नारी शक्ति पर निबंध | भारत में नारी सशक्तीकरण की पहले अथवा नारी-शक्ति को बल कैसे दें?

नारी शक्ति पर निबंध

नारी शक्ति पर निबंध- Essay on Nari Shakti in Hindi |भारत में नारी सशक्तीकरण की पहले अथवा नारी-शक्ति को बल कैसे दें? (यूपी पीसीएस मुख्य परीक्षा, 2014) 

जिस राष्ट्र में महिलाओं की स्थिति मजबूत एवं सम्मानजनक होती है, वह राष्ट्र विकास के पायदानों पर तेजी से आगे बढ़ता है। यह बात भारत पर भी लागू होती है। हम भारत निर्माण के स्वप्न को तब तक साकार नहीं कर सकते, जब तक कि हमारे देश की महिलाएं सशक्त एवं स्वावलंबी नहीं बनतीं। हमारे नीति नियंताओं ने राष्ट्र के विकास में सशक्त नारी की भूमिका के महत्त्व को समझते हुए ही, आजादी के बाद से अब तक नारी सशक्तीकरण की अनेक पहलें की हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि आज की भारतीय नारी घर की देहलीज में कैद रहने वाली नारी नहीं है, बल्कि वह मुखर होकर सार्वजनिक जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। 

नारी सशक्तीकरण की भावना तो हमारे संविधान में निहित है। स्वतंत्रता के बाद अपनाए गए संविधान में महिलाओं को पुरुषों के समान बराबरी का दर्जा प्रदान किया गया है तथा उसे पुरुषों के समान ही अधिकार प्रदान किए गए हैं। जहां संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 15(3), 16(2), 23, 39(क), 39(घ), 39(ङ) एवं 42 महिला अधिकारों को विविध स्तरों पर संरक्षण प्रदान करते हैं, वहीं भारतीय संविधान के भाग 4क में वर्णित अनुच्छेद 51क(ङ) में प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य निर्धारित किया गया है कि वे स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध प्रथाओं का त्याग करें। स्पष्ट है कि भारतीय नारी की संवैधानिक स्थिति अत्यंत सशक्त एवं सम्मानित है। 

सशक्तीकरण से अभिप्राय है मूल गुणों को उभार कर शक्ति । प्रदान करना। नारियों के प्रति संविधान की नेक भावना को ध्यान में रखकर समय-समय पर हमारी सरकार द्वारा नारी सशक्तीकरण की सुचिंतित एवं व्यापक पहलें की जाती रही हैं। विषय के संदर्भ में यहां समग्रतः इनकी चर्चा करना समीचीन रहेगा। महिलाओं के विकास और सशक्तीकरण को ध्यान में रखकर भारत सरकार द्वारा वर्ष 2006 में उनके लिए ‘महिला एवं बाल विकास मंत्रालय’ के रूप में एक पृथक मंत्रालय की स्थापना की गई। यह मंत्रालय इस दिशा में प्रयासरत है कि हिंसा व भेदभाव से मुक्त वातावरण में महिलाएं सम्मान से रह सकें और विकास में पुरुषों के समान ही भागीदारी निभा सकें। यह मंत्रालय महिलाओं से संबंधित विभिन्न नीतियों एवं कार्यक्रमों के जरिए महिला सरोकारों को मुख्य धारा से जोड़कर, महिलाओं के अधिकारों के बारे में उनमें जागरुकता बढ़ाकर तथा महिलाओं को अपने अधिकारों की प्राप्ति एवं संपूर्ण विकास के लिए संस्थागत व कानूनी समर्थन प्रदान करके महिलाओं के सामाजिक एवं आर्थिक सशक्तीकरण को प्रोत्साहित करता है। 

