आतंकवाद और मानव-मूल्य पर निबंध |Essay on terrorism and human values

आतंकवाद और मानव-मूल्य पर निबंध

आतंकवाद और मानव-मूल्य पर निबंध |Essay on terrorism and human values

सम्प्रति आतंकवाद एक भयंकर चुनौती के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उभरा है. वह विश्व क्षितिज पर प्रलयकारी बादलों की भाँति छाया हुआ है और प्रतिपल मानव के लिए संकट का वाहक बना हुआ है. न मालूम कहाँ और किसके ऊपर उसकी गाज गिरे व विनाशलीला प्रकट हो जाए? साथ ही इसके कारण मानव हर क्षण संत्रस्त तथा मूकदर्शक बना है. जहाँ तक आतंकवाद और मानव मूल्य का प्रश्न है, तो दोनों में छत्तीस का सम्बन्ध है. 

आतंकवाद वस्तुतः अतिवाद का दुष्परिणाम है. नीति सम्बन्धी यह कथन प्रायः सत्य है कि ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’. आज के भौतिकवादी युग में अतिवाद की काली छाया काफी बढ़ी है. इसके कारण असंतोष की स्थिति तेजी से बढ़ रही है. असंतोष की अभिव्यक्ति के अनेक माध्यम हैं, यथा-हिप्पीवाद, बोटल्स, वीटनेक्स व क्रुद्ध युवा पीढ़ी आदि. आतंकवाद आज राजनीतिक स्वार्थपरता की पूर्ति के लिए एक अमोघ अस्त्र बन गया है. हत्या, लूट, बलात्कार, अपहरण आदि इसके विभिन्न रूप हैं. अपनी बात मनवाने के लिए आतंक उत्पन्न करने की पद्धति एक सामान्य नियम बन गई है. शक्तिशाली राष्ट्र निर्बल राष्ट्रों के प्रति उपेक्षा का व्यवहार करता है, तो इसका प्रतिकार आतंकवाद है. उपेक्षित वर्ग भी अपनी अस्मिता प्रमाणित करने के लिए आतंकवाद का मार्ग अपनाता है. 

सन् 1982 में सिखों ने अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण आन्दोलन किया. पहले जैलसिंह और दरबारा सिंह के बीच खींचतान हुई, फिर केन्द्रीय सत्ता द्वारा दोनों की प्रतिस्पर्धा को बढ़ाकर भिंडरावाला को बढ़ावा दिया गया. सत्ताधीश इसके दुष्परिणामों को जानते हुए भी मूकदर्शक बने रहे. फलत : एक सामान्य सिख के दिमाग में यह भावना घर कर गई कि उन्हें सत्ता से न्याय पाने की आशा छोड़ देनी चाहिए. स्वर्ण मंदिर में सैनिक कार्यवाही के कारण सिखों का अभिमान आहत हुआ और कानून का राज्य शनैः शनैः आतंकवाद के कीचड़ में धंस गया. यहीं से आतंकवाद का पदार्पण हुआ.. 

स्वार्थबद्ध संकुचित दृष्टि ही आतंकवाद की जननी है. हमारी स्वार्थबद्धता की अभि व्यक्ति अनेक रूपों में होती है जो अंततः आतंकवाद के पोषण एवं प्रसार में सहायक बनते हैं, यथा-क्षेत्रवाद, धर्मान्धता, ऐतिहासिक घटनाएं, भौगोलिक कारण, सांस्कृतिक टकराव, आर्थिक विषमता, भाषायी मतभेद, समन्वय की कमी, न्यायपालिका की दुर्बलता तथा संगठनों, सरकारी संस्थाओं एवं प्रशासनिक मशीनरी की निष्क्रियता, नैतिक-हास या जीवन मूल्यों का अवमूल्यन तथा अपराध का राजनीतिकरण आदि. 

