ग्रामीण विकास में बैंकों की भूमिका पर निबन्ध | Essay on The Role of Banks in Rural development in Hindi

ग्रामीण विकास में बैंकों की भूमिका पर निबन्ध

ग्रामीण विकास में बैंकों की भूमिका पर निबन्ध | Essay on The Role of Banks in Rural development in Hindi

1991 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 1 मार्च, 1991 को 84.63 करोड़ थी जिसमें 74.29 प्रतिशत भाग ग्रामीण जनसंख्या का है. अतः इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता है कि गाँवों के समग्र विकास में ही देश का विकास निहित है. इसी तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्रीमती इन्दिरा गांधी ने 1969 में 14 प्रमुख बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर ग्रामोत्थान का दायित्व बैंकों को सौंपा था. बैंकों के राष्ट्रीयकरण से ग्रामीण विकास की मुख्य धारा में तीव्र गतिशीलता आई, क्योंकि बैंकिंग सेवाओं के निमित्त अनेक बैंक शाखाओं का सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में खोलने का काम द्रुतगति से हुआ. 

बैंकों के राष्ट्रीयकरण के समय जुलाई 1969 तक देश में बैंकों की 8,262 शाखाएं थीं जिसमें 23 प्रतिशत शाखाएं ग्रामीण क्षेत्रों में थीं, लेकिन 30 जून, 1998 की स्थिति के अनुसार देश में बैंकों की शाखाओं की संख्या बढ़कर 64,280 हो गई है जिनमें से 51 प्रतिशत शाखाएं ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित की गई हैं. भारत की बैंकिंग प्रणाली द्वारा ग्रामीण विकास के क्षेत्र में की जा रही प्रगति का उल्लेख निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता 

ग्रामीण विकास हेतु विभिन्न बैंकों की स्थापना 

(1) राष्ट्रीय कृषि तथा ग्रामीण विकास बैंक (NABARD)– इस देश में कृषि तथा ग्रामीण विकास हेतु वित्त उपलब्ध कराने वाली शीर्षस्थ संस्था है. इसकी स्थापना 12 जुलाई, 1982 को की गई. नाबार्ड की चुकता पूँजी 100 करोड़ में भारत सरकार तथा रिजर्व बैंक का बराबर (50:50) का योगदान था. वर्ष 1996-97 में इसे बढ़ाकर 1000 करोड़ रुपए कर दिया था जिसमें RBI का योगदान 800 करोड़ रुपए था. आगामी 5 वर्षों के दौरान उसे बढ़ाकर 2000 करोड़ रुपए करने का प्रस्ताव था. नाबार्ड ग्रामीण ऋण ढाँचे में एक शीर्षस्थ संस्था के रूप में अनेक वित्तीय संस्थाओं को पुनर्वित्त सुविधाएं प्रदान करता है जो ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादन गतिविधियों के विस्तृत क्षेत्रों को बढ़ावा देने के लिए ऋण देती है. अपनी ऋण सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नाबार्ड भारत सरकार, विश्व बैंक तथा अन्य एजेन्सियों से धन राशियाँ प्राप्त करता है. 

नाबार्ड द्वारा वाणिज्यिक बैंकों तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को पुनर्वित्त सहायता के रूप में ऋण उपलब्ध कराए जाते हैं जिसके परिणामस्वरूप ये बैंक, लघु, सिंचाई समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम, डेरी विकास, फार्म यन्त्रीकरण आदि के अन्तर्गत दिए जाने वाले ऋणों के साथ-साथ अपनी विभिन्न प्रकार की गतिविधियों को चालू रख सकते हैं. वर्ष 1998-99 के दौरान मार्च 1999 तक नाबार्ड ने राज्य सहकारी बैंकों को मौसमी कृषि परियोजनाओं के लिए कुल 5979 करोड़ रुपए के अल्पावधि ऋण स्वीकृत किए.. 