महिलाओं को विधिक संरक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से केंद्र । सरकार द्वारा समय-समय पर अनेक कानूनों को लागू किया गया है। भारतीय दंड संहिता की धारा 354 स्त्री की लज्जा भंग करने को अपराध घोषित करती है। इसी संहिता की धारा 497 में बलात्कार को तथा धारा 509 में स्त्री की लज्जा का अनादर करने के आशय से शब्द, ध्वनि, अंग विक्षेप किए जाने को दंडनीय अपराध घोषित किया गया है। अनैतिक व्यापार निरोधक अधिनियम, 1959, प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम, 1961, समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976, वेश्यावृत्ति निवारण अधिनियम, 1986, स्त्री अशिष्ट निरूपण अधिनियम, 1986, सती निषेध अधिनियम, 1987, दहेज निरोधक कानून, 1961 (1986 में संशोधित), बाल-विवाह निषेध अधिनियम, 2006, घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005, राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990, कार्यस्थलों पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिशोध एवं निवारण) कानून, 2012 एवं आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 और मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 आदि के जरिए महिला अधिकारों के संरक्षण का प्रणयन किया गया है। 

महिला अधिकारों को बेहतर ढंग से प्रवर्तित कराने तथा उनकी सामाजिक एवं आर्थिक दशाओं में सुधार के लिए सुझाव देने के लिए वर्ष 1992 में ‘राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास माना जा सकता है। ‘राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990’ के अधीन गठित इस आयोग को महिलाओं के सांविधानिक और कानूनी सुरक्षा के अधिकारों को लागू कराने तथा महिलाओं से संबंधित आवश्यक संशोधनों एवं व्यवस्थाओं से संबंधित सुझाव देने का दायित्व सौंपा गया है। इसी के तहत वर्ष 1993 में ‘राष्ट्रीय महिला कोष’ का गठन किया गया, जो स्वरोजगार हेतु प्रयासरत महिलाओं तथा महिला समूहों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराता है। 

महिला अधिकार संरक्षण की दृष्टि से 73वां एवं 74वां संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1992 द्वारा पारित ‘पंचायती राज अधिनियम’ अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसके अंतर्गत अनुच्छेद 243घ तथा 243न द्वारा क्रमशः पंचायतों और नगरपालिकाओं में एक-तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए हैं। इससे स्थानीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी में पर्याप्त वृद्धि हुई है, जो एक सकारात्मक संकेत है। 

“इसमें कोई दो राय नहीं कि आज की भारतीय नारी घर की देहलीज में कैद रहने वाली नारी नहीं है, बल्कि वह मुखर होकर सार्वजनिक जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।”

महिलाओं की प्रगति, विकास और सशक्तीकरण सुनिश्चित करने के उद्देश्य से वर्ष 2001 में महिला सशक्तीकरण की राष्ट्रीय नीति का प्रतिपादन भविष्य की रूपरेखा के प्रारूप में किया गया। इसमें महिलाओं के साथ हर तरह का भेदभाव समाप्त करने, कानून प्रणाली सहित मौजूदा संस्थाओं को सशक्त बनाने, स्वास्थ्य संबंधी देख-रेख और अन्य सेवाओं तक बेहतर पहुंच उपलब्ध कराने, निर्णय लेने के क्रम में महिलाओं की भागीदारी के समान अवसर उपलब्ध कराने एवं विकास की प्रक्रिया में महिलाओं से जडे सरोकारों को मुख्यधारा में लाने के लिए विस्तृत लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। 

नारी सशक्तीकरण को ध्यान में रखकर हमारी सरकार द्वारा ‘जेंडर बजटिंग’ की न सिर्फ पहल की गई है, बल्कि इसे संस्थागत रूप प्रदान करने के उद्देश्य से वित्त मंत्रालय द्वारा वर्ष 2005 में सभी मंत्रालयों व विभागों में जेंडर बजटिंग प्रकोष्ठ के गठन का आदेश दिया गया। जेंडर बजटिंग महिलाओं को मुख्य धारा में लाने का लक्ष्य हासिल करने का सशक्त माध्यम है, ताकि विकास के लाभ पुरुषों के समान ही महिलाओं तक भी पहुंचे। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को जेंडर बजटिंग के लिए नोडल मंत्रालय बनाया गया है। महिलाओं के संपूर्ण सशक्तीकरण के उद्देश्य से मार्च, 2010 में सरकार द्वारा ‘राष्ट्रीय महिला सशक्तीकरण मिशन’ का सूत्रपात किया गया था। इस मिशन के तहत जिन प्रमुख बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है, वे हैं—बच्चों का घटता लिंगानुपात, महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा, बाल-विवाह, महिलाओं को मुख्य धारा में लाना, जेंडर बजटिंग शिक्षा के अधिकार के तहत लड़कियों को स्कूल में दाखिला दिलाना एवं मानव तस्करी आदि। 

