परमार्थ में ही मानव जीवन की सार्थकता है पर निबंध |Essay on the importance of human life in nature

परमार्थ में ही मानव जीवन की सार्थकता है पर निबंध

परमार्थ में ही मानव जीवन की सार्थकता है 

“यही पशु प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे, वही मनुष्य है जो मनुष्य के लिए मरे।” (मैथिलीशरण गुप्त)

मानव सभ्यता का विकास उन्हीं महान व्यक्तियों द्वारा सम्भव हुआ है जिन्होंने अपने हित को समाज के हित के साथ जोड़ दिया था अथवा जिन्होंने लोक के हित के लिए व्यक्तिगत हित की उपेक्षा की है. गौतम, महावीर, तुलसी, लिंकन, गांधी, दयानंद, तिलक नेहरू, सुभाष, भगतसिंह, अशफाक उल्ला खाँ आदि इसी श्रेणी के व्यक्ति थे. इन्हीं के पारमार्थिक जीवन की ज्योति द्वारा यह जगत् प्रकाशित हो रहा है. ये लोग यह मानते थे कि – 

जीना तो है उसी का जिसने यह राज जाना। 

है काम आदमी का औरों के काम आना।।

वेदों की ब्रह्मवाणी, मनीषियों की अभिव्यक्ति और साहित्यकारों की लेखनी अतीत से वर्तमान तक जिस परम सत्य और यथार्थ का उदघोष करती आई है वह मानव जीवन की सार्थकता का ‘आत्मकेन्द्रण’ से परे ‘परमार्थ’ की स्वीकृति पर मुहर अंकित करती है. मनु का वंशज मानव वस्तुतः ब्रह्माण्ड का सर्वश्रेष्ठ जीव, इसलिए स्वीकार किया जाता है, क्योंकि उसमें ‘पर’ का भाव भी निहित होता है, खलील जिब्रान ने कहा था कि “मानव जीवन प्रकाश की वह सरिता है जो प्यासों को जल प्रदान कर उनके जीवन में व्याप्त तिमिर को दूर भगाती है,” गोस्वामी तुलसीदास की लोक कल्याणकारी भावना भी हमारा परमार्थ से साक्षात्कार कराती है-“परहित सरिस धम नहीं भाई.” वस्तुतः उपनिषदों का दर्शन, भगवद्गीता का आत्मवाद और पुराणों का अध्यात्मवाद मानव जीवन की सार्थकता के जो अपरिहार्य तत्व व्याख्यायित करते हैं, वे अपने गर्भ में समाहित ‘पर’ के भावों का प्रकटीकरण कर मानव जीवन की अस्तित्वमयता का लक्ष्य, महत्ता एवं उपादेयता अभिव्यक्त कर प्रकाश स्तम्भ बन हमारा पथ आलोकित करने वाले हैं. वही मानव यथार्थ में मानव रूप में स्वीकार किया जाता है जो मानवीयता से परिपूर्ण हो. जिस व्यक्ति की अन्तर्रात्मा में करुणा की कोमल मंदाकिनी प्रवाहित होती हो, जो संवेदनात्मक और सहानुभूतिपूर्ण तरंगों से आप्लावित हो, “जियो और जीने दो का भाव इनके लिए पर्याप्त नहीं रहा. इनकी मान्यता थी कि अपने को मिटाकर औरों के रहने के लिए जीने की भूमि प्रस्तुत करो. इनकी मान्यता थी कि अश्रुपूर्ण नयनों के अश्रु पोंछ उसके अधरों पर स्निग्ध मुस्कान खिलाने का उत्साह समेटे हो, अकुलाती अंतड़ियोंधारी की क्षुधा शान्त करने की उमंग अपने कृत्यों में समाहित किए हो, वही व्यक्ति मूलतः मानव कहलाने का अधिकारी स्वयंसिद्ध होता है और ऐसे ही व्यक्ति का जीवन सार्थकता के आलोक से जाज्वल्यमान होता है. तभी तो कवि प्रसाद ने कहा था 

