सरोगेसी पर निबंध | Essay on Surrogacy in Hindi

सरोगेसी पर निबंध

सरोगेसी पर निबंध | Essay on Surrogacy in Hindi

भारत में सरोगेसी की नैतिक स्वीकार्यता अश्वा तातोली और भारत में सरोगेसी की नैतिक स्वीकार्यता अथवा सरोगेसी और समाज अथवा सरोगेसी : संगतियाँ-विसंगतियाँ 

सरोगेसी से अभिप्राय है, किसी और की कोख से अपने बच्चे को जन्म देना। यदि कोई पति-पत्नी बच्चे को जन्म नहीं दे पा रहे हैं, तो किसी अन्य महिला की कोख को किराए पर लेकर उसके जरिए बच्चे को जन्म देना ‘सरोगेसी’ कहलाता है। जिस महिला की कोख को किराए पर लिया जाता है, वह ‘सरोगेट मदर’ कहलाती है। सरोगेसी में एक महिला, दूसरी महिला के लिए इस मंशा से बच्चे को अपनी कोख में धारण करती है कि जन्म के बाद वह बच्चा दूसरी महिला को सौंप दिया जाएगा। सरोगेसी नामक यह तकनीक आधुनिक विज्ञान की देन है, जिसमें भ्रूण को टेस्टट्यूब में तैयार कर किराए की कोख में स्थापित किया जाता है। 

“सरोगेसी से अभिप्राय है, किसी और की कोख से अपने बच्चे को जन्म देना। यदि कोई पति-पत्नी बच्चे को जन्म नहीं दे पा रहे हैं, तो किसी अन्य महिला की कोख को किराए पर लेकर उसके जरिए बच्चे को जन्म देना ‘सरोगेसी’ कहलाता है।” 

सरोगेसी दो प्रकार की होती है-व्यावसायिक और परोपकारी। । जब किसी महिला को गर्भ धारण के एवज में धनराशि दी जाती है…. तब यह व्यावसायिक यानी कॉमर्शियल सरोगेसी कहलाती है। इसमें चिकित्सा खर्च से लेकर अन्य खर्च भी सम्मिलित होते हैं। परोपकार की भावना से जुड़ी सरोगेसी में परमार्थ का भाव प्रबल होता है और गर्भधारण के एवज में महिला कोई आर्थिक अनुदान नहीं लेती है। 

इसमें कोई दो राय नहीं कि संतानोत्पत्ति की नई तकनीक सरोगेसी ने भारत में परिदृश्य को बदलकर संतानहीनों को नया विकल्प उपलब्ध कराया है। जिन्हें ईश्वर ने संतान नहीं दी है, उन्हें चिकित्सक इस नई तकनीक से संतान दे रहे हैं। यह सच है कि आबादी की दृष्टि से भारत दुनिया का सबसे बड़ा देश है, किंतु एक सच यह भी है कि भारत में संतानहीनों की संख्या बहत अधिक है (लगभग 12 करोड़), जो कि आस्ट्रेलिया की जनसंख्या के बराबर है। पहले संतानहीनों के सम्मुख बच्चा गोद लेने का ही विकल्प होता था, किन्तु अब इस कृत्रिम तकनीक से उनके घरों में किलकारियां गूंजने लगी हैं। उनकी वंशबेल पनपने लगी है। सरोगेसी से जुड़ा प्रमुख सकारात्मक पहलू यही है कि इससे निःसंतान दंपत्तियों को संतान की प्राप्ति होती है, जिससे उनकी वंशबेल पुष्पित-पल्लवित होती है। व्यावसायिक सरोगेसी की स्थिति में सरोगेट माँ को इसका आर्थिक लाभ मिलता है। वह आर्थिक रूप से सशक्त होती है और उसके जीवन स्तर में सुधार आता है। परोपकारी सरोगेसी की स्थिति में तो यह परमार्थ से जुड़ा एक ऐसा कार्य है, जिससे असीम भावनात्मक सुख की प्राप्ति होती है, क्योंकि यह कार्य निःस्वार्थ भाव से करने वाली महिला किसी परिवार को एक अनमोल तोहफा देती है। वह बांझ दंपति की मदद कर आत्मसुख की अनुभूति करती है। 