सामाजिक विकास के क्षेत्र में महिलाओं के व्यक्तिगत योगदान को पहचान देने के उद्देश्य से सरकार द्वारा ‘स्त्री शक्ति’ पुरस्कार के नाम से छह राष्ट्रीय पुरस्कारों की स्थापना की गई है। ये पुरस्कार भारतीय इतिहास की जिन छह सम्मानित महिलाओं के नाम पर रखे गए हैं, वे हैं- रानी लक्ष्मीबाई, रानी रुद्रम्मा देवी, देवी अहिल्या बाई होल्कर, कण्णगी, माता जीजाबाई एवं रानी गिडनेलू। 

उक्त पहलों के अलावा भी सरकार द्वारा समय-समय पर नारी कल्याण एवं सशक्तीकरण के उद्देश्य से अनेकानेक पहलें की जाती रही हैं, जिनमें उल्लेखनीय हैं वर्ष 2010-11 में शुरू की गई राजीव गांधी किशोरी सशक्तीकरण स्कीम (सबला), इंदिरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना, महिलाओं के प्रशिक्षण एवं रोजगार के लिए सहायता कार्यक्रम (स्टेप), बेसहारा महिलाओं के कल्याण के लिए स्वाधार योजना, कामकाजी माताओं के लिए राजीव गांधी राष्ट्रीय क्रेच योजना, बालिकाओं को वित्तीय प्रोत्साहन हेतु धनलक्ष्मी योजना, महिलाओं के विकास और सशक्तीकरण की समन्वित योजना स्वयंसिद्धा, महिला शिक्षा के लिए कंडेंस पाठ्यक्रम आदि। 

जनवरी, 2015 में सरकार द्वारा ‘राष्ट्रीय बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान’ के तहत बेटियों की उच्च शिक्षा और उनके विवाह के लिए ‘सुकन्या समृद्धि योजना’ नाम से राष्ट्रीय लघु बचत योजना का सूत्रपात किया गया है। ये दोनों ही योजनाएं बालिकाओं के सशक्तीकरण से अभिप्रेत हैं। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के उद्देश्य अत्यंत व्यापक हैं। इसके तहत जनसामान्य को अपनी पुत्रियों पर गर्व करने तथा परायाधन की मानसिकता का विरोध करने, लड़कों और लड़कियों के बीच समानता को बढ़ावा देने, बच्ची का स्कूल में दाखिला व उसकी पढ़ाई बरकरार रखने के उपाय सुनिश्चित करने, पुरुषों और लड़कों को लैंगिक रूढ़िवादी सोच एवं भूमिकाओं को चुनौती देने, लिंग निर्धारण परीक्षण की किसी भी घटना की सूचना देने, अपने पास-पड़ोस को महिलाओं एवं लड़कियों के लिए सुरक्षित एवं हिंसा मुक्त बनाने, बाल-विवाह एवं दहेज प्रथा का दृढ़ता से विरोध करने तथा महिलाओं की सम्पत्ति के स्वामित्व एवं उत्तराधिकार के अधिकार को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित व प्रोत्साहित करने का विधान है। इसी प्रकार बालिकाओं की उच्च शिक्षा एवं उनके विवाह में सहायता के उद्देश्य से शुरू की गई ‘सुकन्या समृद्धि योजना के तहत 31 जनवरी, 2017 तक एक करोड़ से अधिक खाते खोले गए। इसी क्रम में जहां मई, 2016 में शुरू की गई ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत महिलाओं की स्वास्थ्य सुरक्षा एवं खाना पकाने के समय को कम कर उनके सशक्तीकरण के उपाय सुनिश्चित किए गए, वहीं ‘प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण)’ के तहत घरों की रजिस्ट्री महिलाओं के नाम किए जाने का प्रावधान किया गया। महिला सशक्तीकरण के क्रम में ही मातृत्व लाभ अधिनियम में संशोधन से मातृत्व अवकाश 26 सप्ताह किया गया, जो मार्च, 2017 से प्रभावी है। अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के बीच उद्यमिता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 5 अप्रैल, 2016 को ‘स्टैंड अप इंडिया’ की शुरुआत की गई, जिसमें 80% से अधिक महिलाएं सम्मिलित की गईं। महिला सशक्तीकरण की इससे अच्छी मिसाल और क्या होगी हमारे सशस्त्र बलों के सभी युद्धक वर्गों में महिलाओं के प्रवेश की व्यवस्था सुनिश्चित की जा चुकी है। वर्ष 2017 में भारतीय वायुसेना में पहली तीन महिला युद्धक पायलटों को शामिल किया गया था। इसी क्रम में दिल्ली सहित सभी संघ शासित प्रदेशों में पुलिस बलों में गैर-राजपत्रित पदों में सीधी भर्ती में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित की गई। 

