शिक्षा का निजीकरण पर निबंध | Essay on the Privatization of Education in Hindi

शिक्षा का निजीकरण पर निबंध

शिक्षा का निजीकरण पर निबंध | Essay on the Privatization of Education in Hindi

शिक्षा अपनी प्रकृति से ही निजी उपक्रम है और फ्रांस की क्रांति से पहले वह प्रायः निजी व्यक्तियों द्वारा ही संचालित होती थी। फिर उसका सरकारीकरण होता गया। आज वैसे भी भूमंडलीकरण के दौर में निजीकरण पर ही जोर है। दूसरे सरकारें शिक्षा के लिए कम तम संसाधन भी नहीं जुटा पा रही हैं। इसके लाभ भी हैं और हानि भी। 

सभ्यता के प्रारंभ में मनुष्य ने स्वयं शिक्षित होना शुरू कर दिया था। तब शिक्षा का न कोई स्वरूप था न उसके लिए कोई संगठित पद्धति और संस्थाएं। फिर कुछ स्वशिक्षित गुरुओं और मनीषियों ने शिक्षा प्रदान करने के लिए कुछ संस्थाएं विकसित की। समाज के सशक्त लोगों के बच्चे गुरुकुल जाने लगे, यानी गुरु के कुल के सदस्य के रूप में उनसे विद्या ग्रहण करने लगे। | ऐसी ही स्थिति सभी प्राचीन सभ्यताओं में रही होगी। 

धीरे-धीरे समाज के सबसे बुद्धिमान लोगों ने पुरोहिती करनी शुरू कर दी और शिक्षा धर्म के चंगुल में फंसती गई। । प्राचीन यूनान और चीन में जहां धर्म का कम प्रभाव था वहां शिक्षा । प्रायः सांसारिक बनी रही पर अधिकतर जगहों पर शिक्षा पर धर्म का प्रभाव बढ़ता गया। मध्यकाल तक आते-आते सारा दुनिया में सिवाय जन जातीय इलाकों जैसे अश्वेत अफ्रीका, लातिन अमरीका और आस्ट्रेलिया आदि के, शिक्षा का मुख्य स्वरूप धर्म केन्द्रित हो गया। 

“ब्रिटिश राज्य कायम होने से पहले भारत में शिक्षा निजी मदरसों और पाठलाओं द्वारा ही संचालित थी। उच्च शिक्षा का कोई प्रबंध नहीं रह गया था। सारी प्राचीन परंपराएं और संस्थाएं ध्वस्त हो चुकी थीं। अठारहवीं ताब्दी की उथल-पुथल में शिक्षा व्यवस्था और भी अधिक डांवाडोल थी।” 

आधुनिक काल शुरू होने, यानी यूरोप में पुनर्जागरण का प्रारंभ होने, का सबसे प्रमुख कारण नई सांसारिक शिक्षा का प्रादुर्भाव था। यह नई शिक्षा मुख्यतः व्यक्तिगत प्रयासों से ही विकसित हो रही थी। इसी से धर्म की रूढ़िवादिता का विरोध मुखर हुआ और मार्टिन लूथर और काल्वै आदि ने धर्म सुधार यानी ‘प्रोटेस्टेंट’ आंदोलन शुरू किया। इसके प्रतिकार के लिए कैथोलिक चर्च ने प्रति सुधार (Counter-Reformation Move ment) आंदोलन शुरू किया और उसके लिए शिक्षा को ही मुख्य उपकरण बनाया। सारी दुनिया में कैथोलिक चर्च ने स्कूलों और अस्पतालों के माध्यम से ही अपना विस्तार किया। धीरे-धीरे प्रोटेस्टेंट चर्चों ने भी यही रास्ता अपनाया और आज सारी दुनिया में विशेषकर भारत में, मिशिनरीज द्वारा संचालित शिक्षण संस्थाओं की धाक है। 

पर इस दौरान यूरोप में प्रबोधन काल के दौरान तर्कबुद्वि और सांसारिकता का विकास हुआ। कोपरनिक्स, गैलीलिओ और न्यूटन आदि के प्रभाव में विज्ञान का भी प्रचार हो ही रहा था। इससे धर्म पर सवाल उठ ही रहे थे। जब स्थापित सामंती व्यवस्था पर प्रश्न उठाते हुए अठारहवीं सदी में फ्रांस की क्रांति हुई तो उसका एक मुद्दा चर्च विरोधी भी था। क्रांति काल के सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में था शिक्षा को चर्च के हाथ से लेकर उसका सरकारीकरण। फ्रांस के बाद पश्चिमी यूरोप में अन्य देशों में भी सरकारों ने शिक्षा में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। राज्य की नई अवधारणा में राज्य द्वारा जनकल्याण के कार्यों को प्रोत्साहन जरूरी समझा जाने लगा। इस तरह अब तीन तरह की शिक्षा प्रणालियां चलन में आ गईं-चर्च संचालित, राज्य संचालित और निजी प्रयासों द्वारा संचालित। 

