अण्टार्कटिका और भारतीय अभियान पर निबंध |Essay on Antarctica and Indian Expeditions

अण्टार्कटिका और भारतीय अभियान पर निबंध

अण्टार्कटिका और भारतीय अभियान (Antarctica and Indian Expeditions) 

भूगोल के विद्वानों एवं विद्यार्थियों के अनुसार पृथ्वी के 66 दक्षिण अक्षांश को अण्टार्कटिका सर्किल तथा उसके आगे दक्षिण ध्रुव तक के भाग को अण्टार्कटिका शीत कटिबंध कहते हैं. अंग्रेजी कोश में Antarctic का अर्थ इस प्रकार दिया गया है-Opposite the Arctic relating to the south pole or the south polar region. 

विस्तार की दृष्टि से अण्टार्कटिका अर्थात् दक्षिणी ध्रुव विश्व का पाँचवाँ महाद्वीप है. इसका क्षेत्रफल 1 करोड़ 40 लाख वर्ग किलोमीटर या पृथ्वी के कुल थल का दसवाँ भाग 1/10 है. तुलनात्मक दृष्टि से इसका क्षेत्रफल आस्ट्रेलिया और यूरोप से भी अधिक है. अण्टार्कटिका की सीमाएँ इस प्रकार हैं— उत्तर में अटलांटिक महासागर, दक्षिण में प्रशान्त महासागर और पूर्व में हिन्द महासागर. 

इसका सबसे ऊँचा बिन्दु विनसन मैसिफ 5140 मीटर ऊँचा है. अण्टार्कटिका में पर्वत हैं जो उसको दो भागों में विभक्त करते हैं—पूर्व अण्टार्कटिका और पश्चिम अण्टार्कटिका. पूर्वी भाग भू-वैज्ञानिक दृष्टि से अधिक प्राचीन है. पश्चिम अण्टार्कटिका में लहरदार पर्वतमालाएँ हैं जिनकी चोटियाँ कहीं-कहीं बर्फ के ऊपर झाँकती हुई दिखायी देती है. 

इस महाद्वीप का लगभग 98 प्रतिशत भाग हिमाच्छादित है, शेष 2 प्रतिशत क्षेत्र में अधिकतर पर्वत हैं. पेसाकोला पर्वतों में ड्यूफेक मैसिफ की 33,000 वर्ग किमी वाली एक चट्टान है जो 6.5 किलोमीटर मोटी है. भू-विज्ञानवेत्ताओं के मतानुसार यह विश्व की अत्यन्त सम्पन्न संरचनाओं से मिलती जुलती है. बर्फ की औसत मोटाई 3000 मीटर है. तट के अनेक स्थलों में 100 से 250 मीटर मोटी बर्फ की चादरें बनी हुई हैं. अनुमान यह है कि अण्टार्कटिका की कुल बर्फ का आयतन 3 करोड़ घन किलोमीटर है. यदि यह बर्फ पिघलने लगे तो समुद्र की सतह 70 से 80 मीटर तक ऊँची उठ जायेगी और जलप्लावन का दृश्य उपस्थित हो जायेगा. अण्टार्कटिका का सामान्य तापक्रम शून्य से नीचे 10 से 20 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है. अण्टार्कटिका के रूसी केन्द्र बोस्तक में तापमान शून्य के नीचे 88.3 सेल्सियस तक रिकार्ड किया गया है. गर्मी में मौसम कुछ अनुकूल हो जाता है, जबकि यहाँ का तापमान जमाव बिन्दु अर्थात् शून्य से 10 से 20 डिग्री सेल्सियस तक नीचे हो जाता है. 

जाड़े के मौसम में लगभग 6 महीने रात रहती है और गर्मी में 6 महीने दिन रहता है. यहाँ हिमपात भी कम होता है. तटवर्ती क्षेत्र में 50 सेण्टीमीटर तथा भीतर के क्षेत्रों में लगभग 5 सेण्टीमीटर. इस प्रकार औसत हिमपात 23 सेण्टीमीटर अर्थात् 10 इंच से भी कम होता है.