औरों को हंसते देखो मनु, हंसे और सुख पाओ,

अपने सुख को विस्तृत कर लो, सब को सुखी बनाओ। 

महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी, अशोक, ईसा. गांधी आदि इतिहास के पृष्ठों, धर्म संस्कृति और मानवता के ग्रन्थों में इसलिए उच्च स्थान, श्रद्धा, सम्मान, अमरत्व और यश प्राप्त कर सकने में सफल हुए, क्योंकि वे प्रकाश-पुंज बनकर आजीवन परमार्थ का प्रांगण आलोकित करते रहे, पर सेवा, पर कष्ट, पर पीड़ा और पर दुःख का निवारण करने में संलग्न रहे. यथार्थ में जो स्व-सुख, स्व-हित और स्व-अर्थों तक सीमित रहता है वह पशुतुल्य व्यक्ति अपने निरर्थक जीवन का बोझ इस धरती माता पर डालकर अपने इहलोक आगमन को अमांगलिक कृत्य को तो सिद्धप्राय कर ही देता है, साथ ही वह विधाता को भी लज्जित कर देता है. मानव प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ रचना, उत्कृष्ट कृति और गतिशील निर्मिति, इसलिए स्वीकार नहीं की गई है कि वह स्वकेन्द्रण के दायरे, संकीर्ण चिन्तन और पशुवत् प्रवृत्ति से ऊपर ही न उठ सके. इसीलिए तो एक कवि मानव जीवन की सार्थकता का शंखनाथ करते हुए कहता है कि-“अपने लिए जिए तो क्या जिए, तू जी ऐ दिल जमाने के लिए.” अथवा वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए जिए. 

प्रकति चौरासी लाख यौनियों में पहले जीव को परिभ्रमण कराती है और अन्ततः मानव योनि से जीव को आभूषित करती है. वस्तुतः मानव जीवन को जो उच्चादर्श है वही उसके जीवन की सार्थकता को भी अपने में समाहित किए हुए है और वह है परमार्थ. प्रकृति ने मानव को विकसित मस्तिष्क, जागरूकता, चेतनाशीलता, इसीलिए प्रदान की है कि वह मानव जीवन की सार्थकता और परमार्थ को परस्पर पर्याय मानकर अपनी ऊर्जा, शक्ति, सामर्थ्य और क्षमता को परोपकारिता से सम्बद्ध करने का यशस्वी कार्य सम्पादित कर सके मानव को प्रकृति ने भावनात्मक आवेगों, कोमल तरंगों और औदार्य के भावों से ओत-प्रोत हृदय, इसलिए प्रदान किया है जिससे मानव पर पीड़ा, पर व्यथा, पर वेदना और पर दुःखों को अपना मानकर द्रवित, व्यथित, संवेदित और कारुणिक होकर उसकी सहायता और पीडा निवारण को सक्रिय हो जाए. रहीम का संदेश था कि लोक कल्याण करने वाला लोक का अंग होने के कारण स्वयं भी कल्याण का भागी बन जाता है. वे आगे कहते हैं कि जो फूलों की खेती करता है, उसके पथ पर प्रकृति फूल बिछा देती है, जो दूसरों के लगाने के लिए मेंहदी पीसता है उसके हाथों में मेंहदी स्वतः ही लग जाती 

“यों रहीम सुख होत है, उपकारी के संग। 

बाटन वारे के लगे, ज्यों मेंहदी को रंग।।

प्रत्येक धर्म का सन्देश भी परमार्थ की राह प्रशस्त करता है. अधिकांश धर्मप्रवर्तक परमार्थ की खातिर ही हँसते-हँसते धर्म और संस्कृति की बलिवेदी पर शहीद हो गए, पर अपने परमार्थ के यज्ञ, संकल्प और पावन लक्ष्य से विमुख नहीं हुए. ईसा मसीह परमार्थ, पर उत्थान और लोक कल्याण के निमित्त ही क्रूस पर चढ़ रहे थे. महावीर स्वामी ने भूखे प्यासे रहकर और बुद्ध ने सघन वनों में कष्टकारी तपस्या करके अपने को परमार्थ हेतु पूर्णतः समर्पित कर दिया था. गांधीजी ने सत्याग्रह और अहिंसावाद निज खातिर नहीं वरन् ‘पर’ खातिर ही अपने चिन्तन, कार्यक्रम और क्रियान्वयन में सम्मिलित किया था. इतिहास साक्षी है कि जो मानव परमार्थी बनकर जिया, वह न केवल अमरत्व को प्राप्त हो गया, वरन् अपनी सुकरनी से सम्पूर्ण देश, परिवेश और विश्व को सौरभमय भी कर गया. सुकरात ने परमार्थ का पक्षधर अन्त तक बने रहने के निमित्त ही जहर का प्याला पिया था. मौर्य शासक अशोक का बुद्धवाद, अहिंसावाद और धर्मप्रचार परमार्थ के ही सशक्त दृष्टान्त है युगों-युगों से वर्तमान तक अनगिनत मानव इस धरा पर अस्तित्वमय हुए फिर काल के गाल में समा गए, पर इनमें से हमें कितनों का स्मरण है? कितने अतीत के पृष्ठों पर सुरक्षित हैं? कुछ गिने-चुने ही और वही जो परमार्थ का भाव अपने अन्तर्मन में संजोकर औरों के हितों का संवर्धन, संरक्षण और क्रियान्वयन करने में अनवरत् रूप में क्रियाशील बने रहे. 

