भारतीय नारी की समस्या पर निबंध |Essay on The Problems of Indian Woman

भारतीय नारी की समस्या पर निबंध

भारतीय नारी की समस्याएँ (The Problems of Indian Woman) 

वैदिक एवं उत्तर वैदिक काल से ही ऐसे प्रमाण मिलते हैं जिनमें नारी की अभ्यर्थना की गई है. प्रकृतिस्वरूपा, नारी को परमेश्वर की शक्तियों के रूप में स्थान मिला है. विद्या, विभूति और शक्ति की क्रमशः सरस्वती, लक्ष्मी एवं पार्वती या दुर्गा के रूप में सर्वत्र पूजा होती है. महान् आचार शास्त्री एवं धर्मवेत्ता मनु ने लिखा है—“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता.” प्राचीनकाल में बालक बालिकाओं की सहशिक्षा व्यवस्था के भी प्रमाण मिलते हैं. वाल्मीकि ऋषि के आश्रम में ऐत्रेयी ने लव-कुश के साथ शिक्षा ग्रहण की थी. लड़कियों के बाल-विवाह की प्रथा नहीं थी और स्वयंवर प्रथा द्वारा उन्हें अपना पति चुनने की स्वतन्त्रता प्राप्त थी. गृहस्वामिनी एवं माँ के रूप में उसे पिता एवं आचार्य से भी उच्च स्थान प्राप्त था. महाभारत का यह उद्धरण प्रमाण है-“गुरुणां चैव सर्वेषां माता परमं को गुरु.”

स्त्रियों की मध्यकालीन दशा 

मध्यकालीन कुरीतियों में सती प्रथा, बाल विवाह और विधवाओं को हेय दृष्टि से देखना आदि प्रमुख कही जा सकती हैं. सन्तों एवं सिद्ध कवियों ने नारी के प्रति अत्यन्त कटु दृष्टिकोण अपनाया. उदाहरण के तौर पर कबीर की ये पंक्तियाँ- 

“नारी तो हम भी करी जाना नहीं विचार ।

जब जाना तब परिहरी, नारी बड़ा विकार ॥

नारी की झाँई परत अंधा होत भुजंग । 

कबिरा तिन की कौन गति, नित नारी के संग ॥

स्त्रियों की आधुनिक काल में दशा 

यद्यपि आधुनिक काल में सती प्रथा, बाल-विवाह, विधवाओं के प्रति हेय दृष्टि जैसी कुरीतियाँ समाप्त प्रायः-सी हो गई हैं, तथापि दहेज-प्रथा, अपहरण, बलात्कार आदि समस्याएँ आज अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच गई हैं. दहेज प्रथा आज निम्नतम एवं विकृतम रूप में पहुँच गई है. आज भले ही नारी शिक्षित हो गयी है तथा पुरुषों के बराबर चलने की बातें करती हो, किन्तु सत्य का स्वरूप आज भी भयानक है. नैना साहनी तन्दूर काण्ड, जेसिका लाल हत्याकाण्ड, शिवानी भटनागर हत्याकाण्ड, पूजा-निशा तेजाब काण्ड, शिवानी तेजाब काण्ड, भंवरी देवी बलात्कार काण्ड आदि अनेकानेक घृणास्पद दुर्घटनाएँ यही इंगित करती हैं कि नारी को आज भी पिसना व शोषण सहन करना पड़ रहा है. गाँव में पंचायत के लिए चुनी गयी अनपढ़ औरत हो या उच्च जीवन शैली का दंभ भरने वाली उच्च वर्ग की सम्भ्रांत गृहिणी; स्थिति दोनों ही की सरीखी है. अन्तर मात्र इतना है कि पहली की दुर्दशा सबके सामने आ जाती है, जबकि दूसरी अपनी दुर्दशा को सम्भ्रांत होने के आवरण में छुपा लेती है. भीतर से आज भी दोनों टूटी हुई या दरकी हुई हैं. 

सामाजिक सुधार 

सामाजिक पुनर्जागरण काल में महान् समाज-सुधारक राजा राममोहन राय ने सती प्रथा की समाप्ति, विधवाओं के पुनर्विवाह, स्त्री-शिक्षा आदि पर जोर दिया. महात्मा गांधी ने अछूतोद्धार की भाँति नारी-मुक्ति के लिए भी प्रयास किया. आधुनिककालीन कवियों ने नारी की पीड़ा को समझा. गुप्त जी नारी-दशा से द्रवीभूत होकर कह पड़े 

“अबला जीवन, हाय, तुम्हारी यही कहानी, 

आँचल में है दूध और आँखों में पानी.”