अण्टार्कटिका, विश्व के सात महाद्वीपों में सर्वाधिक दुर्गम महाद्वीप है. यह विश्व का सर्वाधिक ऊँचा, सबसे ठण्डा, सबसे सूखा, सबसे अधिक तेज हवाओं वाला और सबसे अधिक दूरस्थ महाद्वीप है. इसको ‘बर्फीला सहारा’ अथवा श्वेत महाद्वीप भी कहा जाता है. अन्य महाद्वीप तो एक-दूसरे से प्रायः थल द्वारा जुड़े हुए हैं या सँकरे समुद्री मार्ग से कटे हैं, परन्तु यह भू-भाग अन्य किसी महाद्वीप से किसी प्रकार नहीं जुड़ा है. इसके निकटतम भू-भाग हैं—केपहॉर्न, जो 990 किलोमीटर दूर है. सर्वाधिक आश्चर्य की बात यह है कि इस बर्फीले प्रदेश में ज्वालामुखी भी पाये जाते हैं. इनमें कुछ धधकते हुए ज्वालामुखी भी हैं. विरुद्धों का यह सामंजस्य इस महाद्वीप को विचित्र आकर्षण प्रदान करता है.

अण्टार्कटिका की खोज 

इस महाद्वीप की खोज 18वीं शताब्दी के आरम्भ में प्रारम्भ हुई और कैप्टेन कुक वे व्यक्ति थे, जो सबसे पहले समुद्र और अण्टार्कटिका सर्किल को पार करके दक्षिण में गये थे और जिन्होंने बर्फ की इस विशाल धनराशि का स्पर्श किया था. हिमाच्छादित इस महाद्वीप के एक भाग ग्राह्मलैण्ड (Graham Land) को सबसे पहले सन् 1820 में एडवर्ड ब्रान्सफील्ड ने देखा था. अन्य कई राष्ट्रों के खोजकर्ताओं ने इस महाद्वीप के विभिन्न भागों की खोज की, परन्तु इसकी व्यापक खोज सर्वप्रथम करने वाले थे—कैप्टेन जेम्स क्लार्करौस जो अपने दो सहयोगियों एरीबस और टैटर के साथ सन् 1841 में रौस सागर में भीतर घुसकर गये थे और उन्होंने 78° दक्षिणी अक्षांश पर बर्फ की प्रसिद्ध दीवार (Ross Ice Basviev) को खोज निकाला था. 

भारतीय अभियान 

भारत दिसम्बर 1999 ई. तक अण्टार्कटिका के लिए 19 अभियान भेज चुका है और अनेक उललेखनीय सफलताएं अर्जित कर चुका है. 6 दिसम्बर 1981 ई. में अण्टार्कटिका के लिए अपना प्रथम अभियान भेजने से पूर्व भारत ने डॉ. जी. एस. सिरोही को 1967 ई. में अमरीकी वैज्ञानिक दल के साथ अण्टार्कटिका भेजा था. इस प्रकार डॉ. सिरोही पहले भारतीय हुए जिन्होंने अण्टार्कटिका पर कदम रखा बाद में 1971 ई. में डॉ. परमजीत सिंह और डॉ. विनोद धारगलकर क्रमशः अमरीकी और आस्ट्रेलियाई अभियान दल के सदस्य के रूप में गए. सन् 1981 ई. से भारत ने अपने अभियान भेजने शुरू किए.

प्रथम अभियान 

24-7-1981 को गठित सागर विकास विभाग के तत्त्वावधान में प्रथम भारतीय अभियान दल ने दक्षिण ध्रुव के लिए 6 दिसम्बर, 1981 को शाम 7 बजकर 40 मिनट पर गोआ के समुद्री तट पर स्थित मारमोगोआ बन्दरगाह से नार्वेजियन आइसब्रेकर जहाज पोलर सर्किल द्वारा प्रस्थान किया इसके लिए देश के 7 विभिन्न संस्थानों से प्रतिभावान और स्वस्थ वैज्ञानिकों के 21 सदस्यीय दल का चयन किया गया. इस दल के नेता थे—समुद्र विकास विभाग के सचिव डॉ. सैयद जहूर कासिम. 