कथ्य है कि मानव वही है जो इंसानी मूल्यों से आप्लावित हो और परमार्थ इंसानी मूल्यों का अपरिहार्य तत्व है, इसलिए परमार्थ की श्रेष्ठ भावना के अभाव में मानव वैसा ही उजड़ा-सूना प्रतीत होता है, जैसे ‘मंगलसूत्र’ और ‘माँग के सिन्दूर’ के अभाव में नारी प्रतीत होती है. पुष्प अपनी सुरभि से, धरा अपनी ममता से, गगन अपनी गरिमा से तो गिरि अपनी दृढ़ता के कारण वैशिष्ट्य प्राप्त करते हैं. इसी प्रकार मानव अपनी परमार्थ की करनी द्वारा विशिष्ट है, पर यदि पुष्प से सौरभ, धरा से ममता, गगन से गरिमा और गिरि से उसकी दृढ़ता छीन ली जाए तो ये सभी अपनी उत्कृष्टता, अपनी पहचान खोकर तेजरहित हो जाएंगे. ठीक यही स्थिति परमार्थ रहित मानव के साथ है.

जिस प्रकार प्रत्येक पदार्थ, प्रत्येक वस्तु और प्रकृति की प्रत्येक रचना के साथ कुछ विशेषताओं और अद्वितीय गुणधर्मों की उपस्थिति अपरिहार्य होती है, उसी प्रकार मानव जीवन की सार्थकता हेतु भी ‘परमार्थ’ नामक गुणधर्म की विद्यमानता अत्यावश्यक होती है. परमार्थ बिना मानव वस्तुतः दो पैरों वाला पशु सम ही है जो स्वयं के लिए जीता है, स्वयं के लिए मरता है और सब कुछ स्वयं के लिए ही करता है. नदी को इसलिए पूजनीय स्वीकार किया जाता है, क्योंकि वह प्यासे की प्यास बुझाती है और वृक्ष को इसलिए सांस्कृतिक-प्रतीक उद्घोषित किया जाता है, क्योंकि वह क्षुधाग्रस्त को विनम्रतापूर्वक फल प्रदान कर उसकी क्षुधा को तृप्त करता है, सूर्य अपने प्रकाश, चाँद अपनी शीतलता और मेघ अपनी जल-वृष्टि के कारण ही प्रकृति को परमार्थी सिद्ध कर मानव को भी परोपकार हेतु दिशा-निर्देशित करते हैं. यदि प्रकृति का अपरिहार्य अंग पवन अपनी स्वाभाविक-परमार्थता तज दे तो क्या होगा? स्पष्ट है कि प्रत्येक जीवधारी का जीवन संकटापन्न हो जाएगा, परन्तु ऐसा नहीं होता है, क्योंकि सभी की अपनी विशिष्ट स्वाभाविकता व सार्थकता है, इसीलिए मानव जीवन की सार्थकता भी परमार्थ में ही सन्निहित है. मनोविज्ञान की दृष्टि से चेतना पत्थर में सोती है, वनस्पति में जगती है, पशु में चलती है और मनुष्य में चिंतन करती है और उसी चिंतन का ही यह परिणाम है कि परमार्थता मनुष्यत्व का अपरिहार्य अंग है. परमार्थ से युक्त मानव जीवन ऊर्जावान और कान्तिवान दृष्टिगोचर होता है. उसकी लोक सेवा उसका स्मारक बन जाती है.

मानव जब समाज में आगमित होता है तो उस पर समाज, राष्ट्र, संस्कृति और धर्म का ऋण होता है, इसीलिए उसे जन्म लेने के उपरान्त सामाजिकता, राष्ट्रीयता, सांस्कृतिकता और धार्मिकता के पावन आदर्शों से अपने अन्तर्करण को आप्लावित करके परमार्थ का व्यावहारिक कार्य सम्पादित करना ही पड़ता है, अन्यथा वह अपनी पहचान, लाक्षणिकता ही खो देता है. वस्तुत: गांधीजी का प्रिय भजन अपनी अन्तर्रात्मा में परमार्थ का सम्पूर्ण दर्शन ही समाहित किए हुए हैं-“वैष्णव जन तो तेणे कहिए, जे पीर पराई जाणे रे.” इसी भावना से प्रेरित होकर रंतिदेव ने कहा था 