(2) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (RRBs)– समाज के कमजोर वर्ग विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों तथा कारीगरों को संस्थागत उधार उपलब्ध कराने के लिए देश में क्षेत्रीय 

ग्रामीण बैंकों की स्थापना की गई. ये बैंक सिक्किम तथा गोआ को छोडकर समस्त राज्यों में कार्यरत हैं. भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को 26 अगस्त, 1996 से उधारियों पर ब्याज दर स्वतन्त्रतापूर्वक निर्धारित करने की छूट प्रदान कर दी है. 1996 97 के बजट में सरकार ने RRBs के पुनर्गठन और उन्हें पुनः प्रदान करने के लिए 200 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया. 1997-98 के बजट में इस प्रयोजन हेतु 270 करोड़ रुपए तथा 1998-99 के बजट में 265 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया 

(3) भूमि विकास बैंक (LDB)– किसानों को भूमि खरीदने, भूमि पर स्थायी सुधार करने अथवा पुराने ऋणों का भुगतान करने आदि से सम्बन्धित वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भूमि विकास बैंक की स्थापना की गई है. यह बैंक किसानों की अचल सम्पत्ति को बन्धक रखकर दीर्घकालीन (25 वर्ष तक के) ऋणों की व्यवस्था करते हैं. इन बैंकों का ढ़ाचा दो स्तर वाला होता है राज्य स्तर पर केन्द्रीय भूमि विकास बैंक तथा जिला अथवा तालुक स्तर पर प्राथमिक भूमि विकास बैंकों की स्थापना की गई है.

ग्रामीणों के विकास हेतु बैंकों की ऋण सम्बन्धी योजनाएं एवं कार्यक्रम 

भारत में किसान अपनी ऋण सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति दो प्रकार की संस्थाओं से करते हैं : 

गैर-संस्थानात्मक स्रोत तथा द्वितीय संस्थानात्मक स्रोत-गैर-संस्थानात्मक स्रोतों के अन्तर्गत साहूकार, व्यापारी एवं भू-स्वामी को सम्मिलित किया गया है, जबकि संस्थानात्मक स्रोतों के अन्तर्गत सरकार द्वारा स्थापित विभिन्न संस्थाओं तथा बैंकों आदि को सम्मिलित किया गया है. वर्तमान में लगभग 65 प्रतिशत ऋण संस्थानात्मक स्रोतों द्वारा उपलब्ध कराए जाते हैं. कृषि ऋण वाणिज्यिक बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और सहकारी समितियों से गठित बहु-एजेंसी नेटवर्क के माध्यम से वितरित किया जाता है 31 मार्च, 1998 के अनुसार वाणिज्यिक बैंकों की ग्रामीण और अर्ध-शहरी शाखाएँ 46691 थी तथा 196 क्षेत्रीय बैंकों की 14496 शाखाएँ थीं सहकारी क्षेत्र में, अल्प-अवधि सहकारी ऋण संरचना में 91720 प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ, 28 राज्य सरकारी बैंकों सहित 364 जिला केन्द्रीय सहकारी बैंक का नेटवर्क विद्यमान है. नवीं योजनावधि के दौरान सभी एजेन्सियों का कुल ऋण प्रवाह वर्ष 1998-99 के 3805400 लाख रुपए से बढ़कर 2001-02 में 6084200 लाख रुपए तक पहुँच जाने की सम्भावना है 

इस प्रकार बैंकों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों का विकास मुख्यतः उन्हें सुलभ वित्तीय सहायता प्रदान करके ही किया जाता है. इस दिशा में सरकार के द्वारा विभिन्न योजनाएं कार्यान्वित की जा रही हैं जो निम्नलिखित प्रकार से हैं 

