वन्यजीव संरक्षण पर निबंध | Essay on Wildlife Conservation in Hindi

वन्यजीव संरक्षण पर निबंध

भारत में वन्य जीव संरक्षण | वन्यजीव संरक्षण पर निबंध | Essay on Wildlife Conservation in Hindi

वन वे स्थान होते हैं, जहां प्रकृति बैठकर अपने रूप को संवारती है। वन्य जीवन प्रकृति के इस सुंदरतम् स्वरूप यानी वनों को जहां विविधता के रंगों में रंगता है, वहीं वनों को जीवंतता भी प्रदान करता है। यदि वन्य जीवन न हो तो वन वीरान और खामोश हो जाएंगे, अतएव वन्य जीवों का संरक्षण एवं इनकी सुरक्षा आवश्यक हैं|

वर्ष 2019 में जैव विविधता के मामले में विश्व के सर्वाधिक सम्पन्न देशों में भारत 17 देशों में शामिल है। संपूर्ण विश्व में पायी जाने वाली लगभग 130 लाख वन्य प्रजातियों में से लगभग 75000 प्रजातियां भारत में पायी जाती हैं। इनमें से 340 स्तनधारी, 1200 पक्षी, 420 सरीसृप, 140 उभयचर, 2000 मत्स्य, 50,000 कीट, 4000 मोलस्क तथा अनगिनत रीढ़ विहीन जन्तु हैं। प्राकृतिक संसाधनों एवं भौगोलिक विविधता के मामले में भी भारत अतिसम्पन्न देशों में एक है। 14 जैवमंडलीय क्षेत्रों में विभाजित भारत के लगभग 33 लाख वर्ग किमी. क्षेत्र में वैविध्य खूब है। 7516 किमी. लम्बी समुद्र तटीय जलवायु सहित भारत में 14 प्रकार के वन पाये जाते हैं। भारत में वनों का क्षेत्रफल लगभग 6.50 लाख वर्ग किमी. है। विशालकाय झीलों, नदियों, हिमालय जैसी पर्वत श्रृंखलाओं, रेगिस्तान, दलदली भूमि तथा द्वीप समूहों के कारण भारत में वनस्पति एवं वन्य जीवा का उपलब्धता अपार है। विश्व के 7 प्रतिशत पेड़-पौधे तथा 6.5 प्रतिशत जीव जन्तु भारत में निवास करते हैं जबकि भारत का भूभाग संपूर्ण विश्व के भूभाग का मात्र 2 प्रतिशत ही है। 

“जैव विविधता के मामले में विश्व के सर्वाधिक सम्पन्न देशों में भारत 17 देशों में शामिल है।” 

भारत में अच्छी संख्या में राष्ट्रीय पार्क एवं अभयारण्य हैं, जो वन्य जीवों के सुरक्षित अधिवास तो माने जाते हैं, किंतु विडंबना यह है कि इनमें वन्य जीवों की संख्या घटी है। यही कारण है कि भारत में वन्य जीवों के संरक्षण की आवश्यकता महसूस की गई है। वस्तुतः वन्य प्राणियों का विनाश प्रायः दो कारणों से होता है-प्रथम कारण प्राकृतिक है, जबकि द्वितीय कारण मानव जनित है। प्राकृतिक कारणों से वन्य प्रजातियों का विनाश एक धीमी प्रक्रिया है, जो कि स्वाभाविक है। प्राकृतिक कारणों से वन्य जीवों के विलुप्त होने की प्रथम ज्ञात घटना डायनासोरों से संबंधित है जो 7 करोड़ वर्ष पूर्व घटित हुई थी। इसके बाद के काल में मैमथ और मेस्टाडोन जैसी जीव प्रजातियां विलुप्त हुईं।

भारत में भी वन्य स्तनधारियों की लगभग 80, वनस्पतियों की लगभग 95, सरीसृपों तथा उभयचरों की लगभग 15 प्रजातियां लुप्त हो चुकी हैं। अब तक देश के कुल 714 जीव जन्तु विलप्त हो चुके हैं एवं लगभग 22790 प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं। पहले भारतीय प्रजाति का बब्बर शेर देश के कई जंगलों में पाया जाता था किन्तु अब ये गुजरात के गिरवन में थोड़ी सी संख्या में सिमट गए हैं। 