पुरुष वर्ग के स्वार्थ की कलई खोलते हुए उन्होंने पंचवटी में लिखा- 

“नरकृत शास्त्रों के बंधन हैं, सब नारी ही को लेकर । 

अपने लिए सभी सुविधाएँ, पहले ही कर बैठे नर ।”

सामाजिक पुनर्जागरण से प्रगतिशील विचारधारा ने जोर पकड़ा. नारी ने भी अपनी महत्ता को पहचानना प्रारम्भ किया. सुभद्रा कुमारी चौहान ने-“खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी” लिखकर नारी को यह एहसास दिलाया कि वह (नारी) साहस और शौर्य में पुरुष से कम नहीं है. 

कतिपय कवियों ने उसके पक्ष के समर्थन के गीत गाए; यथा 

“मुक्त करो नारी को, मानव ! चिर बन्दिनी नारी को ।

युग-युग की निर्मम कारा से, जननी, सखि, प्यारी को ॥” (कवि पंत)

“नारी ! तुम केवल श्रद्धा हो ।” विश्वास-रजत-नग-पग-तल में।

पीयूप-स्रोत-सी बहा करो। जीवन के सुन्दर समतल में ॥  (जयशंकर प्रसाद)

इस प्रकार महात्मा गांधी और अन्य समाज सुधारकों के सामूहिक प्रयास, देश में सामाजिक और राजनीतिक चेतना के प्रादुर्भाव, पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव तथा प्रगतिशील विचारधारा ने नारी-दासता की बेड़ियों को काटा और वह मुक्ति की ओर अग्रसर हुई. आज नारी जीवन के हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा दिखा रही है. वह राजनीतिज्ञ, राजनयिक, विधिवेत्ता, न्यायाधीश, प्रशासक, कवि, चिकित्सक आदि के रूप में समाज को अपना योगदान दे रही है. 

नारी-मुक्ति आन्दोलन को बीसवीं सदी में राष्ट्रीय आन्दोलन के उदय से काफी प्रोत्साहन मिला. उन्होंने बड़ी संख्या में बंग-भंग विरोधी आन्दोलन तथा होमरूल लीग आन्दोलन में भाग लिया. 1918 के बाद से वे राजनीतिक जुलूसों में सहभागिनी होने लगी. नारी-उत्थान की दिशा में 1927 में स्थापित ‘ऑल इण्डिया वोमेन्स कॉन्फ्रेंस’ नामक संस्था उल्लेखनीय है,

संवैधानिक अधिकार 

स्वतन्त्रता मिलने के बाद भारतीय संविधान के अनुच्छेदों 14 और 15 ने पुरुषों और स्त्रियों की पूर्ण समानता की गारण्टी दी तथा लैंगिक आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव न करने की बात कही गई. हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 में लड़की को लड़के के समान सह-उत्तराधिकारी बना दिया गया. हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 ने विशेष आधारों पर विवाह के सम्बन्ध को खत्म करने यानी तलाक की अनुमति दी. दहेज को अवैध घोषित किया गया तथा इसके लिए सजा की व्यवस्था की गई. दहेज की विकरालता को देखते हुए सन् 1961 में एक दहेज विरोधी कानून बनाया गया, जिसमें दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति को छः महीने की सजा या 5,000 रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है. बाद में इस दिशा में संशोधन करके दहेज विरोधी प्रावधानों को अति कठोर कर दिया गया. दहेज के लिए उत्पीड़न के विरुद्ध नारी को पर्याप्त संवैधानिक सुरक्षा प्रदान की गई है. 

20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में भारत में नारी ने लगभग प्रत्येक आन्दोलन में पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर योगदान दिया है. समाज की हर समस्या के विरुद्ध अपनी आवाज उठाई है. नारी के शोषण की घटनाओं के विरुद्ध तो उसने पुरुषों से भी अधिक शक्तिशाली प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की हैं. यह इस बात का संकेत है कि महिलाओं में पर्याप्त जागरूकता आई है. नारियों को विभिन्न स्तरों पर आरक्षण देने की बातें न मालूम कब से हो रही हैं, परन्तु संविधान में यह व्यवस्था अभी तक नहीं की जा सकी है.

