मद्य निषेध पर निबंध | शराबबंदी पर निबंध | Essay on Prohibition of Liquor in Hindi

शराबबंदी पर निबंध

मद्य निषेध पर निबंध | शराबबंदी पर निबंध |Essay on Prohibition of Liquor in Hindi |नशाबंदी पर निबंध |मद्यनिषेध अथवा क्या भारत में संभव है समग्र मद्यनिषेध? 

एक पुरानी कहावत है- ‘पहले हम शराब पीना शुरू करते हैं और बाद में शराब हमें पीना शुरू कर देती है।‘ इस कहावत में एक बड़ा पैगाम छिपा हुआ है, जिसका केन्द्र बिन्दु है शराब का हमारे जीवन पर पड़ने वाला दुष्प्रभाव। यह अकारण नहीं है कि शराब को विष से भी भयंकर बताया गया है। शराब की लत मनुष्य के अपने स्वास्थ्य के लिए तो हानिकर होती ही है, इसके अनेकानेक सामाजिक दुष्परिणाम भी सामने आते हैं, जो राष्ट्र की प्रगति में अवरोधक की भूमिका निभाते हैं। शराब तबाही का पर्याय है यह जानते हुए भी शराबखोरी करना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। फरवरी, 2019 में एम्स ने मद्य पान पर अपनी रिपोर्ट पेश की। जिसके अनुसार भारत के लगभग 5 करोड़ नागरिक गंभीर रूप से मद्य पान की आदत के शिकार हैं। 

“शराब के हानिकारक प्रभावों को इस देश में यदि सर्वप्रथम किसी ने अत्यंत गंभीरता से लिया तो वे थे हमारे स्वतंत्रता संघर्ष के महानायक महात्मा गांधी। शराब के दुष्प्रभावों को ध्यान में रखकर बापू ने ‘मद्यनिषेध’ की पैरोकारी की और इसे अपने रचनात्मक कार्यक्रम का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनाया।” 

शराब के हानिकारक प्रभावों को इस देश में यदि सर्वप्रथम किसी ने अत्यंत गंभीरता से लिया तो वे थे हमारे स्वतंत्रता संघर्ष के महानायक महात्मा गांधी। शराब के दुष्प्रभावों को ध्यान में रखकर बापू ने ‘मद्यनिषेध’ की पैरोकारी की और इसे अपने रचनात्मक कार्यक्रम का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनाया। उन्होंने एक आन्दोलन के रूप में इसे आगे बढ़ाया। मद्यपान को बापू चोरी एवं वेश्यागमन से भी घृणित कृत्य मानते थे। इसीलिए वह कहा करते थे- “यदि एक घंटे के लिए मुझे भारत का तानाशाह बना दिया जाए, तो मैं देश में शराब की दुकानों को बिना कोई क्षतिपूर्ति दिए तत्काल प्रभाव से बंद करवा दूं।” सर्वप्रथम बापू ने ही ‘शराब मुक्त भारत’ का स्वप्न अपनी आंखों में संजोया था। वह समूचे भारत में समग्र रूप से मद्यनिषेध चाहते थे, न कि किसी विशेष राज्य या जिले में। वह परिवार, समाज एवं राष्ट्र पर शराबखोरी के पड़ने वाले कुप्रभावों से सुविज्ञ थे, इसीलिए बर्बादी के इस रास्ते पर चलने वाले लोगों को उन्होनें न सिर्फ सचेत किया, बल्कि शराब छुड़वाने के लिए लोगों से यह आह्वान किया कि वे दृढ़ प्रतिज्ञ हों। उनका यह मानना था कि शराब हमें अनैतिकता एवं पाप की ओर ले जाती है तथा इसका स्वरूप बर्बर होता है। 

