समान नागरिक संहिता पर निबंध | समान नागरिक संहिता |एक देश एक कानून पर निबंध | समान नागरिक संहिता पर टिप्पणी |Essay on Uniform Civil Code

समान नागरिक संहिता पर निबंध

समान नागरिक संहिता पर निबंध | समान नागरिक संहिता |समान नागरिक संहिता पर टिप्पणी |Essay on Uniform Civil Code|समान नागरिक संहिता पर लोकतांत्रिक संवाद की जरूरत 

भारतीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली का आधार भारतीय संविधान में उल्लिखित प्रावधान हैं। भारतीय संविधान भारत की वैविध्यपूर्ण संस्कृति एवं विविधता से भरे जनमानस को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अधिकार देता है। मूल मताधिकारों से भरे पड़े इस भारतीय संविधान की कसौटी उसकी प्रस्तावना है जिसमें लोकतंत्र का सार निहित है। साथ ही यह अपने नागरिकों से मूलभूत कर्तव्यों की अपेक्षा करता है जो वास्तव में लोकतंत्र की न केवल जमीन मजबूत करते हैं बल्कि इनसे ही लोकतांत्रिक अभिशासन की कार्यप्रणाली सुचारू ढंग से चलती है। 

“मूल अधिकार वास्तव में राजनीतिक लोकतंत्र के हिमायती हैं जबकि नीति निदेशक तत्व सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र के लिए अभी तक प्रासंगिक हैं। इन्हीं निदेशक तत्वों में अनुच्छेद 44 में वर्णित ‘समान नागरिक संहिता’ का प्रावधान लोकतांत्रिक समाज बनाने हेतु निरंतर अपेक्षित रहा।” 

अधिकारों और कर्तव्यों के अलावा भारतीय संविधान के भाग चार के अनुच्छेद 36 से 51 में राज्य के नीति निदेशक तत्वों का वर्णन है। राज्य को निर्देशित किए जाने वाले ये तत्व वास्तव में सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की उस जमीन को तैयार करने वाले तत्व हैं जिसकी कल्पना भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा में की थी। मूल अधिकार वास्तव में राजनीतिक लोकतंत्र के हिमायती हैं जबकि नीति निदेशक तत्व सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र के लिए अभी तक प्रासंगिक हैं। इन्हीं निदेशक तत्वों में अनुच्छेद 44 में वर्णित ‘समान नागरिक संहिता’ का प्रावधान लोकतांत्रिक समाज बनाने हेतु निरंतर अपेक्षित रहा। भारत सरकार ने इस दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए जुलाई, 2019 में मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) कानून बनाया है जिसके द्वारा तीन तलाक को गैरकानूनी करार दिया गया है। इसी क्रम में भारत सरकार ने अगस्त, 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा दिया है। समय-समय पर ‘समान नागरिक संहिता’ की आवश्यकता न्यायालय और राज्य ने महसूस की है। लेकिन यह भारत की बहुधार्मिक एवं बहुसांस्कृतिक जीवन पद्धतियों के खिलाफ जाती है, ऐसा समान नागरिक संहिता का विरोध करने वालों का कहना है। ध्यातव्य है कि समान नागरिक संहिता से तात्पर्य है कि भारत में निवास करने वाले प्रत्येक नागरिक के लिए एक समान कानून हो, चाहे वह किसी जाति या मजहब का हो। विदित हो कि विधि आयाग न अगस्त, 2018 में पर्सनल लॉ पर एक परामर्श पत्र जारी किया। परामर्श पत्र तलाक, भरण-पोषण, विवाह के लिए न्यूनतम उम्र आदि के आधारों पर चर्चा करता है। समान नागरिक संहिता की अनुशंसा करने के बजाय आयोग पर्सनल लॉ में ‘चरणबद्ध तरीके से बदलाव की अनुशंसा करने के पक्ष में है। गौरतलब है कि 17 जून, 2016 को विधि मंत्रालय ने विधि आयोग से समान नागरिक संहिता को देखने की सिफारिश की थी। 

