सामाजिक परिवर्तन में शिक्षक की भूमिका | Essays for Ias Exam in Hindi-सामाजिक बदलाव के वाहक : शिक्षक 

सामाजिक परिवर्तन में शिक्षक की भूमिका

सामाजिक परिवर्तन में शिक्षक की भूमिका | Essays for Ias Exam in Hindi-सामाजिक बदलाव के वाहक : शिक्षक 

समाज में शिक्षक की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण इसलिए माना गया है, क्योंकि वह किसी भी शिक्षा पद्धति का केन्द्रीय व्यक्ति तो होता ही है, अपने शिष्य को साधारण से असाधारण बनाकर, उसकी समझ एवं ज्ञान को विकसित कर, उसे प्रेरित कर तथा उसे मार्गदर्शन प्रदान कर समाज के उन्नयन एवं प्रगति में सहायक बनता है। यानी शिक्षक ही सामाजिक परिवर्तन का प्रतिनिधित्व कर सामाजिक बदलावों का वाहक बनता है। 

“समाज में शिक्षक की भूमिका शिक्षा और ज्ञान प्रदाता की होती है। इस भूमिका में शिक्षक मानव मस्तिष्क को विकसित करने में महत्वूपर्ण भूमिका निभाता है। इस प्रकार वह हमें सही दिशा-बोध करवाता है।” 

सामाजिक बदलावों के वाहक के रूप में हमारे देश में शिक्षक की शीर्ष भूमिका पहले भी महत्वपूर्ण थी और आज भी है। यदि हम प्राचीन भारत पर दृष्टिपात करें तो पाते हैं कि तत्कालीन भारत में वशिष्ठ, सन्दीपन, विश्वामित्र, द्रोणाचार्य जैसे आचार्यों ने सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चाणक्य जैसे विद्वान आचार्य ने तो चन्द्रगुप्त मौर्य को नरेश बनाकर अखंड भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऐसे असाधारण कार्य को एक महान शिक्षक ही अंजाम दे सकता है। कुछ उतार-चढ़ाव के साथ शिक्षक की समाज में अग्रणी भूमिका आज भी है। आधुनिक काल में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे शिक्षकों ने उच्च आदर्श प्रस्तुत किए। 5 सितंबर को प्रतिवर्ष हमारे देश में शिक्षक दिवस उन्हीं के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। 

समाज में शिक्षक की भूमिका शिक्षा और ज्ञान प्रदाता की होती है। इस भूमिका में शिक्षक मानव मस्तिष्क को विकसित करने में महत्वूपर्ण भूमिका निभाता है। इस प्रकार वह हमें सही दिशा-बोध करवाता है। शिक्षा से हमें सही दिशा मिलती है और इस प्रकार शिक्षा समाज से अनेक प्रकार की बुराइयों, विसंगतियों आदि को मिटाने में सहायक बनती है। अगर हम दुनिया के इतिहास को देखें तो पाएंगे कि सभ्यता का निर्माण उनमहान आचार्यों एवं शिक्षाविदों के हाथों से हुआ है, जो स्वयं विचार करने की सामर्थ्य रखते हैं, जो देश और काल की गहराइयों में प्रवेश करते हैं, उनके रहस्यों का पता लगाते हैं और इस तरह से प्राप्त ज्ञान का उपयोग लोक-कल्याण के लिए करते हैं। समाज के लिए इससे ज्यादा महत्वपूर्ण शिक्षक की भूमिका और क्या हो सकती है। 

शिक्षक अपने शिष्यों को सिर्फ शिक्षा से संबंधित तथ्यों, सिद्धांतों एवं सूत्रों आदि को नहीं समझाता, बल्कि वह अपने शिष्यों को वैचारिक स्तर पर समृद्ध बनाकर सत्य के शोध हेतु प्रेरित करता है तथा उसे आगामी चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार भी करता है। शिक्षक हमें ज्ञान देकर शक्तिशाली तो बनाता ही है, वह हमें परिपूर्णता भी प्रदान करता है। 