(1) कृषि एवं ग्रामीण ऋण राहत योजना- इस योजना का शुभारम्भ 15 मई, 1990 को हुआ था जिसके द्वारा भारत सरकार ने किसानों, ग्रामीण कारीगरों एवं बुनकरों को जोकि कुटीर ग्रामोद्योग, हस्तशिल्प व बुनाई आदि से सम्बद्ध ग्रामीण विकास कार्यक्रमों की गतिविधियों में लगे हुए थे अनेक सुविधाएं उपलब्ध कराईं. इन लोगों ने सरकारी क्षेत्रों के बैंकों तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों से उधार प्राप्त किया. इस योजना के अन्तर्गत ऐसे लगभग 316.29 लाख उधार प्राप्तकर्ताओं को 7,744.09 करोड़ रुपए की ऋण राहत प्रदान की गई. यह योजना 31 मार्च, 1991 को समाप्त कर दी गई. 

(2) विभेदी ब्याज दर की योजना- बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पश्चात भारत सरकार ने इस योजना को अप्रैल 1972 में प्रारम्भ किया था. यह योजना उन गरीबों के लिए है जिनकी पारिवारिक वार्षिक आय ग्रामीण क्षेत्रों में 6,400 रुपए तथा शहरी क्षेत्रों में 7,200 रुपए से अधिक नहीं है तथा जो 2.5 एकड गैर सिंचित भूमि अथवा 1 एकड सिंचित भूमि से कम का स्वामित्व रखते हैं. ऐसे व्यक्तियों को 6,500 रुपए का ऋण अथवा कार्यशील पूँजी ऋण उत्पादक कार्यों के लिए 4 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से उपलब्ध कराया जाता है. इस योजना के तहत बैंकों द्वारा प्रदान किए गए कुल अग्रिमों का कम-से-कम 40 प्रतिशत अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के लोगों को दिया जाना अनिवार्य कर दिया गया है. 

(3) ग्रामीणों के लिए नई रणनीति-सेवा क्षेत्र पद्धति-फरवरी 1988 के पश्चात ग्रामीण उधार की एक नई रणनीति अपनाई गई, जिसे सेवा क्षेत्र पद्धति के नाम से जाना जाता है. 1 अप्रैल, 1989 से प्रारम्भ इस योजना के अधीन व्यापारिक बैंकों की शाखाओं को विशेष अर्द्धनगरीय तथा ग्रामीण क्षेत्र सौंपे गए जिनमें उन्हें कार्य करना होगा तथा अपने-अपने क्षेत्रों के आर्थिक विकास के लिए आयोजन पद्धति अपनानी होगी. इस प्रकार यह योजना ग्रामीण विकास की दिशा में बैंकों की उत्तम योजना है. 

(4) समेकित ग्रामीण विकास कार्यक्रम –इसके तहत देश के समस्त विकास खण्डों में से निर्धनतम व्यक्तियों को प्रत्येक वर्ष चुनकर बैंकों से ऋण उपलब्ध करवाकर गरीबी की रेखा से ऊपर उठाने का कार्य किया जाता है. यह ऋण विभिन्न ग्रामीण क्रियाकलापों के लिए दिया जाता है. जिससे उन्हें स्वरोजगार की प्राप्ति हो सके 

(5) अग्रणी बैंक योजना यह योजना- मुख्यतः ग्रामीण जनता की गरीबी से मुक्ति के लिए विविध कार्यों का समन्वित प्रयास है. इसके अन्तर्गत देश के सभी जिलों को आर्थिक विकास हेतु सभी राष्ट्रीयकृत बैंकों तथा कुछ निजी बैंकों के बीच बाँटा गया है, जहाँ वे अपनी शाखाओं को बढ़ाने और ऋण सम्बन्धी सुविधाओं के विस्तार के लिए क्षेत्रीय क्षमता का सर्वेक्षण करते हैं. यह अग्रणी बैंक केन्द्र व राज्य शासन की विभिन्न एजेन्सियों के तालमेल से ग्रामीण विकास योजनाओं को प्रोत्साहन देते हैं. 

