टिकाऊ विकास पर निबंध | पोषणीय विकास पर निबंध | टिकाऊ विकास किसे कहते हैं

टिकाऊ विकास पर निबंध

टिकाऊ विकास/पोषणीय विकास/धारणीय विकास अथवा टिकाऊ विकास पर निबंध | पोषणीय विकास पर निबंध | टिकाऊ विकास किसे कहते हैं-Essay on Sustainable Development

टिकाऊ विकास, जिसे धारणीय विकास एवं पोषणीय विकास आदि नामों से भी जाना जाता है, की अवधारणा सर्वप्रथम 1987 में प्रख्यात् पर्यावरणविद् ब्रटलैण्ड ने प्रतिपादित की थी। ब्रटलैण्ड के अनुसार टिकाऊ विकास वह विकास है जिसमें वर्तमान पीढ़ी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति आने वाली पीढ़ी की आवश्यकताओं को बिना हानि पहुंचाए करती है। टिकाऊ विकास प्रकृति के साथ मानव के साहचर्य, उसके प्रति श्रद्धा व सम्मान की भावना पर आधारित है। टिकाऊ विकास की अवधारणा हमारी प्राचीन जीवन पद्धति, जो सुख-शांति, समृद्धि, सौहार्द तथा संतोष के समावेश के साथ प्रकृति से निकटता तथा नैसर्गिक चिंतन पर आधारित थी, के बहुत निकट है।

पर्यावरण एवं विकास पर 1987 में विश्व आयोग द्वारा जारी रिपोर्ट (Our Common Future) ‘हमारा सम्मिलित भविष्य’ के अनुसार टिकाऊ विकास उसे कहते हैं जिससे भावी पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करने की योग्यता से कोई समझौता किए बगैर अपनी वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा किया जाता है। टिकाऊ विकास वास्तव में साधन सम्पन्न लोगों की तुलना में साधनहीन लोगों तथा वर्तमान पीढ़ी से अधिक भावी पीढ़ी को अधिक महत्त्व देता है। 

आज जो पर्यावरणीय क्षति हो रही है उसका एक मात्र कारण हमारी वह मानसिकता है जिसमें हम सोचते हैं—मैं जीवित हूँ, मेरी सुख-समृद्धि बढ़े ताकि मैं अत्यधिक सुख सुविधा का उपयोग कर सकू।इस मानसिकता पर प्रहार करते हुए विश्व बैंक के पूर्व अध्यक्ष जेम्स डी. वॉलफेंसान ने एक स्थान पर कहा था, ‘आगे देखिए और कल्पना कीजिए कि हम किस प्रकार का विश्व चाहते हैं। ठीक अभी नहीं लेकिन अपने बच्चों के लिए क्या हम अपनी पैतृक सम्पत्ति एक निर्धनतम, ससाधनविहीन विश्व के रूप में छोड़ रहे हैं, जहां बहुत सारे लोग भूखे हैं, एक अनिश्चित जलवायु है, कम वन हैं, कमजोर जैव विविधता है, और समाज उससे कहीं अधिक अस्थिर है जितना कि आज है।’ 

“आज जो पर्यावरणीय क्षति हो रही है उसका एक मात्र कारण हमारी वह मानसिकता है जिसमें हम सोचते हैं-मैं जीवित हूँ, मेरी सुख-समृद्धि बढ़े ताकि मैं अत्यधिक सुख सुविधा का उपयोग कर सकू।” 

1987 में ‘ऑवर कॉमन फ्यूचर’ नाम से विश्व आयोग की रिपोर्ट में उठाए गए मुद्दों पर सघन रूप से विचार हेतु 1992 में ब्राजील के शहर रियो डी जेनेरियो में पृथ्वी सम्मेलन का आयोजन किया गया। यह पहला सम्मेलन था जिसमें पर्यावरणीय संकट पर चर्चा के साथ-साथ विकास एवं पर्यावरण में संतुलन बनाने पर चचा की गयी। पृथ्वी सम्मेलन में अपनाई गयी कार्य नीति के आकलन हतु 1997 में संयुक्त राष्ट्र महासभा का विशेष अधिवेशन आयोजित किया गया। इस अधिवेशन में लिए गए निर्णय के अनुक्रम में 26 अगस्त, 2002 से 4 सितम्बर, 2002 तक जोहांसबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) में टिकाऊ विकास पर विश्व शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया। 

