बेरोजगारी पर निबंध-Essay on Unemployment in Hindi

बेरोजगारी पर निबंध

बेरोजगारी पर निबंध-Essay on Unemployment in Hindi

बेरोजगारी का अर्थ है-काम चाहने वाले व्यक्ति को कार्य क्षमता रहते हुए भी काम न मिलना। बेरोजगारी किसी भी राष्ट्र के लिए चिंता का विषय है। बेरोजगारी के कारण राष्ट्रों का सर्वांगीण विकास नहीं हो पा रहा है, जिससे वे त्रस्त हैं। भारत में यह समस्या कुछ ज्यादा ही गंभीर है। भारत के गांव-शहर तथा शिक्षित-अशिक्षित सभी इस समस्या से ग्रस्त हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर प्रकार के बेरोजगारों की कुल संख्या 12 करोड़ है। इस प्रकार अगर भारत को बेरोजगारों का देश कहा जाए, तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। 

अब बेरोजगारी की समस्या के कारण और निवारण-दोनों पर दृष्टिपात करना आवश्यक है। जनसंख्या वृद्धि, कृषि पर अधिक भार, प्राकृतिक प्रकोप, मशीनीकरण एवं दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली-बेरोजगारी के मूल कारण हैं। भारत में उत्पादन एवं रोजगार वृद्धि पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। योजना जितनी बड़ी होती है, जनसंख्या वृद्धि के कारण बेरोजगारी का मुंह उतना ही बड़ा हो जाता है। फलतः बेरोजगारों की संख्या बढ़ती जा रही है। जनसंख्या वृद्धि के कारण बढ़ रही बेरोजगारी पर किसी कवि ने व्यंग्य करते हुए ठीक ही लिखा है 

बेकारी की कठिन समस्या का हल होगा सच्चा, 

घर-घर में जब जन्म ले सके बिना पेट का बच्चा।

बेरोजगारी की समस्या दूर करने के लिए शिक्षा एवं परिवार नियोजन की सहायता से जनसंख्या वृद्धि की दर घटाना आवश्यक है। भारत की आबादी का 70 प्रतिशत भाग कृषि पर आधारित है। इधर जनसंख्या वृद्धि के कारण कृषि भूमि में दिनो-दिन कमी हो रही है, तो उधर शरणार्थियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसके कारण भी बेरोजगारों की संख्या में इजाफा हो रहा है। भारतीय किसानों को प्राकृतिक प्रकोपों का भी सामना करना पड़ता है-कभी अति वृष्टि, तो कभी अनावृष्टि । इससे लोग बेकार हो जाते हैं। अतः इस समस्या के समाधान हेतु सहकारिता एवं वैज्ञानिक उपाय खेती के लिए अपनाने होंगे। 

वर्तमान युग तो मशीनों का युग है। इन मशीनों ने उद्योगों में लगे लाखों मजदूरों के काम छीनकर उन्हें बेकारों की पंक्ति में खड़ा कर दिया है। इसी कारणवश हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने मशीनीकरण का विरोध किया था। इससे निजात पाने के लिए गांवों तथा शहरों में कुटीर और लघु उद्योगों का जाल फैलाना होगा। भूतपूर्व राष्ट्रपति वी.वी. गिरि ने बेकारी से छुटकारा पाने के लिए अपनी पुस्तक में इस प्रकार लिखा है, “भारत के प्रत्येक घर में कुटीर उद्योग लगाकर और जमीन के हर एकड़ में चारागाह बनाकर बेरोजगारी की समस्या का निदान किया जा सकता है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली से सिर्फ डिग्रियां हासिल हो रही हैं। हाथ की कुशलता समाप्त हो रही है। परिणामतः डॉक्टर, इंजीनियर, वकील तथा स्नातक-सभी स्तरों पर देश में बेरोजगारी है।” 

शिक्षित बेरोजगारों की दुर्दशा पर बेढब बनारसी ने लिखा है- 

नौकरी की खोज में घूमते हैं ग्रेजुएट, 

घूमता है जिस तरह धोबी का कोई खर खुला।

अतः मैथिलीशरण गुप्त ने इस शिक्षा प्रणाली के नाश की कामना की –

हे शिक्षे! तुम्हारा नाश हो, 

जो चाकरी के हित बनी।

कहने का तात्पर्य यह है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में आमूल परिवर्तन लाकर ही इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। इसके लिए व्यावहारिक शिक्षा प्रणाली अपनानी होगी, जिससे ज्ञानी मस्तिष्क के साथ-साथ कुशल हाथ भी निकलें अर्थात शिक्षा को रोजगारोन्मुखी बनाया जाए। साथ ही साथ लोगों में नौकरी परस्ती की प्रवृत्ति के बजाय रोजगार परक प्रवृत्ति जागृत करनी होगी। 

संत विनोबा भावे कहा करते थे, “शिक्षा जीवन के बीच से आनी चाहिए और शिक्षा का अर्थ जीने की कला होना चाहिए। सरकार बेरोजगारों को भत्ता दे रही है, लेकिन बेरोजगारी भत्ता ऊंट के मुंह में जीरा के सिवाय कुछ नहीं है। सरकार को ऐसी योजनाएं बनानी चाहिए, जिससे प्रत्येक व्यक्ति को क्षमता के अनुरूप काम मिल सके, तभी बेरोजगारी का समूल विनाश संभव है।”

बेरोजगारी का दुष्प्रभाव प्रकारांतर से समाज पर पड़ता है, जिससे समाज अनेक समस्याओं से ग्रस्त हो जाता है। खासकर शिक्षित बेरोजगार युवकों का मस्तिष्क रचनात्मक न रहकर विध्वंसात्मक हो जाता है। समाज में आश्चर्य चकित करने वाले अपराध हो रहे हैं, जो बेरोजगारों के मस्तिष्क की उपज हैं। अशिक्षितों के बेरोजगार रहने से उतनी गंभीर समस्या नहीं उत्पन्न होती, जितनी गंभीर समस्या शिक्षित बेरोजगारों से उत्पन्न होती है।

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