महिलाएं तभी सशक्त बनेंगी, जब वे सुरक्षित रहेंगी। इसे ध्यान में रखकर भी अच्छी पहलें की गई हैं। वर्ष 2015 में एक स्थान पर केंद्रित योजना सखी शुरू की गई, जिसके तहत हिंसा से प्रभावित महिलाओं के लिए एक स्थान पर चिकित्सा, पुलिस, वैधानिक एवं मानसिक-सामाजिक परामर्श उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है। मार्च, 2017 तक देश में 121 केंद्र स्थापित किए जा चुके हैं। इसी क्रम में परेशानी में फंसी महिलाओं की सुविधा के लिए जहां मोबाइल फोनों पर ‘पेनिक बटन’ लगाने की योजना है, वहीं संकट में फंसी महिलाओं के लिए यूनिवर्सल हेल्पलाइन 181 शुरू की गई है। 

भारत वैश्विक स्तर पर भी महिला कल्याण एवं सशक्तीकरण हेतु वचनबद्ध एवं प्रतिबद्ध है। भारत, संयुक्त राष्ट्र की महिलाओं के प्रति भेदभाव समाप्त करने संबंधी संधि (सीईडीएडब्ल्यू) पर 30 जुलाई, 1980 को हस्ताक्षर कर चुका है। उल्लेखनीय है कि इस संधि में शामिल सदस्य देश महिलाओं के प्रति भेदभाव दूर करने के लिए अपने यहां कानून बनाने और दूसरे उपाय करने तथा उसके लिए पुरुषों के समान मूल अधिकारों और मानवाधिकारों का उपयोग करने की आजादी की गारंटी देने के लिए बाध्य हैं। ध्यातव्य है कि विश्व भर की महिलाओं के लिए नीति निर्धारित करने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था ‘कमीशन ऑन द स्टेट्स ऑफ वूमन’ से भी भारत संबद्ध है। 

उक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि हमारे देश में महिलाओं के सशक्तीकरण, विकास एवं कल्याण की भरपूर पहले सरकार की तरफ से की गई हैं। इनके अच्छे परिणाम भी मिले हैं तथा आधी दुनिया में बदलाव भी दिख रहा है। भारत में सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से उनके सम्मान व गरिमा में वृद्धि भी हुई है। भारतीय नारी सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक स्तरों पर कहीं अधिक सबल होकर अपनी भूमिकाओं का निर्वहन कर रही है। हालांकि और अधिक अच्छे परिणामों के लिए पुरुष प्रधान समाज के ‘माइंड सेट’ में बदलाव की आवश्यकता अभी भी महसूस की जा रही है। 

नारी की महत्ता, राष्ट्र एवं समाज के विकास में उसके योगदान तथा नारी के मानवीय गुणों से हमारे धर्म-शास्त्र भरे पड़े हैं। समाज के निर्माण में नारी का अप्रतिम योगदान होता है। श्रेष्ठ समाज एवं श्रेष्ठ राष्ट्र निर्माण हेतु नारी का सशक्त एवं सम्मानित होना अनिवार्य है। इस अनिवार्यता को समझकर ही हमने नारी सशक्तीकरण की पहले शरू की हैं, जो यकीनन रंग लाएंगी।

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