तुलसी-साहित्य और इसकी प्रासंगिकता निबंध(Tulsi-Literature and Its Relevance) 

Tulsi-Literature and Its Relevance

तुलसी-साहित्य और इसकी प्रासंगिकता (Tulsi-Literature and Its Relevance) 

भारत में लोकनायकों की परम्परा श्रीकृष्ण से लेकर अद्यावधि महात्मा गांधी तक आयी है. गौतमबुद्ध, स्वामी रामानुजाचार्य, महाप्रभु वल्लभाचार्य, गोस्वामी तुलसीदास, महात्मा गांधी आदि महापुरुषों के कृतित्व में हमें इसी परम्परा के दर्शन होते हैं. हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में, “लोकनायक वही हो सकता है, जो समन्वय कर सके. गीता में समन्वय की चेष्टा है, बुद्धदेव समन्वयवादी थे, और तुलसीदास समन्वयकारी थे. लोक-शासकों के नाम तो भुला दिए जाते हैं, परन्तु लोकनायकों के नाम युग-युगान्तर तक स्मरण किए जाते हैं.” 

वैदिक धर्म में बाह्याचार एवं कर्मकाण्ड की प्रधानता हो गई थी. बुद्धदेव ने इसका विरोध किया और मधमा प्रतिपदा का उपदेश दिया और सदाचार के स्वर्ण-सोपानों के माध्यम से निर्वाण प्राप्ति के मार्ग का निरूपण किया.

लोकनायक तुलसी 

कालान्तर में बौद्ध धर्म भी बाह्याचार, कर्मकाण्ड, बाह्याडम्बर द्वारा ग्रसित हो गया और मायाजाल में उलझकर अनाचार का आवरण बन गया. लगभग डेढ़ हजार वर्षों बाद जगद्गुरु शंकराचार्य का आविर्भाव हुआ. उन्होंने अपने मायावाद द्वारा बौद्ध धर्म के मायाजाल से मुक्ति का मार्ग तो प्रशस्त कर दिया, परन्तु वह समाज के सम्मुख कर्म-सौन्दर्य के उच्चादर्श की प्रतिष्ठा नहीं कर सके. उनका प्रभाव चिन्तन और धर्म के दार्शनिक पक्ष तक ही सीमित रहा. जगद्गुरु लोकनायक के आसन पर प्रतिष्ठित न हो सके. 

मध्यकाल में भारत पर मुसलमान आक्रमणकारियों के आतंक ने भारत की संस्कृति, धर्मभावना एवं जीवन की मान्यताओं को गहरी चोट पहुँचाई. हिन्दू धर्म के आधार स्तम्भों धर्म, कर्म, अवतारवाद तथा वर्णाश्रम धर्म की जड़ें हिल गयीं. मुसलमानों के शासन में जो अत्याचार एवं अनाचार किये गये. उसके कारण भारतीय जन-मानस नैराश्य से भर गया. इन प्रतिकूल एवं विषम परिस्थितियों में निर्गुण-पंथी कबीर आदि सन्त कवियों ने तथा जायसी आदिक प्रेममार्गी सूफी कवियों ने अपनी-अपनी पद्धति पर जीवन से निराश एवं कर्म के प्रति हतोत्साहित जनता में जागृति उत्पन्न करने के प्रयत्न किये, परन्तु उन्हें बहुत ही सीमित सफलता मिली. उनकी वाणियों में भगवान की उस लोक-व्यापिनी एवं आनन्द विधायिनी कला का अभाव था, जिसका संस्पर्श प्राप्त करके धर्मपरायण भारतीय जनता के भावूक हृदय में मंगलाशा का संचार हो सकता. ऐसे आड़े समय में गोस्वामी तुलसीदास का आविर्भाव हुआ. उन्होंने जनता की नब्ज को पहचाना तथा उसके मनोवैज्ञानिक परितोष एवं व्यावहारिक अभावों की पूर्ति श्रुतिसम्मत और विरति-विवेक हरि-भक्ति-पथ की प्रतिष्ठा की. उनका कहना था कि भगवान् और उसकी कृपा की प्राप्ति जगत् से नाता तोड़कर नहीं, जगत् से नाता जोड़कर ही सम्भव है. गोस्वामी तुलसीदास ने खण्डन की पद्धति से दूर रहकर मण्डन की पद्धति अपनायी, प्रत्येक मतवाद से, प्रत्येक चिन्तन-पद्धति से सार-संचय किया और समस्त 

