भारत में जल संकट पर निबंध | Essay on Water Crisis in India

भारत में जल संकट पर निबंध

भारत में जल संकट पर निबंध अथवा निरंतर घटता जलस्तर और जल प्रदूषण की समस्याएं (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2006) अथवा पेयजल संकट और हम अथवा जल है तो कल है 

अथर्ववेद में जल की महत्ता को कुछ इस प्रकार बताया गया है-

“वर्षेण भूमिः पृथिवी वृतावृता

सानो दधातु भद्रया प्रिये धामनि-धामनि।” 

यानी भूमि की समरसता के लिए जल का संतुलन आवश्यक है। इससे पृथ्वी पर हरितिमा छायी रहती है, वातावरण में उत्साह बना रहता है तथा सभी प्राणियों का जीवन सुखमय तथा आनंदमय बना रहता है। 

निःसंदेह जल और जीवन एक-दूसरे के पर्याय हैं। जल के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। हमारे वेद-शास्त्र आदि जल की महत्ता से भरे पड़े हैं। दुख का विषय यह है कि हमने जल की इस महत्ता को समझने में भूल की और इसके संरक्षण और संतुलन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। परिणाम सामने है। न सिर्फ | भारत, बल्कि समूचा विश्व जल संकट से जूझ रहा है। यहां तक कहा जा रहा है कि अगला विश्वयुद्ध जल को लेकर होगा। हमने अपनी अतिवादी हरकतों से जहां जल के परंपरागत स्रोतों को नष्ट किया, वहीं जीवनदायिनी नदियों को प्रदूषित भी किया। नदियां न तो निर्मल ही रहीं और न ही अविरल। भू-गर्भीय जल का न सिर्फ जमकर दोहन किया, बल्कि उसे दूषित भी किया। हम अपने कृत्यों से बाज नहीं आए और जल की समस्या विकराल होती चली गई। जल के अमृत तत्वों में जहर घोल कर हमने जल संकट के साथ-साथ जल-जनित बीमारियों को भी दावत दी। भूजल में बढ़ते आर्सेनिक, फ्लोराइड एव यूरेनियम जैसे तत्वों ने इसे विषाक्त बना दिया है। भूजल पीने लायक नहीं रहा, किंत् मजबरी में लोगों को पीना पड रहा है, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को। दूषित जल के सेवन से ग्रामीण आबादी में पीलिया, मियादी बुखार, हैजा, डायरिया, क्षय रोग, पेचिश एवं इन्सेफ्लाइटिस जैसी बीमारियां बढ़ी हैं। रासायनिक उर्वरक आधारित कृषि व उद्योगों से भी भूजल दूषित हुआ है। 

“निःसंदेह जल और जीवन एक-दूसरे के पर्याय हैं।” 

हमारे रीति-कालीन कवि रहीम कितने दूरदर्शी थे। तब न तो इतनी जनसंख्या थी और न ही भौतिकता का यह आलम था, तथापि उन्होंने जल की महत्ता को बताते हुए कहा था –

“रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून 

पानी गए न ऊबरै मोती, मानुस, चून।” 

सचमुच, पानी के बिना सब सूना है। हमें जीवन के हर क्षेत्र में पानी की आवश्यकता है। पीने के लिए पानी चाहिए, खाना पकाने के लिए पानी चाहिए, खेतों की सिंचाई के लिए पानी चाहिए, उद्योग-धंधों और कल-कारखानों को चलाने के लिए भी पानी चाहिए। कहां तक गिनाया जाए, पानी के बिना तो प्रकृति का अस्तित्व भी संभव नहीं है। जीवन और प्रकृत्ति के अस्तित्व और संतुलन के लिए जल आवश्यक तत्व है। सिर्फ इंसान ही नहीं, पशु-पक्षी और मशीनें तक जल पर निर्भर करती हैं। 

