भारतीय संस्कृति का विदेशों में विस्तार 

भारतीय संस्कृति का विदेशों में विस्तार 

भारतीय संस्कृति का विदेशों में विस्तार (Expansion of Indian Culture Abroad) 

वैश्वीकरण के दौर में भारतीय संस्कृति का काफी प्रचार-प्रसार हुआ है। हमारी संस्कृति का विदेशों में काफी विस्तार हुआ है। सारी दुनिया भारतीय संस्कृति से परिचित हो रही है और इस संस्कृति की असाधारणता से अभिभूत है। भारतीय संस्कृति की विरासत का विस्तार भी कम अद्भुत नहीं है। इस विरासत का एक प्रमुख अंग है रामायण-कथा। विश्व में मात्र कुछ ही ऐसी ऐतिहासिक गाथायें होंगी जिन्होंने हर किसी की कल्पनाओं को इतना नहीं झकझोरा होगा 

जितनी रामकथा ने। भौगोलिक सीमाओं से परे रामायण की कथा आधे विश्व से अधिक में प्रचलित है। चाहे बौद्ध व जैन परम्पराएं हो अथवा आज के मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया या मलेशिया जैसे देश हों अथवा थाईलैंड, कम्बोडिया या सुदूर के पूर्वी द्वीप समूह हों वहां भी इस कथा ने मानव मन पर गहरी छाप छोड़ी है। इसने वहां की कला संस्कृति, स्थापत्य और नाट्य शैलियों को प्रभावित किया है। हमारे देश में भी रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों को ब्राह्मणवाद से जोड़ने वाले पूरी तरह से बेखबर हैं कि इन दोनों ग्रंथों के आदि रचयिता वाल्मीकि और व्यास स्वयं ब्राह्मण या क्षत्रिय न होकर निचले वर्गों में से थे। आज भी महान और दिव्य कथायें उसके  मूल घटना स्थलों से दूर बहुस्तरीय विश्वव्यापी समाज की थाती बनी हुई हैं। अयोध्या स्वयं करोड़ों लोगों के मन में एक अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में स्थापित है। पहले के थाईलैण्ड के राजाओं की प्राचीन राजधानी का भी यही नाम रहा है। जहां के सम्राट आज भी स्वयं को राम के वंशज मानते हैं। भारत का आदर्श अयोध्या की अनुगूंज वृहत्तर भारत के कई सुदूर नगरों में जीवंत हो चुकी है। 

जाहिर सी बात है, जहां भारत पश्चिम की संस्कृति की ओर जा  रहा है और भारत में रहने वाले लोग पश्चिम की संस्कृति से प्रभावित हो रहे हैं, पश्चिम की संस्कृति और सभ्यता भारत में व्याप्त हो रही है, वहीं पश्चिम भी भारत की संस्कृति को अपना रहा है। ‘योग’ इसका ज्वलंत उदाहरण है। योग का आकर्षण पहले भी था। इसमें आर चमक आई है 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किए जान के बाद। ‘योग’ भारतीय संस्कृति का ही अभिन्न घटक है, जिससे सारी दुनिया सुरभित हो रही है। इस रूप में भारतीय संस्कृति का परचम पूरे विश्व में लहरा रहा है। 

“भारत ने रामकथा को या किसी दूसरी आस्था को बलपूर्वक या तलवार के बल पर या औपनिवेशिक ताकत के रूप में दुनिया में नहीं फैलाया है। भारत ने अपनी नैतिक शक्ति से हर जगह मानव मन को झकझोरा है।” 

कंबोडिया के विश्व प्रसिद्ध विशाल ‘अंगकोरवाट’ मंदिर ने राम के आख्यान को एशिया के उस भाग में अपने विस्मयजनक स्थापत्य द्वारा अमरत्व प्रदान किया है। रूस में भी राम कथानक का परिचय सदियों पहले हो चुका था। कई शताब्दी पूर्व रूसी यात्री अफनासी निकितिन भी भारत आया था जो राम कथा से वाकिफ था। राम कथाओं को दन्त कथाओं से ऊपर उठाकर मानव सभ्यता के अन्तर्मन जोड़ने में विदेशी विचारकों का योगदान है। फ्लेमिश भाषी फादर कामिल बुल्के आज के युग के राम कथा के सबसे प्रमुख अध्येता रहे हैं उनकी तुलना रूसी भाषाविद् बरान्निकोव से की जा सकती है जिन्होंने रशियन में रामचरितमानस का पद्यमय अनुवाद किया है। यह भी गौरतलब है कि भारत ने रामकथा को या किसी दूसरी आस्था को बलपूर्वक या तलवार के बल पर या औपनिवेशिक ताकत के रूप में दुनिया में नहीं फैलाया है। भारत ने अपनी नैतिक शक्ति से हर जगह मानव मन को झकझोरा है। भारत के प्राचीन धर्म के विविध रूप हैं जो दूसरे देशों के धार्मिक विश्वास के बदलने पर भी उनकी वर्तमान जीवन पद्धति से जुड़ गये हैं। आज जापान पूरी तरह से आधुनिकतम प्रौद्योगिकी से सुसज्जित है और नवीनतम डिजाइनों की वहां गगनचुम्बी अट्टालिकायें हैं पर भारत की तरह वहां अब भी भवन निर्माण के पहले भूमि पूजन की परम्परा है। नए इस्पात और कंक्रीट के भवनों के निर्माण स्थलों पर आज भी भूमि खनन के पहले शिन्तो धर्म की एक रस्म अदा की जाती है, जो हमारे भूमि पूजन जैसी है। 