न त्वहं कामये राज्यं, न स्वर्ग नपुनर्भवः 

कामये दुःख तप्तानां प्राणिनामार्तनाशनम्।

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का सूत्र भी परोपकर और लोक कल्याण में ही मानव जीवन की सार्थकता का साक्षात्कार करता है, इसीलिए यह स्पष्टतापूर्वक कहा जा सकता है कि मानव को परमार्थ की भावना से अभिभूत होना चाहिए. उसमें परोपकार की भावना कूट कूटकर भरी होनी चाहिए. वस्तुतः पशु परहित की भावना से शून्य होता है, इसीलिए मानव जीवन की सार्थकता केवल इसी में है कि वह अपने कल्याण के साथ दूसरे के कल्याण हेतु भी चिंतन करे, संकल्प करे और कार्य करे शहादत का इतिहास सदियों से परमार्थ की उद्घोषणा करता आ रहा है. संवेदना, करुणा, प्रेम, सहायता, दया और सहानुभूति वस्तुतः परमार्थ के ही अवयव हैं, जो मानव को मानव के सरोकारों से सम्बद्ध कर देते हैं, वैसे भी मानव जीवन ज्ञान, चेतना, विवेक, मानवीय मूल्यों और ‘पर’ (गुण और कर्म की वृत्ति या सत्ता) का ही नाम है, इसलिए परमार्थ बिना मानव जीवन निरर्थक प्रतीत होने लगता है. वस्तुः “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे भवन्तु निरामयाः” का सार और चिन्तन मानव को स्वार्थों से ऊपर उठाकर पर की आदर्शवादी अवधारणा से सम्बद्ध कर देता है. परमार्थ को साहित्यकारों ने मुक्ति का द्वार भी स्वीकार किया है. “बहुजन हिताय बहुजन सुखायः” का सूत्र भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र भी है और मानव हेतु श्रेष्ठ दिशा निर्देशक तत्व भी. परमार्थ तो मानव जीवन की प्राणवायु है, इसलिए परमार्थ तो मानव जीवन की प्राणवायु है, इसलिए परमार्थ के अभाव में मानव जीवन, जीवन तो रह ही नहीं जाता है, बल्कि सिसक-सिसककर दम भी तोड़ देता है, इसीलिए निर्विवाद एवं निर्भीकतापूर्वक यह कहा जा सकता है कि परमार्थरहित मानव प्रकृति, मानवता, समाज, राष्ट्र एवं धर्म के प्रति अपराधी तो सिद्ध हो ही जाता है उसका स्वयं का जीवन स्वयं के लिए भी अमांगलिक, निन्दनीय और निरर्थक सिद्ध हो जाता है. प्रत्येक धर्म परमार्थ का पोषण और उद्घोष करता आया है और करता रहेगा. पंडित जवाहरलाल नेहरू के अनुसार, “पूजा क्या है? धर्म क्या है? इंसानियत क्या है,” फिर वे स्वयं ही उत्तर देते हुए कहते हैं “पर सेवा, पर सहायता और पर हितार्थ कर्म करना ही पूजा है, धर्म है, इंसानियत है.” 

प्रो. आरनोल्ड टॉयनबी ने लिखा था-“भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति इसलिए स्वीकार्य है, क्योंकि इसमें मानव जीवन का लक्ष्य ‘स्व’ नहीं वरन् ‘पर’ का भाव है .

वस्तुतः मानव देवत्व और पशुत्व के बीच की कड़ी है. वह पाशविक प्रवृत्तियों के निराकरण और मानवीय प्रवृत्तियों के आत्मसातीकरण द्वारा मनुष्यत्व को प्राप्त होता है और निज जीवन परमार्थ के पावन कार्य हेतु पूर्णतः समर्पित करके वह बुद्ध, महावीर स्वामी व ईसा की तरह अन्ततः देवत्व की प्राप्ति भी कर सकता है. चूँकि परमार्थ का पावन भाव मानव को मानव के रूप में स्थापित करने के परिप्रेक्ष्य में अपरिहार्य तत्व है. इसलिए परमार्थ की अपूर्व व अद्वितीय महत्ता व प्रासंगिकता है जो सर्वस्वीकार्य है. अतएव यह सिद्ध है कि परमार्थ में ही मानव जीवन की सार्थकता निहित है. 

खलील जिब्रान के अनुसार “मानव रूप धारण किया है तो कार्य भी मानवीय सम्पादित करो. समाज के अंग हो तो दूसरों के हितों हेतु कुछ करो, अन्यथा पशु माने जाओगे. मैं धर्म की बात नहीं कर रहा हूँ यह तो इंसानियत का ही तकाजा है कि एक मानव दूसरे मानव के सहयोग, सहायता और भलाई के लिए सदैव तत्पर रहे. केवल एक यही तो वह बिन्दु है जहाँ पशु और मनुष्य पूर्णतः भिन्न दृष्टिगोचर होते हैं.” 

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