विरोधाभासों के मध्य समन्वय स्थापित किया. अपने ग्रन्थ ‘रामचरितमानस’ में निगम, आगम एवं पुराण तीनों दृष्टिकोणों को एक साथ प्रस्तुत करते हुए गोस्वामीजी ने पूर्ण आत्मविश्वास के साथ समाज को आश्वस्त किया कि संसार में ऐसा कौन है, जिसे ‘राम कथा’ ने भवसागर से पार नहीं किया है, अथवा जिसे वह पार न कर देगी 

पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना । 

गनिका अजामिल ब्याध गीध गजादि खल तारे घना ॥

लोकधर्म गोस्वामीजी की समस्त चिन्तन एवं भाव-पद्धतियों का मूल मन्त्र है ‘जिसे यह दृश्यमान जगत् प्रिय नहीं, वह कैसे कह सकता है कि उसको जगत् को बनाने वाला प्रिय है ?’ 

‘रामचरितमानस’ में गोस्वामी तुलसीदास ने रामराज्य की परिकल्पना द्वारा कल्याणकारी राज्य का स्वरूप प्रस्तुत किया. उन्होंने “जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी’ सो नृप अवसि नरक अधिकारी” की आवाज लगाकर अपने युग के शासकों को अपने कुशासन के प्रति सावधान किया और इस प्रकार भारतीय जन-मानस में कुछ कर गुजरने की भावना उत्पन्न की. भले ही आधुनिक पूर्वाग्रही विचारक यह स्वीकार न करें कि मार्क्स ने विषमताविहीन समाज की प्रेरणा तुलसी के रामराज्य की परिकल्पना से ग्रहण की थी, यथा—“राम प्रताप विषमता खोई (उत्तर काण्ड)” परन्तु यह निर्विवाद है कि तुलसी के रामराज्य की परिकल्पना में मार्क्स के साम्यवाद के बीज दिखाई देते हैं.

लोकमंगलवादी भक्ति-भावना 

हिन्दू समाज बल-वैभवहीन था और मुस्लिम समाज मदोन्मत एवं विलासी था. जो निर्गुण पंथी संत और योगमार्गी साधु समन्वय और सुधार का संकल्प लेकर चले थे, वे निम्न वर्ग के व्यक्ति थे, वे अशिक्षित थे, उनके मन में उच्च वर्ग के प्रति घृणा थी तथा उनके आत्मविश्वास एवं दंभ ने दुर्वह गर्व का रूप धारण कर लिया था. उनकी वाणी प्रायः जनता को वैराग्य, संसार त्याग, कर्म क्षेत्र से विमुख होने की प्रेरणा दे रही थी. तुलसी ने युग बोध को समग्र रूप में प्रभावित किया और शाश्वत रूप में उसको प्रस्तुत भी किया. उन्होंने लोक रंजक श्री राम के ऐसे रूप की प्रतिष्ठा की, जो वर्तमान और भविष्य दोनों के प्रति आश्वस्त करने वाला है. 

श्री राम ने निर्वासित होकर भी. नियमित सैन्य शक्ति न होने पर भी, केवल वानरों और भालुओं की सहायता से, त्रिलोकजयी रावण का समूल नाश उसके घर में घुसकर किया. भारतवासियों के लिए तुलसी की प्रेरणा स्पष्ट है—तुम तो करोड़ों की संख्या में हो, तुम्हारे पास विपुल साधन उपलब्ध हैं तथा शत्रु तुम्हारे घर में मौजूद है. जागो उठो और विजयश्री का वरण करो. श्री राम के इस रूप में तुलसी ने जनता को उसका प्रेरक एवं रक्षक प्रदान किया. तुलसी के इस युग-बोध एवं उनकी लोक-धर्मी भक्ति को देखकर कवि निराला चकित होकर गा उठे थे—“देशकाल के शर से बिध कर, यह जागा कवि अशेष छविधर.” 

