गांव का धोबी पर निबंध-Essay on Village Washerman

गांव का धोबी पर निबंध

गांव का धोबी पर निबंध

जिस प्रकार निंदक बिना साबुन और पानी के सहारे मन को निर्मल करते हैं, उसी प्रकार साबुन एवं जल के साथ ही सही, मैं भी लोगों के गंदे कपड़ों को निर्मल करने वाला धोबी हूं। मैं कपड़े धोने में जात-पांत तथा ऊंच-नीच का भेदभाव नहीं रखता। एक हरिजन और एक ब्राह्मण के गंदे कपड़े मेरे लिए समान हैं। इस प्रकार मेरे व्यवसाय से समाजवाद की सुगंध आती है। 

मेरी दिनचर्या अस्त-व्यस्त रहती है। गांव-गांव एवं घर-घर घूम-घूमकर मैं गंदे कपड़े एकत्रित करता हूं। इसे गांव के समीप स्थित नदी या तालाब के किनारे धोने के लिए ले जाता हूं। इन किनारों को ‘धोबी घाट’ कहा जाता है। जहां नदी और तालाब नहीं होते, वहां मैं यह कार्य कुएं अथवा नल के पानी से करता हूं। साफ कपड़े पर इस्तिरी करके मैं नियत समय के अंदर लोगों तक पहुंचाता हूं। विलंब होने पर मुझे ग्राहकों का कोपभाजन बनना पड़ता है। इससे प्राप्त पारिश्रमिक से ही मैं अपने परिवार का भरण-पोषण करता हूं। इस कार्य में सिर्फ गधा ही मेरा साथी है। जेठ की दोपहरी हो या माघ की सर्दी-गधा गंदे कपड़ों को घर से घाट एवं साफ कपड़ों को घाट से घर तक पहुंचाता है। 

ग्रामीण इलाकों में मेरा काम शहरों की अपेक्षा कठिन होता है। यहां धोने के लिए शहरों की भांति अच्छे किस्म के साबुन, पाउडर और मशीन उपलब्ध नहीं हैं। गांव में गंदे कपड़ों को सोडा और जल के साथ भट्टी में खौलाकर घाट पर पटक-पटककर साफ करता हूं। इससे कपड़ों के फटने की संभावना रहती है। यह मैं शौक से नहीं, अपितु आर्थिक मजबूरी में करता हूं। सरकार द्वारा धन मिलने से मेरी जर्जर माली हालत एवं कपड़े धोने की घटिया विधि में सुधार हो सकता है। जिस प्रकार मैं समाज की गंदगी से घृणा नहीं करता हूं, उसी प्रकार समाज को भी मुझसे घृणा नहीं करनी चाहिए। मैं भी समाज का एक महत्वपूर्ण अंग हूं। आचार्य शिवपूजन सहाय ने तो मेरी तुलना भगवान से की है। उनके अनुसार मैं गंदगी धोता हूं, जबकि भगवान पाप धोते हैं। 

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