एक तरफ तो दिनों-दिन जल की जरूरत बढ़ती जा रही है, तो दूसरी तरफ जल-स्रोत अत्यधिक दोहन के कारण जवाब दे रहे हैं। जीवनदायिनी नदियां जिन्हें ‘लाइफ-लाइन’ कहा जाता है, प्रदूषण के कारण विषैली हो चुकी हैं। तलाब, पोखर, कुएं, बावली जैसे परम्परागत जल-स्रोतों को या तो हमने नष्ट कर दिया या इतना क्षित कर दिया कि उनका जल उपयोग लायक नहीं रहा। भूमिगत जल का हमने इस कदर दोहन किया कि जल स्तर खतरनाक स्तर तक नीचे चला गया। पुनर्भरण पर ध्यान न देने के कारण नलकूप और हैंडपंप सूखते चले गए। आज स्थिति यह आ पहुंची है कि उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान व तमिलनाडु जैसे देश के अनेक प्रदेशों में कुछ इलाके ऐसे हैं, जहां धरती की कोख सूख चुकी है। इतना ही नहीं, भूमि के नीचे का मीठा पानी भी कम हुआ है और उसमें लवणीयता बढ़ी है। कुल मिलाकर स्थिति अत्यंत भयावह बन चुकी है। लोगों को मीलों दूर से पीने योग्य पानी ढोकर लाना पड़ता है। शहरों में लोग पानी के लिए रतजगा करते हैं। मारपीट का कारण भी जल की कमी बनता है। कहने का आशय यह है कि स्वच्छ पेयजल एवं सुलभ पेयजल लोगों के मुंह से छिनता जा रहा है। 

आज स्थिति यह बन गई है कि भारत में मांग के अनुरूप जल की उपलब्धता नहीं है। आने वाले दिनों में यह समस्या और विकराल होगी। गौर-तलब है कि भारत में सन् 1947 में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 6000 घनमीटर थी, जो कि सन् 2001 में घर 1829 रह गई। यदि इसी अनुपात में उपलब्धता घटती रही तो 2017 तक प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता मात्र 1600 घनमी ही रह जायेगी। भारत में वर्षा जल की स्थिति भी समान नहीं है। काम प्रधान देश होने के कारण हमें मानसून पर निर्भर रहना पड़ता है। मानसून कमजोर पड़ने या सूखा पड़ने पर स्थिति और विकट हो जाती है। वर्षा जल के अभाव में भू-गर्भीय जल का स्तर और घटने लगता है। भारत में औसत वार्षिक वर्षा तकरीबन 115 सेमी होती है। विडंबना यह है कि क्षेत्रवार इसमें समानता नहीं है। जहां चेरापंजी जैसे क्षेत्रों में अतिवष्टि होती है, वहीं राजस्थान में नाममात्र की वर्षा होती है। वर्षा का समान वितरण न होने के कारण जल संकट और गहराता है। हमारी अब तक की तीनों राष्ट्रीय जल नीतियों (वर्ष 1987, 2002 एवं 2012) पेयजल को सर्वोच्च वरीयता दिए जाने के बावजूद पीने के पानी की किल्लत कम नहीं हो पाई है। यदि पीने का पानी उपलब्ध भी है, तो वह साफ नहीं है। वर्तमान में भारत की 85% ग्रामीण आबादी स्वच्छ पेयजल से वंचित है। भारत की कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था की जनसंख्या का लगभग दो-तिहाई भाग खेती पर निर्भर है। स्थिति यह है कि देश की वर्तमान जल की माग सिंचाई की आवश्यकताओं के लिए अधिक है। इसमें सतही जल का 89 प्रतिशत तथा भू-गर्भीय जल का 92 प्रतिशत जल इस्तेमाल किया जाता है। कुल जल उपयोग में कृषि सेक्टर का भाग दूसर सेक्टरों से अधिक है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि आन वाले दिनों में आबादी बढ़ने के साथ औद्योगिक व घरेलू क्षेत्रों में जब की मांग और बढ़ेगी। तब समस्या की विकरालता क्या होगी, अनुमान लगा सकते हैं। 

बढ़ते जल संकट के कई कारण हैं। इनके लिए कहीं न कहीं जिम्मेदार हम भी हैं। जनसंख्या की स्थिति विस्फोटक है, वक्षों का रोपण बहुत कम होता है, उनकी कटाई ज्यादा की जाती है। नगरीकरण में बेतहाशा वृद्धि हो रही है, तो औद्योगीकरण भी अनियंत्रित गति से बढ़ रहा है। वर्षा का स्तर निरंतर घट रहा है। जल के संरक्षण और उसकी निर्मलता के प्रति हम सजग नहीं हैं। भू-जल का अंधाधुंध दोहन तो जारी है, मगर पुनर्भरण के पुख्ता इंतजाम नहीं किए जा रहे हैं। परंपरागत जल स्रोतों की हमने न सिर्फ उपेक्षा की है, बल्कि उन्हें नष्ट कर या तो उन पर इमारतें बना ली या खेती-बाड़ी शुरू कर दी। कृषि में जल का उपयोग भी बढ़ा है। इसके साथ ही जीवन-शैली में बढ़ती विलासिता और आधुनिकता ने भी पानी की खपत को बढ़ाया है। इन सारी बातों का मिश्रित प्रभाव सामने है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि देश के कई क्षेत्रों में लोग बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं। यदि हम अब भी न चेते तो आने वाले दिन बहुत भारी गुजरेंगे। 