भारत में चीता, लघु आकार का गैंडा, गुलाबी सिर वाली बतख, पहाड़ी बटेर, साइबेरियन बाघ, काला भालू, सुनहरा लंगूर, सुनहरा गरुड़ इत्यादि पूरी तरह विलुप्त हो चुके हैं। इसी प्रकार भारत में अभ्र तेंदुआ एवं हिमालय का हिम तेंदुआ, गैंडा, हाथी, जंगली भैंसें, रीछ, गिब्बन, शेरपुच्छ बंदर, कश्मीरी हिरण या बारहसिंघा, कस्तूरी मृग, सांभर, झाबर हिरण, मूस हिरण, चीतल, भरल, नील गिरी ताहर, गौर श्याम कुरंग, सेही, मूरा-सिंगा हिरण, लोरिस, चौसिंघा, जंगली गधा, कृष्णा सागर भारतीय सारंग, समुद्री गरुड़, भुजंगा, धनेष, हुकना, अजगर, लाल एवं चिंत्रक कंटमृग, भारतीय पनचिरा विषैले सर्प, घड़ियाल, कछुवे एवं मगरमच्छ आदि विलुप्ति के कगार पर हैं। देश से गिद्धों का लगभग सफाया हो चुका है। उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में इन्हें इका-दुक्का ही देखा जा सकता है। चीलों की संख्या में भी कमी देखी जा रही है। 

वन्य जीवों के विनाश के लिए मानव जनित कारण सर्वाधिक उत्तरदायी है। तीव्र गति से बढ़ते औद्योगिकीकरण, प्राकृतिक स्थलों के विनाश, प्राकृतिक संसाधनों के अविवेकपूर्ण दोहन के कारण वन्य जीवों के प्राकृतिक आश्रय स्थलों में निरंतर कमी आ रही है जिसके कारण आज वन्यजीवों की असंख्य प्रजातियां संकटग्रस्त हो गयी हैं। इसके अतिरिक्त मनोरंजन, भोजन, तथा वन्यजीवों के अंगों के व्यापार के उद्देश्य से किए जाने वाले शिकार के कारण भी कई वन्य जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ा हुआ है। हिरण, मोर, सारस, बत्तख जंगली सूअर का शिकार आज भी लोग मांस भक्षण के लिए करते 

“जैव विविधता के महत्त्व तथा पारिस्थितिक तंत्रों के अनुरक्षण के प्रति देश के हर नागरिक को जागरूक होना होगा।”

भारतीय संविधान के भाग 4 के अनुच्छेद 48(क) में राज्य को पर्यावरण के संरक्षण तथा वन्य जीवों की रक्षा करने का निर्देश दिया गया है। इसी प्रकार अनुच्छेद 51(क)(छ) में वन्य जीव की रक्षा करना भारतीय नागरिक का मूल कर्त्तव्य बताया गया है। भारत में वन्य जीव संरक्षण की दिशा में पहली बार सरकारी स्तर पर 1952 में विचार किया गया । 1952 में 1894 से चली आ रही वन नीति के संशोधन के समय भारत की दुर्लभ वन्य जीव प्रजातियों की सूची तैयार की गयी। इस सूची में 13 वन्य जीव प्रजातियों को दुर्लभ बताया गया था। 1960 में पशुओं पर अत्याचार की रोकथाम के लिए कानून बनाया गया तथा पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के अधीन एक पशु विकास बोर्ड का गठन किया गया। वन्य जीव संरक्षण की दिशा में सरकारी स्तर पर वास्तविक शुरुआत 1972 में भारतीय वन्य प्राणी (संरक्षण) अधिनियम (Indian Wildlife (Protection) Act) के साथ ही हो सकी। इस अधिनियम में देश के दुर्लभ तथा संकटग्रस्त वन्य जीवों की सूचियां बनाकर उन्हें कानूनी रूप म संरक्षित घोषित किया गया। 2 अक्टूबर, 1991 को इस अधिनियम में संशोधन कर अधिनियम का उल्लंघन करनेवालों को सीधे अभियाजित करने का प्रावधान किया गया। अधिनियम की धारा 9 के अनुसार अधिनियम की सूची संख्या 1 से 4 तक में उल्लिखित वन्य जीवों के शिकार को अवैध ठहराया गया तथा दोषी व्यक्ति को कठोर सजा देने का प्रावधान रखा गया। इसके साथ ही वर्ष 2006 में 1972 के अधिनियम में संशोधन कर केन्द्र सरकार को राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के गठन का अधिकार दिया गया। साथ ही राज्य सरकारों को प्राधिकरण के सहयोग के लिए एक संचालन समिति के गठन का निर्देश दिया गया है जो बाघ संरक्षण प्राधिकरण को कार्यात्मक सहयोग देगी। अधिनियम के अंतर्गत 25 सदस्यीय प्राधिकरण का गठन किया जा चुका है तथा कुछ राज्यों में समितियों का गठन भी हो चुका है। 

