ग्रामीण मेले पर निबंध-Essay on Village fair in Hindi

ग्रामीण मेले पर निबंध-

ग्रामीण मेले पर निबंध Essay on Village fair in Hindi

बाह्य रूप से ग्रामीण मेला और हाट में कोई अंतर नहीं दिखता, लेकिन दोनों के आयोजन के मूल में भिन्नता है। हाट लोगों की दैनिक जरूरतों की पूर्ति के लिए सप्ताह में एक या दो दिन लगाया जाता है, जबकि मेले सामाजिक एवं धार्मिक अवसरों पर लगाए जाते हैं। उदाहरण के लिए छठ के अवसर पर लगने वाला मेला ‘छठ मेला’ तथा रामनवमी के अवसर पर लगने वाला ‘रामनवमी मेला’ कहलाता है। इसी तरह दशहरा, दीपावली एवं मकर संक्रांति के अवसर पर भी मेलों के आयोजन होते हैं। ग्रामीण मेला एक दिन का भी होता है और महीने भर का भी होता है। गांव में मेले के लिए एक निर्धारित स्थल होता है। हमारे गांव में जो मेला स्थल है, वहीं ग्रामीण मेला लगता है। 

मेरे आवास के समीप ही यमुना और दरघी नदी का संगम-स्थल है। यह स्थल चौरस और काफी विस्तृत है। यहां शिव, दुर्गा, राम और हनुमान जी के भव्य मंदिर हैं, जिनसे यहां का वातावरण हमेशा धार्मिक बना रहता है। मैदान के चारों ओर हरे-भरे वृक्ष हैं, जो इस स्थान की प्राकृतिक सुंदरता में चार चांद लगाते हैं। कुल मिलाकर यह स्थान मेलों के आयोजन के लिए उपयुक्त है। 

दशहरे के एक-दो दिन पूर्व ही यहां दुकानदारों का जमघट प्रारंभ हो जाता है। सरकार की ओर से बिजली, पेयजल एवं पुलिस की व्यवस्था की जाती है। इस मेले में कपड़े, बरतन, मिट्टी एवं काठ के सामान, स्त्रियों के श्रृंगार प्रसाधन 

और बच्चों के खिलौने आदि की दुकानें लगाई जाती हैं। बच्चों के मनोरंजन के लिए मेले में कहीं तेज-तर्रार बंदरिया चाची नाचती रहती हैं, तो कहीं काले कलूटे भीमकाय भालू काका अपना करतब दिखाते रहते हैं। झूले और काठ के घोड़े भी बच्चों के आकर्षण के केंद्र होते हैं। इसके अतिरिक्त ग्रामीण मेलों में अखाड़ों की कुश्तियां एवं लोकसंगीत गाती ग्रामीण मंडलियां नौजवानों को अपनी तरफ आकर्षित किए रहती हैं। दशमी की संध्या में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद का वध तो मेले का मुख्य आकर्षण होता है। इस दृश्य को देखने के लिए ग्रामीणों की अपार भीड़ उमड़ पड़ती है। इन पुतलों के दहन के साथ ही मेले का समापन हो जाता है और लोग हंसते-खेलते, नाचते-गाते अपने-अपने घरों की ओर लौट पड़ते हैं। 

 ग्रामीण मेलों से हमें अनेक लाभ हैं। मेले में लोगों की अपने मित्रों एवं संबंधियों से भेंट होती है। वे एक दूसरे के सुख-दुख से अवगत होते हैं। मेले में लगी विभिन्न प्रकार की प्रदर्शनियों से ज्ञानार्जन होता है, साथ ही स्वस्थ मनोरंजन भी होता है। ये मेले हमारी संस्कृति के प्रतीक हैं। अत: इनके मूल स्वरूप की रक्षा होनी चाहिए। मेलों को अधिक से अधिक उपयोगी एवं मनोरंजक बनाने की  दिशा में सरकार को सचेष्ट रहना चाहिए।

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