पैसे की महत्ता पर निबंध |Essay on the Importance of Money

पैसे की महत्ता पर निबंध

पैसे की महत्ता पर निबंध

जिसके पास नहीं है पैसा, 

उसका जग में जीवन कैसा।

सचमुच मेरे अभाव में प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ उपहार मानव जीवन भी तुच्छ लगने लगता है। दवा के अभाव में तड़पते रोगी के पास जब मैं पहुंच जाता हूं, तो उसके जीवन में आशा के दीप जलने लगते हैं। भिखारी के खाली कटोरे में मेरी उपस्थिति से ही उसे अन्नपूर्णा देवी के दर्शन होने लगते हैं। अभावग्रस्त विद्यार्थी के पास पहुंचते ही मैं उसे सरस्वती का दूत दिखने लगता हूं। राजा के खजाने में मेरी कमी से सबल से सबल राजा के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच जाती हैं। तिजोरियों में मेरी अनुपस्थिति सेठ-साहूकारों के लिए हृदयाघात जैसी जानलेवा बीमारी का आमंत्रण होता है। भोगियों के लिए मैं ही सब कुछ हूं। अतः रोगी हो या भोगी, राजा हो या रंक, विद्यार्थी अथवा या व्यापारी-सभी के लिए मैं जीवन हूं। यही मेरा व्यापारिक परिचय है। 

अर्थशास्त्र की भाषा में मैं विनिमय का माध्यम हूं। वास्तविकता भी यही कि मैं एक साधन मात्र हूं। लेकिन आजकल लोगों ने मुझे ही साध्य बना लिया है। किसी चिकित्सक से आप पूछे कि तुम्हारे जीवन का लक्ष्य क्या है। जवाब मिलेगा-धन कमाना। किसी अभियंता से पूछे, तो जवाब मिलेगा-धन कमाना। किसानों, पदाधिकारियों एवं व्यापारियों-इनसे भी आपको यही जवाब मिलेगा। इस प्रकार सभी को मुझसे लगाव है। लेकिन इन दिनों राजनेताओं ने जो मुझसे असीम और अनन्य प्रेम दिखाया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। 

यही कारण है कि आज भारत को ‘घोटालों का देश’ कहा जा रहा है। पशुपालन घोटाला, सांसद रिश्वत कांड, शेयर घोटाला और बोफोर्स दलाली आदि मेरी प्राप्ति हेतु खेले गए घृणित खेल हैं। इन्हीं लोगों के कारण मेरे प्रभाव में आशातीत वृद्धि हुई है। अगर आप परीक्षा में अच्छी सफलता चाहते हैं, नौकरी चाहते हैं या पदोन्नति चाहते हैं, तो मुझे आगे करके देखें। आपका रुका हुआ काम चंद मिनटों में हो जाएगा। इतना ही नहीं, मैं जहां भी चाहता हूं, वहां की परिभाषा बदल देता हूं। यदि मैं व्यभिचारी के पास रहता हूं, तो लोग उसे सदाचारी मान बैठते हैं। अगर मूर्ख के पास रहता हूं, तो लोग उसे विद्वान मान लेते हैं। मलिन के पास रहता हूं, तो लोग उसे कुलीन मानते हैं 

धनवंत कुलीन मलिन अपि।

मेरी खनखनाहट में भी अद्भुत आकर्षण शक्ति है। इसे सुनकर मंदिर छोड़ पुजारी, आश्रम छोड़ महंत, कुर्सी छोड़ पदाधिकारी और बंगला छोड़ राजनेता मेरी ओर दौड़ पड़ते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि पूरी दुनिया ही मेरी उंगलियों पर नाच रही है। दुनिया की क्यों, अब तो भगवान भी मेरी मुट्ठी में हैं। अगर भीड़ के कारण आपको मंदिर में प्रवेश करना कठिन लग रहा हो, तो भगवान के पुजारी-पंडों के पास मुझे पहुंचा दीजिए। शीघ्र ही भगवान का दुर्लभ दर्शन सुलभ हो जाएगा। गोस्वामी तुलसीदास की इन पंक्तियों द्वारा आप मेरी स्तुति करें, लोक-परलोक सर्वत्र आपकी विजय होगी 

