नारी ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है पर निबंध |Essay on woman is god’s masterpiece

नारी ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है पर निबंध

नारी ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है पर निबंध |Essay on woman is god’s masterpiece

परिचय 

नारी ब्रह्म विद्या है, श्रद्धा है, शक्ति है, पवित्रता है, वह सब कुछ है, जो इस संसार में सर्वश्रेष्ठ के रूप में दृष्टिगोचर होता है. नारी कामधेनु है, अन्नपूर्णा है, सिद्धि है, रिद्धि है और वह सब कुछ है जो मानव प्राणि के समस्त अभावों, संकटों का निवारण करती है. यदि नारी को श्रद्धा की भावना अर्पित की जाए, तो वह विश्व के कण-कण को स्वर्गीय भावनाओं से ओत-प्रोत कर सकती है. नारी एक सनातन शक्ति है. वह आदिकाल से उन सामाजिक दायित्वों को अपने कन्धों पर उठाए आ रही है जिन्हें केवल पुरुषों के कंधे पर डाल दिया जाता, तो वह कब का लड़खड़ा गया होता. भौतिक जीवन की लालसाओं को उसकी पवित्रता ने रोका और सीमाबद्ध करके उसे प्यार की दिशा दी. नारी के विषय में पुराणों में यह श्लोक अंकित है 

“विद्या समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रिया समस्ता सकला जगत्सु । 

त्वथैकया पूरितमम्बयेतत का तै स्तुति स्तव्यपरा परोकित ।।”

अर्थ- “हे देवी ! संसार की समस्त विद्याएं तुमसे निकली हैं और सब स्पृहाएँ तुम्हारा ही स्वरूप हैं. समस्त विश्व एक तुम्हीं से पूरित है अतः तुम्हारी स्तुति किस प्रकार की जाए?” 

जहाँ तक नारी शब्द का प्रश्न है वह नर की ही तरह नृ धातु से बना है, इसका अर्थ क्रियाशील रहने वाला नर है और क्रियाशील रहने वाली नारी भी है. ऋग्वेद के दशम मण्डल के 159वें सूक्त में शची का गौरव वर्णित है. शची का कथन है 

अहम कुतुरहम मूर्धाऽमुग्रा विवाचिनी।

ममेदनु क्रतुं पतिः सोहानाया उपाचरेत।।       – ऋग्वेद, दशम मण्डल सूक्त 159

अर्थ “मैं ज्ञान में अग्रगण्य हूँ. मैं स्त्रियों में मूर्धन्य हूँ. मैं उच्चकोटि की वक्ता हूँ, मुझ विपयणी की इच्छानुसार मेरा पति आचरण करता है” 

वेदों में नारी का गौरवमय स्थान इससे भी ज्ञात होता है कि नारी को ही घर कहा गया है. स्त्री की प्रतिष्ठा अपने गुणों और योग्यता के आधार पर ही है. वेदों की तरह ब्राह्मण ग्रंथों में भी नारी का गौरव वर्णित है. यहाँ नारी को सावित्री कहा गया है. विभिन्न शास्त्रों में प्रतिपादित नारी की इस विशिष्टता का आधार उसकी अन्तर्निहित क्षमता एवं सद्गुण सम्पत्ति है. जिसे प्राचीन समय में विकसित होने के पूर्ण अवसर थे. 

मनुस्मृति में बताया गया है कि जहाँ नारियों का सम्मान, उनकी पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं और जहाँ इसका सम्मान नहीं होता वहाँ प्रगति, उन्नति की सारी क्रियाएं विफल हो जाती हैं. नारी समाज का वह स्तम्भ है जिसके बिना समाज का निर्माण नहीं हो सकता. नारी को वैदिककाल से ही अनेक रूपों में पाया जाता है. महाशक्ति, लक्ष्मी व पार्वती के रूप में तीन शक्तियाँ आज भी समाज की अराध्य देवियाँ मानी जाती हैं. अर्धनारीश्वर भगवन शिव की कल्पना इसी का प्रतीक है. नारी के अभाव में कोई भी 

पारिवारिक, धार्मिक अनुष्ठान अथवा सामाजिक दायित्व पूरा नहीं हो सकता. नारी ने अलग-अलग सीमा में रहकर इस समाज को उन्नति के शिखर पर पहुँचाने की जिम्मेदारी से भी स्वयं को अलंकृत किया है.

धर्मशास्त्रों में नारी की गरिमा 

सबसे पहले यदि प्राचीन ग्रंथों में नारी के लिए प्रयुक्त सभी शब्दों की व्युत्पत्ति पर ही सही विचार करें, तो स्पष्ट हो जाएगा कि मध्यकालीन अंधकार युग से पहले अपने यहाँ महिलाओं के प्रति समाजशास्त्रियों का मनोभाव क्या था? 