संविधान के अनुच्छेद 44 के अनुसार राज्य संपूर्ण देश में ‘समान नागरिक संहिता’ लागू करने का प्रयास करेगा अर्थात सभी के लिए निजी कानून एक जैसे होंगे। निजी कानूनों से अभिप्राय ऐसे कानूनों से है जो निजी मामलों में लागू होते हैं जैसे—विवाह, तलाक एवं उत्तराधिकार। भारत में लंबे समय से हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी, सिख, बौद्ध, जैन एवं अन्य समुदायों में भेदभावपूर्ण, दमनकारी, स्त्री विरोधी, गैर मानवोचित एवं अन्यायपूर्ण निजी कानून प्रचलित रहे हैं। वर्तमान में विभिन्न समुदायों में प्रचलित अंधविश्वासों, कुप्रथाओं और रूढ़ियों को हवा देने वाले एवं उनके नाम पर अपनी दुकान चलाने वाले पंडितों, मौलवियों व अन्य धर्म गुरुओं की कमी नहीं है। राजनीतिज्ञ भी इन्हीं की हां में हां निभाते नजर आते हैं। ऐसे में संविधान के व्याख्याकर्ताओं ने समय-समय पर यह जरूरत महसूस की है कि समतामूलक समाज व पंथनिरपेक्ष जीवन पद्धति एवं शासन की स्थापना के लिए ‘समान नागरिक संहिता’ आवश्यक है। 

भारत में अलग-अलग धर्मों में विवाह, तलाक एवं उत्तराधिकार से संबंधित अलग-अलग विधान है। कुछ धर्मों में प्रचलित कुरीतियों एवं रूढ़ियों के खिलाफ लंबे आंदोलन चले हैं, लेकिन कुछ धर्मों के विभिन्न समुदायों में आज भी ऐसे निजी कानून प्रचलित हैं जो मानवीय गरिमा का अपमान करते हैं और समतामूलक समाज के निर्माण में | बाधा बनते हैं। इसलिए पंथनिरपेक्षता के लक्ष्य को प्राप्त करने के | लिए राज्य को धर्म आधारित कानूनों पर युक्तियुक्त बंधन लगाकर | भारत के समस्त नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता की आवश्यकता बनी हुई है। 

भारत सरकार ने इस दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए जुलाई, 2019 में मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) कानून बनाया है जिसके द्वारा तीन तलाक को गैरकानूनी करार दिया गया है। इसी क्रम में भारत सरकार ने अगस्त, 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा दिया है। 

एक समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर संविधान सभा में बोलते हुए संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि हमारे देश में मानवीय संबंधों के प्रायः प्रत्येक पहलू को प्रभावित करने वाले कानूनों की एक समान दंड संहिता है, जो भारतीय दंड संहिता’ एवं ‘अपराध दंड संहिता’ में निहित है। वर्तमान समय में ऐसे बहुत से कानून हैं जो देश के नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं लेकिन विवाह एवं उत्तराधिकार के कानून अलग-अलग धर्मों में अलग-अलग होने की वजह से प्रायः ये नागरिक अधिकारों का हनन करते नजर आते हैं। महिलाओं को इन कानूनों से सबसे अधिक नकारात्मक तौर पर प्रभावित होना पड़ता है। 

संविधान सभा में मीनू मसानी, हंसा मेहता एवं राजकुमारी अमृत कौर ने ‘समान नागरिक संहिता’ को मूल अधिकारों के तहत रखने की वकालत की थी। संविधान सभा में बहस के दौरान कुछ सदस्यों ने यह आशंका प्रकट की थी कि यह मुस्लिमों के विरुद्ध है लेकिन अंबेडकर ने इस आशंका को निर्मूल करार देते हुए कहा था कि ‘मेरा दृढ़ विश्वास है कि किसी मुस्लिम को कभी भी यह कहने का अवसर नहीं मिलेगा कि समान नागरिक संहिता के निर्माताओं ने मुस्लिम समुदाय की भावनाओं को भारी आघात पहुंचाया।’ इस संदर्भ में कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने भी समान नागरिक संहिता के पक्ष में संविधान सभा में ऐतिहासिक भाषण दिया था। 

