भारत में आतंकवाद पर निबंध |Essay on Terrorism in India

भारत में आतंकवाद पर निबंध

भारत में आतंकवाद पर निबंध |Essay on Terrorism in India 

आज आतंकवाद एक भयंकर चुनौती के रूप में हमारे सामने उपस्थित है. आतंकवाद आजकल एक अन्तर्राष्ट्रीय समस्या बन गया है, वह विश्व क्षितिज पर प्रलयंकारी बादलों की भाँति छाया हुआ है और प्रतिपल हमारे लिए संकटदायी बना हुआ है. न मालूम कहाँ और किसके ऊपर उसकी गाज गिरे और विनाशलीला समुपस्थित हो जाए ? कुछ अर्थों में तो आतंकवाद परमाणु बम से भी अधिक भयावह है, क्योंकि इसके कारण मानव-जीवन हर घड़ी विनाश के घेरे में बना रहता है. 

आतंकवाद के कारण 

हमारी स्वार्थबद्ध संकुचित दृष्टि ही आतंकवाद की जननी है. हमारी स्वार्थबद्धता की अभिव्यक्ति अनेक रूपों में होती है, जो अन्ततः आतंकवाद के पोषण एवं उसके प्रसार में सहायक बनते हैं; यथा—क्षेत्रवाद, धर्मान्धता, ऐतिहासिक घटनाएँ, भौगोलिक कारण, सांस्कृतिक टकराव, आर्थिक विषमता, भाषाई मतभेद, समन्वय की कमी, न्यायपालिका की दुर्बलता तथा संगठनों, सरकारी संस्थाओं एवं प्रशासनिक मशीनरी की निष्क्रियता, नैतिक ह्रास, जीवन के मूल्यों का अवमूल्यन, राजनीतिक कारण आदि. 

आजकल विश्व की राजनीति तथा पारस्परिक व्यवहार में क्षेत्रवाद एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण विभाजक तत्त्व बन गया है. हम स्वयं देख सकते हैं कि प्रत्येक अंचल या क्षेत्र सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक, राजनीतिक आदिक कारणों से अपने पृथक् अस्तित्व के लिए जागरूक है और संघर्षरत भी है. भारत में पृथक् कश्मीर की माँग, मिजोरम समस्या तथा श्रीलंका में तमिल समस्या क्षेत्रवादी आतंकवाद के ज्वलंत उदाहरण हैं. 

ऐसे भी उदाहरण हैं, जब भौगोलिक एवं जनसंख्या की दृष्टि से लाभ वाली स्थिति के राष्ट्र अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए अथवा अपने पड़ोसी राज्य को नीचा दिखाने के लिए आतंकवादी गतिविधियों का सहारा लेते हैं, कश्मीर में गतिमान आतंकवाद के पीछे अमरीका और पाकिस्तान के हाथ हैं. पंजाब के मामले में भी ऐसा ही था. कुछ वर्ग आतंकवाद के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता स्थापित करने का प्रयत्न करते हैं. बंगालियों में इस प्रकार की विचारधारा वहाँ रहने वाले अन्य राज्यों के निवासियों के लिए सदा से भय का कारण रही है. भारत में अपने वर्ण विशेष की सांस्कृतिक श्रेष्ठता का गर्व अनेक साम्प्रदायिक संघर्षों के मूल में देखा जा सकता है. 

लूटपाट के मूल में आतंकवाद का कारण मूलतः आर्थिक ठहरता है. आजकल भौतिकवादी दृष्टिकोण प्रायः सर्वव्यापी एवं सर्वग्रासी बन गया है. प्रत्येक व्यक्ति को आर्थिक असन्तोष सताता रहता है. हिम्मत वाले व्यक्ति आतंकवाद का मार्ग अपनाकर बैंक आदि लूटकर, फिरौती के लिए अपहरण करके, अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने का प्रयत्न करते हैं. 

इस प्रकार के आतंकवादी कार्य करने वाले व्यक्ति प्रायः मध्यमवर्गीय परिवारों के युवक होते हैं. 

भाषाई प्रदेशों के नाम पर जमकर खून-खराबा हुआ. राष्ट्र भाषा हिन्दी के नाम पर दक्षिण भारत में अनेक हिंसात्मक आन्दोलन हुए. भाषावार प्रदेश के निर्माण की माँग ने कितने आतंकवादियों को जन्म दिया है, इसका हिसाब किसके पास है ? भारत में आतंकवाद के पनपने के मूल में वस्तुतः भाषाई विवाद ही है. आतंकवाद नियमपूर्वक नित्य हत्याएँ, लूट, तोड़-फोड़ आदि की हिंसक एवं असामाजिक कार्यवाहियाँ करता है. यह प्रवृत्ति अन्य राज्यों में भी व्याप्त हो गई है. फलतः उत्तर भारत में जीवन अनिश्चित एवं दूभर हो गया है.

आतंकवाद का दुष्प्रभाव 

आतंकवाद ने हमारे समाज को, उसके प्रत्येक पक्ष, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक को समग्र रूप में प्रभावित कर दिया है. इसके कारण समाज में हिंसा, अनैतिकता, अविश्वास एवं अंधविश्वास का बोलबाला हो गया है. जनसामान्य का मनोबल क्षीण हो गया और असामाजिक तत्त्वों को बल मिला है. इतना ही क्यों, असामाजिक तत्वों को मनमानी करने की छूट सी प्राप्त हो गई है. 