जोहांसबर्ग सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्कालीन महासचिव कोफी अन्नान द्वारा सुझाए गए पांच क्षेत्रों पर व्यापक चर्चा हुई। ये पांच क्षेत्र हैं—जल, ऊर्जा, स्वास्थ्य, कृषि एवं जैव विविधता। इस सम्मेलन का मुख्य एजेंडा था— ‘पर्यावरणीय सुरक्षा के साथ टिकाऊ विकास।’ सम्मेलन में जीवाश्म ईंधन, पेट्रोल, डीजल, कोयला को क्षति से बचाने के लिए पवन ऊर्जा एवं सौर ऊर्जा स्रोतों के विकास पर आम सहमति बनी। 

पर्यावरण में निरंतर बढ़ रहे प्रदूषण, जल स्रोतों की कमी, प्राकृतिक संसाधनों तथा जैव विविधता में निरंतर आ रही कमी से चिंतित अंतर्राष्ट्रीय संगठनों द्वारा किए जा रहे प्रयास से विश्व स्तर पर पर्यावरण के प्रति बोध एवं चेतना का विस्तार हुआ है। विगत दो दशकों में यह पर्यावरण बोध एक आंदोलन का रूप ले चुका है। विश्व के लगभग सभी देश अपने-अपने क्षेत्रीय पर्यावरण के प्रति जागरूक दिखाई दे रहे हैं तथा सभी उन युक्तियों को शीघ्रातिशीघ्र लागू करने पर बल दे रहे हैं जिनसे पर्यावरणीय हानि के बिना विकास की गति को बनाए रखा जा सके। किन्तु निरंतर बढ़ती जनसंख्या के दबावों तथा बेलगाम हो चुकी प्रौद्योगिकी गतिविधियों के कारण आज सम्पूर्ण विश्व व्यापक रूप से जलवायु परिवर्तन का शिकार हो रहा है। वैश्विक गर्माहट, निरंतर कम होते ग्लेशियर क्षेत्र, तथा वनों की – अंधाधुंध कटाई ने विश्व जलवाय पर विपरीत प्रभाव डाला है। वाहनों, जैव ईंधनों तथा उद्योगों से निरंतर निकल रही ओजोन हानिकारक गैसें आज जलवायु को प्रभावित कर एक व्यापक पर्यावरणीय समस्या को अंजाम दे रही हैं। 

जहां तक भारत का संबंध है, यहां पर्यावरण संबंधी अनेक ज्वलंत समस्यायें हैं। हालांकि भारत जैवविविधता से युक्त, प्राकृतिक संसाधनों से सम्पन्न देश है तथापि भारत में भी अब यह स्वीकार किया जाने लगा है कि विकास के लिए पर्यावरण का विनाश नहीं अपितु संरक्षण किया जाना आवश्यक है। इससे यही ध्वनित होता है कि पर्यावरण एवं जैवविविधता के संरक्षण के लिए भारत भी टिकाऊ विकास को लेकर प्रतिबद्ध है। 

“तीव्र औद्योगीकरण के साथ-साथ विश्व स्तर पर ऊर्जा के उपयोग में बेतहाशा वृद्धि हुई है। मानव के द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के अविवेकपूर्ण उपयोग के कारण ऊर्जा संसाधनों के क्षरण अथवा विलुप्त हो जाने तक का खतरा उत्पन्न हो गया है।” 

तीव्र औद्योगीकरण के साथ-साथ विश्व स्तर पर ऊर्जा के उपयोग में बेतहाशा वृद्धि हुई है। मानव के द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के अविवेकपूर्ण उपयोग के कारण ऊर्जा संसाधनों के क्षरण अथवा विलुप्त हो जाने तक का खतरा उत्पन्न हो गया है। टिकाऊ विकास निर्देशों के अंतर्गत आज संभवतः ऊर्जा को सर्वाधिक प्राथमिकता वाले क्षेत्र के रूप में शामिल किया गया है। यही कारण है कि ऊर्जा के संरक्षण के साथ-साथ ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों की तलाश को आज सर्वाधिक महत्त्व दिया जा रहा है। गैर-परंपरागत ऊर्जा संसाधनों की तलाश कर हम प्राकृतिक संसाधनों पर अपनी निर्भरता को कम करके ऊर्जा संरक्षण का महत्त्वपूर्ण कार्य कर सकते हैं। इसके साथ ही ऊर्जा का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग कर ऊर्जा का संरक्षण किया जा सकता है। इसके लिए उन्नत तकनीक का आविष्कार करना होगा। साथ ही इनका उपयोग भी करना होगा। ऊर्जा की भावी सकंटमय स्थिति का आकलन करके आज विकसित और विकाशील देश तेजी से इस दिशा में सोच रहे हैं। भारत के वैज्ञानिक भी इस दिशा में ठोस कदम की शुरुआत कर चुके हैं। 