आतंकवाद रूपी विषधर के विष से न सोहनी महीवाल का पंजाब बचा है और न कमनीय कुंजगलियों वाला कृष्ण-कन्हैया और राधा का ब्रज. इसके दारूणदंश की व्यथा से न तो महावीर व बुद्ध के उपदेशामृत से सिक्त बिहार ही वंचित है और न चैतन्य की भास्वर भक्ति की स्निग्ध रस-धारा से आप्लावित बंग ही. केसर-कुंकुम से सुरक्षित कश्मीर की कमनीय केसर क्यारियों की श्यामल हरिताभा आज अपने ही स्वजनों के रक्ताश्रुओं के महासागर में विलीन हो चुकी है. कामरूप की कामाक्ष्या अपने ही दिग्भ्रान्त मातृ-हन्ताओं की काली करतूतों पर मातम मना रही है. सड़कें शोले बिछा रही हैं और डगरों पर डाकू दस्तक दे रहे हैं. हर रास्ते पर रहजन खड़े हैं तथा हाट-बाट पर बटमार बैठे हुए हैं, फिर शान्ति जाएं तो कहाँ और किधर? 

साम्प्रदायिक राजनीति की शक्ति पिछले दशकों में आतंकवाद के रूप में उभरी है. धार्मिक उपासना स्थल आतंकवाद के साधना स्थल बनते जा रहे हैं. इसके दु:खद परिणाम पंजाब से जुड़ी हुई घटनाओं में देखे जा सकते हैं. यह साम्प्रदायिक आतंकवाद देश की एकता व अखंडता की चिंता नहीं करता, बल्कि यह अपने ही सम्प्रदाय के उस प्रगतिशील वर्ग की भी चिंता नहीं करता है, जो देश की एकता के लिए समर्पित हैं. हरचन्द सिंह लोंगोवाल का अपने ही सम्प्रदाय द्वारा मारा जाना इसकी सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण परिणति है. विचित्र बात तो यह है कि सांस्कृतिक वैशिष्टय के अनेक प्रश्नों का जवाब राजनीति में ढूँढ़ा जाता है. प्रत्येक राजनीतिक आन्दोलन और मोर्चे की शुरूआत शांति के नाम पर होती है और फिर हिंसा, अराजकता एवं आगजनी का सहारा लिया जाता है. धर्म से आशा की जाती है कि आतंकवाद के मूल अतिवाद को दूर करे, परन्तु वहाँ भी कट्टरपंथ का सर्वग्रासी फन है. 

पूरे देश में अपराध, अराजकता, अनायास धन कमाने की लालसा, भ्रष्टाचार और राजनीति के बीच जो अन्दरूनी गठजोड़ है, उसका सिर्फ कुछ दर्दनाक पहलू ही अभी तक उजागर हो सका है. ऐसा नहीं है कि सिर्फ असम में, बल्कि कश्मीर में, पंजाब में, उत्तर-पूर्व के अन्य सूबों में हर जगह ऐसे ही हालात हैं. अभी कुछ दिन पहले दूरदर्शन पर एक खौफनाक दृश्य देखा गया. एक कश्मीरी युवक रो रहा था. उसका कहना था कि आतंकवादी अक्सर उनके गाँव पर धावा बोल देते हैं. जिन घरों में 15 वर्ष से ऊपर के लडके होते हैं, उन्हें वे जबरन उठा ले जाते हैं. बाद में पुलिसवाले उनके घरवालों को प्रताड़ित करते हैं. 

अविराम युद्ध-जर्जर विश्व के दग्ध मर्मस्थल को शान्ति, प्रेम और करुणा की सुधा से भारत ही शीतल करता रहा है, किन्तु मानवता का आशा केन्द्र भारत ही आज आतंकवाद के मर्मान्तक प्रहार से पराजित हो रहा है. विदेशों के क्रीतदास कुछ अपने ही राष्ट्रद्रोही जयचन्द हमारी स्वाधीनता और राष्ट्रीय अस्मिता के शवदाह के समारोह का आयोजन कर रहे हैं. मानव मूल्यों के प्रति दृष्टि में परिवर्तन हो जाने के कारण जनमानस के मन में हिंसात्मक प्रवृत्तियाँ बलवती हुई है और आतंकवादी गतिविधियों को बल प्राप्त हुआ है. फलतः हमारी चंचल मानसिकता हिंसा विरोधी नहीं रह गई है और हम आतंकवाद पर काबू नहीं कर पा रहे हैं. 

