पंचायतों के आर्थिक स्वावलम्बन की दिशा में एक अभिनव प्रयोग-पंचायत उद्योगों की स्थापना के उद्देश्य

पंचायत उद्योगों की स्थापना के उद्देश्य पर निबंध

पंचायतों के आर्थिक स्वावलम्बन की दिशा में एक अभिनव प्रयोग-पंचायत उद्योग 

गाँवों के लोगों की दिन-प्रतिदिन की आवश्यकता की वस्तुओं की पूर्ति को लक्ष्य करते हुए कुछ उपयोगी वस्तुओं को स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके उत्पादित करने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश में पंचायतीराज संस्थाओं द्वारा देश में ‘पंचायत उद्योग’ के नाम से छोटे मोटे उद्योगों की स्थापना का सूत्रपात किया गया. प्रदेश में पंचायतों को आर्थिक सम्बल प्रदान करने, उन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक विकास को गति प्रदान करने तथा गाँव में औद्योगिक विकास को उचित दिशा देने के उद्देश्य से एक मौलिक एवं देशभर में अपने ढंग का एक अभिनव प्रयोग ‘पंचायत उद्योग’ के नाम से प्रारम्भ किया है. इनकी स्थापना से प्रदेश के गाँवों में बेरोजगार युवकों को रोजगार प्रदान करने, प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम पंचायतों की अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा देने तथा पंचायतों को आय के निजी स्रोत प्रदान करने एवं ग्रामीण बेरोजगारी की स्थिति पर प्रभावी नियन्त्रण करने आदि की दिशा में पंचायत उद्योगों का बहुत कुछ योगदान रहा है. पंचायत उद्योगों का सूत्रपात 

उत्तर प्रदेश में पंचायत उद्योगों का प्रारम्भ प्रयोग के तौर पर वर्ष 1961 में किया गया और इसके अन्तर्गत सर्वप्रथम लखनऊ में ‘चिनहट पंचायत उद्योग’ प्रयोग के स्तर पर स्थापित किया गया, चिनहट पंचायत उद्योग प्रयोग के तौर पर विकास अन्वेषणालय’ लखनऊ (वर्तमान में विकास अन्वेषण एवं प्रयोग प्रभाग, राज्य नियोजन संस्थान, नियोजन विभाग, उ.प्र.) द्वारा प्रारम्भ किया गया था और इसकी स्थापना के अगले दो वर्षों में प्रदेश के विभिन्न जनपदों में 11 पंचायत उद्योगों को स्थापित किया गया. इन पंचायत उद्योगों ने काफी सफलतापूर्वक कार्य किया.

अपने उद्देश्यों की पूर्ति में इन्हें पर्याप्त रूपेण सफल पाए जाने पर वर्ष 1963 में इन सभी 11 पंचायत उद्योगों के प्रबन्धन और इसकी व्यवस्था का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व पंचायतराज विभाग को सौंप दिया गया. साथ-ही-साथ इस प्रकार के उद्योगों को पूरे प्रदेश में स्थापित करने के लिए योजना तैयार की गई. इसके फलस्वरूप प्रदेश में जिला स्तर के साथ-साथ विकासखण्ड स्तर पर भी पंचायत उद्योगों की स्थापना की गई जिससे इनकी संख्या में तीव्र गति से वृद्धि हुई. पंचायत उद्योगों को उत्पादन की दृष्टि से अधिक उपयोगी बनाने तथा उनकी आय में पर्याप्त वृद्धि कराने के उद्देश्य को लेकर कालान्तर में प्रत्येक जिला मुख्यालय पर ‘केन्द्रीय प्रिंटिंग प्रेसों की स्थापना का भी निर्णय लिया गया. इन प्रिंटिंग प्रेसों के माध्यम से विभिन्न सरकारी विभागों में होने वाले छपाई के कार्य को कराए जाने का प्रावधान भी किया गया. इसके अन्तर्गत वर्तमान में प्रदेश में 47 केन्द्रीय प्रिंटिंग प्रेस स्थापित की जा चुकी हैं तथा इनमें और अधिक वृद्धि की कोशिशें की जा रही हैं. वर्तमान में प्रदेश के विभिन्न जनपदों और विकासखण्डों में 806 पंचायत उद्योग सफलतापूर्वक कार्यरत हैं. 

