कला : कलावादी अथवा जीवनवादी निबंध(Esssay on Art for Art’s Sake or Art for Life’s Sake) 

कलावादी अथवा जीवनवादी निबंध(

कला : कलावादी अथवा जीवनवादी (Art : Art for Art’s Sake or Art for Life’s Sake) 

चैतन्य मनुष्य पर बाह्य सृष्टि के विविध पदार्थों की प्रतिछाया भी पड़ती है और उसकी छाप भी पड़ती है. फलस्वरूप उसका हृदय दोलित हो उठता है और उसी क्षण वह अपने हृदय पर पड़ने वाले प्रभाव को व्यक्त करने के लिए उत्सुक हो उठता है. इन प्रभावों को व्यक्त करने के लिए उसके पास अनेक माध्यम एवं साधन उपलब्ध रहते हैं. अभिव्यक्ति के इन विभिन्न माध्यमों को ‘कला’ कहते है. संस्कत काव्यशास्त्र के आचार्यों ने कला की प्रेरणा एवं उसके प्रयोजनों का विशेष विवेचन किया है और अनेक दृष्टियों से उसकी व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं. उन्होंने कला को परिभाषा की सीमाओं में बाँधने का प्रयास बहुत कम किया है. इसके विपरीत पश्चिम के विद्वानों ने कला की एक सुनिश्चित परिभाषा प्रस्तुत करने के प्रयास किए हैं. पाश्चात्य काव्यशास्त्र की परम्परा प्लेटो से प्रारम्भ होती है और इसके अन्तिम आचार्य टी. एस. इलियट ठहरते हैं. उक्त परम्परा में आने वाले आचार्यों के मतों के निष्कर्ष रूप काव्य का प्रयोजन त्रिधा ठहरता है- 

(i) कला आत्मानुभूति के लिए

(ii) कला आनन्द के लिए तथा

(iii) कला मनोविनोद के लिए. 

प्रकृति की न्यूनता एवं अपूर्णता को स्वीकार करते हुए प्रायः समस्त विचारकों ने यह माना है कि ‘कला’ उस न्यूनता की पूर्ति है. हेगल का कथन है कि “प्राकृतिक सौन्दर्य ईश्वरीय सौन्दर्य का आभास है. ‘कला’ उसी की पुनरावृत्ति है, जिसमें विचार और आदर्श की चमक की प्रधानता रहती है.” कुछ परिभाषाएँ कला को रेखाओं, रंगों, गतियों, ध्वनियों और शब्दों द्वारा मनुष्य के मनोगत भावों की बाह्यभिव्यक्ति बताती हैं. हमारे मतानुसार इन समस्त मन्तव्यों का निष्कर्ष यह है कि ‘मनोभावों’ की मार्मिक अभिव्यक्ति को ‘कला’ शब्द द्वारा अभिहित किया जाता है. 

मूर्ताधार के न्यूनाधिक्य के अनुसार कलाओं का श्रेणी-निर्धारण किया जाता है. काव्य कला का मूर्ताधार शब्दार्थ मात्र है. इसी से कलाकृतियों में काव्य कला का स्थान सर्वोपरि माना जाता है. 

प्रत्येक कलाकृति में दो विशेषताएँ रहती हैं—लालित्य और उपयोगिता. ये दोनों गुण सापेक्ष हैं. इन गुणों के प्राधान्य के अनुसार कलाकृति को ललित कला अथवा उपयोगी कला कहते हैं. दोनों के मध्य लक्ष्मण रेखा खींचना एक दुष्कर कार्य है, परन्तु इतना अवश्य है कि ललित कला का सम्बन्ध मनुष्य के मानसिक विकास से रहता है और उपयोग कला का 

सम्बन्ध उसकी शारीरिक और आर्थिक उन्नति से है. ललित कलाएँ पाँच हैं. मूर्ताधार के अनुसार उनका उत्तरोत्तर क्रम इस प्रकार है- 

(1) वास्तु कला,

(2) मूर्ति-कला,

(3) चित्र- कला,

(4) संगीत कला,

(5) काव्य-कला. 

