जाड़े की ऋतु पर निबंध-Essay on Winter Season in Hindi

Essay on Winter Season in Hindi

जाड़े की ऋतु पर निबंध-Essay on Winter Season in Hindi

हमारे देश में छह ऋतुएं हैं, परंतु इनमें से तीन ऋतुएं ही प्रमुख रूप से अनुभव में आती हैं-जाड़ा, गर्मी और बरसात। कार्तिक, अगहन, पूस और माघ-ये चार महीने जाड़े के माने गए हैं। 

जाड़े की ऋतु में सर्वप्रथम शरद ऋतु और उसके बाद शिशिर ऋतु आती है। शरद ऋतु में न तो जाड़े की कड़कड़ाती ठंड रहती है और न ही ग्रीष्म का दहकता ताप। इसमें मौसम समशीतोष्ण रहता है। गरीब-अमीर सभी इसका समान रूप से आनंद लेते हैं। वर्षा ऋतु बीत जाने पर शरद ऋतु का आगमन होता है। आश्विन और कार्तिक महीने शरद ऋतु के होते हैं। इसके आगमन के संबंध में ‘रामचरित मानस’ में गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं 

वर्षा विगत सरद रितु आई। 

लछिमन देखहु परम सुहाई॥

पृथ्वी पर कांस में फूल आना और खंजन पक्षी का दिखाई पड़ना-शरद ऋतु के आगमन के दो प्रमुख लक्षण हैं- 

फले कांस सकल महि छाई। 

जनु बरसा कृत प्रकट बुढ़ाई॥

शरद ऋतु में बरसात की भांति गलियों में कीचड़ नहीं होती। नदी एवं तालाब के जल निर्मल हो जाते हैं। आकाश साफ रहता है। मंद-मंद सुखद हवा चलती रहती है। अगस्त्य, हरसिंगार तथा कुमुद आदि पुष्पित हो उठते हैं। इन पुष्पों पर भौंरों के गुंजन और नाना प्रकार के पक्षियों के कलरव से शरद ऋतु का दिवस प्रायः संगीतमय बना रहता है 

गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। 

सुंदर खग रव नाना रूपा॥

शरद-रात्रि की सुंदरता अधिक मनभावन होती है। मेघों से रहित निर्मल आकाश तारों की ज्योति से वैसे ही जगमगा उठता है, जैसे सत्वगुणी चित्त वेदों का अर्थ समझ जाने पर शोभायमान हो जाता है। शरद पूर्णिमा की रात्रि का कहना ही क्या? रजनी मानो अपनी काली साड़ी बदलकर श्वेत वसना बन जाती है। शरद की चांदनी में एक विशेष प्रकार की मादकता होती है। 

शरद ऋतु मनभावन ही नहीं होती, अपितु यह अपने साथ-साथ अन्नपूर्णा देवी को भी लाती है। मघई एवं अगहनी फसलों से किसानों की कोठरियां भर जाती हैं। रबी फसलों की बोआई इसी ऋतु में होती है। दशहरा एवं दीपावली के त्योहार इसी ऋतु में मनाए जाते हैं। वर्षा ऋतु के कारण कार्य ठप पड़ जाते हैं, जो शरद ऋतु का आगमन होते ही फिर से आरंभ हो जाते हैं। 

जाड़ा प्रारंभ होते ही सभी लोग ठंड से सुरक्षा हेतु अपनी सामर्थ्य के अनुसार तैयारी में जुट जाते हैं। ऊनी वस्त्र की दुकानों पर भीड़ लग जाती है। स्वेटर, ऊनी चादर, रजाइयों एवं कंबलों की ब्रिकी धड़ल्ले से होने लगती है। अधिकांश महिलाओं के हाथ में ऊन और कांटे दिखने लगते हैं। शयनकक्षों को वातानुकूलित मशीन अथवा हीटर की सहायता से गर्म रखा जाता है। स्नानघरों के लिए ‘गीजर’ की व्यवस्था की जाती है। कहने का तात्पर्य यह है कि जाड़े की ऋतु में धन अपना खेल दिखाने लगता है। अमीरों के पास जाड़े की ठंड फटक ही नहीं पाती। पेट में पौष्टिक अन्न एवं ऊपर से जयपुरिया लिहाफ की गर्मी पाते ही वे लोग बोल उठते हैं, “अहा! जाड़ा तो ईश्वर का दिया हुआ एक वरदान है, यह कुदरत की एक अनोखी नेमत है।” 

लेकिन जाड़े का एक दूसरा पक्ष भी है। जिसके पास न तन ढकने को कपड़ा, न पेट भरने को अन्न और न सोने के लिए सिर के ऊपर छप्पर है, ऐसे अभागों के लिए जाड़े की ऋतु कष्टप्रद होती है। पुआल की खोह में घुटने और सिर को एक कर गरीब बोल उठता है, “जाड़ा एक अभिशाप है।” 

जाड़े की ऋतु का एक तीसरा पक्ष भी है, जो बड़ा मनोरम है। जाड़े में न तो गर्मी की लू होती है और न ही बरसात की कीचड़। सर्वत्र शांत एवं स्वच्छ वातावरण रहता है। धान की सुनहरी बालियों एवं सरसों के पीले फूलों से आच्छादित खेतों को देखकर किसान फूले नहीं समाते। तालाबों में कमल के पुष्प खिलकर शोभायमान होने लगते हैं। जाड़े की ऋतु में हमें अनेक प्रकार के खाद्यान्न, फल-फूल एवं सब्जियां मिलती हैं। सब्जियों का राजा आलू इसी ऋतु की उपज है। हमारे प्रधान खाद्यान्न गेहूं और चना इसी ऋतु की देन हैं। फलों में अमरूद और बेर जैसे सस्ते फल इसी ऋतु में मिलते हैं। 

स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी शरद ऋतु अन्य ऋतुओं से श्रेष्ठ है। इस मौसम में गर्मी और बरसात की तरह महामारी फैलने की संभावना नहीं रहती। इस ऋतु में कभी-कभी यह भी सुनने को मिलता है कि शीत लहर से ठिठुरकर गरीबों के बच्चे-बूढ़े मर गए। अगर गरीबों के लिए भी अशन-वसन की समुचित व्यवस्था हो जाए, तो निःसंदेह यह ऋतु सर्वप्रिय हो जाएगी। 

जाड़े की ऋतु में शाम होते ही निर्धन लोग आग का सहारा लेते हैं। आग के चारों ओर परिवार एवं मित्रों के साथ बैठकर खेत-खलिहान तथा बच्चों के संबंध में बातें करते हुए वे रात्रि का अधिकांश समय काट लेते हैं। इसके बाद सोने के लिए सपरिवार पुआल की खोह की शरण लेते हैं। ऐसे में अगर वर्षा हो जाए, तो इनके कष्ट की कोई सीमा नहीं रहती। 

जाड़े की रात में गलियों एवं सड़कों पर बिल्कुल सन्नाटा रहता है। क्या अमीर, क्या गरीब-कोई भी बाहर नहीं निकलना चाहता। इसके अलावा अन्य जीव-जंतु भी अपने-अपने सुरक्षित स्थानों में दुबके रहते हैं। कभी-कभी ठंड से कुत्ते एवं सियारों का रोना जाड़े की रात्रि की भयंकरता बढ़ा देता है।

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