गोस्वामी तुलसीदास ने राम-कथा का सबसे बड़ा अधिकारी वक्ता पक्षियों में नीचतम काकभुशंडि को माना और निम्न वर्ग के व्यक्तियों को राम-भक्ति का सच्चा अधिकारी बताया. वशिष्ठ जी के मुख से “पौरोहित्य कर्म अदि मंदा, वेद पुरान सुमृति कर निंदा” जैसा अप्रिय सत्य कहला दिया. अन्त में तुलसी इस यथार्थवादी सत्य को प्रकट करते हैं कि “नहिं दरिद्र सम दुःख जग माहीं” और मानो यह संकेत कर देते हैं कि ‘भूखे भजन न होह गुपाला’. तुलसी की राम-भक्ति दृश्यमान जगत् की सेवा का पाठ पढ़ाने वाली है. वह उस लोकग्राह्य सामान्य धर्म को लेकर चलती है, जिसमें परपीड़न और शोषण के लिए सुई की नोंक के बराबर भी गुंजाइश नहीं है 

परहित सरिस धरम नहिं भाई। 

परपीड़ा सम नहिं अधमाई ॥

तुलसी का भक्ति-मार्ग जीवन के समग्र रूप को लेकर चलने वाले लोक-धर्म का मार्ग है. श्रद्धा और सेवा उसके आधार स्तम्भ हैं. 

सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम | 

ते नर प्रान समान मम जिन्ह के द्विज पद प्रेम ॥ 

समन्वय-साधना 

समन्वय साधना तुलसी साहित्य की प्रकृति है. यह समन्वय तुलसी के युग बोध और आत्मान्वेषण का मधुर फल है. तुलसी का व्यक्तित्व कवि और दार्शनिक, भावुक और विचारक का मिलन बिन्दु है. अपने व्यक्तित्व की इस विशिष्टता के कारण तुलसी युगबोध के शत-शत विरोधी तत्त्वों के मध्य समन्वय स्थापित करने में समर्थ हुए हैं. 

तुलसी का सम्पूर्ण काव्य समन्वय की विराट् चेष्टा है. उसमें हमें लोक और शास्त्र का समन्वय, भाषा और शास्त्र का समन्वय, भक्ति, ज्ञान और कर्म का समन्वय, गार्हस्थ्य और वैराग्य का समन्वय, निर्गुण और सगुण का समन्वय, ब्राह्मण और चाण्डाल का समन्वय, प्रवृत्ति और निवृत्ति का समन्वय, शासित और शासक का समन्वय, आदर्श और व्यवहार का समन्वय तथा काव्य के रूपों एवं उसकी विभिन्न शैलियों का समन्वय दिखाई देता है. तुलसी ने उपर्युक्त समस्त समन्वयों का उपयोग कर राम के अत्यन्त लोक संग्रही एवं लोक-व्यापी रूप का अत्यन्त मार्मिक कलापूर्ण चित्र प्रस्तुत किया है. 

गोस्वामी तुलसीदास के समन्वय-विधान अनेक हैं—काव्य के क्षेत्र में समन्वय, धर्म के क्षेत्र में समन्वय, दर्शन के क्षेत्र में समन्वय, साधन के क्षेत्र में समन्वय, संस्कृति के क्षेत्र में समन्वय, राजनीति के क्षेत्र में समन्वय तथा समाज के क्षेत्र में समन्वय. 

तुलसी ने काव्य के क्षेत्र में जिस समन्वयशीलता का परिचय दिया है, वह सर्वथा अप्रतिम है. उन्होंने अपने समय में प्रचलित दोनों काव्य भाषाओं (ब्रज और अवधी) को अपनाया तथा समस्त काव्य रूपों एवं शैलियों में काव्य-रचना की. उन्होंने बंगाल में प्रचलित मंगल काव्यों की परम्परा को अपनाते हुए जानकी मंगल, पार्वती मंगल की रचना की. 