कामकाजी महिलाओं की समस्याएँ 

पुरुषों एवं महिलाओं का एक वर्ग यह समझता है कि कामकाजी नारी की समस्त समस्याएँ समाप्त हो जाती हैं. नौकरी मिलते ही नारी नारीत्व के अभिशापों से मुक्त हो जाती है, परन्तु वस्तुस्थिति सर्वथा भिन्न है, यथा 

1.नारी कामकाजी महिला बनने का निर्णय लेने में स्वतन्त्र नहीं होती है. पहले तो माता-पिता प्रचलित रूढ़ि को तोड़कर उसको घर के बाहर नहीं भेजना चाहते हैं और बाद में यह ससुरालीजनों की इच्छा पर निर्भर रहता है कि वह कामकाजी बनी रहे अथवा नहीं. 

2.कामकाजी होने पर भी महिला आर्थिक दृष्टि से स्वतन्त्र नहीं बन पाती है. उसको अपनी कमाई का हिसाब घरवालों को देना पड़ता है. अनेक युवक तो कामकाजी महिला के साथ विवाह ही यह सोचकर करते हैं कि उनके घर में सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी आ रही है. प्रायः यह भी देखने में आया है कि ससुराल वाले विवाह के पूर्व की गयी उसकी कमाई का भी हिसाब मांगते हैं. 

3.दोहरी जिम्मेदारी- कामकाजी महिलाओं को घरेलू कामों से छुटकारा नहीं मिलता है. नौकरी या धन्धे से लौटकर घरेलू कार्य उन्हीं को करना पड़ता है. पुरुष-वर्ग गृह कार्य, चौका बर्तन आदि को आज भी महिलाओं का कार्य मानता है. अतः एक अतिरिक्त और वह भी पुरुष के बराबर जिम्मेदारी संभाल कर भी कामकाजी महिलाएँ अपनी पूर्व जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो पाई हैं. 

4.बच्चों की परवरिश- कामकाजी महिलाओं की यह भी समस्या है कि बच्चों को देने के लिए उनके पास समय का अभाव होता है. अतः उनके बच्चे संस्कारित नहीं हो पाते. बच्चों को नौकर-नौकरानी के सुपुर्द करने पर अथवा उनको मुक्त छोड़ देने पर उनके बुरी संगति में पड़ जाने की पूरी सम्भावना बनी रहती है और इस प्रकार बच्चों का भविष्य बिगड़ जाता है. 

5.समाज में बदनामी-आधुनिक युग में भी स्त्रियों का नौकरी करना उचित नहीं माना जाता. बहू को नौकरी नहीं करने देने के लिए सास, ससुर, देवर-ज्येष्ठ और पति तक तनकर खड़े हो जाते हैं. ज्येष्ठ कहते हैं यह कल की छोकरी हमारी तरह कुर्सियों पर बैठेगी? 

6.परिजनों का शक-नौकरी पेशा करने वाली महिलाएँ चरित्र के प्रति संदेह की समस्या से कभी नहीं उबर पाती हैं. कार्यालय में थोड़ी भी देर हो जाए. किसी सहकारी के घर किसी भी उपलक्ष्य में जाना हो, अथवा सामूहिक कार्यक्रम पिकनिक, इत्यादि पर जाना हो, परिजनों, विशेषकर पति की शक की निगाहें उसे अन्दर तक बेध डालती हैं. यह समस्या उस वक्त और भी बढ़ जाती है, जबकि महिला कोई स्टेनो या सेक्रेटरी हो अथवा किसी प्राइवेट संस्थान में कार्य करती हो. 

7.यौन शुचिता—आज स्त्री की सबसे बड़ी समस्या यौन शुचिता है. महिला ऑफिस में किसी भी पुरुष से हँसकर बोल ले, कई आँखें उसे समझने का प्रयास करने लग जाएंगी. आज महिला की स्थिति इतनी दुर्बल वस्तु बनी हुई है कि वह किसी भी मुस्कराहट या स्पर्श से भी दूषित हो जाती है. यह यौन शुचिता का परिवेश नारी को समग्र रूप से खुलकर कार्य करने से रोकता है. उसकी प्रतिभा को कृण्ठित करता है. कामकाजी महिलाओं की यह सबसे बड़ी समस्या है. 

