निबंध लेखन upsc-समाज की आंखों का विस्तार है साहित्य | साहित्य और समाज पर निबंध

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निबंध लेखन upsc-समाज की आंखों का विस्तार है साहित्य | साहित्य और समाज पर निबंध |साहित्य समाज का दर्पण है 

आज सूचना ज्ञान और तकनीक का युग है, सूचनाओं के ढेर में मनुष्य अपनी पहचान खो रहा है, जबकि साहित्य मनुष्य को पहचान दिला रहा है, क्योंकि साहित्य सूचना पर नहीं, वरन् संवेदना पर चलता है, बाजारीकरण और प्रपंचीकरण के युग में साहित्य समाज को भविष्य के प्रति चिंतित कर रहा है, जागृत कर रहा है। वास्तव में साहित्य का हृदय रेडियो की फ्रिक्वेंसी से भी अधिक संवदेनशील होता है और साहित्य की अभिव्यक्ति लाउडस्पीकर से भी अधिक असरकारी तथा प्रभावशालिनी होती है। साहित्य की नजर समय, समाज, भूत, भविष्य सब पर होती है। साहित्य की निगाह चौकन्नी होती है। पर इसका मतलब यह नहीं निकालना चाहिए कि साहित्य किसी मंत्री द्वारा किया जाने वाला हवाई सर्वेक्षण (बाढ़ या सूखा का) है। साहित्य तो जरूरतमंद के कंधे पर रखा जाने वाला स्नेहिल हाथ है, भूमंडलीकरण (भूमंडलीकरण नहीं, बाजारीकरण) के दौर में इस हाथ का महत्त्व बढ़ा है और चुनौतियां भी उपस्थित हुई हैं। हो सकता है, कभी ऐसा वक्त भी आये जब समाज को साहित्य की आवश्यकता ही न रहे, तब भी साहित्य को समाज की आवश्यकता रहेगी। पोलैंड के मशहूर कवि तदेउश रूजेविच की एक कविता का भाव है, कि नेता, अफसर, पुलिस, पादरी और धर्मग्रंथ के मठाधीशों को कवि और कविता की आवश्यकता नहीं है लेकिन कवि को उनकी बहुत आवश्यकता है। अभिप्राय यह है कि समाज से जुड़ाव के बिना साहित्य का काम नहीं चल सकता है। साहित्य आंख मूंदकर सोना नहीं जानता। कहा जाता है कि न्यायशास्त्र के प्रवर्तक ऋषि गौतम किसी विषय के चिंतन में इतने रम गये थे कि वे चलते-चलते गहरे कुएं में गिर पड़े। इस घटना की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए ईश्वर ने उनके चरणों (पैरों) में आंखे लगा दी, ताकि वह चलते चलते देख सकें और देखकर चल सकें। यहां देखने का आशय समाज को भली-भांति देखने से भी लगाया जा सकता है। साहित्य समाज के लिए उसी तरह आवश्यक है, जैसे बुखार के लिए पैरासिटामॉल। सच पूछा जाये तो साहित्य नीम की पत्ती की तरह एंटीबैक्ट्रिीयल होता है। इसलिए समाज-निरपेक्ष, तटस्थ साहित्य की बात बेमानी है। साहित्य में समाज और जीवन के समकालीन और मौजूं सवालों की गूंज होनी ही चाहिए। 

भारत का समाज विक्षुब्ध समाज है, बावजूद इसके दिशाहीन समाज है। बड़े से बड़े आंदोलनों की या तो हवा निकल जाती है या दिशा बदल जाती है। फिर हश्र होता है कि लड़ना था गरीबी से, लड़ पड़े गरीबों से। ऐसे विभ्रांतिग्रस्त समाज में साहित्य सृजन मुश्किल हो जाता है और साहित्यकार का समाज से रिश्ता 63 का न रहकर 36 का हो जाता है। ऐसे समाज में प्रचलित अवधारणाओं को साहित्य अप्रमाणिक कहकर जब ठुकराने लगता है तो समाज साहित्य पर आरोप लादता है कि बिला वजह बखेड़ा खड़ा किया जाता है। जो भी हो साहित्य उन सबको ठीक कर सकता है, जो समाज को ठीक कर सकते हैं। साहित्य सीधा सामाजिक बदलाव नहीं कर सकता है, पर समाज बदलने वालों को मानसिक रूप से तैयार कर सकता है। इसका अर्थ यह नहीं निकाल लेना चाहिए कि जब समाज का अस्तित्व बाढ़ के पानी से खतरे में घिरा हो तो साहित्य कविता-पाठ कराने बैठ जाए। साहित्य को बाढ़-पीड़ितों की मदद के लिए सीधे आगे आना चाहिए। क्योंकि अंततः साहित्य के लिए जिंदगी की सलामती जरूरी है। 