कवन सो काज कठिन जग माहीं। 

जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥

यही नहीं, मेरे विषय में तो प्राचीन ग्रंथों में भी वर्णन हुआ है- 

यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः,

स पण्डितः सः श्रुतवान् गुणज्ञः।

स एव वक्ता स च दर्शनीयः, 

सर्वे गुणाः कांचननाश्रयंति॥

अर्थात जिसके पास धन है, वही कुलीन है, वही पंडित है, वही श्रुतियों को जानने वाला अर्थात वेदज्ञ है, वही गुणों का पारखी है, वही वक्ता है और वही दर्शन करने योग्य अर्थात सुंदर और आदर के योग्य है। क्योंकि धन में ही समस्त गुणों का वास है। 

मेरा सर्वत्र व्यापक प्रभाव जान लेने के बाद अब आप मेरी उत्पति जानने के लिए अवश्य ही उत्सुक होंगे। सो उसे भी सुन लीजिए, लेकिन अति संक्षिप्त में कहूंगा। इतिहासकारों का कहना है कि सर्वप्रथम ईसा से सात सौ वर्ष पूर्व ग्रीक में मेरा जन्म हुआ था। उस समय चांदी और स्वर्ण के मिश्रण से मेरा निर्माण होता था। भारत में मुझे लाने का श्रेय अंग्रेज बादशाह जार्ज पंचम को है। उन्होंने रुपया, अठन्नी, चवन्नी, दुअन्नी, इकन्नी तथा तांबे के एक-दो पैसे के सिक्के के रूप में सन 1831 में मेरी शुरुआत की। 

आजादी के उपरांत सन 1957 में मुझे दशमलव पद्धति में परिवर्तित कर दिया गया। रुपया, अठन्नी, चवन्नी, दुअन्नी आदि के स्थान पर पांच पैसा, दस पैसा, पच्चीस पैसा, पचास पैसा एवं एक रुपया, दो रुपये, पांच रुपये, दस रुपये आदि के सिक्कों का प्रचलन प्रारंभ हुआ। मेरा निर्माण भी सोने, चांदी या तांबे से न होकर सस्ती एल्युमीनियम तथा स्टील से होने लगा। मेरे शरीर पर मेरा मूल्य और राष्ट्र-प्रतीक अशोक स्तंभ अवश्य अंकित रहता है। मेरे निर्माण के लिए कुछ मापदंड निर्धारित हैं। इसका अधिकार भारतीय रिजर्व बैंक को है, जो राष्ट्रीय स्वर्ण भंडार के आधार पर मेरा निर्माण कराता है। मेरे छोटे-छोटे स्वरूप को देखकर मुझे अकिंचन न समझें, यह तो मेरा वामन रूप है। मेरा विराट रूप भी है। भारत में 1000 रुपये के कागजी नोट मेरे सबसे बड़े भाई हैं। 

अपनी कहानी समाप्त करने के पहले अपने स्वभाव के बारे में एक-दो बातें कहना चाहता हूं। इन्हें आप धैर्य से सुनें, क्योंकि इनसे आपको अवश्य लाभ होगा। मेरी तीन गतियां-दान, भोग और नाश हैं। सबसे अच्छी गति दान की है, उसके बाद मेरा उचित उपभोग करें, अन्यथा मैं तीसरी गति नाश को प्राप्त कर लूंगा, तब आप हाथ मलते रह जाएंगे। एक सलाह यह भी है कि आप मुझे संचित अथवा अवरुद्ध न करें, नहीं तो समाज में चोरी, डकैती और हिंसा आदि का तांडव प्रारंभ हो जाएगा, जो अब भी हो रहा है। इसलिए मेरे शुभागमन पर कबीरदास जी के इस दोहे का अनुसरण अवश्य करें 

पानी बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम। 

दोनों हाथ उलीचिए, यही सयानो काम॥

मेरे प्रभाव में ही समाज की सुख, समृद्धि और उत्कर्ष निहित है।

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