बापू ने मद्यनिषेध को एक सिद्धान्त के रूप में प्रतिपादित किया। वह चाहते थे कि इस सिद्धांत के दायरे में समूचे देश को लाया जाए। बापू के ये विचार आजादी से पहले भी प्रासंगिक थे और आजादी के बाद भी प्रासंगिक बने रहे। उनके विचारों की प्रासंगिकता को ध्यान में रखते हुए ही आजाद भारत के संविधान में मद्यनिषेध को प्रोत्साहन प्रदान किया गया। हमारे संविधान के अनुच्छेद 47 में शराबबंदी को प्रोत्साहित किया गया है। अनुच्छेद 47 के अनुसार “राज्य, लोगों के पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊंचा करने और लोक स्वास्थ्य के सुधार को अपना प्राथमिक कर्त्तव्य मानेगा और मादक पेय तथा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक औषधियों के, औषधीय प्रयोजन से भिन्न उपयोग का प्रतिषेध करने का प्रयास करेगा।” 

आजादी के बाद जहां मद्यनिषेध को प्रोत्साहित करने के संवैधानिक प्रावधान बनाए गए, वहीं बापू की प्रेरणा से देश में मद्यनिषेध का राजनीतिक आकर्षण भी कायम रहा। इस सब के बावजूद भारतीय समाज में शराबखोरी बजाय घटने के, बढ़ती ही चली गई और देश में समग्र मद्यनिषेध व शराब मुक्त भारत का सपना अधूरा ही रह गया। प्रसंगवश संक्षेप में उन कारणों पर दृष्टि डाल लेना समीचीन रहेगा, जिन्होंने भारत में शराबखोरी को बढ़ाया है। भारत में जिन कारणों से शराबखोरी बढ़ी है, उनमें प्रमुख हैं- पाश्चात्य एवं आंग्ल सभ्यता का अंधा अनुकरण, फिल्मों व टीवी सीरियलों आदि में शराब के दृश्यों को प्रमुखता से दिखाया जाना, आधुनिक जीवन-शैली के प्रति बढ़ता आकर्षण, विशाल मध्य वर्ग, लोगों की आमदनी में इजाफा, तनाव, एकाकीपन, अवसाद, असफलता, शराब के लुभावने विज्ञापनों का आकर्षण, शराब को थकान मिटाने के साधन के रूप में देखना, गलत संगत, युवा आबादी का कामकाज के सिलसिले में घर से बाहर निकलना, संयुक्त परिवारों का टूटना, घटती सामाजिकता एवं बढ़ता शहरीकरण आदि। इन कारणों के अलावा यह रेखांकित करना भी समीचीन रहेगा कि सामाजिक वर्जनाओं के टूटने एवं शिथिल पड़ने से देश में कुछ इस तरह का सामाजिक बदलाव आकार ले चुका है, जिसमें शराब को पहले जितना बुरा नहीं माना जाता। एक तरफ तो विभिन्न कारणों से समाज में शराबखोरी बढ़ती गई, तो दूसरी तरफ शराबबंदी को लेकर सरकारें उदासीन रहीं, क्योंकि एक तरफ तो उन पर शराब माफिया का जबरदस्त दबाव रहा, तो दूसरी तरफ वे शराब की बिक्री से मिलने वाले भारीभरकम राजस्व से हाथ नहीं धोना चाहती थीं। यहां तक कि सरकारें जहरीली शराब से होने वाली मौतों तक से विचलित नहीं हुईं। 

