकाले जाने, भारत में पाकिस्तानी अभिनेताओं के विरुद्ध समय-समय पर घृणा के आवेग, तालिबान और आई. एस. आई. एस. सहित धार्मिक कट्टरपंथियों द्वारा मासूम लोगों की नियमित हत्याओं, बांग्लादेश में हत्याएँ और उदार आवाजों को दबाने और विश्व के अन्य भागों में समान घटनाओं के उदाहरण नस्लवादियों और लड़ाकों के उदय को दिखलाते है, 

सीरिया, मिस्र, लीबिया और मध्य पूर्व के अन्य भागों में सीमित भावनाओं की समान अभिव्यक्तियाँ पहले ही से ‘अरब स्प्रिंग’ (अरब विश्व के प्रजातांत्रिक आन्दोलन) से उपजी उम्मीदों को झुठला रही हैं। हाल की जे. एन. यू. की घटनाओं पर सुविज्ञ प्रतिक्रिया और उद्गार, धार्मिक हस्तियों के ‘अवांछित’ कार्टून और पेंटिंग्स, या भारतीय दण्ड संहिता की धारा 124 ए के तहत राष्ट्रीय चिन्ह की मिथ्या प्रस्तुति के लिए एक कार्टूनिस्ट की गिरफ्तारी हमारी विकृत प्राथमिकताओं का एक संकेत देते हैं। बिना इन घटनाओं के औचित्य या अनौचित्य में गए, यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि इन क्षुद्रताओं की अपेक्षा हमें व्यस्त रखने के लिए बेहतर एवं और अधिक बड़े मुद्दे हैं।

 एक ऐसे समय में ये घटनाएँ शर्मनाक और आश्चर्यजनक लगती हैं जब दूसरे ग्रहों पर अन्य ग्रहवासी जीवन ढूँढ़ने में कई एजेंसियाँ और सरकारें लगी हुई हैं। जबकि अभी तक हमने सभ्य जीवन के अपने ही नियमों और मानकों के अनुकूलन में मानव जीवन को व्यवस्थित करना नहीं सीखा है, हम ज्ञान मीमांसा सत्ता मीमांसा की अपनी सीमाओं को इस ग्रह से परे फैलाने के लिए व्यग्र हैं। हमें निश्चित रूप से दूसरे ग्रहों पर विदेशी जीवन ढूँढने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है जब हम अड़ियल ढंग से अपने ही नीले ग्रह के अन्य ग्रहवासियों (इसे विदेशियों और अन्य जातियों, समुदायों, क्षेत्रों, धर्मों, इत्यादि के लोग पढ़ें) समझौता करने को तैयार नहीं हैं। 

एक ऐसे समय में जब हमें एक कमजोर अर्थव्यवस्था, सीमावर्ती अवैध प्रवास, राज्य-निर्माण से सम्बंधित सारे कठिन मुद्दों को हल करने, स्थायी निर्धनता और सामाजिक असमानताओं की समस्याओं, बेरोजगारी, निरक्षरता, नारी भ्रूण हत्या, पर्यावरणीय अपकर्ष, जलीय और ऊर्जा के बढ़ते संकट और क्या नहीं से उपजी तात्कालिक समस्याओं को सुलझाने में व्यस्त होना चाहिए, हम पूर्णतः नकारात्मक और अनुत्पादक मुद्दों में व्यस्त हैं। सेलिग हैरिसन के अनुसार विनाश के पैगम्बर भारतीय राष्ट्र के जल्द ही एक विखंडन के लिए पहले से ही ओवरटाइम काम कर रहे हैं। हमें निश्चित रूप से अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है अन्यथा हम जल्द ही एक ऐसी नियति पर पहुँचेंगे जो हम कभी नहीं चाहेंगे। 

यह आशा की जाती है कि यह सब एक गुजर जाने वाला एक चरण साबित हो। पहले हमें निर्धनता, निरक्षरता और बेरोजगारी जैसी दानवाकार समस्याओं को सुलझाना चाहिए अन्यथा राष्ट्र निर्माण के लिए किए गए हमारे सारे प्रयास और उपलब्धियाँ व्यर्थ हो जाएँगी। प्यू रिसर्च फाउंडेशन के निष्कर्ष के अनुसार, एक साल पहले जो यह था उसकी अपेक्षा अपने देश के आर्थिक विकास की दिशा और भविष्य के बारे में भारतीय जन का विश्वास कम हो गया है। जैसा हम एक राज्य और एक राष्ट्र के रूप में कर रहे हैं उससे निश्चित रूप से कहीं और बेहतर कर सकते हैं खासकर तब जब हम एक महान शक्ति बनने की इच्छा करें। हालाँकि संकीर्ण मानसिकता और क्षद्र विचार के साथ वाश्वक मच पर असाधारण भूमिका निभाने की आशा हम कभी नहीं कर सकते हैं। 

मुख्य बिन्दु 

  • अहस्तक्षेप की अर्थव्यवस्था के अदृश्य हाथों ने लम्बे समय से अधोमुखी रिसाव, यानी अमीरों से गरीबों की ओर धन के प्रवाह को ढककर रखा है। 
  • मुम्बई में उत्तर भारतीय बनाम मराठी बहस थमने से पहले काफी लम्बे समय तक चली। 
  • हमारे सामने ऐसी अनुत्पादक, व्यर्थ लेकिन ऐसी कमजोर बनाने वाली क्षुद्रताओं पर अपना दिमाग खराब करने की अपेक्षा हल करने के लिए कही और बड़ी समस्याएँ हैं। 
  • अंतर्राष्ट्रीय श्रम विभाजन की तरह एक राष्ट्रीय श्रम विभाजन भी धीरे-धीरे उभरा है। 
  • असहिष्णु भावनाएँ केवल भारत तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि इनकी अभिव्यक्ति दुनिया भर में हो रही है। 
  • अपने देश के आर्थिक विकास की दिशा और भविष्य के बारे में भारतीय जन का विश्वास कम हो गया है। 
  • जैसा हम एक राष्ट्र के रूप में कर रहे हैं उससे निश्चित रूप से कहीं और बेहतर कर सकते हैं।

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