महानगर की समस्या पर निबंध-Essay on the Problem of Metropolis

महानगर की समस्या पर निबंध

महानगर की समस्या पर निबंध-Essay on the Problem of Metropolis

बड़े-बड़े नगरों को ‘महानगर’ कहा जाता है। प्रकृति का नियम है कि छोटी बस्तियां फैलकर गांव में, गांव फैलकर कस्बे में, कस्बे फैलकर नगर में तथा नगर फैलकर महानगर में परिवर्तित हो जाते हैं। जब देश के ग्रामीण उद्योग धंधे नष्टप्राय होने लगे, तो नगरों तथा महानगरों का विकास प्रारंभ होने लगा। देश में महानगरों की संख्या बढ़ने लगी। तभी से महानगरीय-जीवन समस्या-प्रधान होने लगा। अतः महानगरों में विविध प्रकार की समस्याएं जन्म लेने लगीं, जिनमें से कुछ ज्वलंत समस्याएं निम्नलिखित हैं 

महानगरों में प्रथम प्रमुख समस्या है-जनसंख्या वृद्धि की। देश में ग्राम व्यवस्था चरमराने के उपरांत महानगरों की जनसंख्या वृद्धि की गति पहले ही तीव्र थी, उस पर काम धंधों की खोज में गांवों से पलायन करने वाले लोगों ने जनसंख्या का दबाव अधिक बढ़ा दिया। अतः तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या का दबाव महानगरों की प्रथम विकट समस्या है। 

महानगरों में दूसरी प्रमुख समस्या है-आवास की। आवास की समस्या महानगरों में बढ़ती हुई अपार जनसंख्या का ही परिणाम है। जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में आवास की सुचारु व्यवस्था न हो पाने के कारण महानगरों के आलीशान भवनों की बगल में झोपड़-पट्टियों का निर्माण होने लगा। धीरे-धीरे आवास की समस्या ने एक विकट समस्या का रूप धारण कर लिया। 

इसके फलस्वरूप महानगरों में गंदगी बढ़ती गई तथा वहां के लोगों को नारकीय जीवन व्यतीत करने हेतु बाध्य होना पड़ा। धीरे-धीरे इसके दुष्परिणाम हमारे सामने आने लगे। महानगरों में आवास की जटिल समस्या के परिणाम स्वरूप लोगों ने सार्वजनिक स्थलों-पार्क, सड़क एवं सरकारी भूमि आदि पर अनधिकृत कब्जे करने प्रारंभ कर दिए। इसके कारण अनेक स्थानों पर यातायात में बाधा आने लगी। विभिन्न स्थानों पर गंदगी और कूड़े-कचरे के ढेर दिखाई देने लगे। इस समस्या का निदान आज तक भी संभव नहीं हो सका। 

महानगरों की एक अन्य समस्या यह है-उनका आकार बेतरतीब ढंग से लगातार बढ़ते जाना। ज्यों-ज्यों महानगरों में जनसंख्या बढ़ने लगी, त्यों-त्यों लोगों का दूर-दूर तक निरंतर बसते जाना प्रारंभ हो गया। इतनी दूर तक आने जाने के लिए यातायात और परिवहन की समस्याएं उत्पन्न हो गईं। वहां रहने वाले लोगों का आधा समय घर से कार्यालय जाने तथा आने में व्यतीत हो जाता है। इसके अतिरिक्त वहां रहने वाले लोगों की संख्या के अनुपात में यातायात के साधनों के अभाव के कारण उन्हें बसों में धक्के-मुक्के खाकर आना-जाना पड़ता है। बसों में अधिक भीड़ होने से कई बार अनेक लोगों की जेबें कट जाती हैं। यह समस्या भी दिनो-दिन बढ़ती जा रही है। 

महानगरों में उद्योगों की प्रगति पर विशेष बल दिया जाता है। निरंतर हो रहे औद्योगीकरण ने महानगरीय जीवन को कई तरह से प्रदूषित एवं समस्याग्रस्त बना रखा है। औद्योगीकरण के कारण सबसे पहले वायु प्रदूषण का शिकार होती है। उद्योगों के संयंत्र बड़े पैमाने पर ऊर्जा पैदा करते हैं। इसी गरमी से समस्त वातावरण में वायु प्रदूषण बढ़ता है। प्रदूषण के कारण मनुष्य अनेक प्रकार के मानसिक तथा शारीरिक रोगों का शिकार होता जा रहा है। 

इसके अतिरिक्त छोटी-बड़ी फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुएं, कचरे, गंदे पानी आदि के फैलने से वातावरण दूषित हो रहा है। उद्योगों के कारण बढ़ते वाहनों का दबाव, उनसे निकलता धुआं और जहरीली गैसों ने महानगरों के वातावरण को विषाक्त एवं दमघोंटू बना दिया है। परिणाम स्वरूप पर्यावरण प्रदूषित होता जा रहा है। लोग श्वास रोग, अंधत्व, अपंगता, विक्षिप्तता आदि से ग्रस्त हो रहे हैं। बड़े महानगरों में वाहनों से निकलता धुआं नरक बना देता है। वाहनों की आवाज ध्वनि प्रदूषण में वृद्धि करती है। 

महानगरों की अन्य समस्या है-शुद्ध वायु, पानी एवं रोशनी का अभाव। बढ़ती जनसंख्या के कारण वहां स्वच्छ जल की सदैव कमी बनी रहती है। पानी और बिजली की समस्या सर्वव्याप्त है, जिसके कारण लोगों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं का उपाय है-विकेंद्रीकरण।

इसके लिए सरकारी कार्यालयों, बाजारों तथा मंडियों को महानगरों के भीड़-भाड़ से हटाकर रखा जाए। बेकार भूमि का उपयोग बाजार-हाट लगाने के लिए किया जाए। देश में ऐसे कानून बनाए जाएं, जो बढ़ते प्रदूषण को नियंत्रित करने में सहायक हों। दिल्ली जैसे महानगर में सी.एन.जी. वाहनों का बढ़ता प्रयोग इसका उपाय है। शुद्ध वायु के लिए वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इस कार्य के लिए आम जनता का सहयोग भी अपेक्षित है।

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