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश का पंचायतीराज व्यवस्था की स्थापना में पूरे देश में एक अग्रणी स्थान है जहाँ दिसम्बर 1947 में ‘यू.पी. पंचायतराज एक्ट’ पास किया गया था और 15 अगस्त, 1949 से प्रदेश में 35 हजार चुनी हुई ग्राम पंचायतों ने विधिवत् रूप से अपने दायित्वों का निर्वहन प्रारम्भ कर दिया था. वर्ष 1961 में प्रदेश में पंचायतीराज व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाने के उद्देश्य से ‘उत्तर प्रदेश क्षेत्र समिति एवं जिला परिषद् अधिनियम’ पास करके यहाँ त्रिस्तरीय पंचायतीराज व्यवस्था लागू कर दी गई थी. देश में पंचायतीराज व्यवस्था के पुनर्गठन के उद्देश्य से 73वें संविधान संशोधन किए जाने के फलस्वरूप पंचायतीराज व्यवस्था को अधिक प्रभावी और ग्रामीण विकास को विशेष गति देने के उद्देश्य से अधिनियम में किए गए प्रावधानों के अनुरूप प्रदेश के दोनों अधिनियमों में यथा आवश्यक एवं यथावांछित संशोधन एवं परिवर्द्धन किया गया है. वर्तमान में प्रदेश में 52028 ग्राम पंचायतें 813 क्षेत्र पंचायतें तथा 70 जिला पंचायतें कार्यरत् हैं जिनमें 7.5 लाख के करीब चुने हुए पंचायत प्रतिनिधि हैं जिनमें से 2.25 लाख तो महिला प्रतिनिधि हैं जो प्रदेश में पंचायतीराज व्यवस्था के सफल क्रियान्वयन के लिए विशेष रूप से उत्तरदायी हैं. 

वर्तमान में पंचायतों को ग्रामीण विकास के विभिन्न विकास कार्यक्रमों को क्रियान्वित करने हेतु काफी बड़ी मात्रा में सरकार द्वारा धनराशि उपलब्ध कराई जा रही है. इसके अतिरिक्त पंचायतों को कराधान के माध्यम से भी विकास कार्यों हेतु वित्तीय संसाधनों को जुटाने के लिए अधिकृत किया गया है. इसके साथ-ही-साथ पंचायतें अपनी आय को बढ़ाने के लिए कुछ आर्थिक गतिविधियाँ भी प्रारम्भ कर सकती हैं जिनके सम्बन्ध में उन्हें यू.पी. पंचायतराज अधिनियम, 1947 के अन्तर्गत प्रारम्भ से ही व्यवस्था निर्धारित है. इसी व्यवस्था के क्रम में उत्तर प्रदेश में ‘पंचायत उद्योग’ की अवधारणा का प्रादुर्भाव हुआ और वर्ष 1961-62 से पंचायतीराज अधिनियम की धारा-30 के अन्तर्गत संयुक्त समितियाँ स्थापित करके प्रदेश में पंचायत उद्योगों द्वारा कारोबार करना प्रारम्भ किया गया और उत्तरोत्तर उनके कारोबार में वृद्धि होती गई.

वर्ष 1976 में पंचायत उद्योगों को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से प्रदेश के पंचायत उद्योगों में निर्मित वस्तुओं को समस्त सरकारी विभागों तथा अर्द्धसरकारी प्रतिष्ठानों को पंचायत उद्योगों से सामान क्रय करने के लिए टेन्डर या कोटेशन आदि से छूट प्रदान की गई. इसके फलस्वरूप इनको अपने कारोबार में और भी अधिक सफलता प्राप्त हुई. पंचायत उद्योगों की स्थापना के उद्देश्य 

प्रदेश में पंचायत उद्योगों की स्थापना ग्रामीण क्षेत्रों के समग्र विकास की अवधारणा को ध्यान में रखते हुए विविध उद्देश्यों को लेकर की गई. इनमें से प्रमुख उद्देश्य निम्न प्रकार हैं 

 1. ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के साथ-साथ उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था को विकसित करने के प्रयास करना. 