‘कला’ के विवेचन में सामान्यतः ‘काव्य कला’ से ही तात्पर्य रहता है.

कला का प्रयोजन 

भारत और पश्चिमी देशों के प्रायः सभी विद्वान ‘कला’ में रंजक तत्त्व अथवा आध्यात्मिक तत्त्व पर सदा से न्यूनाधिक बल देते आये हैं. उनके मध्य इस दृष्टिभेद ने न तो किसी प्रकार के विवाद का रूप धारण किया और न विभिन्न सम्प्रदायों की प्रतिष्ठा ही की. 

भारत में धर्म-भावना प्रेरित कलाकृतियों तथा अन्य यथार्थवादी रचनाओं को जीवन के स्वाभाविक प्रवाह के रूप में सहज रूप से ग्रहण किया गया, परन्तु यूरोप में ‘कला के प्रयोजन’ के प्रश्न को लेकर विचार-विमर्श एवं आन्दोलनों की एक परम्परा मिलती है. उन्नीसवीं शताब्दी में इटली के विचारक विद्वान क्रोचे ने कहा था कि “भावों की अभिव्यक्ति ही कला है तथा जीवन में इन भावों का उपयोगी होना आवश्यक नहीं है.” क्रोचे के इस कथन को लेकर यूरोप में कई आन्दोलन उठ खड़े हुए और उसके फलस्वरूप स्वच्छन्दतावादी विचारधारा परिपुष्ट हुई. इन आन्दोलनों में ‘कला, कला के लिए’ वाला दृष्टिकोण विशेष चर्चा का विषय बना. इसके समर्थकों में ब्रेडले, ऑस्कर वाइल्ड, स्पिन्नगान आदि मुख्य हैं. इनके विचार से कला या कलाकार का एकमात्र उद्देश्य कला या सौन्दर्य की सृष्टि भर कर देना है, अतः कलाकार में नीति या धर्म या उपदेशों के प्रतिपादन की आशा करना व्यर्थ है. जे. ई. स्पिन्नगार्न ने स्पष्ट लिखा है कि “हमने कला से समस्त नैतिकता को बहिष्कृत कर दिया है.” 

यह निर्विवाद है कि मनुष्य के समस्त प्रयत्न आनन्द हेतु होते हैं. अतएव काव्य का मुख्य प्रयोजन आनन्द अथवा सुख की प्राप्ति है. सुख या आनन्द की प्राप्ति का लक्ष्य व्यष्टि और समष्टि दोनों ही होते हैं. स्मरणीय यह है कि सुख वितरित करने वाले को अनायास ही सुख की प्राप्ति हो जाती है. मेंहदी पीसने वाले के हाथ मेंहदी द्वारा सहज भाव से रंग जाया करते हैं.

यथार्थवाद और आदर्शवाद 

‘कला’ के सम्बन्ध में, जो अनेक मत प्रकट किये जाते हैं, उनके मूलतः दो वर्ग होते हैं—यथार्थवादी और आदर्शवादी. प्रथम वर्ग कहता है कि काव्य का क्या प्रयोजन है ? द्वितीय वर्ग कहता है कि काव्य का क्या प्रयोजन होना चाहिए ? हमारे विचार से उक्त दोनों विचारधाराओं में कोई मौलिक अन्तर नहीं है. समाज सुधारक कवि समाज-सुधार के प्रयोजन से काव्य रचना करेगा तथा समाज सुधार का आकांक्षी पाठक कवि से समाज-सुधारपरक 

काव्य की आशा करेगा. इसी प्रकार साम्यवादी कवि वर्ग-संघर्ष का प्रतिपादन करेगा और साम्यवादी पाठक कवि से वर्ग संघर्ष को उत्तेजना प्रदान करने वाले काव्य की आशा करेगा. अतएव काव्य-प्रयोजन की दृष्टि से यथार्थवादी तथा आदर्शवादी विचारधाराएँ एक ही सिक्के की दो पीठे ठहरती हैं.