निरंतर बढ़ती जनसंख्या, उद्योगों का विस्तार तथा घरेलू उपकरणों में हो रही बेतहाशा वृद्धि के कारण हमारी ऊर्जा आवश्यकता दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। ऊर्जा के भावी आवश्यकता को देखते हुए भारत सरकार द्वारा अनेक उपाय किए जा रहे हैं। 

1982 में देश में गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोत विभाग की स्थापना की गयी जिसे अब स्वतंत्र मंत्रालय का रूप दे दिया गया है। वह विभाग ऊर्जा के नए विकल्पों की तलाश के साथ-साथ ऊजा संरक्षण हेतु भी प्रयास करता है। 1987 में भारतीय नवीकरणाय ऊर्जा विकास अभिकरण की स्थापना की गयी। इस संस्था का मुख्य कार्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के व्यावसायीकरण की गति तेज करना है। ऊर्जा के क्षेत्र में नवीन स्रोतों की पहचान तथा ऊर्जा के दुरुपयोग को रोकने की दिशा में इस संस्था ने कई महत्त्वपूर्ण कार्य किए हैं। 

आज के पर्यावरणीय संकट का मूल कारण तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी विकास है और विद्वानों का मानना है कि जिस तकनीकी विकास ने समस्याओं को जन्म दिया है वही इसका समाधान भी करेगा। जैसा कि जॉन वी. लिण्डसे ने लिखा है- “Technology produced the crisis and Technology can end it.” forma यह कार्य तकनीक स्वतः नहीं करेगी, इसके लिये हमें उसे नई दिशा देनी होगी, अनुसंधानों में लगना होगा और प्रत्येक नई विकास तकनीक के साथ ही उन साधनों को भी खोजना होगा जो इसके कुप्रभावों को रोक सकें। 

टिकाऊ विकास के लिए हमें अब ऐसी रणनीति अपनानी होगी जिसमें पर्यावरणीय हानि लगभग शून्य के स्तर पर हो ताकि भावी पीढ़ी के लिए प्राकृतिक संसाधनों का भंडार बचा रहे। इस प्रकार के विकास को पारिस्थितिकी के अनुरूप विकास कहा जाता है। टिकाऊ विकास के लिए निम्नलिखित मार्गदर्शक सिद्धांत हैं जिन पर हमे ध्यान देना होगा- 

 1. उत्पादन के क्षेत्र में पारिस्थितिकी मित्रवत् प्रौद्योगिकी (Eco Friendly Technique) को अपनाया जाय। 

2.परियोजना मूल्यांकन की प्रक्रिया में जिन तीन ‘E’ (ई) पर विशेष ध्यान दिया जाय, वे हैं-(i) Environmental Proce (पर्यावरण सुरक्षा), (ii) Ecological Balance (पारिस्थितिकीय संतुलन), (iii) Economic Efficiency (आर्थिक दक्षता)। 

3.उत्पादन का विकेन्द्रीकरण करके इस क्षेत्र में जन भागीदारी बढ़ायी जाय। 

4.समग्र जीवन चक्र प्रबन्धन भूमण्डलीय आधार पर किया जाये ताकि संसाधन संरक्षण को एक प्रभावशाली दिशा दी जा सके। 

5.प्रभावी जवाबदेही तंत्र (Effective Accountability Sys tem) का विकास किया जाय जिससे कि पर्यावरण और पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सके। 

6.पारिस्थितिकी साक्षरता (Eco-Literacy) को प्रभावशाली वैश्विक आंदोलन की तरह चलाया जाय जिससे हर व्यक्ति पारिस्थतिकी के संरक्षण में सहयोग करने लगे। 

7.पोषणीय विकास पर प्रभावी जनमत निर्माण में पर्यावरणविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, गैर-सरकारी संगठनों की मदद लेनी चाहिए। 

8.विश्व के सभी राष्ट्रों द्वारा पर्यावरण के सम्बन्ध में वैश्विक संस्थाओं, संधियां व प्रोटोकालों को पूर्ण मान्यता दी जाय व उनका पूर्ण रूपेण अनुपालन हो। 

पर्यावरण एवं जैवविविधता के विश्वव्यापी संकट को देखते हुए टिकाऊ विकास एक वैश्विक जरूरत बन गया है। यह भारत के लिए भी जरूरी है। यदि हमने समय रहते इस दिशा में ध्यान न दिया तो हमारी भावी पीढ़ियां नैसर्गिक सौगातों से वंचित रह जाएंगी। टिकाऊ विकास के लिए जहां पर्यावरण के प्रति बोध एवं चेतना को विस्तार देना होगा, वहीं टिकाऊ विकास के मार्गदर्शक सिद्धांतों को व्यवहार के धरातल पर उतारना होगा। सुखद यह है कि भारत सहित विश्व के अधिकांश देशों में शुरुआत होती नजर आ रही है। 

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