नदियों के जल बँटवारे के विवाद पर निबंध |Essay on the Dispute over the Sharing of rivers

नदियों के जल बँटवारे के विवाद पर निबंध

नदियों के जल बँटवारे के विवाद (River-Waters Distribution Disputes) 

सम्प्रति देश के कई राज्यों में नदियों के जल बँटवारे को लेकर विवाद चल रहे हैं जिसके कारण कई राज्यों की राजनीति गरम हो गई है. ऐतिहासिक रूप में देखा जाए, तो ये विवाद ब्रिटिश शासन के समय ही प्रारम्भ हो गए थे. वर्ष 1947 में जब स्वतन्त्रता प्राप्त हुई, तो इस तरफ ध्यान दिया गया और सन् 1956 में अन्तर्राज्यीय नदी जल विवाद कानून बना. इस कानून के बन जाने से कुछ सुधार हुआ और कुछ विवाद तो शान्त हो गए, लेकिन कुछ अभी भी चल रहे हैं. प्रमुख विवादों का क्रमिक व संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है

रावी-व्यास-सतलज जल विवाद 

हाल ही में सम्पन्न पंजाब चुनाव के बाद वहाँ के मुख्यमंत्री बने प्रकाश सिंह बादल ने रावी-व्यास नदियों के पानी को अन्य राज्यों को न दिए जाने की घोषणा करके इस विवाद को ताजा कर दिया है. इस विवाद का इतिहास काफी पुराना है और इसकी शुरूआत ब्रिटिशकाल में ही हो गई थी. सतलज नदी का पानी लेने के लिए तत्कालीन पटियाला रियासत व ब्रिटिशकालीन पंजाब का समझौता हुआ. इस समझौते के बाद सरहिन्द नहर बनाई गई और पंजाब की ब्रिटिश हुकूमत ने रॉयल्टी लेकर पटियाला रियासत को जलापूर्ति की थी. सन् 1920 में पंजाब की ब्रिटिश सरकार ने बीकानेर रियासत के महाराजा गंगा सिंह को तब पानी दिया जब उनसे रॉयल्टी ले ली. इस तरह गंग नहर बनाई गई. सन् 1945 की शुरूआत में चौधरी छोटूराम ने भाखड़ा प्रोजेक्ट का समझौता करके पंजाब के संगरूर, भटिंडा एवं वर्तमान हरियाणा के रोहतक, भिवानी व महेन्द्रगढ़ आदि जनपदों की जलापूर्ति की व्यवस्था की, लेकिन समझौते के बाद उनका स्वर्गवास हो गया. 

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद सन् 1955 में रावी व्यास नदियों के जल बँटवारे हेतु पहली अन्तर्राज्यीय बैठक हुई. 29 जनवरी को कुल पानी 15-85 मिलियन एकड़ फुट (एम. ए. एफ.) का जल बँटवारा समझौता सम्पन्न हुआ. इस समझौते के तहत् पंजाब को 5.90, राजस्थान को 8-00, पैप्सू को 1-30 तथा जम्मू कश्मीर को 0-60 एम. ए. एफ. पानी मिलना निश्चित हुआ. इस तरह पंजाब व पैप्सू को मिलाकर पंजाब को कुल 7.2 एम. ए. एफ. पानी आवंटित हो गया. 1 नवम्बर, 1966 को पंजाब का एक हिस्सा हरियाणा के रूप में अलग राज्य बना, तो जल बँटवारे का विवाद उभर कर सामने आया. नए प्रदेश हरियाणा ने सन् 1955 के समझौते को आधार मानकर 4.8 एम. ए. एफ. पानी पर अपना दावा जताया. वहीं पंजाब ने 7.2 एम. ए. एफ. पानी अपने पास रखना चाहा. 