उदाहरण के लिए महिला शब्द को ही लें- मह + इल च + आ = महिला. मह का अर्थ श्रेष्ठ या पूजा है. पूज्य और श्रेष्ठ जो है वही महिला है. लौकिक संस्कृति में आदर के लिए स्त्रियों के लिए ‘मान्या’ शब्द का प्रयोग किया जाता है, 

स्त्री शब्द तो सर्वाधिक प्रचलित है. भाष्यकार महर्षि पतंजलि के अनुसार, ‘स्तास्यति अस्था गर्भ इति स्त्री’ अर्थात् “उसके भीतर गर्भ की स्थिति के होने पर उसे स्त्री कहा जाता है.” 

वेदों में तो नारी का गौरव अनेक प्रकार से वर्णित है.

“स्त्री हि ब्रह्मा वभूवित”                – ऋग्वेद 8/33/19 

इसका अभिप्रायः यह है कि वह स्वयं विदुषी होकर अपनी संतान को सुशिक्षित बनाती है. ब्रह्म ज्ञान का अधिष्ठाता है. यही यज्ञों का संचालन करता है. वह ज्ञान-विज्ञान में श्रेष्ठ होता है. अतः उसे यज्ञ में सर्वोच्च स्थान दिया जाता है उसी प्रकार से नारी को ज्ञान-विज्ञान में निपुण होने के कारण ब्रह्म बताया गया है- विभिन्न शास्त्रों में प्रतिपादित नारी की इस विशिष्टता का आधार उसकी अन्तर्निहित क्षमता एवं सद्गुण सम्पत्ति है जिसे प्राचीन समय में विकसित होने के पूरे अवसर प्राप्त थे. पूर्वजों के मन में उसके लिए भरपूर सम्मान और समता की भावना थी. यों तो यथार्थ यही है जिसके पास सामाजिक प्रभुता होती है उसी का सब सम्मान करते हैं. इसीलिए नारी की वर्तमान उपेक्षित स्थिति के लिए वेद, पुराण आदि को दोष देने और अर्थहीन विवाद करते रहने तथा ठोस कार्य कुछ न करने के स्थान पर जरूरत इस बात की है कि नारी को पुनः वैसा ही समर्थ, सक्षम बनाया जाए जैसा प्राचीन शास्त्रों में वर्णित है. 

त्याग और बलिदान के आदर्श के रूप में हम उन राजपूत वीरांगनाओं का स्मरण करते हैं, जो हँसते-हँसते जौहर कर लेती थीं. पति के प्रति उनकी परायणता को देखकर फारसी के एक कवि ने कहा था 

मिस्ल हिन्दू जन कसेदर आशिकी मर्दाना नेस्त 

सोरवतन दर शम-मुर्दाकार हर परवाना जेस्त

अर्थ-परवाना जिंदा शमां पर प्राण देता है. हिन्दू नारी मुर्दा पर जान देती है. हर पतंगे का बलिदान इसके सामने नगण्य है. बलिदान का ऐसा उदाहरण अप्राप्य है. 

निर्णय करने से पूर्व वैज्ञानिकों से तो पूछ लीजिए कि वे क्या कहते हैं? वैज्ञानिकों के अनुसार मृत शरीर के अस्थिपंजर देखने से ही नर-नारी की परख आसानी से की जा सकती है, क्योंकि प्रकृति ने इसकी बनावट में अन्तर थोड़ा-बहुत रख छोड़ा है. “नारी की हड्डियाँ पुरुष की अपेक्षा छोटी, चौड़ी तथा सरल होती है. नारी के मस्तक की ऊँचाई कम, नीचे का जबड़ा हल्का, दाँत छोटे, ठोड़ी ऊँची, सीने के बीच की हड्डी छोटी तथा टेढ़ी, छाती पतली, रीढ़ की हड्डियों के गुटखे पतले, गहरे देखकर नारी के अस्थि-पंजर को आसानी से पहचाना जा सकता है. 

रोगों की प्रतिरोधक क्षमता महिलाओं में पुरुषों से अधिक होती है. काफी खोजबीन के बाद शरीर विज्ञानी इस निष्कर्ष पर पहुँच गए हैं कि स्त्रियों की प्रतिरक्षा प्रणाली पुरुषों की अपेक्षा कहीं अधिक शक्ति रहती है. उनके अनुसार इसका कारण यह है कि एक विशिष्ट प्रकार का प्रोटीन जिसे कि ‘इम्यूनोग्लोकुलीन एम.’ के नाम से जाना जाता है. स्त्रियों के शरीर में यह पुरुषों की अपेक्षा अधिक बनता है. शरीर रक्षा के लिए यह एक शक्तिशाली घटक है. यही कारण है कि महिलाएं पुरुषों से अधिक स्वस्थ, सानन्द दिनचर्या व्यतीत करती हैं, अमरीकी चिकित्सा वैज्ञानिकों द्वारा यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि दिल का दौरा पुरुष वर्ग को ही अधिक होता देखा गया है. उनकी दृष्टि में 4 करोड़ 20 लाख से भी अधिक पुरुष वर्ग को ही दौरा अधिक होते देखा गया है. अथवा रक्तवाहिनी का कोई न कोई रोग बना ही रहता है, उनसे पूछताछ करने पर एक ही जवाब मिलता है इसके लिए वातावरण और परिस्थितियाँ दोषी हैं, जबकि वास्तविकता ऐसी नहीं है मूल कारण तो शारीरिक, मानसिक संरचना में निहित है. स्त्रियों के सम्बन्ध में एक अतिमहत्वपूर्ण बात यह है जिसे प्रकृति की अनुकम्पा कहा जा सकता है वह है ‘इस्ट्रोजन’ नामक हॉर्मोन इसके रूप में उन्हें ऐसा अमोध अस्त्र हाथ लगा है, जो किसी प्रकार के हृदय रोग से मुक्ति दिलाने में हरसम्भव सहायक होता है यही कारण है कि स्त्रियों में पुरुषों की अपेक्षा किसी प्रकार का रोग या कष्ट सहने की क्षमता अधिक होती है. इतना ही नहीं मनोचिकित्सकों द्वारा किए गए परीक्षणों द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि किसी भी समस्या के समाधान में पुरुष वर्ग को अधिक तनावग्रस्तता का सामना करना पड़ता है. ऐसी अवस्था में उनके दिल की धड़कनें अधिक तीव्र हो जाती हैं, जबकि स्त्रियों के दिल की धड़कनों में विशेष परिवर्तन नहीं होता है और न उत्तेजना उभारने वाले “एड्रिनेलिन’ नामक हॉर्मोन का स्राव अधिक होता है. दिल के दौरे पुरुषों में अधिक पड़ने का कारण यही है. 

