स्वच्छ भारत अभियान पर निबंध | Essay on Swachh Bharat Abhiyan in Hindi

Essay on Swachh Bharat Abhiyan in Hindi

स्वच्छ भारत अभियान पर निबंध अथवा स्वच्छता देवत्व के निकटतम पर निबंध

“जब अंदरूनी और बाहरी स्वच्छता होती है, तो यह धर्मनिष्ठता से भी आगे हो जाती है।”—महात्मा गांधी 

भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी स्वच्छता को देवत्व के निकटतम् मानते थे। उन्होंने सदैव स्वच्छता को भक्ति के समतुल्य माना। स्वच्छता के महत्व को रेखांकित करते हुए बापू कहा करते थे कि स्वच्छता समग्र होनी चाहिए और इसमें सब शामिल हों। उनका विश्वास था कि स्वच्छ और निर्मल आत्मा अपवित्र शरीर में नहीं रह सकती। गंदे और दूषित दिमाग में स्वच्छ विचार उत्पन्न नहीं हो सकते और एक निर्मल, स्वच्छ एवं ईमानदार व्यक्ति अपने आस-पास गंदगी में नहीं रह सकता। अच्छे कर्म करने अथवा अच्छी घटनाओं के लिए सम्पूर्ण स्वच्छता जरूरी है और इसे बनाए रखना हर व्यक्ति की जिम्मेदारी होती है। 

स्वच्छता का सबक सिखाते हुए बापू कहा करते थे कि जिस प्रकार हमें अपनी व्यक्तिगत साफ-सफाई की चिंता होती है, उसी प्रकार हमें अपने पास-पड़ोस, बस्ती, कस्बे और शहर की साफ सफाई के प्रति भी जिम्मेदार होना पड़ेगा। इस जिम्मेदारी को वह प्रमुख नागरिक कर्त्तव्य के रूप में नियमित व्यवहार में सम्मिलित करने की सीख दिया करते थे। बापू के इन्हीं विचारों से प्रेरित होकर भारत में स्वच्छता की तरफ एक कदम बढ़ाया गया है। 

“भारत को सम्पूर्ण रूप से स्वच्छ बनाना बहुत आसान नहीं है। अनेक चुनौतियां हैं। आजादी के इतने वर्षों के बाद भी हम स्वच्छता के अनुकूल ढांचा नहीं खड़ा कर पाए हैं।” 

“मैं स्वच्छता के प्रति कटिबद्ध रहूंगा और इसके लिए समय दूंगा। मैं न तो गंदगी फैलाऊंगा और न दूसरों को फैलाने दूंगा।” भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गांधी जयंती के अवसर पर 2 अक्टूबर, 2014 को देशवासियों को स्वच्छता अभियान को लेकर जो शपथ दिलाई, ऊपर की पंक्तियों में उसका निहितार्थ है। इसी के साथ भारत में स्वच्छता अभियान का श्रीगणेश हुआ। भारत को स्वच्छ बनाने का यह अटूट अभियान बापू की डेढ़ सौवीं जयंती 2 अक्टूबर, 2019 तक चलेगा। इस अभियान के जरिए हम बापू के साफ-सुथरे भारत के स्वप्न को साकार करेंगे। निःसंदेह इस अभियान ने देशवासियों को स्वच्छता का बोध करवाया है और अब यह उनका दायित्व बनता है कि वे इस अभियान को सफल बनाने में अपना भरपूर योगदान दें। स्वच्छ भारत से ही हम मजबूत भारत की तरफ बढ़ेंगे। 

भारत को सम्पूर्ण रूप से स्वच्छ बनाना बहुत आसान नहीं है। अनेक चुनौतियां हैं। आजादी के इतने वर्षों के बाद भी हम स्वच्छता के अनुकूल ढांचा नहीं खड़ा कर पाए हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अंतिम आंकड़ों से पता चलता है कि गांव प्रधान इस देश के गांवों के 67.3% घरों में शौचालय की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। देश में 626 मिलियन लोग खुले में शौच करते थे। शहरों में कचरा निस्तारण और प्रबंधन की समुचित व्यवस्था नहीं थी। बढ़ती आबादी के साथ कचरे की मात्रा निरंतर बढ़ रही है। एक शहरी भारतीय एक साल में औसतन 165 किलो कचरा पैदा करता है। शहरों में जगह जगह अनिस्तारित कचरे के ढेर पहाड की तरह लगे रहते हैं। यह आंकड़ा गौर करने लायक है कि भारत के 7880 छोटे नगर जितना कुल कचरा (82 हजार मैट्रिक टन प्रतिदिन) पैदा करते हैं, 53 बड़े शहर (सभी मिलियन प्लस नगर) इससे ज्यादा कचरा (88 हजार मैट्रिक टन रोजाना) पैदा करते हैं। जीवनशैली में आए बदलावों के कारण प्रति व्यक्ति कूड़े का उत्पादन भी बढ़ा है। 

भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे स्वच्छता अभियान का असर दिखने लगा है। अगस्त, 2019 में केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए नवीनतम आंकड़ों के अनसार भारत के लगभग 6 लाख 40 हजार गांवों में से 5 लाख 90 हजार गांव ओडीएफ घोषित किए जा चुके हैं। इसके अलावा 32 राज्य/केंद्रशासित प्रदेश सहित लगभग 99 प्रतिशत तक स्वच्छता की पहुंच हो चुकी है। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में 22 तरह की बीमारियां कचरे की देन हैं। इससे होने वाली बीमारियों के कारण एक व्यक्ति पर सालाना 6.50 हजार रुपये का आर्थिक बोझ आता है। कूड़ा-कचरा निस्तारण की एक प्रभावी और कारगर अधोसंरचना का विकास हम अभी तक नहीं कर पाए हैं। ये जमीनी समस्याएं स्वच्छता अभियान में बड़ी बाधक हैं।

व्यावहारिक बाधाएं भी कमतर नहीं हैं। हम ऐसी जीवन शैली का विकास अभी तक नहीं कर पाए हैं, जो कि कचरे के उत्पादन को सीमित कर सके, जबकि स्वच्छता अभियान की सफलता के लिए नितांत आवश्यक है। हमारे ज्यादातर शहर गंदगी से बजबजाते हते हैं। गांवों में खुले में शोच की जो मानसिक आदत बन चकी है. वह टूटती नहीं दिख रही है। स्वच्छता के प्रति जागरूकता में इतनी कमी है कि हम अपने घर की सफाई दहलीज तक ही करते हैं और बाहर पड़े कूड़े-कचरे से बेपरवाह बने रहते हैं। यह बेपरवाही इस हद तक की है कि खुद घर का कचरा बाहर फेंककर बड़ी बेहवायी से नजरें फेर लेते हैं। राह चलते कहीं भी थूक देते हैं। सार्वजनिक स्थलों को गंदा करने की हमारी प्रवृत्ति बन चुकी है। ये प्रवृत्तिगत अवरोध भी कम गंभीर नहीं हैं। 

सुखद यह है कि स्वच्छ भारत अभियान के तहत हम साफ सफाई के प्रति नये सिरे से संकल्पबद्ध हुए हैं और सरकार भी इसके लिए मजबूती से आगे आई है। वर्ष 2019 तक चलने वाले इस 

अभियान को दो भागों में बांटा गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ भारत (ग्रामीण) और शहरी क्षेत्रों में स्वच्छ भारत (शहरी) अभियान संचालित किया जा रहा है। इस अभियान के तहत 66,575 घरों में रोजाना शौचालय बनेंगे, ताकि पांच सालों में प्रत्येक घर को शौचालय देने का लक्ष्य पूरा किया जा सके। 56,928 अतिरिक्त शौचालय ग्रामीण स्कूलों में बनेंगे। साथ ही देश के प्रत्येक स्कूल व शिक्षण संस्थानों में लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग टायलट बनेंगे।

स्वच्छता अभियान का दायरा अत्यंत व्यापक है। घर, स्कूल, अस्पताल, गलियां, सड़कें, बाजार, सरकारी कार्यालय, कार्यस्थल, रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, मूर्तियां, पार्क, स्मारक व अन्य सार्वजनिक स्थल, पर्यटन स्थल, तालाब, झीलें एवं नदियां आदि इसमें सम्मिलित हैं। इस अभियान को विशेष रूप से पर्यटन उद्योग से भी जोड़ा गया है। पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण देश के 50 शहरों को साफ-सुथरा किया जाएगा। अभियान के तहत कचरा निष्पादन प्रबंधन एवं अपशिष्ट जल प्रबंधन पर विशेष जोर दिया जाएगा तथा 500 शहरों में यह काम प्राथमिकता के आधार पर होगा। ‘वाश’ योजना के तहत इस अभियान में अमेरिका भी मदद करेगा। 