शराबखोरी बढ़ने के साथ-साथ देश में शराब का उत्पादन एवं बापत तो बढी ही, कम उम्र, यहां तक कि अल्पवयस्क भी शराब के नती बन गए। वर्ष 2015 में प्रकाशित ‘आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन’ (ओईसीडी) की रिपोर्ट से पता चलता है कि पिछले 20 वर्षों में भारत में अल्कोहल की खपत में 55% की बढ़ोत्तरी हुई है। 40 देशों की इस सूची में शराब की खपत के मामले में रूस और एस्टोनिया के बाद भारत तीसरे पायदान पर है। उद्योग संगठन ‘एसोचैम’ की रिपोर्ट से पता चलता है कि वर्ष 2010 में देश में शराब की खपत 670 करोड़ लीटर थी, जो कि वर्ष 2016 तक 1900 करोड़ लीटर तक पहुंच गई। भारत में न सिर्फ शराब की खपत बढ़ी है, बल्कि उत्पादन भी बढ़ा है। आज भारत दुनिया के अग्रणी शराब निर्माता के रूप में अपनी जगह बना चुका है। विडंबना यह है कि कम उम्र के लोगों में भी शराब पीने का चलन बढ़ रहा है। यानी शराब पीने की औसत आयु तेजी से घट रही है। वर्ष 1990 में जहां देश में शराब पीने की औसत आयु 28 साल थी, वहीं वर्तमान में यह घटकर मात्र 15 साल रह गई है। यह रुझान बहुत घातक है। 

‘शरीर एवं परिवार का विनाश करने वाली शराब देश की प्रगति में बाधक बनती है। अतः शराबबंदी को राजस्व की क्षति के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक लाभ के रूप में देखना चाहिए।” 

भारत में बढ़ती शराबखोरी के बीच जहां शराबबंदी की मांग उठती रही, वहीं इसके लिए आन्दोलन भी होते रहे। इस बीच राज्य स्तर पर शराबबंदी की पहले भी होती रहीं। महात्मा गांधी के गृह प्रदेश गुजरात में वर्ष 1958 से शराबबंदी लागू है। बिहार में वर्ष 2016 में शराबबंदी लागू की गई, नगालैण्ड में वर्ष 1989 में शराबबंदी लागू की गई, तो वर्ष 2016 में तमिलनाडु में चरणबद्ध शराबबंदी की शुरुआत की गई। कुछ ऐसे राज्य भी हैं, जहां पहले तो शराबबंदी लागू की गई, किंतु बाद में इसे हटाना पड़ा। मसलन, वर्ष 1995 में मिजोरम में सम्पूर्ण मद्य निषेध लागू किया गया, जिसे जनवरी, 2015 में हटा लिया गया। मणिपुर में वर्ष 1991 में शराबबंदी लागू की गई थी, जिसे वर्ष 2002 में आंशिक तौर पर हटा लिया गया। वर्ष 1994 में आंध्र प्रदेश में शराबबंदी लागू की गई, जिसे वर्ष 1997 में हटा लिया गया। इसी प्रकार वर्ष 1996 में हरियाणा में शराबबंदी लागू की गई, जिसे वर्ष 1998 में हटा लिया गया। 

स्पष्ट है कि भारत में मद्यनिषेध की पहले तो होती रहीं, किंत् इन्हें बहुत सफल नहीं कहा जा सकता है। मिजोरम, मणिपुर, आंध्रप्रदेश एवं हरियाणा जैसे राज्य इसके उदाहरण हैं, जहां पहले मद्यनिषेध की ओर कदम बढ़ाए गएं और बाद में कदम पीछे खींचने पड़े। इन पहलों की असफलता के पीछे अनेक कारण हैं। जहां सरकारों को शराबबंदी के कारण भारीभरकम राजस्व की क्षति उठानी पड़ी, वहीं शराब बिक्री से प्राप्त होने वाले राजस्व की भरपाई के लिए नए-नए कर लगाने पड़े तथा पहले से चले आ रहे करों में वृद्धि करनी पड़ी, जिनके अच्छे राजनीतिक परिणाम नहीं निकले। सरकारों पर उन शराब माफियाओं का भारी दबाव भी रहा, जो राजनीतिक दलों को मोटा चंदा देकर उन्हें उपकृत करते हैं। यही कारण है कि सरकारों द्वारा राजस्व क्षति का हवाला देकर शराबबंदी हटाए जाने के कदम का उचित ठहराया जाता रहा। यह भी देखने को मिला कि शराबबंदी के बावजूद चोरी-छिपे शराब बेची जाती रही, जिससे भ्रष्टाचार बढ़ा। शराबबंदी से लोगों के रोजगार भी छिने। इन्हीं सब कारणों से देश के अनेक राज्य शराबबंदी लाग करने की हिम्मत नहीं जुटा शराब मुक्त भारत का सपना साकार नहीं हो पाया। हालांकि जिन राज्यों में शराबबंदी लागू है, वहां इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने हैं। 