कला जीवन के लिए 

कलाकृति मात्र सौन्दर्य की अभिव्यक्ति हो अथवा उसमें ‘शिवत्व’ का पुट भी हो—यह प्रश्न विचारकों को प्रायः झकझोरता रहा है. इस सन्दर्भ में विद्वानों के प्रायः दो वर्ग रहे हैं. एक मात्र सौन्दर्य की अभिव्यक्ति को अलम् मानता है और दूसरा वर्ग सौन्दर्य के साथ शिव का संयोग अनिवार्य मानता है. प्रथम वर्ग के विद्वानों के मतानुसार कला की एकान्तिक उपलब्धि ही उनकी तुष्टि का प्रमुख साधन होती है, जबकि द्वितीय वर्ग के विद्वान कला को आध्यात्मिक विभूति मानते हैं और वे कला को जीवन के निर्माण एवं विकास का प्रमुख उपादान मानते हैं. उनका कहना है कि सौन्दर्यानुभूति का लक्षण तन्मयता है—द्रष्टा और कलाकृति का तादात्म्य होना चाहिए और तादात्म्य सदैव सात्त्विकता का उपकारक होता है. प्रथम कोटि के विद्वानों का कला प्रयोजनपरक आदर्श वाक्य है-“कला, कला के लिए है” और द्वितीय वर्ग_“कला, जीवन के लिए है” आदर्श वाक्य को लेकर चलता है. इनके लिए कला का उदात्त पक्ष अधिक महत्वपूर्ण ठहरता है. कला, कला के लिए 

कला, ‘कला के लिए’ का नारा आधुनिक काल की देन है. फ्रांस में इस मान्यता को एक ‘वाद’ या आन्दोलन का रूप प्राप्त हुआ. इसके प्रवर्तक थे विक्टर कजिन. इस प्रकार भारत में इसका आगमन यूरोप से हुआ. कुछ विद्वान संस्कृत काव्यशास्त्र में इस सिद्धान्त के बीज खोजने का प्रयत्न करते हैं. उनका कहना है कि छठवीं सदी में होने वाले आचार्य दण्डी ने “नृत्य गीत प्रभृतयः कला कामर्थ संश्रयाः” कहकर कला के व्यक्तिरंजक रूप पर ही बल दिया था. इस वर्ग के विद्वानों की मान्यता है कि एकान्तिकता और पलायन की वृत्ति तथा अति कलात्मकता अथवा अति आलंकारिता की वृत्ति भी ‘कला, कला के लिए’ सिद्धान्त के अन्तर्गत आती है. 

‘कला, कला के लिए’ वाले सिद्धान्त के समर्थक वे कवि भी माने जा सकते हैं जो काव्य में भाव पक्ष को गौण तथा कला पक्ष को, अभिव्यक्ति के चमत्कार को एवं अतिशय आलंकारिकता को प्रधान मानते हैं. इस दृष्टि से हिन्दी के रीतिकालीन कवियों को इस वर्ग का कलाकार माना जा सकता है. 

‘कला, कला के लिए’ सिद्धान्त का जन्मस्थान फ्रांस है. इसके सूत्रपात का श्रेय वहाँ के विद्वान विक्टर कजिंग (1792-1867) को दिया जाता है, परन्तु इस सिद्धान्त का सर्वाधिक प्रबल प्रतिपादक गौटियर (Goutier) था, जिसने इस मान्यता की स्थापना की कि कला न केवल अनैतिक होती है, अपितु वह नैतिकता के विरुद्ध भी होती है, गौटियर का कहना है कि “एक नगर केवल अपने भवनों के कारण मुझे आकर्षक लगता है. वहाँ के निवासी भले ही पूर्णतः अधम हों और वह नगर भले ही अपराधों का केन्द्र हो, परन्तु इन सब बातों का मेरे लिए क्या महत्व है, यदि इन भवनों को देखते समय मेरी हत्या नहीं की जाती है ?” एक अन्य फ्रांसीसी समालोचक रेनन (Renan) ने बलपूर्वक कहा है कि “कला को जीवन की 

वास्तविकताओं से पृथक् ही रखा जाना चाहिए.” इस आधार पर रेनन ने दाँते, चौसर, माइकल, एंजिलो, शेक्सपियर, मिल्टन, ग्रेटे प्रभृति कलाकारों की भर्त्सना की. प्रसिद्ध फ्रांसीसी समालोचक बोदलेयर ने यह घोषित किया था कि “काव्य का प्रयोजन केवल काव्य ही है. यदि किसी कवि ने नैतिक मूल्यों का अनुगमन किया है, तो उसने अपनी कवित्व शक्ति का ह्रास किया है. उसका परिणाम प्रायः अशिव ही होता है.” 