स्वच्छ भारत अभियान के लिए कुल 1,96,009 करोड़ रुपये। के भारी-भरकम बजट का बंदोबस्त किया गया था, जिसमें 1,34,000 करोड़ रुपये की भागीदारी ग्रामीण विकास मंत्रालय की होगी तथा 62,009 करोड़ रुपये की भागीदारी शहरी विकास मंत्रालय की होगी। इसमें 25% खर्च राज्य सरकारें वहन करेंगी। केवल जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्य 10% राशि का योगदान देंगे। कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि पूरी संकल्पबद्धता के साथ स्वच्छता अभियान की एक सुचिंतित एवं व्यापक रूपरेखा तैयार की गई।

यह सर्वविदित है कि सिर्फ राजनीतिक इच्छा शक्ति के बल पर ही कोई भी अभियान सफल नहीं हो सकता। इसके लिए जन सहयोग भी आवश्यक होता है। इस आवश्यकता को महसूस करते हुए ही महात्मा गांधी ने इस बात पर बल दिया था कि यदि लोग व्यक्तिगत स्वच्छता के साथ दूसरों तथा समाज को स्वच्छ रखने में सहयोग नहीं देते, तो ऐसे लोगों से मिलकर बने समाज में स्वच्छता, स्वास्थ्य, पोषण आदि की सिर्फ मांग की जा सकती है, जो कभी पूरी नहीं हो पाएगी। अतः खुद स्वस्थ रहना जितना जरूरी है, उतना ही यह भी जरूरी है कि हम दूसरों के लिए गंदगी न फैलाएं। यह सिर्फ स्वच्छ व स्वस्थ रहने से ही नहीं, बल्कि एक व्यक्ति की दूसरे व्यक्ति के प्रति संवेदनशीलता तथा समाज के प्रति जिम्मेदारी के भाव को भी दिखाता है। प्रत्येक व्यक्ति, जो गंदगी फैलाता है, उसे उसकी सफाई खुद करनी चाहिए। इसमें ऊंच-नीच का कोई भाव नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा सभी करने लगें तो इससे स्वच्छ समाज के साथ समरस सामाजिक संरचना वाले समाज का भी विकास होगा। ऐसे स्वच्छ समाज से ही स्वस्थ राष्ट के निर्माण की कल्पना की जा सकती है। इस स्वच्छता अभियान की सफलता के लिए बापू के उक्त विचार नितांत प्रासंगिक हैं। 

“जब हम स्वस्थ रहेंगे तो भरपूर ऊर्जा के साथ राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे सकेंगे। हमारी अर्थव्यवस्था विकसित होगी, तो स्वस्थ शरीर में वास करने वाले स्वस्थ मस्तिष्क में अच्छे विचार और संस्कार पुष्पित-पल्लवित होंगे।” 

स्वच्छता अभियान की सफलता के लिए कुछ और बातें भी जरूरी हैं। मसलन, हम समग्र रूप से न सिर्फ घर-बाहर स्वच्छता को बनाए रखें, बल्कि एक ऐसी जीवनशैली का भी विकास करें, जो कूड़े-कचरे के उत्पादन को सीमित करे। यह भी आवश्यक है कि हम साफ-सफाई करने वाले स्वच्छकारों को हेय दृष्टि से न देखें, बल्कि मानवीय दृष्टि का परिचय देते हुए उनके प्रति अपना व्यवहार सहानुभूतिपूर्ण बनाए रखें। स्वच्छता के कामों से जुड़े स्वच्छकारों को सम्मानीय मानकर उन्हें समाजधारा के केन्द्र में स्थापित किया जाए। । इस अभियान की सफलता के लिए यह भी आवश्यक है कि हम | अपने भीतर स्वच्छता के अर्थशास्त्र की नई समझ पैदा करें। 