(6) ग्रामीण आधारिक संरचनात्मक विकास निधि-1 अप्रैल, 1995 से नाबार्ड के तहत एक नई ग्रामीण आधारिक संरचनात्मक विकास निधि की स्थापना की गई. इस कोष के लिए उन बैंकों से अंशदान स्वीकार किया गया था जो प्राथमिक क्षेत्र (कृषि) को लक्ष्य के अनुरूप साख उपलब्ध नहीं करा सके थे. RIDF प्रायः राज्य सरकारों को ग्रामीण संसाधन परियोजनाओं के कार्यान्वयन के लिए सक्षम बनाने हेतु आवश्यक ऋण उपलब्ध कराती है.

मूल्यांकन 

उक्त प्रयासों के बावजूद आज भी अनेक गाँवों में शुद्ध पेयजल तक उपलब्ध नहीं हो पाया है. पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराने में भी सफलता नहीं मिली है. गरीबी उन्मूलन अभी भी हमारे ग्रामीण विकास कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है. सामाजिक, आर्थिक, क्षेत्रीय विषमता तथा भूमि के असमान वितरण की समस्याएं आज भी मुख्य चिन्ता का विषय बनी हुई हैं. 

इन परिस्थितियों में निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर ग्रामीण विकास में बैंकों की भूमिका की सार्थकता का सिंहावलोकन कर सकते हैं 

(1) खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता- ‘नाबार्ड’ के नेतृत्व में कृषि एवं ग्रामीण साख उपलब्ध कराने में कार्यरत विभिन्न प्रकार के बैंकों, यथा-भूमि विकास बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, सहकारी बैंक तथा व्यापारिक बैंकों द्वारा अधिक उपज वाली किस्मों के बीजों, रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, भूमि सुधारक तत्वों, आधुनिक कृषि यन्त्र, ट्रेक्टरों, थैशरों, इन्जनों, 

क्रॉपिंग मशीनों, फिल्टर पाइन्टो, स्टेबलाइजर तथा अन्य कृषि उपयोगी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तथा सिंचाई के साधन ट्यूबबैल, पम्पसेट इत्यादि हेतु ऋण उपलब्ध कराए जाने का ही परिणाम है कि भारतीय किसान कृषि की नवीन तकनीक की ओर आकर्षित हुए हैं तथा इनका उपयोग करने लगे हैं. बैंकों द्वारा संचालित इन कृषि एवं ग्रामीण ऋण योजनाओं का ही परिणाम है कि निरन्तर बढ़ती जनसंख्या के बावजूद भी खाद्यान्न उत्पादन के क्षेत्र में हमने आत्मनिर्भरता प्राप्त की है तथा हरितक्रान्ति से आगे बढ़कर कृषि जिन्सों के निर्यातक देशों की श्रेणी में पहचान बनाई है. 1950-51 में हमारा खाद्यान्न उत्पादन 50.8 मिलियन टन था जिसके 1998-99 में बढ़कर 202.54 मिलियन टन के स्तर पर पहुँच जाने का अनुमान लगाया गया है. 

(2) रोजगार में बढ़ोत्तरी-ग्रामीण क्षेत्रों की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी की है, जिसके कारण ग्रामीण क्षेत्र की अधिकतम क्षमता का उपयोग नहीं हो पाता फलस्वरूप ग्रामीण व्यक्ति तो निर्धन बने ही रहते हैं, देश भी कमजोर रहता है. गाँवों में व्याप्त मौसमी स्थायी, अर्द्ध शिक्षित तथा अदृश्य बेरोजगारी के निवारण हेतु बैंकों द्वारा अनेक कार्यक्रम प्रारम्भ किए गए हैं. 1978-79 में भारत सरकार के द्वारा प्रारम्भ किए गए ‘समेकित ग्रामीण विकास कार्यक्रम’ (IRDP) के संचालन में बैंकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. इसके अतिरिक्त युवा ग्रामीण बेरोजगारी को स्वरोजगार हेतु प्रशिक्षण प्रदान करने वाली योजना ‘ट्राइसेम’ (TRYSEM) के तहत प्रशिक्षण प्रदान करने वाली संस्थाओं को भी बैंकों द्वारा वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है. गरीबी की रेखा से नीचे बसर कर रहे ग्रामीण परिवारों की महिलाओं के लिए ‘ग्रामीण क्षेत्रों की महिला तथा बाल विकास कार्यक्रम’ (DWCRA) स्वरोजगार हेतु चलाया जा रहा है, जिसके तहत बैकों द्वारा अनेक प्रकार से वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है. \