यह अकारण नहीं है कि महर्षि अरविंद ने शिक्षकों को राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली के रूप में अभिहित किया। शिक्षकों के संबंध में उनका यह विचार अमूल्य है-“शिक्षक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली होते हैं। वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से सींचकर उन्हें निर्मित करते हैं।” महर्षि अरविंद तो यह मानने में तनिक भी गुरेज नहीं करते थे कि किसी राष्ट्र के वास्तविक निर्माता तो उस देश के शिक्षक होते हैं। स्पष्ट है कि शिक्षक न सिर्फ एक विकसित, समृद्ध एवं खुशहाल देश के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाते हैं, बल्कि विश्व निर्माण में भी उनकी भूमिका अहम होती है।

यह कहना असंगत न होगा कि शिक्षक, समाज के वास्तविक शिल्पकार होते हैं। जिस प्रकार एक शिल्पकार पत्थरों को तराश कर उन्हें सुन्दर आकृति का स्वरूप प्रदान करता है, ठीक उसी प्रकार एक शिक्षक अपने शिष्यों को गढ़ने का कार्य कर उन्हें एक अच्छा नागरिक बनाता है, जो कि समाज का निर्माण कर उसमें सकारात्मक बदलाव लाते हैं। सच तो यह है कि सुशिक्षित बच्चे ‘विश्व प्रकाश की अवधारणा को साकार बनाते हैं। ये अपने समाज को तो प्रकाशवान बनाते ही हैं, समूचे विश्व को भी रोशन करते हैं। ये समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप अपना योगदान सुनिश्चित कर ‘समाज का प्रकाश’ बनते हैं। शिक्षा रूपी संस्कार उन्हें विकृतियों से बचाता है। 

शिक्षक बचपन से ही बालक के जीवन को सफल बनाने की आधारशिला रखते हैं। एक मजबूत नींव प्रदान करते हैं, जो कि आगे बढ़ने का संबल प्रदान करती है। इसी नींव पर खड़े होकर वे परिवार, समाज, देश एवं विश्व के निर्माता बनने का गौरव प्राप्त करते हैं। शिक्षकों के द्वारा ही हमें उद्देश्यपूर्ण शिक्षा मिलती है, जिससे एक सुन्दर एवं सभ्य समाज का निर्माण संभव होता है। शिक्षकों से ही हमें वह सामाजिक एवं शैक्षणिक ज्ञान प्राप्त होता है, जो समाज का दिशा-बोध कराने में सहायक बनता है। 

शिक्षकों से जहां हमें उच्च नैतिक मूल्यों को जीवन में उतारने की प्रेरणा मिलती है, वहीं भौतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक तीनों प्रकार की उद्देश्यपूर्ण एवं संतुलित शिक्षा मिलती है। इसी शिक्षा के बल पर एक अच्छा ‘विश्व नागरिक’ बनकर समाज के सामने आता है। शिक्षक द्वारा ही शिष्यों में करुणा, प्रेम एवं श्रेष्ठ परंपराओं का विकास होता है और इससे शिक्षा को सार्थकता मिलती है, क्योंकि यही वे अवयव हैं, जो सार्थक शिक्षा के लिए आवश्यक माने जाते हैं। शिक्षा के इन्हीं गुणों से बच्चों को मन, वचन और कर्म के द्वारा समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की अद्भुत शक्ति मिलती है। 

“एक सुन्दर, सुसभ्य एवं सुसंस्कारित समाज की आधारशिला रखने वाले शिक्षक निःसंदेह आदर एवं आस्था के पात्र हैं।” 