जब पंजाब अपने रुख पर कायम रहा तो सन् 1969 में तत्कालीन हरियाणा सरकार पंजाब पुनर्गठन अधिनियम-1966 के तहत् जल बँटवारे के समाधान हेतु इस मामले को केन्द्र सरकार के पास ले गई. सन् 1970 में जल बँटवारे का विवाद सुलझाने के लिए केन्द्र सरकार ने एक समिति बनाई. अध्ययनोपरान्त इस समिति ने सन् 1971 में अपनी रिपोर्ट में हरियाणा राज्य को 3-78 मिलियन एकड़ फुट पानी देने की सिफारिश की. इसी तरह योजना आयोग के उपाध्यक्ष डी. पी. धर ने एक जाँच के बाद सन् 1973 में अपने प्रतिवेदन में पंजाब को 3-26 तथा हरियाणा को 3-74 मिलियन एकड़ फुट पानी दिए जाने की बात कही, लेकिन कुछ भी नहीं हुआ. 

जब श्रीमती इन्दिरा गांधी पुनः सत्ता में आईं, तो 31 दिसम्बर, 1981 को एक समझौता हुआ जिसके तहत् पंजाब को 4-22, हरियाणा को 3-50, राजस्थान को 8-60, जम्मू-कश्मीर को (0.65 तथा दिल्ली को (0.20 मिलियन एकड़ फुट पानी दिया जाना निश्चित हुआ. इसमें यह भी निश्चित हुआ था कि समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद दो वर्षों के अन्दर सतलज यमुना सम्पर्क नहर पूरी हो जाएगी तथा अपने राज्य के हिस्से की नहर पंजाब पूरी करवाएगा. 

हरियाणा व पंजाब की जनता की आशाएं जल्द पूरी हों इसलिए प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी ने पटियाला के गाँव कर्पूरी में नहर का उद्घाटन कर दिया, लेकिन पंजाब में बनने वाली नहर प्रधानमंत्री राजीव गांधी व लोंगोवाल समझौते (1985) के बाद बननी शुरू हुई. इस समझौते में भी 15 अगस्त, 1986 तक नहर के निर्माण कार्य को पूरा करने के आदेश दिए गए थे इसी बीच पंजाब व हरियाणा की जल सम्बन्धी माँगों का जायजा लेने के लिए न्यायाधीश बी. बालकृष्ण इराडी की अध्यक्षता में रावी व्यास ट्रिब्यूनल बनाया गया. इसके सदस्यों में न्यायमूर्ति ए. एम. अहमदी और न्यायमूर्ति पी. सी. मेनन थे. 30 जनवरी, 1987 को ट्रिब्यूनल ने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया. जिसमें पंजाब को 5-00, हरियाणा को 3-83, राजस्थान को 8.60, जम्मू-कश्मीर को 0-65 तथा दिल्ली को 0-20 मिलियन एकड़ फुट पानी देने की सिफारिश की, लेकिन आगे कुछ भी नहीं हुआ, क्योंकि पंजाब ने इसे मानने से इनकार कर दिया था. 

इसके बाद पंजाब में आतंकवाद बढ़ने लगा. मई 1988 में नहर के निर्माण कार्य में लगे उत्तर प्रदेश व बिहार के 32 मजदूरों को गोलियों से भून दिया. इसके कुछ समय बाद नहर से सम्बन्धित दो इंजीनियरों को भी मार दिया गया, तब राष्ट्रपति शासन के दौरान नहर निर्माण कार्य रोक देना पड़ा. सन् 1995 में हरियाणा सरकार इस मामले को पुनः सर्वोच्च न्यायालय ले गई और न्यायालय ने 15 जनवरी, 2002 को अपना ऐतिहासिक निर्णय सुनाया जिसमें यह कहा गया है कि एक वर्ष के अन्दर पंजाब सरकार अपने हिस्से की नहर का निर्माण पूरा करे और यदि पंजाब ऐसा न कर सके, तो यह कार्य केन्द्र सरकार पूरा करवाए. पंजाब सरकार ने निर्माण कार्य तो करवाया नहीं, लेकिन अवधि पूरी होने के एक दिन पहले ही 14 जनवरी, 2003 को सर्वोच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर कर दी.. 