शराबबंदी के संबंध में यहां यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कि समाज की क्षति। सही उत्तर है समाज की क्षति। राजस्व की क्षति की भरपाई तो अन्य तरीकों से हो सकती है, किंतु सामाजिक क्षति की भरपाई संभव नहीं है। यह बात सरकारों को समझनी होगी। शराब का सेवन दिल, दिमाग, लीवर, और किडनी की घातक बीमारियों का तो कारण बनता ही है, इसके बर्बर स्वरूप से अपराध भी बढ़ते हैं। सड़क दुर्घटनाओं में शराब का सेवन जहां एक बड़ा कारण होता है, वहीं इससे घरेलू हिंसा एवं कलह की घटनाएं भी बढ़ती हैं। घर की महिलाओं को शर्मनाक स्थितियों का सामना करना पड़ता है। शरीर एवं परिवार का विनाश करने वाली शराब देश की प्रगति में बाधक बनती है। अतः शराबबंदी को राजस्व की क्षति के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक लाभ के रूप में देखना चाहिए। 

राज्यों द्वारा जिस राजस्व की क्षति का हवाला देकर शराबबंदी को अनुचित ठहराया जाता है, उसके बारे में महात्मा गांधी का कहना था कि आबकारी राजस्व प्राप्ति का एक अनैतिक, पापयुक्त एवं बहुत ही भद्दा साधन है। राजस्व प्राप्ति के जिस साधन की बापू इतनी तीव्र भर्त्सना किया करते थे, वह देश की सरकारों के लिए इतना महत्त्वपूर्ण बन चुका है कि वे राजस्व लाभ के लिए सामाजिक लाभ की अनदेखी कर रही हैं। इसी के साथ समग्र मद्यनिषेध एवं शराब मुक्त भारत का सपना चिंदी-चिंदी हो रहा है। 

शराबबंदी एक नेक पहल है। यह सामाजिक लाभ की वह पहल है, जो परिवारों को, समाज को और अंततः राष्ट्र को तबाही और क्षय से बचाती है। शराब मुक्त भारत की परिकल्पना असंभव नहीं है, बशर्ते इस दिशा में सच्चे मन से दृढ़ता के साथ कदम बढ़ाए जाएं। इन कदमों में पारदर्शिता हो तथा समाज के हित का जज्बा हो। जब यह जज्बा होगा, तो राजस्व क्षति की दलीलें सामने नहीं टिक पाएंगी। यूं भी जब किसी समस्या से निपटने की प्रबल इच्छा शक्ति पास होती है, तो वह विकल्प भी तैयार कर लेती है। शराब मुक्त भारत के लिए जहां दृढ़ पहले आवश्यक हैं, वहीं भ्रष्टाचार पर अंकुश भी जरूरी है, ताकि शराबखोरी के चोर दरवाजे न खले रह जाएं। । सरकारी पहलों के अलावा साक्षरता एवं जागरूकता को बढ़ाकर भी हम शराबबंदी के अनुकूल वातावरण तैयार कर शराब मुक्त भारत के स्वप्न को साकार कर सकते हैं। 

शराब मुक्त भारत के स्वप्न को साकार कर हम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं। जिस तरह से देश में शराबबंदी के प्रति राजनीतिक आकर्षण दिख रहा है तथा राज्यों के चुनावों में शराबबंदी को चुनावी घोषणाओं में स्थान दिया जा रहा है, उससे उम्मीदें जागी हैं। बस, जरूरत दृढ़ प्रयासों की है। इस नेक शुरुआत को अभीष्ट आयाम देने के लिए हमें कमर कस लेनी चाहिए। 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

3 × three =