शिक्षकों से प्राप्त होने वाली शिक्षा बच्चों को ‘टोटल क्वालिटी पर्सन’ तो बनाती ही है, उन्हें आत्मनिर्भर एवं स्वावलंबी बनाने में भी सहायक सिद्ध होती है। इससे उनका भविष्य सुखद एवं सुरक्षित बनता है। वे डॉक्टर, इंजीनियर, अर्थशास्त्री, अधिवक्ता न्यायिक एवं प्रशासनिक अधिकारी बनकर राष्ट्र निर्माण में अपना यथेष्ट योगदान देते हैं। इस तरह देखें तो दो स्तरों पर शिक्षकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वे अपने शिष्यों को ज्ञान, विवेक एवं रोजगारपरक शिक्षा देकर उन्ह आत्मनिर्भर तो बनाते ही हैं, एक अच्छा इंसान बनाने के लिए जीवन मूल्यों की अनमोल पूंजी भी प्रदान करते हैं। 

यदि शिक्षक अपनी भूमिका का सही ढंग से निर्वहन न करे, तो हमारा समाज अज्ञानता के तमस से आच्छादित हो जाए तथा समाज में विसंगतियां और विद्रूपताएं बढ़ने लगें। समाज अधोगामी हो जाए। शिक्षा से ही शिक्षक अपने शिष्यों में उस विवेक को विकसित करता है, जो उसे सही निर्णय लेने में सहायता प्रदान करता है। यदि यह विवेक न हो तो व्यक्ति गलत निर्णय लेकर खुद तो पथभ्रष्ट होता ही है, साथ ही परिवार, समाज, देश एवं विश्व को भी विनाश की ओर ले जाने का कारण बनता है। यह स्थिति विध्वंस और विनाश की होती है। शिक्षक हमें इस स्थिति से बचाता है तथा हमें सही निर्णय लेने की समझ और विवेक प्रदान कर समाज को अधोगामी होने से बचाता है। 

इसे विडंबना ही कहेंगे कि आज के दौर में सामाजिक बदलावों के वाहक शिक्षकों के प्रति शिष्यों में सम्मान का भाव घटा है। यह एक घातक रुझान है। दूसरी तरफ शिक्षकों में भी सदाचार की कमी देखने को मिल रही है। शिक्षा के क्षेत्र में व्यावसायिकता ने भी पांव पसारे हैं। इससे शिक्षकों में धन लिप्सा बढ़ी है और आज का शिक्षक उस कसौटी पर खरा नहीं उतर पा रहा है, जिसके लिए हम प्राचीन भारत के आचार्यों एवं आधुनिक भारत के डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे 

शिक्षकों को याद करते हैं। अच्छे परिणामों के लिए यह आवश्यक है कि जहां शिष्य शिक्षकों के प्रति अपने पूज्य भाव को बनाए रखें, वहीं शिक्षक अपने सदाचार एवं समर्पण भाव से प्ररेक उदाहरण प्रस्तुत करें। हमें यह याद रखना होगा कि जब तक हम शिक्षक को समाज में महत्वपूर्ण स्थान एवं सम्मान नहीं देंगे, तब तक वे सामाजिक परिवर्तन के प्रभावपूर्ण प्रतिनिधि के रूप में कार्य नहीं कर सकेंगे। ऐसे में यह आवश्यक है कि हम शिक्षकों को मान-सम्मान दें तथा सरकारें उनकी सेवा दशाओं में सुधार कर उनके सम्मान को बढ़ाएं। इस संदर्भ में शिक्षकों को भी आत्मनिरीक्षण करना होगा तथा अपने शुचिता पूर्ण आचरण से सामाजिक सम्मान की पात्रता हासिल करनी होगी। 

सकारात्मक सामाजिक बदलाव की जिम्मेदारी शिक्षक की ही होती है। वह इसका वाहक बन कर सामाजिक उत्थान में संलग्न रहता है। सच तो यह है कि शिक्षकों के श्रेष्ठ मार्गदर्शन के द्वारा ही धरती  पर ईश्वरीय सभ्यता की स्थापना संभव है। यही कारण है कि हमारी – सनातनी संस्कृति में गुरु को गोविन्द से श्रेष्ठ माना जाता है। एक आदर्श शिक्षक नमन और श्रद्धा का पात्र होता है। एक सुन्दर, सुसभ्य एवं सुसंस्कारित समाज की आधारशिला रखने वाले शिक्षक निःसंदेह आदर एवं आस्था के पात्र हैं। 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.

8 + two =