तुलसी ने विश्वास और आचरण के मध्य समन्वय करके धर्म के क्षेत्र में प्रत्येक प्रकार के संघर्ष मिटाने का प्रयास किया. धर्म के क्षेत्र में संघर्ष के प्रायः चार रूप होते हैं—धार्मिक आस्तिकता के केन्द्र बिन्दुओं का संघर्ष, उपास्य देवों का संघर्ष, धार्मिक आस्था के मूल स्रोतों का संघर्ष तथा धार्मिक साधना के विभिन्न मार्गों का संघर्ष. तुलसी ने इन संघर्षों के प्रत्येक रूप के अनुरूप समन्वय प्रस्तुत किया है. आस्तिकता के दो केन्द्र बिन्दुओं, सगुण ब्रह्म और निर्गुण ब्रह्म के मध्य उन्होंने पहले तो उन्हें जल और उपल बताकर समन्वय स्थापित किया, फिर उसमें केवल नाम और नामी का अन्तर बताकर समन्वय स्थापित किया, तदनन्तर उनके यथार्थ रूप का प्रतिपादन कर दिया. 

उन्होंने बलपूर्वक दोनों को सापेक्ष बताकर मानो निर्गुण सगुण के मध्य स्थायी समन्वय स्थापित कर दिया है 

ज्ञान कहे अज्ञान बिनु तम बिनु कहै प्रकास । 

निर्गुन कहै सगुन बिनु सो गुरु तुलसीदास ।।

तुलसी ने ‘मानस’ में सीताराम द्वारा पार्वती-शिव की पूजा कराके तथा शिव-पार्वती को राम-सीता की भक्ति का परम अधिकारी बताकर वैष्णवों और शैवों के मध्य परम समन्वय की घोषणा कर दी. 

तुलसी ने अपने समय में प्रचलित दार्शनिक चिन्तन पद्धतियों (अद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत) को इस प्रकार अपनाया है कि प्रत्यक्ष रूप से समन्वय का प्रयत्न होने पर भी इसमें विद्वानों को इस चेतना की अनुभूति होती है. विद्वान् यह बात दो टूक कहने में असमर्थ हैं कि तुलसी किस दार्शनिक मतवाद के अनुयायी हैं. 

साधना के क्षेत्र में ज्ञान और भक्ति, दोनों धाराएँ प्रकर्ष पर थीं और उनके मध्य विरोध भी था. तुलसी ने दोनों को परस्पर पूरक एवं अन्योन्याश्रित बताकर उनके मध्य समन्वय स्थापित कर दिया. 

ग्यानहिं भगतिहिं नहिं कछु भेदा । 

उभय हरहि भव-सम्भव खेदा ।

समाज के क्षेत्र में तुलसी ने वर्ण-धर्म में समन्वय स्थापित किया. भक्ति के क्षेत्र में ‘जाति-पाँति धनु धरम बड़ाई’ सबका लोप बता दिया. 

संस्कृति के क्षेत्र में समन्वय के तीन रूप दिखाई देते हैं—(क) प्रवृत्ति एवं निवृत्ति के मध्य समन्वय, (ख) मोद एवं मंगल के मध्य समन्वय, तथा (ग) लोक एवं वेद के मध्य समन्वय. चित्रकूट में राम-भरत मिलन के अवसर पर होने वाली सभा में तुलसी ने भरत के वचनों के माध्यम से साधुमत, लोकमत, वेदमत तथा राजनीति के मध्य समन्वय का हृदयकारी रूप प्रस्तुत किया है, गुरु वशिष्ठ सभा को सम्बोधित करते हुए कहते हैं 

भरत वचन सादर सुनिइ करइ विचार बहोरि । 

करब साधुमत, लोकमत, नृपनय निगम निचोरि ।

समाज के क्षेत्र में 

सामाजिक समन्वय के कई रूप तुलसी के साहित्य में उपलब्ध होते हैं यथा—(क) व्यक्ति की आवश्यकता और सामाजिक दायित्व में समन्वय तथा (ख) पारिवारिक सम्बन्धों में समन्वय, (ग) वर्गगत कर्त्तव्य-भावना में समन्वय, तथा (घ) नारी विषयक विभिन्न मान्यताओं में समन्वय, आदि. 