आतंकवादी गतिविधियों ने समाज के आर्थिक पहलू को बुरी तरह प्रभावित किया है. लूट-पाट के फलस्वरूप समाज की आर्थिक हानि होती है और व्यापार करते हुए लोग डरते हैं. पूँजी-निवेश दिनोदिन लज्जाशील एवं संकोची बनता जा रहा है. 

आतंकवाद के कारण हमारा राजनीतिक जीवन भी विषाक्त बन गया है. अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए, विपक्षियों को नीचा दिखाने के लिए, राजनीतिक नेता गुण्डों का और असामाजिक तत्त्वों का सहारा लेते हुए देखे जा सकते हैं विपक्षियों की हत्या कराना, उनकी सभाओं में हो-हल्ला कराना, पथराव कराना, बम विस्फोट जैसी भयंकर कार्यवाहियाँ हमारे राजनीतिक जीवन का सहज अंग बनती जा रही हैं. 

आतंकवाद ने हमारे समाज के नैतिक पक्ष को तो बहुत बुरी तरह क्षतिग्रस्त किया है, नैतिक मूल्यों के प्रति अनास्था के फलस्वरूप समाज अनेक असामाजिक कार्यों को सहज भाव से स्वीकार करने लग गया है. हम सही और खरी बात कहते हुए डरने लगे हैं, क्योंकि आतंकवाद का फंदा हरएक के सामने सदैव झूलता रहता है. आतंकवाद के कारण हमारा नैतिक पतन बहुत तेजी के साथ हो रहा है. यह सबसे बड़े खतरे की घण्टी है. 

आतंकवाद ने अपहरण के रूप में अपना वह पंजा फैलाया है, जिसकी पहँच समाज में बहुत गहराई तक पहुँच गई है. अपहरण करके फिरौती वसूल करने को एक धंधे के रूप में अपना लिया गया है और इस धंधे में तथाकथित भले घरों के बेरोजगार युवक भी लग गये हैं. 

आजकल प्रदर्शित हिंसा प्रधान फिल्मों तथा प्रकाशित होने वाले साहित्य ने आतंकवाद को बहुत बढ़ावा दिया है. इनमें अपहरण, फिरौती वसूलने, हत्या आदि आतंकवादी दुष्कृत्यों को साधारण एवं सामान्य घटनाओं के रूप में दिखाया जाता है साथ ही आतंकवादी कार्यवाहियों के नये-नये मार्ग भी बताए जाते हैं. 

पंजाब, जम्मू-कश्मीर और असम में आतंकवाद का सर्वाधिक जोर है. यहाँ आतंकवादी अपने साथियों को आतंकवाद के बल पर जेल से छुड़वा लेते हैं. कश्मीर और असम में तो यह धंधा खूब जोरों पर है. यहाँ तक कि बड़े-बड़े राजनेताओं तक का अपहरण करके आतंकवादी अपने साथियों की रिहाई का सौदा करते रहते हैं. 

राष्ट्रीय स्तर पर नैतिक शिक्षा की व्यवस्था की जाए तथा सामाजिक विषमता को समाप्त करने के लिए आरक्षण की राजनीति पर पुनर्विचार किया जाए. प्रभावी कदम उठाए जाएँ. 

सरकारी और गैर सरकारी, सभी स्तरों पर सम्मेलन, गोष्ठियाँ आदि आयोजित करके आतंकवाद के विरुद्ध वातावरण तैयार किया जाए. पत्रकार, साहित्यकार एवं अध्यापक इस दिशा में योगदान करके बहुत कुछ कर सकते हैं, 

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद के विरुद्ध वातावरण तैयार करके आतंकवाद को सरलता के साथ कुंठित किया जा सकता है. इस हेतु संयुक्त राष्ट्रसंघ के मंच पर बार बार सशक्त आवाजें उठाई जानी चाहिए. 

मानव ने स्वार्थान्धता के वशीभूत होकर आतंकवाद की चादर ओढ़ ली है और वह ‘जिस डाल पर बैठा है, उसी को काट रहा है’ वाली लोकोक्ति चरितार्थ कर रहा है. हम यदि जीवन से ऊबकर मृत्यु का वरण करना चाहते हैं, तब तो आतंकवाद के मार्ग को अपनाना सर्वथा उपयुक्त है, परन्तु यदि हम हँसते, किलकते, चेहरे देखना चाहते हैं, अपने चारों और प्रसन्नता एवं हर्ष का वातावरण चाहते हैं और शस्यश्यामला धरिणी को सुवर्णमयी देखना चाहते हैं तो आतंकवाद हमारे लिए काल एवं कालकूट से भी अधिक भयंकर एवं भयावह है. हमें चाहिए कि एकजुट होकर डटकर उसका मुकाबला करें. हमें एक बात भली प्रकार समझ लेनी चाहिए कि आतंकवाद मात्र साम्प्रदायिक समस्या नहीं है, इसकी जड़ें राजनीति में हैं और उसका पोषण आर्थिक समस्याएँ करती हैं. इन सभी मोर्चों पर आतंकवाद के विरुद्ध आवश्यक कदम उठाना आवश्यक है. इसकी धार को कुंद करने के लिए जनता को जागरूक होना चाहिए.

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