इस अभियान की सफलता के लिए जनसहभागिता जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी यह भी है कि निरंतर इस अभियान की कड़ी निगरानी की जाए और इसकी प्रगति की बराबर समीक्षा करते हुए इसकी खामियों को समय रहते दूर किया जाए। ऐसा नहीं है कि ‘स्वच्छ भारत अभियान’ से पूर्व भारत में स्वच्छता के अभियान चलाए न गए हों। पूर्व के वर्षों में ऐसे अभियान चलाए जाते रहे हैं। वर्ष 1986 में तत्कालीन केन्द्र सरकार (राजीव गांधी के नेतृत्व वाली) द्वारा केन्द्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम (सीआरएसपी) की | शुरुआत की गई थी, जो कि बहुत प्रभावी साबित नहीं हुआ। इसी | प्रकार यूपीए सरकार द्वारा ‘निर्मल भारत अभियान’ की शुरुआत की | गई, जिसके तहत सरकार द्वारा यह लक्ष्य रखा गया कि वर्ष 2022 तक पूरे भारत को शौचालय से जोड़ा जाएगा। इस अभियान की अब तक की प्रगति भी संतोषप्रद नहीं रही। तसल्लीबख्श यह है कि निर्मल भारत अभियान को स्वच्छ भारत अभियान में शामिल करने का निर्णय लिया जा चका है। पर्व के स्वच्छता अभियानों के प्रभावी साबित न होने की मुख्य वजहें यही रहीं कि न तो इनकी निगरानी ठीक से की गई और न ही प्रगति की समीक्षा। जनसहभागिता का अभाव रहा, तो नौकरशाही हावी रही। इन बातों से हमें सबक लेना चाहिए।

स्वच्छ भारत अभियान के अनेक फायदे हैं। अच्छा स्वास्थ्य स्वच्छता से ही प्राप्त होता है। इस अभियान से लोग अच्छा स्वास्थ्य तो प्राप्त करेंगे ही, उनके जीवन की भी रक्षा होगी। आंकड़ों के अनुसार भारत में खुले में शौच के कारण प्रतिवर्ष दो लाख लोगों की मौत हो जाती है। खुले में शौच की प्रवृत्ति के कारण जल-खाद्य प्रदूषित हो जाते हैं। डायरिया जैसे प्रकोप बढ़ते हैं। इतना ही नहीं, छोटे बच्चों में मानसिक विकार उभर आते हैं। खुले में शौच के चलते त्वचा, श्वसन, नेत्र, आंत, गुर्दा, तपेदिक तथा गिल्टी जैसी अनेक बीमारियां पांव पसारती हैं। स्वच्छ भारत अभियान से इससे छुटकारा मिलेगा। स्कूलों और शिक्षण संस्थाओं में महिलाओं के लिए अलग शौचालय के निर्माण से महिला साक्षरता एवं सुरक्षा भी बढ़ेगी। जब हम स्वस्थ रहेंगे तो भरपूर ऊर्जा के साथ राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे सकेंगे। हमारी अर्थव्यवस्था विकसित होगी, तो स्वस्थ शरीर में वास करने वाले स्वस्थ मस्तिष्क में अच्छे विचार और संस्कार पुष्पित-पल्लवित होंगे। एक लाभ यह भी है कि देशवासियों में उत्तरदायित्व तथा जिम्मेदारी के भाव का विकास होगा। सामाजिक स्तर पर समरसता भी बढ़ेगी। 

यह सुखद है कि भारतीय संस्कृति स्वच्छता की संस्कृति के नाम से जानी जाती रही है। वस्तुतः भारतीय संस्कृति और सभ्यता की मूल चेतना ही पवित्रता और शुचिता अर्थात स्वच्छता ही रही है। हमारे मनीषियों ने ऐसी जीवनचर्या का निर्धारण किया, जो शारीरिक पवित्रता के साथ-साथ बाहरी पवित्रता एवं वातावरण की स्वच्छता को भी बनाए रख सके। इस प्राचीन भारतीय संस्कृति के संवाहक के रूप में बापू ने साफ-सफाई को ईश्वर सेवा से जोड़ा। यह सौभाग्य का विषय है कि अब ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के जरिए देशवासियों को स्वच्छता की सनातनी भारतीय संस्कृति को अभीष्ट आयाम देने का मौका मिला है। 

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