भारत में वन्य जीव संरक्षण की दिशा में पहली परियोजना | 1970 में भारतीय वन्य प्राणी बोर्ड द्वारा बाघ परियोजना के नाम से | शुरू की गयी थी। वर्तमान में इस परियोजना के अंतर्गत देश के 17 | राज्यों में कुल 29 बाघ अभयारण्यों की स्थापना की जा चुकी है। कुल 38620 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले इन बाघ अभयारण्यों में नागार्जुन सागर श्री सैलम (आंध्र प्रदेश) सबसे बड़ा बाघ अभयारण्य है। सर्वाधिक बाघ अभयारण्य (पांच) मध्य प्रदेश में हैं। ये सभा भयारण्य राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के अधीन हैं। 

बाघों की घटती संख्या से चिंतित पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा देश में नये बाघ अभयारण्यों की स्थापना की ओर ध्यान का किया गया है, वहीं देश के अनेक हिस्सों में बाघों एवं अन्य जीवों के संरक्षण के लिए अनेक योजनाएं-परियोजनाएं प्रचालित की जा रही हैं। 

वन्य जीव संरक्षण की दिशा में विशेष प्रयास करते हुए भारत में राष्ट्रीय उद्यान तथा अभयारण्यों का पिछले दो दशक में तेजी से विकास किया गया। राष्ट्रीय उद्यानों एवं अभयारण्यों में वन्य जीवों की कई दुर्लभ प्रजातियां पायी जाती हैं। जम्मू-कश्मीर के डाचीगांव राष्ट्रीय उद्यान में पाया जाने वाला हांगुल विश्व भर में कहीं नहीं पाया जाता। यूरोपीय रेन डियर प्रजाति का यह हिरण अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति एवं प्राकृतिक संरक्षण संघ की रेड डाटा बुक के अनुसार संकटग्रस्त वन्य प्राणी है। हांगुल के संरक्षण के लिए 1970 में प्रोजेक्ट हांगुल की शुरुआत की गयी थी। दक्षिण भारत के कई राज्यों में वन्य जीवों के संरक्षण हेतु राष्ट्रीय उद्यान एवं अभयारण्यों का विकास किया गया। कर्नाटक राज्य के बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान, तमिलनाडु में मधुमलाई अभयारण्य, नागरहोल उद्यान तथा केरल में वाइनाड अभयारण्य की स्थापना की गयी। भारत के केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान विश्वविख्यात जल पक्षी आश्रय स्थल है। इस राष्ट्रीय उद्यान में देश तथा विदेश के पक्षी समय-समय पर आते हैं। दुर्लभ साइबेरियन सारसों का यह एकमात्र आश्रय स्थल है। 

राजस्थान के थार रेगिस्तान में 3000 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैला राष्ट्रीय उद्यान स्थानीय वन्यजीवों के लिए आश्रय स्थल है। असम में ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर स्थित काजीरंगा उद्यान तथा अरुणाचल प्रदेश में स्थित नमदाफा अभयारण्य अनेक वन्य जीवों के लिए आवास प्रदान करता है। केवलादेव पक्षी विहार (राजस्थान), जलदापारा अभयारण्य (प. बंगाल) गिंडी राष्ट्रीय पार्क (चेन्नई) बांदीपुर राष्ट्रीय पार्क, (कर्नाटक), कालाडांडा अभयारण्य (तमिलनाडु), काजीरंगा राष्ट्रीय पार्क (असम) आदि अनेक राष्ट्रीय पार्क और अभयारण्यों की । स्थापना देश में की गयी है। 

जहां तक देश में वन्य जीव संरक्षण का प्रश्न है, भारत में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 एक व्यापक एवं संपूर्ण केंद्रीय कानून है परंतु व्यावहारिक रूप से इस कानून का कोई । प्रभाव नहीं रह गया है। इस अधिनियम में वन्य जीवों के शिकार के लिए कठोर सजा का प्रावधान किया गया है, परंतु वन्य जीवों के प्रति हमारे समाज में जागरूकता के अभाव के कारण यह अधिनियम प्रभावकारी नहीं हो पा रहा है। 

मूक, निरीह और संकोची स्वभाव के वन्य जीवों की रक्षा के लिए देश के हर नागरिक को आगे आना होगा। जैव विविधता के महत्त्व तथा पारिस्थितिक तंत्रों के अनुरक्षण के प्रति देश के हर नागरिक को जागरूक होना होगा। पर्यावरण, वन एवं वन्य जीव तीनों की रक्षा तभी हो सकती है जब स्थानीय निवासी इसके प्रति व्यक्तिगत रूप से जागरूक हों। इसके लिए हमें वनों को बचाना होगा, क्योंकि वन्य जीवों का अस्तित्व इन्हीं वनों पर निर्भर करता हैं|

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