इस याचिका पर फरवरी 2004 में आखिरी बहस हुई जिसका फैसला 4 जून, 2004 को हरियाणा के पक्ष में आया, जिसमें न्यायालय ने कहा कि पंजाब में नहर की खुदाई का कार्य 15 जुलाई, 2004 तक केन्द्र सरकार की एजेन्सी को सौंप दिया जाए. इस फैसले से जब पंजाब सरकार ने अपने को फंसते देखा, तो 12 जुलाई, 2004 को ऐतिहासिक कदम उठाते हुए 31 दिसम्बर, 1981 को हुए सभी समझौतों को रद्द करने वाला पंजाब इकरारनामा समापन बिल-20024 अपनी विधान सभा में सर्वसम्मति से पारित कर दिया. यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि सन् 1981 के समझौते में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री दरबारा सिंह, राजस्थान के मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर व हरियाणा के मुख्यमंत्री भजनलाल शामिल थे. पंजाब इकरारनामा समापन बिल-2004 में यह भी कहा गया कि हरियाणा व राजस्थान को मौजूदा पानी मिलता रहेगा. इसी के तहत् हरियाणा को 5.95 एम. ए. एफ. पानी नरवाना ब्रांच व भाखड़ा मेन लाइन से दिया जा रहा है. यह आपूर्ति इकरारनामा बिल की धारा-5 के तहत् जारी है. अब पंजाब की नई सरकार इस धारा को समाप्त करके अन्य राज्यों को पानी दिया जाना रोकने की घोषणा कर चुकी है. यदि यह आपूर्ति बन्द की जाती है, तो हरियाणा व राजस्थान की पेयजल व सिंचाई व्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा. 

कावेरी नदी जल विवाद 

कावेरी नदी के जल बँटवारे पर चार राज्यों तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, पुदुचेरी के मध्य विवाद की स्थिति बनी हुई है. 5 फरवरी, 2007 को कावेरी जल विवाद पंचाट का फैसला आया जिससे कर्नाटक व तमिलनाडु के लोग नाराज हैं और उन्होंने इस फैसले को मानने से मना कर दिया है. भौगोलिक स्थिति की ओर ध्यान दें, तो कावेरी नदी कर्नाटक के कोडागु जिले में ब्रह्मागिरि पर्वतमाला से निकलती है और कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल व पुदुचेरी होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है. इस नदी के बहाव में उसके तटवर्ती क्षेत्र सिंचित होते हैं. इसके पानी से कर्नाटक का 36-49 प्रतिशत, तमिलनाडु का 56-62 प्रतिशत, केरल का 4-05 प्रतिशत तथा पुदुचेरी का 0.95 प्रतिशत हिस्सा सिंचाई का लाभ ले सकता है. जब तक नहरों व बाँधों की व्यवस्था नहीं थी तब तक ऐसा हुआ भी.

 इस विवाद की शुरूआत तब हुई जब सन् 1883 में मैसूर रियासत ने इस पर बाँध बनाकर सिंचाई करनी चाही जिसका विरोध मद्रास प्रेसीडेन्सी ने किया. उस समय भारत में अंग्रेजों का शासन था. अतः मामला उनके न्यायालय में पहुँच गया. सन् 1892 में समझौता हुआ और कर्नाटक को बाँध बनाने की इजाजत मिल गई. जब उसने ऐसा किया, तो मद्रास ने मेत्तुर में एक बड़ा बाँध बनाया. इसके बाद विवाद और बढ़ गया. 19वीं सदी बीत गई और अगली सदी में सन् 1924 में पुनः समझौता हुआ जो 50 वर्ष के लिए था, परन्तु कर्नाटक, केरल व पुदुचेरी असंतुष्ट रह गए. मैसूर का कहना था कि मद्रास को अधिक व कर्नाटक को कम पानी मिला. 