साहित्य को हमेशा प्रतिपक्ष की भूमिका में होना चाहिए और सत्ता को प्रश्नांकित करना साहित्य का धर्म होना चाहिए। अर्थात् साहित्य को स्थाई प्रतिरोध की भूमिका में होना चाहिए। ये सूत्र वाक्य बहुत पहले से चलते आ रहे हैं। फिर भी विश्व की तमाम सत्तायें भ्रष्ट, अकल्याणकारी और निरंकुश हैं, साहित्य ने सत्ता में आज तक डर पैदा नहीं किया। यदि साहित्य ने डर पैदा किया होता तो आज व्यवस्थाएं न तो अव्यवस्थित होतीं और न ही समाज विसंगत होता। भला ऐसे में जनता साहित्य से जुड़े तो कैसे? 

यह सच्चाई है कि जब तक जनता साहित्य की भाषा में सहभागी नहीं होती, तब तक साहित्य से ठीक से जुड़ नहीं पाती। जनता की चित्तवृति का निर्माण साहित्य ही करता है, परंतु जनता के सक्रिय सहयोग के बिना यह संभव नहीं है। कहा जा सकता है कि साहित्य अपने लिए समाज में चेतना पैदा करता है। यह कितने दिन चलेगा कि साहित्य जनता अथवा समाज का सम्मान न करे और समाज साहित्य का सम्मान करता फिरे, इसलिए जनता की चित्तवृत्ति के साथ-साथ साहित्यकारों को अपनी चित्तवृत्ति का भी परिष्कार करना चाहिए। अपनी रुचियों को समाज पर थोपने की कोशिश साहित्य को महंगी पड़ सकती है। प्लेटो ने अपने डायलॉग्स में कहा था कि दुनिया से सहमत होने से पहले अपने से सहमत होना चाहिए। कई बार लगता है कि साहित्य शेयर बाजार के संवेदी सूचकांक की तरह हो गया है। सेंसेक्स की तरह चढ़ता-उतरता है और यहां से चित्तवृति, मनोवृत्ति, अभिरुचि, दृष्टि आदि गायब है। फिर यह भी लगता है साहित्य की जो कमियां है, वे खूबियों की ही परछाईंयां है। साहित्य में दिखने वाला अंतर्विरोध समाज के अंतर्विरोध का ही प्रतिबिंब है, क्योंकि समाज समूह नहीं है, अपितु सामाजिक संबंधों की प्रक्रिया है। जब समूचे समाज की संरचना ही नया आकार ले चुकी है तो भला साहित्य अप्रभावित कैसे रह सकता है? साहित्य समाज की समझ और स्मृति दोनों है, दर्पण है, तो दीपक भी है। दीवारों के कान होते हैं, शुक्र है जबान नहीं। जबान तो साहित्य के पास है। रचना जब प्रकाशित होकर समाज में सार्वजनिक हो जाती है तो वह साहित्य या साहित्यकार की बपौती नहीं रहती है। वह पूरे समाज की हो जाती है, क्योंकि समाज रचना और उसके पात्रों से स्वयं को जोड़ने लगता है। स्वयं को साहित्य से जोड़कर भी यदि समाज चुप रहे, तो यह उसकी रणनीति हो सकती है। समाज की चुप्पी और मौन को साहित्य ही तोड़ सकता है। चुप्पी तोड़ना आसान नहीं होता, इसके लिए हिम्मत की जरूरत होती है। बर्तोल्त ब्रेन ने सच लिखने की पांच मुश्किलों में लिखा है कि यह बात स्वयं सिद्ध लगती है कि लेखक को सच लिखना चाहिए। उसे इसे दबाना या छिपाना नहीं चाहिए और कछ भी ऐसा नहीं लिखना चाहिए जो असत्य हो। इसका अर्थ यह है कि उसे ताकतवर के आगे घुटने नहीं टेकने चाहिए और कमजोर को धोखा नहीं देना चाहिए। लेकिन यह आसान नहीं है। इसके लिए हिम्मत चाहिए, सबसे अधिक उत्पीड़न का अवसर वह होता है जब महान और उच्च विचारों की बात सबसे ऊंचे स्वर में की जाती है। ऐसे वक्त में सच बोलने के लिए साहस की जरूरत होती है। 

जिस प्रकार लहरों की मर्जी पर नाव को छोड़ना खतरनाक होता है, उसी तरह व्यक्ति की मर्जी पर समाज को छोड़ना भी। साहित्य व्यक्ति को सामाजिक और समाज को मानवीय बनाकर ही सार्थक हो सकता है। मछली को बचाना है तो पहले पानी बचाना होगा। साहित्य को बचाना है तो पहले समाज को बचाना होगा। गैलीलियो ने जब टेलिस्कोप का विस्तार किया तो कहा था- ‘यह हमारी आंखों का विस्तार है। वास्तव में साहित्य भी समाज का आंखों का विस्तार है। 

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