तुलसी का सामाजिक समन्वय वस्तुतः कर्त्तव्य भावना, आत्मसंयम और त्याग की त्रिवेणी में अवगाहन करता हुआ चला है. 

राजनीति के क्षेत्र में तुलसी ने राजतन्त्र और प्रजातन्त्र के मध्य समन्वय स्थापित किया है, जिसमें जनतन्त्र का भी समावेश हो ताए. तुलसी ने राजा की सत्ता को सर्वोच्च माना, परन्तु उन्हें निरंकुशता सह्य नहीं है. 

श्रीराम का कथन द्रष्टव्य है 

सोई सेवक प्रियतम मम सोई । मम अनुशासन मानै जोई। 

जौ अनीति कछु भाषौ भाई । तो मोहि बरजहु भय बिसराई ।

तुलसी का राजा अपने आपको प्रजा का सेवक मानता है. उन्होंने राजा को मुख के समान बताया है जो आहार ग्रहण करके समस्त अंगों को पोषण प्रदान करता है. 

मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान कहँ एक । 

पालइ पोषह सकल अंग, तुलसी सहित विवेक ॥

तुलसी के राम ऐसे राजा हैं, जो प्रजा के दुःखी होने पर अपने आपको नरक का अधिकारी मानते हैं.

अभिमानी राजा प्रतापभानु और निजतन्त्र के अनुसार राज्य करने वाले रावण, दोनों का पतन दिखाकर तुलसी ने यह प्रमाणित किया कि राजा ईश्वर का प्रतिनिधि होने के साथ-साथ जनता का सेवक भी है. 

तुलसी ने अपनी समन्वय साधना द्वारा अपने युग के अनेक विरोधों को सहमति के समन्वय-धरातल पर लाने का प्रयास किया तथा बाह्य एवं आन्तरिक अनेक संघर्षों को दृढ़तापूर्वक झेल सकने के लिए जनता का मार्ग दर्शन किया. इसी में वह लोक नायकों की पंक्ति में विराजमान दिखाई देते हैं.

तुलसी की प्रासंगिकता 

मुख्य प्रतिपाद्य—तुलसी का मुख्य प्रतिपाद्य भक्ति है. उनकी भक्ति का मूल मन्त्र सेवा है, उनके सर्वाधिक प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘रामचरितमानस’ में बार-बार यह बात कही जाती है कि समस्त दृश्यमान जगत् परम प्रभु की व्यक्त सत्ता है. उसकी सेवा ही परम प्रभु की सच्ची भक्ति है. भगवान् राम स्वयं अपने श्रीमुख से एक से अधिक बार कहते हुए देखे सुने जाते हैं 

सो अनन्य जाके असि मति न टरइ हनुमंत । मैं सेवक सचराचर रूप स्वामी भगवंत ॥ 

सगुन उपासक परहित निस्त नीति दृढ़ नेम । ते नर प्रान समान मम जिन्ह के द्विज पद प्रेम ॥ 

और अन्त में समस्त धर्म का सार इस प्रकार प्रस्तुत कर देते हैं 

परहित सरित धर्म नहीं भाई । परपीड़ा सम नहिं अधमाई ।

ये उक्तियाँ रामचरितमानस में यथास्थान प्राप्त होती हैं. इस प्रकार तुलसी क्षत्रिय धर्म या ब्राह्मणवाद का प्रतिपादन नहीं करते हैं. उनका प्रतिपाद्य है—भक्ति तथा जाति-धर्म निरपेक्ष 