“विलासिता, आधुनिकता व भोगवादी शैली को तिलांजलि देनी होगी। अपनी स्वार्थी व आत्म-केन्द्रित प्रवृत्तियों से उबरकर जल और प्रकृति से प्रेम को बढ़ाना होगा।” 

देश में बढ़ते हुए जल संकट के निवारण में सरकारी स्तर पर सकारात्मक व व्यावहारिक पहल होती नहीं दिखती है। अमूमन इस तरह की समस्याओं से सरकार का रिश्ता नाजक ही रहा है। यादगार तो पाएंगे कि आजादी के बाद से अब तक जल प्रदाता के रूप में सरकार की भूमिका संतोषजनक नहीं रही है। हालांकि कुछ प्रयास किए गए। मसलन वर्ष 2007 को जल वर्ष घोषित किया गया। वर्ष 1974 में जल अधिनियम (प्रदूषण की रोकथाम तथा नियंत्रण) तथा 1985 में पर्यावरण (प्रतिरक्षण) अधिनियम बनाए गए, मगर ये प्रभावी नहीं रहे। कारण एक तो जन-चेतना के स्तर पर इन्हें सहयोग नहीं मिला, दूसरे पारदर्शिता और इच्छा-शक्ति के मामले में सरकार भी फिसड्डी साबित हुई। जल स्रोतों के न्यायोचित विदोहन एवं समान वितरण के लिए वर्ष 1987 में पहली राष्ट्रीय जल नीति पर अमल किया गया। इस नीति में पहली बार परियोजनाओं का आयोजन एवं उनका ढांचा तैयार करने तथा उन पर अमल करने के लिए समेकित तथा बहुविभागीय दृष्टिकोण अपनाया गया। दूसरे वर्ष 2002 में केंद्र सरकार द्वारा दूसरी राष्ट्रीय जल नीति की घोषणा की गई। इसमें जल को राष्ट्रीय परिसंपत्ति घोषित करते हुए जल आवंटन की प्राथमिकताओं को जिस क्रम में तय किया गया, वह इस प्रकार है-पेयजल, सिंचाई, जल विद्युत, कृषि उद्योग, गैर-कृषि उद्योग, नौकायन व अन्य। इसी क्रम में वर्ष 2012 में तीसरी राष्ट्रीय जलनीति को अंगीकृत किया गया, जिसे राष्ट्रीय, राज्य स्तरीय, क्षेत्रीय एवं स्थानीय संदर्भो को ध्यान में रखकर एकीकृत परिप्रेक्ष्य में तैयार किया गया। इस नीति के तहत देश की वृद्धिमान जनसंख्या और जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों के संदर्भ में जल के संरक्षण तथा विभिन्न हितधारकों एवं प्रयोक्ता समूहों के मध्य समन्वय पर जोर दिया गया। ‘राष्ट्रीय जल नीति, 2012’ के अनुसार जल संरक्षण और इसके समुचित एवं असल उपयोग को बढ़ावा देने के लिए जल को उच्च प्राथमिकता  वाले क्षेत्रों (यथा-पेयजल, सफाई. अन्य घरेल आवश्यकताआ, खाद्य सुरक्षा आदि) में आवंटित किए जाने के बाद ‘आर्थिक वस्त’ माने जाने पर बल दिया गया। इन सबके बावजूद नतीजा ढाक के तीन पात वाला ही रहा। जल समस्या से जुड़ी स्थितियां बद से बदतर होती चली गईं। सिर्फ जल संकट ही नहीं बढ़ा, बल्कि जल-जनित बीमारियां और इससे जुड़ी अन्य समस्याओं में भी इजाफा हुआ। 

जल संकट का समाधान सरकारी स्तर पर तो संभव नहीं दिखता है, क्योंकि सरकारी योजनाओं-परियोजनाओं की सफलता भ्रष्टाचार व लचर व्यवस्था के इस युग में संदिग्ध है। अभी हाल ही में चेन्नई शहर गंभीर जल संकट का शिकार हआ। विदित हो कि जल समस्या के निवारण के लिए जन-भागीदारी और जन-चेतना अत्यंत आवश्यक है। हमें ऐसी समस्याओं के निवारण के लिए जल-क्रांति लानी होगी। पानी की महत्ता को समझना होगा तथा जागरूक होना पड़ेगा। वेदों-शास्त्रों में जल की शुचिता और संरक्षण के जो उपाय बताए गए हैं, उनकी तरफ लौटना होगा। यह तभी संभव है, जब आम आदमी जागे और स्वयं सेवी संस्थाएं आगे आएं। भारत सरकार ने जल संकट को ध्यान में रखते हुए मई, 2019 में जलशक्ति मंत्रालय का गठन किया। ध्यातव्य है कि इस मंत्रालय की जिम्मेदारी गजेंद्र सिंह शेखावत को दी गई। 