8.बॉस का व्यवहार—यदि महिला कोई स्टेनो या पी.ए. है, तो उसकी सबसे बड़ी समस्या है—बॉस का व्यवहार. समाचार-पत्रों में कई अधिकारियों द्वारा अपनी पी. ए. या स्टेनो के यौन शोषण के मामले पढ़ने को मिलते हैं. सरकारी नौकरियों में तो ऐसा फिर भी कम होता है, किन्तु निजी संस्थानों में कार्य करने वाली महिलाओं की दशा बहुत खराब है. प्राइवेट संस्थानों के रोजगार विज्ञापनों में स्मार्ट, सुन्दर व आधुनिक महिलाओं की वरीयता एक प्रश्न खड़ा करती है कि कार्यक्षमता के आधार पर आगे बढ़ने वाले निजी संस्थानों का काम क्या स्मार्ट, सुन्दर व आधुनिक महिलाएँ ही संभाल सकती हैं ? योग्यता कोई मापदण्ड नहीं है ? यदि स्मार्टनेस, सुन्दरता व आधुनिकता मिलकर योग्यता को पीछे छोड़ भी देती है तो भी यह एक बीमार मानसिकता की परिचायक है. कामकाजी महिलाओं के लिए परिधान यानी ड्रेस बहुत बड़ी समस्या रहती है. वह जरा-सी भी सज-संवर करके चले तो उस पर फब्तियाँ कसी जाती हैं, उसको तितली अथवा फैशन परेड की नारी कहा जाता है. 

9.पुरुषों की अपेक्षा सौतेला व्यवहार—महिलाओं को वेतन पुरुषों की अपेक्षा कम दिया जाता है. इण्डियन एयरलाइन्स एवं एयर इण्डिया में विमान परिचारिकाओं के गर्भवती होते ही नौकरी से निकाल दिया जाता था. बाद में उन्होंने लम्बा संघर्ष कर माँ बनने का अधिकार पाया. 

10.बाहरी दौरे- कार्य के लिए अपने गृह जिले के बाहर जाना भी कामकाजी महिलाओं की एक प्रमुख समस्या है. घर की जिम्मेदारी, शील व गरिमा की चिन्ता, पति व बच्चों से आत्मीयता आदि उसे दौरे पर जाने से रोक देते हैं. 

11.रात्रि-ड्यूटी- कामकाजी महिलाओं के लिए रात्रि-ड्यूटी करना बहुत कठिन होता है, एक तो घर का मुखिया उसकी अनुमति नहीं देता. अनुमति मिल भी जाए तो लोगों की शक की निगाहें मुसीबत कर देती हैं. अस्पतालों में रात्रि की पारी में काम करने वाली नर्से, बड़े होटलों में काम करने वाली महिलाएं अपनी ड्यूटी सुरक्षित निकालकर सुकून अनुभव करती हैं. नौं व होटलों की महिला कर्मचारियों के साथ रात्रि ड्यूटी के समय हुए अनाचार की खबरें कई बार अखबारों में पढ़ने को मिलती हैं.

12. यौन-शोषण—सरकारी कार्यालयों में कार्य करने वाली महिलाएँ पूर्ण तो नहीं, किन्तु अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं. हालांकि यदाकदा सरकारी कार्यालयों में कार्यरत महिलाओं का यौन शोषण होता है, किन्तु निजी संस्थानों में अथवा मजदूरी करने वाली महिलाओं की दशा तो अत्यधिक दारुण है. प्राईवेट संस्थानों में अपने बॉस की इच्छा की अवहेलना का तात्पर्य है कि नौकरी से छुट्टी. इस मजबूरी का फायदा बॉस लोग उठाते रहते हैं. 

13.मजदूर औरतों की हालत तो बहुत खराब है. ठेकेदार, ठेकेदार के चहेते अफसर, मालिक के बेटे, दोस्त, पुलिस वाले और पता नहीं किन-किन दरिन्दों की भूख उन्हें मिटानी होती है. 

14.नारी की नौकरी यदि पति की अपेक्षा श्रेष्ठ होती है तो उसे अपने कम योग्यता वाले पति की हीन भावना का शिकार बनना पड़ता है. 

