पुस्तकालय की उपयोगिता पर निबंध-Essay on Utility of Library

पुस्तकालय की उपयोगिता पर निबंध

पुस्तकालय की उपयोगिता पर निबंध-Essay on Utility of Library

किसी भी व्यक्ति, जाति अथवा देश के भौतिक एवं सांस्कृतिक उत्थान के लिए शिक्षा की अत्यंत आवश्यकता होती है। शिक्षा के अभाव में व्यक्ति का न तो मानसिक एवं बौद्धिक विकास संभव है और न ही वह भौतिक संपन्नता प्राप्त कर सकता है। शिक्षा मनुष्य के आंतरिक गुणों को विकसित करके उसे सुसंस्कृत तथा सभ्य बनाती है। इसके बिना मनुष्य का जीवन पशु के समान होता है। इस संबंध में संस्कृत की निम्नवत उक्ति अक्षरशः सत्य है-

साहित्य संगीत कला विहीनः। 

साक्षात् पशुः पुच्छ विषाण हीनः॥

वस्तुतः शिक्षा, ज्ञान एवं विद्या के प्रसार का महत्वपूर्ण साधन पुस्तकालय है। छात्र और अध्यापक दोनों पुस्तकालय का उपयोग करके विद्या एवं ज्ञान का नवीन आलोक प्राप्त करते हैं। अतः पुस्तकालय ही सरस्वती का सच्चा मंदिर है। पुस्तकालय वह साधना स्थल है, जहां पर विभिन्न प्रकार की कृतियों का संग्रह होता है और विद्यार्थी उनसे व्यापक ज्ञान प्राप्त करता है। इससे मनुष्य को अपने जीवन के अशांत एवं संघर्षमय क्षणों में शांति मिलती है। 

पुस्तकालय कई प्रकार के होते हैं। प्रथम प्रकार के पुस्तकालय वे हैं, जो हमारे स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में स्थापित होते हैं। सामूहिक जन कल्याण की दृष्टि से इन पुस्तकालयों का कार्यक्षेत्र सीमित होता है। उनसे केवल छात्र तथा अध्यापक ही लाभान्वित होते हैं। इन पुस्तकालयों से छात्रों को शिक्षा प्रसार और ज्ञान वृद्धि में पर्याप्त सहायता मिलती है। विशेषकर निर्धन विद्यार्थियों के लिए ये बहुत सहायक सिद्ध होते हैं। 

दूसरे प्रकार के पुस्तकालय व्यक्तिगत अथवा निजी पुस्तकालय होते हैं। विद्याप्रेमी धनवान लोग हजारों रुपये व्यय करके अपनी रुचि और आवश्यकता के अनुसार पुस्तकों का संग्रह करते हैं। इन पुस्तकालयों में प्राचीन तथा अर्वाचीन साहित्य एकत्रित किया जाता है। इनसे वह और उनके निकटतम व्यक्ति लाभ उठाते हैं। तीसरे प्रकार के पुस्तकालय राजकीय पुस्तकालय होते हैं, जिनकी आर्थिक दशा अच्छी होती है। परंतु इनसे जन-साधारण को कोई विशेष लाभ नहीं पहुंचता, क्योंकि ये उनकी सीमित पहुंच के बाहर होते हैं। 

चौथे प्रकार के पुस्तकालय सार्वजनिक होते हैं। इनसे सभी लोग लाभ उठा सकते हैं। कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छानुसार इस पुस्तकालय की पुस्तक वहां बैठकर पढ़ सकता है। यहां प्रायः सभी के उपयोग की पुस्तकें उपलब्ध होती हैं। कुछ धनराशि जमा करके यहां से एक निश्चित समय के लिए पुस्तकें घर भी ले जा सकते हैं। पांचवें प्रकार के पुस्तकालय चल-पुस्तकालय होते हैं। इन पुस्तकालयों का स्थान चलती-फिरती गाड़ी में होता है, जो विभिन्न क्षेत्रों में जाकर जनता को नवीन साहित्य का रसास्वादन कराता है। 

पुस्तकालय का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यहां मनुष्य को थोड़े से शुल्क से अधिक पुस्तकें पढ़ने को मिल जाती हैं। यदि वह चाहे तो एक ही विषय से संबंधित अनेक पुस्तकें पढ़ सकता है। दूसरे उसे वहां से प्रत्येक विषय की नवीनतम पुस्तकें मिल सकती हैं। तीसरे उसे किसी भी विषय पर तुलनात्मक अध्ययन करने का अवसर मिल जाता है। इसी कारणवश उच्च कक्षा तथा किसी भी विषय में विशेष योग्यता प्राप्त करने के इच्छुक विद्यार्थी अपना अधिकांश समय ऐसे ही पुस्तकालय में व्यतीत करते हैं। 

पुस्तकालय की उपयोगिता इस बात से भी स्पष्ट हो जाती है कि निर्धन परिवार के जो छात्र-छात्राएं पुस्तकें क्रय करने में असमर्थ होते हैं, वे पुस्तकालय में बैठकर नोट्स तैयार करके अपनी परीक्षा में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। पुस्तकालय मनुष्य में अध्ययन की रुचि बढ़ाता है तथा उनका ज्ञानवर्द्धन करता है। यह हमारे अवकाश के समय का सच्चा साथी है, जो हमें सदुपदेश भी देता है और हमारा मनोरंजन भी करता है। मनोरंजन के अन्य साधनों में धन अधिक व्यय होता है, जबकि यह सबसे सुलभ और सस्ता मनोरंजन है। 

पुस्तकालय का महत्व प्रदर्शित करते हुए महात्मा गांधी ने कहा था, “भारत के प्रत्येक घर में एक पुस्तकालय होना चाहिए। संपूर्ण विकास के लिए यही रामबाण औषधि है। पुस्तकालयों का महत्व देवालयों से भी अधिक है, क्योंकि पुस्तकालय ही हमें देवालय जाने योग्य बनाते हैं।” वास्तव में देश की अशिक्षित जनता को सुशिक्षित बनाने के लिए सार्वजनिक पुस्तकालयों की बहुत आवश्यकता है। हमारी सरकार इनके विकास के लिए प्रयत्नशील है। हमें भी इनके विकास और सुधार की ओर ध्यान देना चाहिए। 

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