जल की जो आज अल्पता है तथा जो दुर्गति इसकी हुई है, का जिम्मेदार भी हम ही हैं और हम ही अपने प्रयासों से इस त्यास उबर सकते हैं। सबसे पहले तो हमें बढ़ती जनसंख्या पर लगाम कसनी होगी, क्योंकि यह अनेक समस्याओं की जननी है। वृक्षों की अंधा-धुंध कटाई को रोककर अधिकाधिक वृक्षारोपण का तरफ ध्यान देना होगा। वृक्षों की खेती को भी बढ़ावा देना होगा। औद्योगीकरण व नगरीकरण को नियंत्रित करना होगा तथा सुचिंतित कार्य-योजनाएं बनाकर जल की एक-एक बूंद का संचय करना होगा। 

विलासिता, आधुनिकता व भोगवादी शैली को तिलांजलि देनी होगी। अपनी स्वार्थी व आत्म-केन्द्रित प्रवृत्तियों से उबरकर जल और प्रकृति से प्रेम को बढ़ाना होगा। इनके प्रति संवेदना पैदा करनी होगी तथा इसकी महत्ता और कीमत को समझना होगा। भू गर्भीय जल के दोहन को कम कर इसके स्तर को बढ़ाने के लिए पुनर्भरण की व्यवस्था बनानी होगी। न सिर्फ शहरी क्षेत्रों में बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य रूप से अपनाना होगा। कृषि कार्यों में भी इस प्रकार की व्यवस्था अपनानी होगी कि पानी बर्बाद न हो तथा कम से कम पानी में काम चले। घरेलू उपयोग में भी पानी की मितव्ययता पर ध्यान देना होगा। परंपरागत जल स्रोतों को न सिर्फ पुनर्जीवित करना होगा, बल्कि इनकी सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान देना होगा। वर्षा जल के संग्रहण एवं संरक्षण के व्यापक उपाय करने होंगे। नदियों की साफ-सफाई पर तो विशेष ध्यान देना ही होगा, उन उद्योगों और कारखानों पर भी निगरानी रखनी होगी, जो न सिर्फ नदियों को विषैला करते हैं, बल्कि भू-गर्भीय जल का दोहन कर उसे दूषित भी करते हैं। सरकार पर निर्भरता कम कर जनता को स्वयं आगे आना होगा। पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए यह भी आवश्यक है कि समुद्रतटीय एवं अन्य जल एकत्रण क्षेत्रों को उपयोग लायक बनाने क लिए बेहतर तकनीक एवं प्रबंधन का विकास किया जाए। साथ ही यह भी आवश्यक है कि सामुदायिक भागीदारी से जलापूर्ति की निगरानी, प्रबंधन एवं नियंत्रण स्थापित किया जाए।

यदि हम तहेदिल से छोटे-मोटे प्रयास करें तो बड़ा बदलाव ला सकते हैं। वर्षा जल को कुओं, गड्ढों, पोखरों आदि में एकत्र कर जल स्तर को बढ़ा सकते हैं। गांवों, कस्बों में नये तालाब खोदकर उनमें जल संग्रह किया जा सकता है। जल जीव इस पानी को कदरती तौर पर साफ भी रखते हैं। घर की छतों पर भी वर्षा जल को एकत्र कर | सकते हैं। हमें जल की हर बूंद की कीमत को समझते हुए हर स्तर से | इसकी बर्बादी को रोकना होगा। ये सारे प्रयास हमें ही करने होंगे। 

बिना जन-भागीदारी व जन-चेतना के जल संकट का समाधान संभव नहीं है। हमें कमर कसनी होगी, सरकार को जागना होगा, स्वयं सेवी संस्थाओं व प्रकृति और पर्यावरण से प्रेम करने वालों को आगे आना होगा। जल और जीवन के रिश्ते को प्रगाढ़ बनाए रखने के लिए मिले-जुले प्रयास आवश्यक हैं। प्रयासों में पारदर्शिता होगी, इच्छाशक्ति होगी, तभी जल बचेगा और जब जल बचेगा तभी जीवन भी संभव हो पाएगा। हमें यह याद रखना होगा कि ‘जल है तो कल है’। कितना मौजूं है जल संकट पर यह शेर- 

सारे जग की प्यास बुझाना इतना आसां काम नहीं,

बादल को भी भाप में ढलकर पानी बनना पड़ता है। 

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