आस्तिक मानववाद, यथा 

सब मम प्रिय सब मम उपजाए । सब तें अधिक मनुज मोहि भाए । 

तिन्हते पुनि मोहि प्रिय निज दासा । जेहि गति मोरि मदूसर आसा ॥ 

भगतिवत अति नाचाउ प्रानी । मोहि प्रानप्रिय अस मम बानी ।

यह सही है कि गोस्वामीजी वर्णाश्रम धर्म को स्वीकार करते हैं, परन्तु वह चरम स्थान देते हैं, एक जाति वर्ण-धर्म-निरपेक्ष आस्तिक मानववाद को. यह भी द्रष्टव्य है कि थीम में कथा की मूल-थीसिस एवं दार्शनिक पृष्ठभूमि में कहीं भी वर्णाश्रम से सीधा कोई सम्बन्ध नहीं है. ब्राह्मण-महिमा-गान, शूद्र-नारी-निन्दा आदि यदि आए हैं, तो केवल प्रसंगवश, गौण रूप में, क्योंकि वह उनका परिवेश था, परन्तु फिर भी वह वस्तुस्थिति के प्रति जागरूक बने रहते हैं. पेट पालन के लिए किए जाने वाले देव-पूजन-अर्जन आदि को उन्होंने स्पष्टतम शब्दों में हेय बताया है. कुल-गुरु वशिष्ठ जी कहते हैं. 

उपरोहित्य कर्म अति मंदा ।

वेद पुरान सुमृति कर निंदा ।

कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना 

गोस्वामी तुलसीदास ने राम कथा के माध्यम से हमारे सम्मुख आदर्श-परिवार की संकल्पना प्रस्तुत की और साथ ही हमें एक आदर्श समाज का प्रारूप भेंट किया है. उनके राम का रामराज्य वस्तुतः आधुनिककालीन कल्याणकारी राज्य है. यह कल्याणकारी राज्य शासनतन्त्र की अन्तिम परिणति के रूप में स्वीकृत है, जिसमें व्यक्ति का महत्त्व और उसकी स्वतन्त्रता पूर्णतः सुरक्षित रहती है. स्वराज्य के इसी आदर्श रूप को पूज्य महात्मा गांधी ने रामराज्य कहा है जिसकी परिकल्पना तुलसी ने चार शताब्दी से भी अधिक पहले की थी. इस रामराज्य से किसे विरोध हो सकता है, जिसमें 

बयरु न कर काहू सन कोई । राम प्रताप विषमता खोई ।

बरनाश्रम निज-निज धरम निरत वेद पथ लोग ।

चलहि सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग । 

दैहिक दैविक भौतिक तापा । राम राज नहीं काहुहि व्यापा । 

अल्प मृत्यु नहिं कवनिउ पीरा । सब सुन्दर सब बिरुज सरीरा ।

नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना । नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना । 

सब गुणज्ञ पंडित सब ज्ञानी । सब कृतग्य नहिं कपट सयानी ।

तुलसी द्वारा परिकल्पित शासन-व्यवस्था में मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षियों के भी पारस्परिक सौमनस्य की परिकल्पना समाहित है-खग मृग सहज बयरु बिसराई । सबहिं परस्पर प्रीति बढ़ाई । तथा रहहि एक सँग गज पंचानन | मानस में वर्णित शासनतन्त्र अपने युग की परम्परानुसार राजतंत्र कोटि का है जिसमें राज्य वंशानुगत होता है, परन्तु तुलसी का राजतन्त्र निरंकुश राजतन्त्र न होकर प्रजातन्त्र समर्पित राजतन्त्र है. 

तुलसी ने धर्म, दर्शन, संस्कृति, कला, समाज आदि प्रत्येक क्षेत्र में कान्ता सम्मति शैली में समन्वय स्थापित किया. यदि वह ऐसा न करते, तो हिन्दू समाज, हिन्दू धर्म एवं दर्शन तथा हिन्दी काव्य का क्या रूप होता है, यह कोई नहीं कह सकता है. तुलसी की दृष्टि व्यापक और सार्वभौमिक थी तथा उनके द्वारा स्थापित जीवन मूल्य आज प्रासंगिक नहीं रह गये हैं. जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण स्वस्थ, समन्वयकारी एवं लोकधर्मी था. कविवर रत्नाकर ने तुलसी को देवताओं की पंक्ति में बैठाया है—”मुनि तुलसीदास सब देवमय, प्रनवत ‘रत्नाकर’ हुलसि.” कवि रहीम के अनुसार इस विश्व की समस्त माताएँ तुलसी के समान पुत्र पाने की स्पृहा करती हैं 

सुरतिय नरतिय नागतिय अस चाहत सब कोय ।

गोद लिए हुलसी फिरै तुलसी सो सुत होय ॥

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