बोदलेयर की उक्त विचारधारा फ्रांस में तो पनपी ही, वह इंगलैण्ड भी पहुंची और वहाँ भी इसको समर्थन प्राप्त हुआ. इसके प्रमुख समर्थक रहे—जे. ए. साइमन्ड्स, वाल्टर, मेटर, क्विलर कोच, ऑस्कर वाइल्ड, क्लाइव बैल आदि. इन कला प्रेमियों का यह कथन था कि धर्म, नैतिकता और दर्शन के साथ कला का कोई सम्बन्ध नहीं है “कलाकार अन्य व्यक्तियों के लिए नहीं, स्वयं अपने लिए लिखता है, कलाकार को लोगों के आनन्द से कोई प्रयोजन नहीं रहता है…”आदि. 

विक्टोरियन युग में स्विनबर्ग ने ‘कला, कला के लिए’ सिद्धान्त का समर्थन किया. रोमाण्टिक युग में कीट्स ने सर्वप्रथम यह कहा कि कलाकार को पाठकों पर अपनी कोई ठोस योजना नहीं लादनी चाहिए, कलाकार का लक्ष्य सौन्दर्य की सृष्टि होती है, न कि सुधारक अथवा उपदेशक बनना. 

अमरीका में जे.ई. स्मीनगर्न ने कला के साथ नैतिकता को सम्बद्ध करने को बाल प्रयास बताया. 

बीसवीं शताब्दी में कलाकारों के एक वर्ग ने विशेषकर, उपन्यासकारों ने अति यथार्थवाद का नारा लगाया और यथार्थवाद के नाम पर उन्होंने वीभत्स, नग्न सौन्दर्य एवं अपराधों के चित्रण प्रस्तुत किये हैं. इन्होंने प्रकृतिवाद के नाम पर अतिप्रकृत अथवा नग्न समाज का चित्रण किया है. डार्विन के सिद्धान्त से प्रभावित ये लोग मनुष्य को उच्च श्रेणी के पशु से अधिक कुछ नहीं मानते हैं.

इटली के विद्वान क्रोचे के अभिव्यंजनावाद द्वारा ‘कला, कला के लिए’ वाले मतवाद को बहुत बल मिला. हमारे अनेक हिन्दी कवि भी उसके प्रभाव में आ गये. मैथिलीशरण गुप्त सदृश आदर्शवादी कवि भी यह कहते हुए दिखाई दिये कि ‘अभिव्यक्ति की कुशल शक्ति ही तो कला है.’ (साकेत) 

आधुनिक मनोविश्लेषण के मनीषियों ने, विशेषकर फ्रायड ने ‘कला, कला के लिए’ मतवाद को गहरा समर्थन दिया. इससे प्रभावित कलाकारों के लिए कला नग्न दृश्यों एवं कुण्ठाओं के चित्रण की पर्याय बन गई. इस सिद्धान्त के समर्थक हिन्दी साहित्यकारों में उदयशंकर भट्ट, इलाचन्द जोशी, बच्चन, अंचल, जैनेन्द्र तथा प्रयोगवादी कवि मुख्य हैं, प्रयोगवादी कवि तो प्रत्येक परम्परा और मान्यता को नकारता है. इनके कथा-साहित्य में व्यक्त नग्नवाद, साड़ी जम्परवाद आदि कलावाद के विकृततम रूप को प्रस्तुत करते हैं.

कला, कला के लिए 

‘कला, कला के लिए’ वाले सिद्धान्त को हम यदि ‘कलावाद’ कहें, तो हम कह सकते हैं कि ‘कलावाद’ के ऊपर क्रोचे और फ्रॉयड के विचारों का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा है. हमारे विचार से इन दोनों विचारकों के समर्थकों ने ‘कलावाद’ सम्बन्धी मान्यता को उलझा भी दिया है और विकृत भी कर दिया है. 