2.प्रदेश में ग्राम पंचायतों के अन्तर्गत पंचायत उद्योगों की स्थापना से पंचायतों की आय के निजी स्रोत विकसित कराकर उनकी अर्थव्यवस्था को नई दिशा प्रदान करना. 

3.स्थानीय कच्चे माल, कार्य-कौशल एवं दस्तकारी का उपयोग कर ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाना. 

ग्रामीण जनता को तुलनात्मक रूप से सस्ती दरों पर उनकी जरूरत का सामान उपलब्ध कराना. 

4.स्थानीय कुशल एवं अकुशल कारीगरों, दस्तकारों तथा युवकों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराकर ग्रामीण बेरोजगारी कम करने में सहायता करना. 

5.ग्रामीण पंचायतों को आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर एवं स्वावलम्बी बनाने का प्रयास करना. पंचायत उद्योगों में उत्पादित वस्तुएं 

प्रदेश में स्थापित किए गए पंचायत उद्योगों द्वारा दिन-प्रतिदिन की घरेलू काम में आने वाली विविध वस्तुओं का मुख्य रूप से उत्पादन किया जाता है. इसके अतिरिक्त कार्यालयों से सम्बन्धित फर्नीचर, छपाई प्रेस तथा कृषि कार्य में काम आने वाली वस्तुएं भी तैयार कराई जाती हैं. इन उद्योगों में उत्पादित की जाने वाली प्रमुख वस्तुओं का विवरण निम्नलिखित प्रकार से है 

1.स्टील तथा लकडी की कुर्सी, मेज, अलमारी, रैक, डेस्क, बुक-केसिस आदि. 

2.लकड़ी के तख्त, टावल स्टैण्ड, पलंग, चकला-बेलन, खिड़की, चारपाई के पाए, सोफासेट आदि. 

3.नाव, बैलगाड़ी, डनलप की बाड़ी, लोहे के कुदाल, खुरपा, फावड़ा, पावर थ्रेसर आदि. 

4.सीमेन्ट के शौचालय सैट, पाइप, नाँद, सीमेन्ट के ब्लाक, पानी की टंकी, टब आदि.

5. ऊनी कम्बल, हैण्डलूम के कपड़े, थैले, दरी, टाट, निवाड़, टोकरी, चटाई आदि.

6. पत्थर की सिलेट, ब्लैक बोर्ड, चाक, फाइल कवर, लकड़ी के खिलौने आदि.

7. छपाई प्रेस, साबुन, कोल्हू तेल की घानी, जूते, चप्पल आदि. 

पंचायत उद्योगों की वर्तमान स्थिति–प्रदेश में पंचायत उद्योगों ने वर्ष 1961-62 से यू.पी. पंचायतराज अधिनियम, 1947 की धारा-30 की व्यवस्थाओं के अन्तर्गत किए गए प्रावधानों के अनुसार संयुक्त समितियाँ स्थापित करके वास्तविक रूप से अपना कारोबार करना प्रारम्भ किया. इस प्रावधान के अन्तर्गत दो या दो से अधिक ग्राम पंचायतों को किसी भी ऐसे कार्य को करने के प्रयोजन से जिसमें वे संयुक्त रूप से अभिरुचि रखती हों, ऐसी संयुक्त समितियाँ नियुक्त करने हेतु जिसमें उनके प्रतिनिधि सम्मिलित हों, सम्मिलित हो सकती हैं. इस प्रकार प्रदेश में पंचायतों ने प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में पंचायत उद्योग स्थापित किए और धीरे-धीरे उनके कारोबार में अभिवृद्धि होती गई. वित्तीय वर्ष 2004-2005 में प्रदेश के पंचायत उद्योगों के लिए 27 करोड़ रुपए के उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया.