संतानहीनों की झोली खुशियों से भर देने वाली सरोगेसी तकनीक की संगतियों के बीच इसकी विसंगतियाँ भी कम नहीं है। विसंगतियों का केन्द्र बिन्दु व्यावसायिक सरोगेसी है, जिसे रोकने के लिए भारत में सख्त कानून की जरूरत पड़ी। इस कानून पर चर्चा से पहले सरोगेसी की विसंगतियों की पड़ताल कर लेना उचित रहेगा। संतानोत्पत्ति के इस नए विकल्प के अनेक आलोच्य बिन्दु हैं। कुछ पेशेवर शुक्राणु, डिंब दान करने वालों या फिर किराये की कोख देने वाली महिलाओं से पैदा होने वाले बच्चों की सामाजिक स्थिति को लेकर जहाँ आलोचनाएँ तेज हुई हैं, वहीं यह भी कहा जा रहा है कि इसमें बच्चा, बच्चा नहीं, बल्कि ‘कमोडिटी’ बन जाता है। माँ और बच्चे के बीच का भावनात्मक संबंध टूट जाता है। यह विधि गर्भाधान और बच्चे को जन्म देने की प्राकृतिक प्रक्रिया में भी हस्तक्षेप करती है। इसमें गरीब महिलाओं के शोषण की गुंजाइश भी अधिक रहती है। इसी वजह से लोग सरोगेसी को असमताओं के माध्यम से महिलाओं का शोषण मानते हैं। कुछ समाजशास्त्रियों का यह भी मत  है कि इस तकनीक के अतिशय प्रयोग से सामाजिक समरसता के लिए खतरा बढ़ा है। इसने कारोबारी प्रवृत्तियों को बढ़ाया है। सरोगेसी के बढ़ते प्रभाव के कारण बच्चों को गोद लेने का चलन भी कम होने लगा है। सामाजिक ताने-बाने के लिए यह बात भी घातक है कि कुछ लोग व्यस्तता के कारण बच्चे पैदा नहीं करना चाहते हैं और इस वजह से इस तकनीक का सहारा ले रहे हैं। यह बात नैसर्गिक नियमों के विपरीत है। 

इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य सरोगेसी से जुड़ी समस्याओं से निपटना, तथा व्यावसायिक सरोगेसी पर रोक लगाना है। अभी यह विधेयक प्रक्रिया में है। कानून के रूप में प्रभावी (अधिनियमित होने पर) होने पर यह व्यावसायिक सरोगेसी और इससे जुड़े अनैतिक कृत्यों पर रोक लगाएगा। 

ज्यादा विरोध और आलोचना कॉमर्शियल सरोगेसी को लेकर है, क्योंकि इसके तहत महिलाओं को गर्भधारण करने का साधन माना जाता है और उनकी कोख को बिकाऊ वस्तु माना जाता है। भारत में कॉमर्शियल सरोगेसी बाधा-मुक्त होने के कारण इसने उद्योग की शक्ल अख्तियार कर ली और हमारे देश को ‘सरोगेसी कैपिटल’ के रूप में अभिहित किया जाने लगा। बढ़-चढ़ कर आर्थिक लाभ अर्जित करने के लिए इसका दुरुपयोग भी होने लगा, जिससे अवैध तौर-तरीके बढ़े। देश में 1300 करोड़ रुपये से अधिक का सरोगेसी का सलाना कारोबार होने लगा तथा इस धंधे में लिप्त 7000 से 8000 क्लीनिक अस्तित्व में आ गए, जिनमें से अधिकांश अवैध हैं। 1 से 4 लाख में सरोगेट माँएं मिलने लगीं, जिनमें से अधिकांश गरीबी की मारी होती हैं। देखते-ही-देखते भारत प्रजननीय पर्यटन का पसंदीदा अड्डा बन गया और विदेशियों ने इसका लाभ उठाना शुरू कर दिया। इस धंधे में बिचौलियों का वर्चस्व बढ़ने लगा। साथ ही गरीब और अशिक्षित महिलाओं को सरोगेसी के लिए बरगलाए जाने की घटनाएं सामने आने लगीं। यानी सरोगेसी के नाम पर गोरखधंधा शुरू हो गया, जिसमें शामिल हैं-डॉक्टर, नर्से, ट्रेवेल एजेंट, बिचौलिए, क्लीनिक, होटल-रेस्तरां एवं सुपर स्टोर्स आदि। 