15.नौकरी चाकरी करते हुए पति-पत्नी एक ही स्थान पर कार्यरत रहें, तब तो गनीमत है, अन्यथा उनका दाम्पत्य जीवन तथा गृहस्थ जीवन समाप्त हो जाते हैं, वैसे भी कामकाजी महिला की गृहस्थी अव्यवस्थित तो हो ही जाती है.. 

16. कुछ कामकाजी महिलाओं के लिए नौकरी अभिशाप बन जाती है. ऐसा प्रायः निम्न या पिछड़े वर्ग की औरतों के साथ होता है. जिनके पतियों की आमदनी कम होती है, अथवा पति शराबी व कुमार्गी होते हैं, वे अपनी पत्नी की आमदनी पर हर घड़ी आँख गड़ाए रहते हैं और उसकी कमाई को भी उड़ाने के लिए पत्नी को भाँति-भाँति से उत्पीड़ित एवं प्रताड़ित करते हैं. 

अनेक समस्याओं का सामना करके जो महिलाएँ धन पैदा करती हैं, उन्हें भी समाज में अपेक्षित सम्मान प्राप्त नहीं होता है. नारी की उन्नति के नाम पर हम कितनी भी बातें करें, परन्तु नारी आज भी उपेक्षित है. वह घर-परिवार में एक सामान्य नारी से अधिक कुछ नहीं है. आज भी गर्भ में बच्ची (लड़की) को मार दिया जाता है. अब तो गर्भ-परीक्षण, गर्भपात आदि की सुविधाओं ने इन कामों को वैध एवं सरल बना दिया है. दूषित वातावरण में रहने वाली नारी को प्रसूति के समय दूषित प्रकृति का शिकार होना पड़ता है. अपनी रक्षा के लिए मुस्तैद नारी पर लोग फब्तियाँ कसते हैं, इस सन्दर्भ में उसको प्रायः घमंडी, गीली, तुनक मिजाज, Lady by chance आदि विशेषणों द्वारा विभूषित किया जाता है. नारियों की समस्याओं के निराकरण के लिए फैमिली कोर्ट बनाए जाएँ और नारियों के प्रति किए जाने वाले आपराधिक मामलों में तकनीकी नहीं, व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए. दहेज, बलात्कार, अपहरण आज की नारी के सामने बहुत बड़ी चुनौतियाँ हैं. 

संविधान और कानून एक ओर है तथा समाज दूसरी ओर. जब तक नारी के प्रति समाज के दृष्टिकोण में बदलाव नहीं आएगा, तब तक नारी का जीवन त्रस्त ही बना रहेगा. 

सुधारों की गर्जना तथा संवैधानिक प्रयास नारी की मौलिक समस्याओं को सुलझा नहीं सके हैं. संविधान ने नारी को मताधिकार एवं सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार प्राप्त करने का अधिकार दे दिया है, परन्तु समाज की दृष्टि में नारी आज भी मात्र भोग्या एवं पुरुष की दासी है. हम आज भी अनेकानेक नारियों के उत्पीड़न, आत्मदाह तथा उनकी हत्या के समाचार पढ़ते-सुनते रहते हैं. इनमें नौकरी करने वाली यानी कामकाजी महिलाएं भी शामिल हैं. आज भी दहेज का दानव नारी के जीवन को त्रस्त किए हुए है. विधवा-विवाह के नाम पर आज भी लोग नाक-भौंह सिकोड़ते हैं, स्त्री श्रमिकों को पुरुषों से कम मजदूरी दी जाती है तथा उसका शारीरिक शोषण भी किया जाता है. आर्थिक दृष्टि से सुरक्षित नारी आज सामाजिक दृष्टि से सुरक्षित अनुभव नहीं करती है. 

हमारे आन्दोलन पश्चिम के अंधानुकरण को लेकर नहीं होने चाहिए. उनको भारतीय गृहिणी के आदर्शों के अनुरूप ढालने का प्रयास करना चाहिए. पाश्चात्य चिन्तन के अंधानुकरण से इस देश की नारियों को भी जल्दी-जल्दी तलाक, अवैध शिशु-जन्म, आदिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. भारतीय नारी की मुक्ति के लिए सांस्कृतिक आन्दोलन की आवश्यकता है.

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