बोरोबुदुर में हिन्दू-बौद्ध शिल्प और स्थापत्य के चमत्कारों का सृजन करने वाले इंडोनेशियावासी ही थे और वहां के लोगों ने हिन्दू या बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद एक महान सभ्यता को जन्म दिया जो वहां के भव्य भग्नावशेषों में आज भी प्रतिबिम्बित है। आज हम सभी इन विशालतम हिन्दू मंदिरों को देखने के लिए सी.एन.एन. और बीबीसी की टीवी श्रृंखलाओं पर ही निर्भर हैं। आज भी वहां के मूलवासी खमेर अपने को गर्व से हिन्दुओं का वंशज कहते हैं। यह वही जाति है जिसने कम्बोडिया में पांचवीं सदी के इर्द-गिर्द एक हिन्दू साम्राज्य स्थापित किया था और नौवीं से बारहवीं सदी के बीच जिनका लगभग संपूर्ण कम्बोडिया पर प्रभुत्व था। अर्नाल्ड ट्वायनबी का कहना है कि जिन लोगों ने इस्लाम धर्म भी ग्रहण किया उन्होंने बाद में ऐसा कुछ निर्माण नहीं किया जिसकी तुलना विगत उपलब्धियों से की जा सके। 

इंडोनेशिया की मुस्लिम बहुल राजधानी जकार्ता और उसके इर्द-गिर्द की हिन्दू विश्वासों की उपलब्धि शायद भारतीय राजधानी दिल्ली से भी अधिक मात्रा में महसूस की जा सकती है। नगर के व्यस्त चौराहों पर स्थित वहां के केंद्रीय बैंक के सामने स्थापत्य कला का एक विशाल और विलक्षण नमूना है, जहां कई घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले रथ पर सवार कृष्ण अर्जुन को गीता का उपदेश देते दिखाई देते हैं। महाभारत के इस प्रकरण को एक बड़े आकार में प्रदर्शित किया गया है जिसकी समानता भारत में पाना भी मुश्किल लगता है। वहां की वायुसेना का नाम ‘गरुड़’ है और आन्तरिक वायुयान कम्पनी का नाम ‘सम्पाती’ है। वहां की प्रचलित राजभाषा ‘बिहाशा’ कहलाती है जिसमें संस्कृत के शब्द समाहित हैं। वहां के विश्वविद्यालय का नाम भी संस्कृतनिष्ठ है। 

वहां के लोगों में भारतीयता की गहरी छाप है। वहां के लोगों के नामों में निर्मला, अप्सरा, सती, देवी के अलावा अनेक हिन्दू देवी देवताओं पर होते हैं। सरकारी इमारतों के नाम भी संस्कृत में हैं। रक्षा मंत्रालय युद्धगृह कहलाता है और उसके भव्य प्रवेश द्वार पर लिखा है-चतुः धर्म, एका कर्म! उसी सड़क के एक किनारे पर खेल मंत्रालय है जिसका नाम है ‘क्रीड़ा भक्ति’। इतना ही नहीं, इंडोनेशिया की बड़ी राशि के नोटों पर गणेश जी का चित्र छपता है। सार्वजनिक और निजी इमारतों पर द्वारपाल की मूर्तियां बनाने का चलन है। वहां के राष्ट्रीय संग्रहालय में लगभग सभी मूर्तियां हिन्दू देवी-देवताओं से संबंधित हैं। उनमें शिव, पार्वती, विष्णु, दर्गा, विघ्नेश्वर, राम और कृष्ण भी हैं। इसी तरह बैंकाक में भी कई व्यस्त चौराहों पर धनुर्धारी राम की प्रतिमायें हैं। यहां तक कि वहां का हिल्टन होटल (Hilton | Hotel) भी ‘रामा हिल्टन’ के नाम से विख्यात था और अनेक बैंकों और बीमा कंपनियों के नाम में राम शब्द जुड़ा है। आज भी ऐसे अनेक देश हैं जिनकी सभ्यता की शैली उनकी प्राचीन धर्म की ही अभिव्यक्ति है, चाहे वह मध्य अमेरिका के यूकाटान प्रदेश की ‘माया’ सभ्यता हो, जो कोलम्बस के आगमन से पहले अपेक्षाकृत अत्यंत विकसित और श्रेष्ठ सभ्यता थी या उसी महाद्वीप के एजटेक्स या इन्काज के पुराने मंदिरों की बात हो। हिन्दू धार्मिक निष्ठा की छांव उनमें भी मिलती है। 