नारी करुणा, उदारता, कोमलता, मातृत्ववत्सल भावनाओं से इस समाज को अनेक तरह के गुणों से सुशोभित कर सुविधाएं प्रदान करके नवजीवन का संचार करती है. इसलिए उसे प्रकृति की बेटी कहा गया. 

ईश्वर ने नारी को अनेक रूपों में जगदकल्याण की भावना से समाज को अर्पित किया है-माँ के रूप में ममता, करुणा, मातृत्ववत्सल, वात्सल्य जैसे गुणों से ओत-प्रोत करके भेजा है. “माँ के रूप में यशोदा, त्याग के लिए पन्ना धाय, भक्ति मार्ग में मीराबाई, पत्नी के रूप में माता सीता, सावित्री जैसी अनेक नारियाँ समाज में प्रकट हुईं और समाज को रास्ता दिखाकर अपनी अमिट छाप छोड़ गई हैं” रानी लक्ष्मीबाई के बारे में कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने लिखा है कि “हमको पाठ पढ़ाने आई बन स्वतन्त्रता नारी थी.” 

शारीरिक, मानसिक वरिष्ठता के साथ नारी की भावनात्मक विशेषताओं के विषय में जितना भी गुणगान किया जाए कम ही होगा, जिस आंतरिक संवेदनशीलता की प्राप्ति के लिए विभिन्न प्रकार के साधनात्मक उपचार किए जाते हैं. उसे (नारी को) वह जन्मजात प्राप्त हैं. अपना यौवन निचोड़कर शिशु को अमृत-दुग्ध पिलाने वाली शिशु की एक मुसकान पर न्यौछावर होने वाली माता की भावनात्मक विशेषताओं का भला किन शब्दों में वर्णन किया जा सकता है. नारी हर तरह का त्याग बलिदान करने में बेमिसाल है. भाव 

सम्पदा की दृष्टि से तो पुरुष नारी से सैकड़ों मील पीछे छूट जाता है. ये सभी तथ्य एक तरह से यही स्पष्ट करते हैं कि नारी को ईश्वर ने पुरुष की अपेक्षा बलशाली एवं सक्षम बनाया है. 

उक्त विवेचन द्वारा यह स्पष्ट है कि ईश्वर ने नारी को संसार की अन्य वस्तुओं से सजीव, निर्जीव सभी प्राणियों से अधिक सक्षम, कर्तव्यनिष्ठ, कोमल, दया से परिपूर्ण बनाया है. अगर गहराई से देखा जाए, तो अगर ईश्वर नारी की रचना न करता, तो क्या इस संसार का किसी भी प्रकार का विकास हो पाता? शायद नहीं, क्योंकि ईश्वर ने मातृत्व सुखमात्र नारी को ही प्रदान किया है. नारी के माता रूप को देखते हुए वेदव्यासजी कहते हैं कि 

“नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः।

नास्ति मातृसमं त्राणं, नास्ति मातृसमा प्रिया।।”              – वेदव्यास

इसी प्रकार नारी के पास वे सम्पूर्ण शक्तियाँ हैं, जो संसार में किसी के पास नहीं. पुराणों में जहाँ कहीं भी देवासुर संग्राम हुआ करते थे वहीं यह उल्लेख भी मिलता है कि जब देवता पराजित होने लगते थे, तब देवी शक्ति किसी-न-किसी रूप में उनकी सहयोगी बनकर सामने आती थी और उन्हें विजयी बनाती थी. इसी प्रकार नारी श्रेष्ठता के अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं. नारी की श्रेष्ठता और शक्तियों के बारे में जितना भी वर्णन किया जाए वह कम ही है.. 

प्रत्येक दृष्टि से नारी श्रेष्ठों में श्रेष्ठ है. सर्वोत्तम है. 

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