सर्वोच्च न्यायालय ने समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए अब तक तीन बार केंद्र को दिशा-निर्देश दिया है। इस संबंध में सबसे प्रसिद्ध निर्णय ‘मोहम्मद अहमद खान बनाम शाहबानो बेगम’ वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 1985 में दिया। इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि ‘यह अत्यंत खेद की बात है कि संविधान का अनुच्छेद 44 अभी तक लागू नहीं किया गया और सरकार की ओर से इसे संसद द्वारा पारित कराने का कोई लक्षण नहीं दिखाई देता।’ जबकि सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के खिलाफ संसद में मुस्लिमों के निजी कानूनों के हित में विधेयक पास करवाया। दूसरी बार ‘सरला मुद्गल बनाम भारत सरकार वाद में निर्णय देते हा सर्वोच्च न्यायालय ने समान नागरिक संहिता का अनिवार्यता की बात कही। साथ ही यह भी कहा कि अनुच्छेद 44 किसी भी तरह से अनुच्छेद 25, 26 एवं 27 में दिए मूल अधिकारी का हनन नहीं करता। इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय ने ‘जॉर्डन डींगडोह बनाम स्वरनजीत सिंह चोपड़ा’ वाद एवं ‘जॉन वल्लामैट्टम बनाम भारत सरकार’ के वाद में भी समान नागरिक संहिता के पक्ष में निर्णय दिया। 

“ऐसे समय में जब महिलाएं अपने अधिकारों और अपनी यौनिकता पर नियंत्रण को लेकर सजग हो रही हैं तो समान नागरिक संहिता की बात करना किन्हीं धार्मिक निजी कानूनों की तुलना में अधिक प्रगतिशील एवं लोकतांत्रिक है।” 

इस तरह भारतीय लोकतंत्र में अभी भी यह अभीष्ट है कि अनुच्छेद 44 इस प्रकार लागू हो जिसमें विभिन्न धर्मावलंबियों तथा विभिन्न धर्मों के पुरुषों तथा स्त्रियों के मध्य कोई विभेद न हो। इस अनुच्छेद को संविधान में अंतर्विष्ट करते समय संविधान निर्माताओं को यह विश्वास था कि प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय के अंतर्गत स्त्री-पुरुषों की बराबरी के लिए और अन्यायपूर्ण सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने के लिए सुधारवादी आंदोलन प्रारंभ किया जाएगा। लेकिन संविधान निर्माताओं की यह आकांक्षा हालिया भविष्य में पूरी होती दिखाई नहीं दे रही। 

फिर भी हाल ही में ‘भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन’ के प्रयासों से सर्वोच्च न्यायालय में ‘तीन तलाक’ एवं ‘हलाला’ जैसे विवाह एवं विवाह-विच्छेद से संबंधित रिवाजों पर समीक्षा हेतु याचिका दाखिल की गई, जिस पर दिया गया निर्णय मील का पत्थर है। बहुत से लोकतांत्रिक देशों यहां तक कि मुस्लिम जनसंख्या बाहुल्य तुर्की एवं मिस्त्र में भी समान नागरिक संहिता लागू है। ऐसे समय में जब महिलाएं अपने अधिकारों और अपनी यौनिकता पर नियंत्रण को लेकर सजग हो रही हैं तो समान नागरिक संहिता की बात करना किन्हीं धार्मिक निजी कानूनों की तुलना में अधिक प्रगतिशील एवं लोकतांत्रिक है। 

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