हालांकि पिछले कई वर्षों से इनमें उत्पादन, लाभ तथा बिक्री आदि सभी में गत वर्षों की तुलना में कमी परिलक्षित हुई, लेकिन फिर भी इन उद्योगों द्वारा सामान्यतया लाभ ही अर्जित किया गया है. वर्तमान में इन उद्योगों में पनप रही कमियों को दूर करने, इन्हें विकसित करने और इनका कार्यक्षेत्र बढ़ाने के हर सम्भव प्रयास भी किए जा रहे हैं जिससे इनके कारोबार में और अधिक बढ़ोत्तरी सम्भव हो सके.

सरकार द्वारा प्रोत्साहन 

प्रदेश में पंचायत उद्योगों को विकसित करने और उन्हें प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से प्रदेश सरकार द्वारा समय-समय पर विशेष उपाय और प्रयास भी किए जाते रहे हैं. पंचायत उद्योगों को सरकार द्वारा आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराई जाती रही है. वर्ष 1976 में तो सरकार द्वारा पंचायत उद्योगों द्वारा निर्मित वस्तुओं को समस्त सरकारी एवं अर्द्धसरकारी विभागों को पंचायत उद्योगों से क्रय करने के लिए टेण्डर या कोटेशन आदि माँगने से छूट प्रदान कर दी थी अर्थात् प्रदेश सरकार के सरकारी एवं अर्द्धसरकारी विभाग पंचायत उद्योगों से सीधे ही उनके द्वारा बनी कोई भी वस्तु बिना किसी औपचारिकता के सीधे खरीद सकते थे. सरकार की इस नीति से पंचायत उद्योगों को काफी बढ़ावा मिला और धीरे-धीरे इनके उत्पादन, बिक्री तथा लाभ में शनैःशनैः वृद्धि भी अंकित की गई. 

वर्तमान में भी प्रदेश सरकार के स्पष्ट आदेश हैं कि सभी सरकारी विभागों, पंचायतीराज संस्थाओं, स्थानीय निकायों, निगमों तथा प्राथमिक शिक्षण संस्थाओं आदि के द्वारा अपनी आवश्यकता की तथा विशेष रूप से साज-सज्जा की सभी वस्तुएं पंचायत उद्योगों से ही खरीदी जाएं और उन्हें यहाँ से सामान खरीदने के लिए किसी टेण्डर या कोटेशन माँगने की आवश्यकता नहीं होगी. इसी प्रकार सरकार द्वारा पंचायत उद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिए समय-समय पर जो महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं इनका इन्हें काफी लाभ मिला है.

यहाँ पर यह तथ्य भी विचारणीय है कि पंचायत उद्योगों को पनपने के लिए केवल सरकारी सहायता या प्रोत्साहन ही आवश्यक नहीं है, बल्कि इन्हें फलने-फूलने और अपने निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक होगा कि ये उद्योग अपने द्वारा तैयार किए जा रहे माल की गुणवत्ता पर विशेषरूप से ध्यान रखें जिससे उनका प्रत्येक उत्पाद गुणवत्ता और कीमत में बाजार से प्रतिस्पर्धा में भी टिक सकें. उनके द्वारा तैयार की जा रही वस्तुएं अधिक उपयोगी, सुसज्जित तथा टिकाऊ होनी चाहिए जिससे उनकी माँग बढ़नी सुनिश्चित हो सकेगी.

उत्पादन में मशीनों का कम-से-कम प्रयोग करके ग्रामीण दस्तकारी और कौशल के उपयोग करने पर अधिक बल दिया जाना भी अधिक उपयोगी होगा. इन्हें विभिन्न वस्तुओं के सम्बन्ध में स्थानीय माँग का भलीभाँति आकलन करने के पश्चात् ही उत्पादन के सम्बन्ध में निर्णय लिया जाना आवश्यक करना होगा तथा अपने उत्पादन की मात्रा और बिक्री भी बढ़ानी होगी तभी ये अपने निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति कर पाने में पूर्ण रूपेण सफल हो सकेंगे. 