जब देश आजाद हुआ तो कर्नाटक ने इसे न मानने की घोषणा कर दी, लेकिन आजादी के बाद की केन्द्र सरकारों ने किसी न किसी तरह पानी का बँटवारा जारी रखा. कर्नाटक, तमिलनाडू, केरल व पुदुचेरी के मध्य सन् 1972 में एक बार समझौता हुआ फिर भी कोई संतुष्ट न हुआ. जल बँटवारा विवाद के चलते सन् 1990 में केन्द्र सरकार ने कावेरी जल विवाद ट्रिब्यूनल का गठन कर दिया. दो जून को गठित इस पंचाट ने एक वर्ष बाद 25 जून, 1991 को अपने अंतरिम आदेश में निर्देशित किया कि कर्नाटक, तमिलनाडु के लिए प्रतिवर्ष 205 थाउजेंड मिलियन क्यूबिक फुट पानी छोड़े, कर्नाटक ने पहले ही पंचाट के गठन का विरोध किया था फिर उसने अन्तरिम आदेश के खिलाफ अपना कानून बनाया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था. 

इसके बाद अंतरिम आदेश से काम चलता रहा. पंचाट ने विवाद से जुड़े कई विषयों पर लम्बी कार्यवाही के बाद 27 जुलाई, 2006 को इसका फैसला आरक्षित कर लिया. न्यायमूर्ति एन. पी. सिंह की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय इस पंचाट ने 5 फरवरी, 2007 को अपना फैसला सुनाया जिसमें कर्नाटक के लिए 270, तमिलनाडु को 419, केरल को 30 तथा पुदुचेरी को 7 थाउजेंड मिलियन क्यूबिक फुट पानी आवंटित किया गया है. यह आवंटन जल वर्ष में सामान्यतः 740 टी एम सी फुट पानी की उपलब्धता के आधार पर किया गया है. पंचाट का अन्तिम आदेश केन्द्र सरकार द्वारा अन्तर्राज्यीय जल विवाद कानून के तहत अधिसूचित तारीख से लागू होगा. 

24 फरवरी, 2007 को कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच. डी. कुमारस्वामी की अध्यक्षता में हुई सर्वदलीय बैठक में सभी दलों ने पंचाट के फैसले पर एक स्वर में विरोध प्रकट किया और यह निर्णय लिया कि 90 दिनों के भीतर समीक्षा याचिका दायर की जाएगी. 

अन्य नदी जल विवाद

नदियों के जल बँटवारे के विवाद रावी, व्यास, सतलज व कावेरी के ही नहीं हैं. तमिलनाडु व केरल के मध्य मुल्लै पेरियार बाँध को लेकर विवाद चल रहा है. बनास धारा नदी के जल बँटवारे पर आन्ध्र प्रदेश व उड़ीसा के मध्य अभी भी विवाद हैं. चम्बल नदी के जल बँटवारे पर राजस्थान व मध्य प्रदेश लड़ रहे हैं. इसी तरह यमुना नदी के जल बँटवारे पर उत्तर प्रदेश, हरियाणा व दिल्ली के बीच तनाव चल रहा है. इन विवादों के अलावा नर्मदा नदी के पानी को लेकर गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र में झगड़े हो चुके हैं. गोदावरी के जल बँटवारे पर कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, उड़ीसा व महाराष्ट्र एवं कृष्णा नदी के पानी के लिए कर्नाटक, महाराष्ट्र और आन्ध्र प्रदेश को भी लड़ते देखा गया. फिलहाल इन नदियों के विवाद शान्त हैं. 

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि देश की अनेक नदियाँ जल बँटवारे पर अन्तर्राज्यीय विवादों का मुद्दा बन गई हैं. जल जीवनदायी है और जनता को आपस में जोड़ने का कार्य करता है, लेकिन आज जल का उपयोग अपने स्वार्थों के लिए किया जाने लगा है जो भारतीय संस्कृति के खिलाफ है. अतः इन विवादों को शीघ्र शान्त किया जाना चाहिए.

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