इस मददे को भारत के संदर्भ में समझें तो, ब्रिटिश राज्य कायम होने से पहले भारत में शिक्षा निजी मदरसों और पाठशालाओं द्वारा ही संचालित थी। उच्च शिक्षा का कोई प्रबंध नहीं रह गया था। सारी प्राचीन परंपराएं और संस्थाएं ध्वस्त हो चुकी थीं। अठारहवीं शताब्दी की उथल-पुथल में शिक्षा व्यवस्था और भी अधिक डांवाडोल थी। 

कंपनी के राज्य में बस कंपनी के कर्मचारियों के लिए कलकत्ते में एक मदरसा और बनारस में एक संस्कृत पाठशाला चाल गए। परन्त उन्नीसवीं सदी में कंपनी ने शिक्षा के लिए एक लाख का बजट बनाया पर वह भी खर्च नहीं हो सका। इस बीच विद्यालय खलते जा रहे थे। धीरे-धीरे ब्रिटिश सरकार ने कक्षत्र में एक तरह से कायाकल्प कर दिया। सबसे बड़ा बात यह हुई कि शिक्षा का माध्यम लार्ड मैकाले के प्रभाव से अंग्रेजी हो गई और शिक्षा सबके लिए सुलभ हो गई। मिशनरी विद्यालयों में भी दी जाने वाली शिक्षा ‘सेक्यूलर’ थी। इस तरह भारत के आधुनिकीकरण में इस नई शिक्षा की बड़ी भूमिका थी। यहां यह बात स्पष्ट होनी चाहिए कि ब्रिटिश राज ने यह भारत के जनकल्याण के लिए नहीं किया था पर परोक्ष रूप से वह हुआ इससे इन्कार नहीं किया जा सकता। 

आजाद भारत में ब्रिटिश शिक्षा नीति ही जारी रही है-कुछ सतही सुधारों के बावजूद । भारत में परिमाणात्मक विकास तो बहुत हुआ है पर गुणात्मक बहुत कम । सरकारी शिक्षा संस्थानों का स्तर कभी प्रशंसित नहीं रहा। दूसरी ओर टाटा द्वारा स्थापित जैसे Tata Institute of Fundamental Re search ने सारे संसार में धाक जमाई है। 

इधर कई बातें उजागर होती गई हैं भारत की बढ़ती आवश्यकताएं सरकारी और सरकार पोषित संस्थाएं नहीं पूरी कर सकतीं। दूसरे, वहां उपलब्ध गुणवत्ता संतोषजनक नहीं है। तीसरे, हिन्दी के राष्ट्रभाषा घोषित होने के बाद भी अंग्रेजी का वर्चस्व कायम है और समाज में यह धारणा व्याप्त है कि बिना अंग्रेजी जाने इस दिशा में सफलता नहीं मिल सकती। चौथे भूमंडलीकरण शुरू होने के बाद तो निजीकरण की बाढ़ ने पब्लिक सेक्टर के उद्योगों तक को ग्रसना शुरू कर दिया। ऐसे में हर क्षेत्र में बढ़ते निजीकरण के दौर में शिक्षा में उसका भारी स्तर पर प्रवेश स्वाभाविक था। और अंत में शिक्षा में निवेश एक अत्यंत लाभकारी उद्योग-व्यवसाय के रूप में उभरा जिसमें सामाजिक प्रभाव और प्रतिष्ठा भारी बोनस था। इन सबके परिणाम स्वरूप शिक्षा सेक्टर’ (Education Sector) अन्य क्षेत्रों की तरह विकसित हुआ तथा खासकर पूंजीपति वर्ग के लिए निवेश का एक बड़ा क्षेत्र खुल गया। लेकिन निजी संस्थानों की मनमानी पर रोक लगाने के लिए सरकार ने शिक्षा के अधिकार कानून को लागू करने के साथ ही निजी शिक्षण संस्थाओं में उस क्षेत्र के गरीब बच्चों के प्रवेश के अधिकार को सुनिश्चित किया। जुलाई, 2019 में उत्तर प्रदेश सरकार उच्च शिक्षा में बड़ा कदम  उठाते हुए उत्तर प्रदेश निजी विश्वविद्यालय विधेयक लेकर आई इस विधेयक का उद्देश्य सभी विश्वविद्यालयों को एक ही कानून के अंतर्गत लाना है। निजी शिक्षण संस्थाओं की कुल सीटों के 25 प्रतिशत सीट पर गरीब बच्चों के प्रवेश दिए जाने संबंधी कानून को लागू किया जा रहा है। 