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि प्रदेश में पंचायतों की अर्थव्यवस्था को सुधारने की दृष्टि से पंचायत उद्योगों को विकसित करने का यह प्रयोग काफी सीमा तक सफल रहा है विशेष रूप से उस समय तक जब तक कि पंचायतों के पास आर्थिक संसाधनों की बहुत कमी थी और सरकारी स्रोतों से भी उन्हें कोई खास सहायता अथवा धनराशि प्राप्त नहीं होती थी. वर्तमान में तो पंचायतों की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में 73वें संविधान का विशेष योगदान मिला है. इसमें किए गए प्रावधानों के अनुरूप ही सभी राज्यों में ‘राज्य वित्त आयोगों’ का गठन किया गया और इनकी सिफारिशों के आधार पर राज्यों की आय का एक अच्छा खासा हिस्सा पंचायतों को सौंप दिया जाना राज्य सरकारों के लिए बाध्यकारी हुआ है. इसके अतिरिक्त केन्द्र सरकार भी केन्द्रीय वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुरूप विकास कार्यों हेतु एक भारी भरकम धनराशि पंचायतों को उपलब्ध करा रही है.

1996-97 से 10वें एवं 11वें केन्द्रीय वित्त आयोगों की सिफारिशों के अनुसार विभिन्न राज्यों की पंचायतों को केन्द्र सरकार द्वारा भारी भरकम धनराशि दिए जाने की व्यवस्था की गई है. इसके अतिरिक्त ग्रामीण विकास की विभिन्न योजनाओं के लिए भी केन्द्र एवं राज्य सरकारों के द्वारा पंचायतों को अतिरिक्त धनराशि उपलब्ध कराई जा रही है उदाहरण के तौर पर इस वर्ष 2004-2005 में उत्तर प्रदेश में केन्द्रीय वित्त आयोग की सिफारिशों के फलस्वरूप केन्द्र सरकार से 233-43 करोड़ रुपए, राज्य वित्त आयोग द्वारा दिए गए सुझावों के आधार पर राज्य के करों में से अंश के रूप में 585 करोड रुपए पंचायतों को उपलब्ध कराए गए हैं. इनके अतिरिक्त भी विभिन्न विकास कार्यक्रमों हेतु 

अतिरिक्त धनराशि भी पंचायतों को निरन्तर रूप से उपलब्ध हो रही है. इस प्रकार प्रचलित वर्ष में प्रदेश में पंचायतों को कुल लगभग 1400 करोड़ रुपया विभिन्न मदों के 

अन्तर्गत ग्रामीण विकास के कार्यक्रमों को संचालित करने के लिए उपलब्ध कराया गया है, जबकि इतनी बड़ी धनराशि पंचायतों को पहले कभी प्राप्त नहीं हुई. हालांकि इसे प्रदेश के विशाल आकार और ग्रामीण क्षेत्रों की आवश्यकताओं को देखते हुए बहुत अधिक भी नहीं कहा जा सकता. पंचायतें इस सहायता राशि के अतिरिक्त यदि अपनी आय के पंचायत उद्योग जैसे कुछ अतिरिक्त स्रोत विकसित कर सकें, तो उनसे अर्जित की हुई धनराशि के उपयोग से विभिन्न विकास कार्यक्रमों को और अधिक प्रभावी ढंग से संचालित किया जाना सम्भव हो सकता है. इसके अतिरिक्त इन उद्योगों की स्थापना से क्षेत्र को मिलने वाले अन्य लाभ तो प्राप्त होंगे ही. इस प्रकार ग्रामीण क्षेत्र और ग्रामीण लोगों के समग्र विकास की ओर एक सार्थक पहल के रूप में पंचायत उद्योगों को अधिक-से-अधिक विकसित करने की दिशा में विशेष प्रयास करना सभी प्रकार से श्रेयस्कर होगा. पंचायत उद्योगों की दिशा में उत्तर प्रदेश का यह अनुभव और प्रयोग अन्य राज्यों के लिए भी अनुकरणीय हो सकता है. 

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