34 दिन की कठिन यात्रा के बाद हिन्द महासागर को पार करके यह दल 9-1-1982 को भारतीय समय के अनुसार रात को 12 बजकर 3 मिनट पर अपने गन्तव्य (दक्षिण प्रदेश में 70° अक्षांश और 41° पूर्व देशान्तर) पर पहुँच गया. यह दल 10 दिन रुकने के बाद उसी पोलर सर्किल जहाज से 21-2-1982 को वापस आ गया. 

इस दल के तीन उद्देश्य थे—समुद्र की गहराइयों की खोज, अण्टार्कटिका के मौसम का अध्ययन और अण्टार्कटिका तथा हिन्द महासागर के जैविक एवं खनिज सम्पदा का अध्ययन. 

इसके लिए दल ने आस्ट्रेलिया की ओर से जाने वाला 17,700 किलोमीटर की समुद्री यात्रा का मार्ग ग्रहण किया, जबकि इसके पूर्व अन्य देशों के अभियान दल अमरीका की ओर से जाने वाले 1600 किमी समुद्री यात्रा के मार्ग से गये थे. 

अण्टार्कटिका पर तिरंगा झण्डा लगाने के बाद इस दल ने 6 तम्बू लगाये जिनमें से एक में प्रयोगशाला थी, जिस स्थान पर यह दल ठहरा था, उसका नाम ‘दक्षिण गंगोत्री’ रखा गया. दक्षिण गंगोत्री में बैटरी और सौर ऊर्जा से चलने वाली एक प्रयोगशाला भी स्थापित की. इसके अतिरिक्त एक 3500 मी. ऊँचे पर्वत की खोज की जिसका नाम ‘इन्दिरा माउण्ट’ रखा गया. वे अपने साथ वहाँ से विभिन्न प्रकार की चट्टानों के नमूने लाये जिनका कुल वजन लगभग 1 टन था, वे अपने साथ विभिन्न गहराइयों की बर्फ के नमूने लाए. इस दल ने दक्षिण गंगोत्री में सौर-बैटरी से चालित कुछ उपकरण भी लगाये, जो 10-12 कार्यों के लिए थे, जैसे—हवा की रफ्तार, दबाव, तापमान, नमी आदि मापना. 

प्रथम अभियान के सम्बन्ध में ये तथ्य द्रष्टव्य हैं—(i) इस दल को दक्षिण ध्रव प्रदेश में भेजने के पहले दो स्थानों पर गहन प्रशिक्षण प्रदान किया गया था—(क) हिमालय में स्थित लेह के पास, समुद्र से करीब 4000 मीटर ऊपर एकान्त स्थान मचोई ग्लेशियर, व (ख) नार्वे का पोलर रिसर्च इन्स्टीट्यूट, (ii) इस दल के समुद्री अनुसन्धान उपकरणों से युक्त आइसब्रेकर जहाज-पोलर सर्किल 4 महीने के लिए 1 करोड़ रुपये में किराये पर लिया गया था. यह जहाज इसके पहले दक्षिण ध्रुव की यात्रा कर चुका था. (iii) अल्ट्रा वायलट विकिरण, हवा की अत्यधिक नमी तथा बर्फीली धूप की अत्यधिक चकाचौंध के कारण वहाँ पर्यावरण सम्बन्धी कठिनाइयों का सामना करना होता है. इनसे रक्षा के उपाय तो बरते ही 

गये थे, परन्तु फिर भी दल के सदस्यों को कठोर परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था,

द्वितीय अभियान 

देश के विभिन्न संस्थानों से चुने गये 28 सदस्यों के दूसरे अभियान दल ने 1-12-1982 को गोआ के समुद्री तट से प्रथम अभियान दल को ले जाने वाले पोलर सर्किल जहाज से प्रस्थान किया. इस दल के नेता थे—भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग के निदेशक डॉ. वी. के. रैना. 28 दिनों की कठिन यात्रा करके यह दल 28-12-1982 को अण्टार्कटिका पहुंचा और 21 मार्च, 1983 को प्रातः 10 बजे गोआ के मारमोगोआ बन्दरगाह पर यह दल वापस आ गया. 