साहित्य या काव्य की रचना का मूल प्रेरणास्रोत क्या है ? यह प्रश्न काव्यशास्त्र के विद्वानों के लिए चिन्तन एवं विवाद का विषय रहा है. इसका मुख्य कारण यह है कि प्रेरणा और प्रयोजन इन दो तथ्यों को सामान्यतः समान अर्थ में ग्रहण कर लिया जाता है. संक्षेप में हम कह सकते हैं कि प्रेरणा अथवा प्रेरणास्रोत की स्थिति कला-रचना के पूर्व होती है, जबकि प्रयोजन की उपलब्धि काव्य कला-रचना के अनन्तर होती है. उदाहरण के लिए कुछ लोग गीत गोविन्दकार जयदेव के इस कथन में काव्य की प्रेरणा खोजने का प्रयास करते हैं “हरिस्मरणे हास विलास कुतूहलम्.” इन महानुभावों को समझ लेना चाहिए कि जयदेव ने हरिस्मरण और विलास कला का कौतूहल शांत करने की जो बात कही है, वह काव्य के प्रयोजन अथवा उसके द्वारा प्राप्त होने वाले फल को ध्यान में रखकर कही है; न कि काव्य रचना की प्रेरणा मानकर. 

एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के अनुसार, “सभ्य समाज की भावपूर्ण प्रेरणा ही काव्य का सुजन करती है, हमें समझ लेना चाहिए कि कला जीवन का मुखरित रूप है. काव्य जीवन के महासागर में उठने वाली उच्चतम तरंग है. जीवन की मूल प्रेरक शक्ति आत्म चेतना है. आत्म चेतना सौन्दर्यानुभूति समन्वित होकर कला सृष्टि की प्रेरणा बनती है. 

हम कला या काव्य के प्रेरणा तत्व को दो भागों में विभक्त कर सकते हैं (i) व्यक्तिगत आनन्द की प्राप्ति की प्रेरणा तथा (ii) सामूहिक आनन्द अथवा लोकमंगल की साधनापरक प्रेरणा. आनन्द की प्राप्ति, ज्ञान व शक्ति की प्राप्ति—ये प्रथम वर्ग के अन्तर्गत हैं. उपदेश, लोक व्यवहार की शिक्षा, राष्ट्र निर्माण प्रेरणा आदिक लोकमंगल हेतु हैं. 

प्रेरणा के स्रोत पर विचार करने पर हम देखते हैं कि कलाकार स्वप्रेरित रचना करने के साथ यह प्रेरित भी रचना करता है. कहने की आवश्यकता नहीं है कि यह प्रेरित रचनाएँ प्रायः यन्त्रवत् होती हैं और उनमें तत्व का अभाव रहता है, क्योंकि उनमें तात्कालिक प्रभाव एवं लाभ अभीष्ट रहते हैं. हिन्दी की रीतिकालीन अधिकांश रचनाएँ इसी कोटि के अन्तर्गत आती हैं. कुछ समालोचक इन रचनाओं को ‘कला, कला के लिए’ सिद्धान्त के उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं. आजकल दूरदर्शन एवं आकाशवाणी के कलाकार वस्तुतः दरबारी कलाकार ही कहे जाएंगे, क्योंकि इनकी रचनाएँ भी प्रायः शासक-वर्ग पर प्रेरित होती हैं. 

आचार्य मम्मट ने काव्य के छः प्रयोजन बताए हैं

(i) यश की प्राप्ति

(ii) अर्थ की प्राप्ति

(iii) शिवेत रक्षतये

(iv) व्यवहार-ज्ञान

(v) अनिष्ट निवारण और

(vi) स्त्री के समान मनभावन उपदेश, तथा 

काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये ।

सद्यः परनिवृत्तये कान्ता संमित तयोपदेशयुते ॥ 

स्पष्ट है कि इनमें प्रथम तीन प्रयोजन रचयिता को लक्ष्य करते हैं और शेष तीन प्रयोजन सहृदय पाठक (समाज) के परिप्रेक्ष्य में हैं. मम्मट ने प्रयोजन और प्रेरणा के मध्य भेद नहीं किया है. कहने की आवश्यकता नहीं है कि लोक मंगल में अशिव की अवधारणा अविच्छिन्न रूप में व्याप्त रहती है तथा कान्तासम्मित उपदेश में अशिव से विमुख करने का भाव निहित रहता है. हिन्दी के रीतिकालीन आचार्य कवि दास ने इस भेद को सर्वथा स्पष्ट कर दिया है. यथा 