सरोगेसी, विशेष रूप से कॉमर्शियल सरोगेसी से जुड़ी विसंगतियों के कारण भारत में इसके नियमन से जुड़े एक सशक्त कानून की आवश्यकता महसूस की गई और इसका प्रारूप तैयार किया गया। तद्नुसार 19 दिसंबर, 2018 को लोकसभा ने सरोगेसी (नियामक) विधेयक पारित कर दिया। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य सरोगेसी से जुड़ी समस्याओं से निपटना, तथा व्यावसायिक सरोगेसी पर रोक | लगाना है। अभी यह विधेयक प्रक्रिया में है। कानून के रूप में प्रभावी | (अधिनियमित होने पर) होने पर यह व्यावसायिक सरोगेसी और इससे जुड़े अनैतिक कृत्यों पर रोक लगाएगा। 

सरोगेसी (नियामक) विधेयक में व्यावसायिक सरोगेसी की घेराबंदी कर इस पर युक्ति-युक्ति अंकुश लगाने के प्रयास किए गए हैं। इस विधेयक के मुताबिक सरोगेसी का लाभ उठाने के इच्छुक व्यक्तियों को भारतीय होना होगा और उनकी शादी के कम-से-कम पाँच साल हो गए हों। इसके अलावा जोड़े में से किसी एक को यह साबित करना होगा कि वह बच्चा जनने की स्थिति में नहीं है। इस बिल के अनुसार समलैंगिक तथा एकल अभिभावकों को सरोगेसी की अनुमति नहीं होगी तथा जिस दंपति के पहले से बच्चे हैं, वे भी सरोगेसी का लाभ नहीं प्राप्त कर सकेंगे। पहले से बच्चे की स्थिति में छूट का प्रावधान तब है, जब बच्चा शारीरिक या मानसिक रूप से सक्षम न हो। विधेयक में सरोगेट माँ के लिए भी प्रावधान सुनिश्चित किए गए हैं। इन प्रावधानों के अनुसार सरोगेट माँ बनने वाली महिला शादीशुदा होनी चाहिए और उसका अपना बच्चा भी होना चाहिए। उसकी उम्र 25 से 35 साल के बीच हो और पहले कभी सरोगेट मदर न बनी हो। उसके पास सरोगेसी के लिए चिकित्सकीय रूप से सक्षम होने का सर्टिफिकेट भी होना चाहिए। सरोगेसी के लिए बनाए प्रावधानों का उल्लंघन करने पर बिल में कठोर सजा का भी बन्दोबस्त किया गया है। यदि सरोगेसी के प्रावधान तोड़े गए तो ऐसा करने वाले दंपति और सरोगेट मदर को क्रमशः 5 से 10 वर्ष की सजा हो सकती है। इसके अलावा 5 से 10 लाख तक का जुर्माना भी लगाया जा सकता है। यदि कोई मेडिकल प्रैक्टिशनर नियमों को तोड़ता पाया गया तो उसे कम-से-कम 5 साल की सजा और 10 लाख का जुर्माना देना पड़ सकता है। 

सरोगेसी के नियमन के लिए जिस सुचिंतित, पारदर्शी एवं नियंत्रणमूलक कानून की आवश्कता थी। वह ‘सरोगेसी (नियामक) विधेयक’ के रूप में प्रक्रिया में आ चुका है। इससे व्यावसायिक सरोगेसी की विसंगतियों से निपटा जा सकेगा। अब सरोगेसी के मामलों में नैतिकता का हनन नहीं हो पाएगा और निर्धारित नियम कायदों का अनुपालन करते हए वही लोग इसका लाभ प्राप्त कर सकेंगे, जिन्हें वास्तव में इसकी जरूरत है। 

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