इस दल के मुख्य उद्देश्य दो थे—अण्टार्कटिका की संरचना एवं सम्पदा का विशेष रूप से परीक्षण करना तथा वहाँ भारत के स्थायी अड्डे के लिए उपयुक्त स्थान का चुनाव करना. 

प्रथम दल द्वारा स्थापित ‘दक्षिण गंगोत्री’ में ही इस दल ने डेरा डाला. प्रथम दल द्वारा छोड़े गये वैज्ञानिक उपकरणों को इसने ज्यों का त्यों सुरक्षित पाया. वहीं उसी केन्द्र के सहारे 3 किमी लम्बी और 100 मीटर चौड़ी एक हवाई पट्टी बनायी तथा संकेत-चिह्न लगाये. यहीं से 2-3 सौ मीटर दूर स्थायी केन्द्र का स्थान चुना गया और 3 झोंपड़ियाँ खड़ी की गयीं. 

इस दल के वैज्ञानिकों ने 30 मीटर गहराई तक की बर्फ के नमूने एकत्र किये, जिन्हें भारत में आने पर स्तम्भाकार टुकड़ों में काटा गया और विशेष रूप से निर्मित थर्मसों में अहमदाबाद स्थित भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला में रखा गया, वहाँ इनके परीक्षण आदि किये गए. 

दल की समस्त गतिविधियों तथा वहाँ के प्राकृतिक दृश्यों का फिल्मांकन किया गया लगभग 50,000 फुट लम्बी फिल्में खींची गयीं. 

इस दल के लोगों ने अण्टार्कटिका में यात्रा हेतु स्नो स्कूटरों का प्रयोग किया. ये स्कूटर आठ पहियों पर स्थित टैंक की तरह होते हैं. टैंकों की तरह एक पट्टी घूमती है, जिससे पहिए बर्फ में धंसते नहीं हैं.

तृतीय अभियान दल 

पहले दो अभियान दलों की भाँति तृतीय अभियान दल भी अपेक्षित प्रशिक्षण प्राप्त करके 3 दिसम्बर, 1983 को अण्टार्कटिका के लिए रवाना हुआ और 29 दिसम्बर को अपने आधार शिविर में पहुँच गया. इसमें 82 सदस्य थे और इसके नेता थे-हैदराबाद के राष्ट्रीय भू-वैज्ञानिक अनुसंधान केन्द्र के निदेशक डॉ. हर्ष गुप्ता. इस दल में दो महिलाएँ वैज्ञानिक डॉ. अदिति पंत और डॉ. सुदीप्ति सेन गुप्त भी गयी थी. इनके अलावा इसमें सेना के तीनों अंगों के कार्मिक भी शामिल थे. 

इस दल के उद्देश्य बहुत ही व्यापक थे. इस दल ने पिछले दो दलों के द्वारा किये गये परीक्षणों व प्रयोगों को तो आगे बढ़ाया ही, साथ ही इसने कई क्षेत्रों में नये वैज्ञानिक अनुसंधान किये. इस दल ने अण्टाकटिका में एक स्थायी मानव युक्त केन्द्र की स्थापना की, जहाँ से समुद्र सम्पदा, विभिन्न महाद्वीपों की संरचना, उसकी खनिज सम्पदा, जलवायु आदि के सम्बन्ध में अनुसंधान कार्यक्रम निरन्तर चलाया जा रहा है. इस दल ने भारतीय स्टेशन पर विभिन्न प्रयोगशालाओं, जनरेटर कक्ष, बर्फ पिघलाने वाले यंत्र, मनोरंजन कक्ष, रहने के कमरों आदि का निर्माण किया. इस दल की एक टुकड़ी ने ले. कर्नल श्याम सुंदर शर्मा के नेतृत्व में रुककर वहाँ शीतकालीन अनुसंधान कार्य किया तथा शेष सदस्य मार्च 1984 के अन्त तक लौट आये थे.

चतुर्थ अभियान 

चौथा अभियान दल डॉ. बी. बी. भट्टाचार्य के नेतृत्व में 4 दिसम्बर 1984 ई. को ‘फिन पोलरिस’ मारमगाओ से रवाना होकर 29 दिसम्बर को अण्टार्कटिका पहुँचा. इसका उद्देश्य अण्टार्कटिका तट के विशेष केंद्रों में भौतिक, रासायनिक, जैव सामग्री तथा परमाण्विक अनुसंधानों में भू-भौतिकी प्रयोगों पर विशेष बल देना था.