इस प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए भी बैंक, पशुपालन, मुर्गीपालन, मत्स्य पालन, डेरी विकास, बागवानी व अन्य कुटीर उद्योग धन्धों के लिए रियायती ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराते हैं. बैंकों के सहयोग से प्रारम्भ की गई कुटीर उद्योगों के विकास की परियोजनाओं से कृषि पर जनसंख्या के दबाव में कमी आई है. 

(3) विद्यतीकरण के लक्ष्य की प्राप्ति– ग्रामीण विद्युतीकरण का कार्य तमाम ग्रामीण विकास कार्यक्रमों की रीढ़ है. अतः रिजर्व बैंक के अनुमोदन पर 1969 में एक Rural Electrification Corporation की स्थापना की गई. इन्हीं प्रयासों का परिणाम है. कि 1947 में जब देश आजाद हुआ उस समय मात्र 1,500 गाँवों में बिजली थी और निगम की स्थापना के समय 1969 में देश के 13 प्रतिशत गाँव विद्युतीकृत थे, किन्तु आज देश के लगभग 88 प्रतिशत गाँव विद्युतीकृत हो चुके हैं. अभी तक देश के 13 राज्यों में शत प्रतिशत ग्रामीण विद्युतीकरण का लक्ष्य प्राप्त किया जा चुका है. 

(4) भूमिहीनों की समस्या का हल- गाँवों में भूमि ही उत्पादन तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य साधन है. भूमि के असमान वितरण को सन्तुलित करने के लिए सरकार द्वारा सीलिंग कानून लाया गया जिसके द्वारा गरीब भूमिहीन जनता को अतिरिक्त भूमि का वितरण किया गया. सीलिंग कानून के अन्तर्गत जो जमीन आवंटित की जाती है वह प्रायः निम्न कोटि की होती है. इससे अच्छी उपज लेने के लिए अधिक धनराशि खर्च करनी पड़ती है जो इस वर्ग के लोगों के पास उपलब्ध नहीं होती है. अतः सरकार ने इन वर्गों के लोगों के पास संसाधनों की कमी को देखते हुए बैंकों के माध्यम से 25,000 रुपए प्रति हेक्टेअर की दर से वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई है. फलस्वरूप भूमिहीनों को भी चहुमुखी उन्नति का अवसर मिला है. 

(5) गरीबी का उन्मूलन- बैंकों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त गरीबी को, अग्रणी बैंक योजना, समेकित ग्रामीण विकास कार्यक्रम एवं स्पेशल कम्पोनेण्ट प्लान द्वारा हटाने का प्रयास किया जा रहा है. 

(6) आर्थिक एवं सामाजिक सन्तुलन की स्थापना– भारतीय रिजर्व बैंक के एक सर्वेक्षण के अनुसार 10 प्रतिशत ग्रामीण कृषक ऐसे हैं जो महँगे कृषि यन्त्रों तथा आधुनिक कृषि-प्रणाली के व्यय को वहन कर सकते हैं. अधिकांश कृषक जिनके पास छोटे कृषि फार्म हैं वे आधुनिक कृषि यन्त्रों की प्रणाली की लागत तथा रखरखाव के व्यय को वहन नहीं कर पाते हैं. इनके लिए कम ब्याज दर पर निर्धन कृषकों को कृषि के लिए उपयोगी सामग्री हेतु ऋण उपलब्ध कराने से ग्रामीण समाज में व्याप्त असमानता और असन्तुलन को दूर करने में भी बैंक सराहनीय भूमिका निभाते हैं. 

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