आतंकवाद और मानव मूल्यों का सम्बन्ध, विचारधारा, सिद्धांत व कार्यपद्धति शुरू से ही अलग-थलग रहे हैं. इन दोनों के बीच दूर-दूर तक कोई रिश्ता नजर नहीं आता है. अपनी मान्यता को हम एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट करते हैं. सन 1922 में चौरी-चौरा हत्याकांड के प्रति असहमत महात्मा गांधी ने अपना असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया था. महात्माजी के इस निर्णय का विरोध उनके अनेक सहयोगियों ने भी किया था, परन्तु अंग्रेज शासकों पर इसका भारी नैतिक दबाव पड़ा. उनके इस निर्णय से ब्रिटिश शासन के मानस पटल पर यह चित्र उभरा था कि भारतीय मानस अभी असभ्य कहाँ हुआ है. इस अवसर पर तथा आगामी आन्दोलनों में भी महात्मा गांधी की नीति यही रही थी कि जनशक्ति का उपयोग रचनात्मक हो. उसको उद्वेलित करके विध्वंसात्मक गतिविधियों द्वारा समाज का अहित ही होगा. 

आतंकवाद मानवता नहीं है, पशुता है, दानवता है. मानवता तो मानव-मानव से प्रेम, स्नेह व प्यार से प्राप्त होता है, किसी भी आतंकवादी समुदाय का कार्य मानवता से मेल नहीं खाता है. चाहे वे उल्फा हों, चाहे वे लिट्टे हों अथवा एम. सी. जी. या कश्मीरी उग्रवादी संगठन हों. न जाने आतंकवादी गतिविधियों में कितने मानवीय मूल्यों का अवमूल्यन हुआ है? मानवता का ह्रास हुआ है. इसका लेखा-जोखा करना सम्भव नहीं है. इन गतिविधियों में मानवीयता का गला घोंटा ही नहीं गया है, बल्कि इनका अस्तित्व ही संकटमय हो गया है, मानो मानव मूल्य सदा के लिए पृथ्वी से विलीन हो गए हैं. 

मानवता, दया, प्रेम, परोपकार, सद्भावना अहिंसा, करूणा, धर्माचरण, तप-त्याग, राष्ट्रप्रेम, सहानुभूति, संवेग-संरचना, शील, सदाचार आदि जो मानव मूल्यों का स्तम्भ रहा है, आतंकवाद में इसका अभाव हमेशा खटकता है. मानवीय मूल्यों से रहित आतंकवाद की एक अलग विचारधारा, चिंतन, मान्यता, सिद्धांत व मानसिकता रही है, जो कभी-भी मानव मूल्य रूपी रेखा को संस्पर्श नहीं कर पाती है. यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मानवीय मूल्यों के अभाव में हँसते-किलकते चेहरों के लिए, अपने चारों तरफ प्रसन्नता, हर्ष का वातावरण व शस्य-श्यामल धरती को सुवर्णमयी देखने की कल्पना असम्भव है. जिस राष्ट्र में आतंकवाद है, वहाँ मानव-मूल्यों के शोषण-दोहन की पूर्व पीठिका स्वयंसिद्ध है और जहाँ मानव-मूल्य नहीं है, उस राष्ट्र का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है. सच तो यह है कि आज विश्व मानवता संत्रस्त में है. 

आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए नैतिक मूल्यों का विकास करना होगा. अपनी कौमी अस्मिता त्यागकर साझा अस्मिता को विकसित करना होगा. साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग तथा ‘जय जगत् की परिकल्पना को विकसित करना होगा. साम्प्रदायिक आधार पर संरक्षण एवं विशेषाधिकार समाप्त कर, भावात्मक एकता व राष्ट्रीय एकता में वृद्धि के लिए मानव मूल्यों का विस्तार करना पड़ेगा. 

आतंकवाद को राष्ट्रीय बुराई के रूप में एक ओर करके सौहार्द्र एवं मैत्री की अवधारणा को जन-मानस तक पहुँचाना होगा. शैक्षिक प्रणाली में आमूल बदलाव, नैतिकता, भावात्मक एकता, न्याय, पारस्परिक विश्वास, व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को बढ़ावा देना, विश्व जनीन संस्कृति एवं कला के प्रति जागरूकता आदि उदात्त गुणों को व्यापक तौर पर विकसित करना होगा. साथ ही मानव तथा मानव-मूल्य में मधुर सम्बन्ध स्थापित करना होगा, अन्यथा आतंकवाद से मुक्ति पाने का प्रयत्न करना कुएँ में तैरने के समान होगा. 

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