पंचम अभियान 

87 सदस्यीय इस अभियान दल ने डॉ. एम. के. कॉल के निर्देशन में डॉ. अदिति पंत और डॉ. गौर इंद्रसेन के साथ 30 नवम्बर 1985 के अण्टार्कटिका के लिए प्रस्थान किया. यह दल 25 दिसम्बर का अण्टार्कटिका पहुँचा.

षष्ठम् अभियान 

डॉ. अरुण पारुलेकर के नेतृत्व में छठा अभियान दल 26 नवम्बर 1986 को मार्मुगाओ से रवाना हुआ. इसने जापान एवं जर्मनी के केन्द्रों के सहयोग से ओजोन छिद्रों का अध्ययन किया. 

सप्तम अभियान 

डॉ. आर. सेन गुप्त के नेतृत्व में 90 सदस्यीय इस दल ने ‘थूलेलेण्ड’ जहाज में मार्मुगाओ से 25 नवम्बर 1987 ई. को प्रस्थान किया. दल के 15 सदस्यों को अण्टार्कटिका छोड़कर यह मार्च 1988 ई. में वापस पणजी आ गया. इस दल ने वहाँ Air Borne Magnetic Survey किया और 92% शुद्धता वाले इल्मेनाइट नामक खनिज का पता लगाया, साथ ही साथ भारत के द्वितीय स्थायी शोध केंद्र ‘मैत्री’ का आधार सिरमेकर पहाड़ी क्षेत्र में तैयार किया.

अष्टम अभियान 

28 नवम्बर 1988 को आठवां सौ सदस्यीय अभियान दल डॉ. अभिताभ सेन गुप्त के नेतृत्व में मार्मुगाओ बंदरगाह से रवाना होकर 24 दिसम्बर 1988 ई. को अण्टार्कटिका पहुँचा. इस अभियान दल ने भारत के द्वितीय शोध केंन्द्र मैत्री की स्थापना की. 

इसी प्रकार नवें, दसवें, ग्यारहवें, बारहवें, तेरहवें, चौदहवें, पंद्रहवें, सोलहवें, एवं सत्रहवें, अभियान दल क्रमशः प्रत्येक वर्ष 1997 ई. तक भेजे गए. दसवें अभियान दल ने वहाँ SODAR (Sound Detection and Ranging System) की स्थापना की. बारहवें अभियान दल ने Atmospheric Science, Meteorology, Biology, Oceanography, Geology आदि विज्ञान की शाखाओं का वहाँ अध्ययन किया. चौदहवें अभियान दल की उपलब्धि यह रही कि ‘मैत्री’ इलेक्ट्रानिक मेल नेटवर्क से जुड़ गया.

अष्टादश अभियान 

अठारहवां 60 सदस्यीय अभियान दल 14 दि. 1998 ई. को गोवा से डॉ. अजयधर के नेतृत्व में रवाना हुआ. इस दल में तीन महिलाएं सम्मिलित थीं.

उन्नीसवां अभियान 

उन्नीसवां अभियान दल अरुण चतुर्वेदी के नेतृत्व में 9 दिम्सबर 1999 ई. को दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन से रवाना हुआ. यह पहला अवसर था जब भारतीय अभियान दल विदेशी भूमि से रवाना किया गया. 

दक्षिण ध्रुव प्रदेश प्राकृतिक सम्पदा की दृष्टि से अत्यन्त सम्पन्न एवं समृद्ध प्रदेश है. यहाँ की सम्पदा का दोहन किसी भी राष्ट्र की स्पर्धा का विषय बन सकता है. अगले कुछ वर्षों में दक्षिण ध्रुव प्रदेश भारी अन्तर्राष्ट्रीय महत्व प्राप्त कर ले, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी. अण्टार्कटिका अभियानों से अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक जगत् में भारत की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई है. भारत विश्व के उन इने-गिने देशों की पंक्ति में आ गया है जिन्होंने इस साहसिक कार्य को करने में इतिहास बनाया है.

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