“एक लहें तपपुंजन के फल, ज्यों तुलसी और सूर गुसाईं ।

एकन को रस ही सो प्रयोजन ज्यों रसखान रहीम की नाईं ॥

एक लहें बहु सम्पति केसव भूषन ज्यों वर वीर बड़ाईं । 

‘दास’ कवित्तन की चर्चा बुधिवंतन को सुख दै सब ठाईं ॥”

वस्तुतः क्रोचे के कथन को ठीक प्रकार से न समझे जाने के कारण बहुत कुछ अर्थ का अनर्थ हुआ है. क्रोचे ने कला को अहं की अभिव्यक्ति का माध्यम न मानकर अहं के विसर्जन का साधन बताया है. यही आदर्शवादी दृष्टिकोण का भी मूल आधार है. इस प्रकार क्रोचे के कलावाद का उदात्त रूप आदर्शवाद बन जाता है. 

हम कला को न जीवन से विलग कर सकते हैं और न उसको जीवन के शाश्वत मूल्यों से निरपेक्ष ही कर सकते हैं. आचार्य पं. रामचन्द्र शुक्ल का यह कथन सर्वथा समीचीन है कि “जीवन-निरपेक्ष कला द्वारा न स्पष्ट प्रसादन होगा और न स्पष्ट अवसादन. उससे एक प्रकार का मनोरंजन या कौतूहल ही होगा.” 

इस सन्दर्भ में डॉ. नगेन्द्र का यह कथन द्रष्टव्य है—“कृतिकार का अपना रागात्मक जीवन और उसके आधार पर निर्मित जीवन-दर्शन कलाकृति में अनिवार्यतः प्रतिफलित होते हैं. कलाकार का अपना भाव बोध ही उसकी कला का मूल उपकरण होता है.” अतः निर्मित का सिद्धान्त अभिव्यक्ति के सिद्धान्त से मूलतः भिन्न नहीं है, भेद केवल बलाबल का है. अभिव्यक्ति में वस्तु तत्त्व माध्यम है और आत्म तत्व प्रधान, जबकि निमिति में आत्म-तत्व प्रच्छन्न रहता है और वस्तु तत्त्व उभरकर सामने आ जाता है. तात्त्विक दृष्टि से विचार करने पर सौन्दर्य चेतना का ही मूल है, प्रकृति का नहीं. इस प्रकार कला ‘अहम्’ की अभिव्यक्ति न होकर अहम् का विसर्जन है. प्रकारान्तर से यही बात क्रोचे ने कही है—“अभिव्यक्ति की प्रेरणा आत्मा के क्षेत्र में सैद्धान्तिक या विचारात्मक वर्ग की प्रवृत्तियों द्वारा होती है.” 

कला जीवनसाध्य है और जीवन कलासाध्य, कला को जीवन से निरपेक्ष कल्पना के रूप में देखने वाले व्यक्ति हमारे विचार से जीवन के अस्तित्व को ही अस्वीकार करते हैं. किसी विद्वान ने ठीक ही लिखा है कि ‘कला, कला के लिए’ सिद्धान्त की ओट में जो लोग कला को समाज से दूर रखना चाहते हैं, वे वास्तव में मात्र जिह्वा के स्वाद के लिए हैजा फैलाने वाली मिठाई के निर्माताओं की कोटि के कलाकार हैं. कला और जीवन एक त्रिभुज की दो भुजाएँ हैं, जिनका आधार समाज है. उत्कृष्ट कला में इनका समन्वय अपरिहार्य है.

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

4 × 3 =