विश्व का प्राचीनतम धर्म होने के कारण इसके प्रसार के पद चिह्न आज भी बराबर मिलते रहते हैं। मध्य एशिया के कई देशों में आज भी हिन्दू प्रभावों को देखा जा सकता है। एक समय तो भारत विज्ञान या ‘इन्डोलाजी’ यूरोपीय विद्वानों की नजर में पूरा एक अलग विषय ही था। आज के अफगानिस्तान में हिन्दू-बौद्ध प्रभावों पर पहले काफी विशद चर्चा होती थी। गांधार बमियान और दसरे कई स्थानों पर विद्यमान भग्नावशेष इस बात के साक्षी हैं कि हमारी आस्था की पहुंच वहां भी थी। चाहे चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत आया हो या फाह्यान, चाहे मेगस्थनीज भारत की संस्कृति के सुगंध से जरूर आह्लादित हुआ होगा। जितने भी विदेशी भारत आए उन्होंने भारत की संस्कृति की महानता और आस्था के बारे में विशद रूप से लिखा है। यह बहुत बड़ी बात है कि यहां की संस्कृति से लोग अपने आप । अपनी आस्था से जड जाते थे। 

कुछ वर्ष पहले संस्कृत के कई शिलालेख उत्तरी अफगानिस्तान के मजारे-शरीफ नगर में पाए गए हैं जो वहां के हिन्दू सम्राटों का वर्णन करते हैं। हिन्दू शासक वेंकादेव और उसकी शिव भक्ति से संबंधित कई अभिलेख मिले हैं। संस्कृत की पश्चिमी शारदा शैली में लिखे ये शिलालेख हिन्दू शाही शासक कल्लार और भीमपाल से संबंधित हैं जो 843 से 959 ईस्वी के बीच हुए थे। मजारे शरीफ से, जहां पैगम्बर साहेब के दामाद हजरत अली की समाधि है, यह शिलालेख अभी कुछ वर्ष पहले लाकर इस्लामाबाद संग्रहालय में रखा गया है। इस भूमंडलीकरण के दौर में आज फिर से भारतीय संस्कृति के व्यापक प्रभावों की चर्चा हो रही है। वियतनाम में हमारी संस्कृति का केंद्र प्राचीन चम्पा साम्राज्य था वहां के प्राचीन भारतीयों ने वहां पर चीनी शासन को अपदस्थ कर चम्पा राज्य की नींव डाली थी। 

वैश्वीकरण के दौर में भी भारतीय संस्कृति में ऐसा कुछ है जिसे विदेशी अपने आप अपना रहे हैं। यह अपने आप में चौंकाने वाली बात है।

 कोरिया में आज भी विश्वास है कि उनके पूर्वज सम्राटों में एक का विवाह अयोध्या के प्राने राजवंश की कन्या से हुआ था। इस तरह से हम देखते हैं कि भारतीय संस्कृति का विस्तार कितने रूपों में मिथकों के रूप में, दंतकथाओं के रूप में, विदेशों में व्यापक रूप से विस्तार पा चुकी है। इसके विभिन्न आयाम हैं। विदेशी यात्री भी भारत से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके, भारतीय संस्कृति निर्विवाद रूप से संसार की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है भारतीय संस्कृति की विशालता इन शब्दों में खोजी जा सकती है- 

यूनान मिस्त्र रोमां सब मिट गए जहां से

बाकी मगर है अब तक नामोनिशां हमारा

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा। 

संस्कृति का दायरा तब व्यापक होता है जब दो संस्कृतियां आपस में मिलती हैं और विकास की दिशा प्राप्त करती हैं। संस्कृति स्वभावतः आदान-प्रदान से बढ़ती है। जब दो देश व्यवसायी संबंध करने पर अथवा शत्रुता या मित्रता के कारण आपस में मिलते हैं तब उनकी संस्कृतियां एक दूसरे को प्रभावित करने लगती हैं। 

जब भी दो जातियां आपस में मिलती हैं तो तीसरी धारा फूट निकलती है। ऐसी ही परिघटना को विचारक हेगेल ने ‘थीसिस’ और ‘एंटीथीसिस’ के टकराव से जन्म को ‘सिंथीसिस’ कहा था। जैसे यूनानी संस्कृति का भारतीय संस्कृति के संपर्क में आने से सांस्कृतिक विकास और भी द्रुत गति से हुआ। आदान-प्रदान की प्रकृति संस्कृति का प्राणतत्व है और इसी के सहारे वह अपने को जिंदा रखती है। वैश्वीकरण के दौर में भी भारतीय संस्कृति में ऐसा कुछ है जिसे विदेशी अपने आप अपना रहे हैं। यह अपने आप में चौंकाने वाली बात है। विदेशों में एक बार पुनः भारतीय संस्कृति को व्यापक प्रचार प्रसार मिल रहा है जबकि उत्तर आधुनिकता ने हर तत्व के अंत की घोषणा कर दी है फिर भी यह सब हो रहा है। भारतीय संस्कृति अब भी अपसंस्कृति से मोर्चा लेने में सक्षम है। 

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