इधर कुछ दशकों से ‘इंग्लिश मीडियम’ स्कूल का चलन इतना बढ़ा कि गांवों तक में भी सेंट जोसेफ और सेंट फ्रांसिस जैसे स्कूल खुल गए। माध्यमिक शिक्षा में डी.पी.एस. जैसे स्कूलों का जाल बढ़ता गया। तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में सबसे अधिक कमाई की गुन्जाइश थी क्योंकि सरकारी इंजीनियरिंग और मेडिकल कालेजों की कमी थी और उनमें प्रवेश कठिन है। ऐसे में पिछले कुछ वर्षों में एक जिले में कई-कई ऐसे कालेज खलते गए। जब सरकार ने अपना नियंत्रण ढीला किया तो प्राइवेट यूनिवर्सिटियां भी बरसात में कुकुरमुत्ते की तरह बजबजा उठीं। आजकल हर वर्ष दसियों नए विश्वविद्यालय खुलते जा रहे हैं नए-नए नारों के साथ। जैसे एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी का नारा है- Real education for the real world. यानी दूसरी जगहों पर वास्तविक विश्व के लिए वास्तविक शिक्षा नहा उपलब्ध है। और उस यूनिवर्सिटी में कौन सी शिक्षा उपलब्ध है? केवल तकनीकी। यानी तकनीक और उससे मिलने वाली नौकरी ही वास्तविक विश्व है। 

“भारत में विकास की पूरी धारणा की तरह मिक्षा के क्षेत्र में भी विकास सबको उपलब्ध नहीं है। आर्थिक विकास की तरह क्षिक विकास भी समाज के समर्थ वर्ग को ही उपलब्ध है।” 

इधर शिक्षा के निजीकरण में संकीर्ण विचारधारा का जोर बढ़ता गया है। ऐसे विद्यालय और मदरसे तेजी से खुल रहे हैं और उनमें विद्यार्थियों की संख्या भी बढ़ रही है, जहां बेहद संकीर्ण और विघटनकारी शिक्षा दी जा रही है। राष्ट्रीय एकता को सबसे बड़ा खतरा उन्हीं से है। 

शिक्षा के निजीकरण से कुछ लाभ तो अवश्य हुए हैं जैसे वहां मिलने वाली शिक्षा गुणात्मक रूप से बेहतर मानी जाती है। वर्तमान में निजी संस्थानों में दी जाने वाली शिक्षा रचनात्मक व अभिरुचियों पर आधारित होती है। उनमें पाठ्येत्तर गतिविधियों के माध्यम से व्यक्तित्व के संपूर्ण विकास पर जोर दिया जाता है। पर याद रखना चाहिए कि यह पूरा सत्य नहीं है। अधिकांश निजी विद्यालय सामान्य और तकनीकी, पूरी तरह धंधा करते हैं। उदाहरण के लिए प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में निजी विद्यालयों में शिक्षा घोटाला बन कर रह गई है। इसी तरह प्राइवेट टेक्निकल कालेज मुनाफा कमाने के सबसे बड़े माध्यम बन गए हैं। वहां अगर बेहतर शिक्षा मिल भी रही है हालांकि अपनी समग्रता में यह बात सच नहीं है, तो भी वह किसे उपलब्ध है? केवल धनिकों को। इससे भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, क्योंकि सामान्यतः भ्रष्टाचार के दो बड़े उत्प्रेरक हैं-एक लड़की की शादी में देने के लिए भारी दहेज, दूसरे बच्चों की नौकरी के लिए तकनीकी शिक्षा और उसमें प्रवेश के लिए भारी डोनेशन । दूसरे, यह जनतंत्र के लिए एकदम घातक है। जब तक बेहतर शिक्षा सबको उपलब्ध नहीं होगी जनतंत्र कभी पनप नहीं सकता। 

निजी शिक्षा के विस्तार से एक लाभ यह भी हुआ है कि शिक्षा संस्थानों की कमी पूरी हो रही है। पर यह भी देखना चाहिए कि भारत में विकास की पूरी धारणा की तरह शिक्षा के क्षेत्र में भी विकास सबको उपलब्ध नहीं है। आर्थिक विकास की तरह शैक्षिक विकास भी समाज के समर्थ वर्ग को ही उपलब्ध है। 

अंत में यह भी तर्क दिया जा सकता है कि निजी शिक्षा के विस्तार से काफी लोगों को रोजगार मिल रहा है। अपेक्षित रूप से सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों की तुलना में निजी संस्थानों का जोर ‘कैम्पस प्लेसमेंट’ पर रहता है। जिससे रोजगार की प्राप्ति होती रहती है। पर कैसा रोजगार? जैसे निजी उद्योग व्यवसाय में कर्मचारियों को उचित पारिश्रमिक नहीं मिलता वैसे ही निजी शिक्षण संस्थाओं में भी प्रायः शिक्षकों को उपयुक्त वेतन नहीं मिलता। रोजगार देना ही निजी शिक्षा के पक्ष में बड़ा तर्क नहीं हो सकता। कम तनख्वाह पाने वाले अयोग्य शिक्षक शिक्षा का कितना क्षरण कर रहे हैं इसका आकलन करने वाला व्यक्ति कांप उठेगा। 

इस तरह हम कह सकते हैं कि शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ते निजीकरण ने कुछ समस्याएं हल की हैं, पर केवल कुछ लोगों की, दूसरी ओर जितनी समस्याएं हल की हैं उनसे अधिक बढ़ाई हैं और वे बढ़ती जा रही हैं। 

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