ग्रीष्म ऋतु पर निबंध-Essay On Summer Season In Hindi

Essay On Summer Season In Hindi

ग्रीष्म ऋतु पर निबंध-Essay On Summer Season In Hindi

ग्रीष्म ऋतु भारत की राष्ट्रीय ऋतु है। भारत की बहुसंख्य आबादी गरीब है। इस बहुसंख्य आबादी के अनुकूल जो ऋतु होगी, उसे ही राष्ट्रीय ऋतु मानना चाहिए। ग्रीष्म ऋतु में यहां तेज गर्मी पड़ती है। सभी विद्यालय, महाविद्यालय एवं सरकारी कार्यालयों का समय प्रात:कालीन हो जाता है, क्योंकि गर्मी की दोपहरी में पृथ्वी तवे के समान तपने लगती है। ऐसे में बाहर निकलना और कार्य करना कष्टप्रद लगता है। चारों ओर लू चलती रहती है। सूर्य की प्रचंड गर्मी से व्याकुल होकर सभी जीव-जंतु पेड़ की छाया के लिए भटकते-फिरते हैं। सूर्य की गर्मी से तालाब, कुएं और नदी सूख जाते हैं। चारों ओर जल के लिए त्राहि-त्राहि मच जाती है। ऐसे में जल ही जीवन प्रतीत होने लगता है। ग्रीष्म ऋतु का वर्णन करते हुए सैयद गुलाम नबी ‘रसलीन’ लिखते हैं –

धूप चटक करि चेट अरु, फांसी पवन चलाइ। 

मारत दुपहर बीच में, यह ग्रीषम ठग आइ॥

ग्रीष्म की दोपहरी जितनी कष्टकर और डरावनी होती है; शाम एवं रात्रि उतनी ही सुखकर तथा लुभावनी होती है। शाम होते ही लोग घूमने निकल पड़ते हैं और देर रात्रि तक खुले वातावरण का आनंद लेते हैं। धनी लोग वातानुकूलित कमरे तथा बिजली के पंखों से गर्मी में राहत पाते हैं, जबकि गरीब हाथ के पंखों एवं पेड़ों की छाया से अपना काम चलाते हैं। कुल मिलाकर औसतन गरीब अमीर खुले आसमान के नीचे सोकर ग्रीष्म ऋतु व्यतीत करना पसंद करते हैं। 

ग्रीष्म ऋतु फलों की ऋतु है। फलों का राजा आम इसी ऋतु में मिलता है। इसके अलावा तरबूज, लीची, जामुन तथा शरीफा भी इसी ऋतु की देन हैं। खीरा, ककड़ी और खरबूजे भी ग्रीष्म ऋतु में ही उत्पन्न होते हैं, जो तपती गर्मी में लोगों को राहत देते हैं। जो लोग वसंत को ऋतुराज और वर्षा को ऋतु रानी समझते हैं, उन्हें ग्रीष्म ऋतु के महत्व को कम करके नहीं आंकना चाहिए। क्योंकि ग्रीष्म ऋतु ही वर्षा की पृष्ठभूमि तैयार करती है। 

ग्रीष्म ऋतु चार महीने-चैत, बैसाख, जेठ एवं आषाढ़ की होती है। जेठ मास गर्मी की युवावस्था है। जेठ मास की युवावस्था अर्थात दोपहरी हमें ग्रीष्म ऋतु का सही परिचय देती है। इस काल में सूर्य की प्रचंड किरणें आग उगलती हैं। सारी धरती तवे के समान तपने लगती है। चारों ओर गर्म हवा की लू चलती है। जेठ की दोपहरी में प्रायः बवंडर उठते हैं, जिन्हें ‘चक्रवात’ भी कहा जाता है। इसमें सभी पेड़-पौधे झुलसे दिखाई पड़ते हैं । राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की निम्नवत पंक्तियों में जेठ की दोपहरी का सटीक चित्रण हुआ है- 

बरसा रहा है रवि अनल, भूतल तवा-सा जल रहा, 

है चल रहा सन-सन पवन, तन से पसीना ढल रहा।

जेठ की लू बड़ी खतरनाक होती है। इसकी चपेट में आ जाने पर मौत से जूझना पड़ता है। सामान्य अवस्था में कोई घर से बाहर निकलना नहीं चाहता। बहुत आवश्यक होने पर ही लोग घर से बाहर निकलते हैं। पक्षी भी अपने अपने घोंसलों में दुबके रहते हैं। कुत्ते तो लंबी जीभ निकालकर किसी पेड़ की छाया तले बैठे रहते हैं। इस प्रकार जेठ की दोपहर रात्रि की नीरवता को भी मात कर देती है। इस संबंध में बिहारी लाल की निम्नवत पंक्तियां देखें 

बैठ रही अति सघन वन, पैढि सदन तन मांह। 

निरखि दोपहर जेठ की, छांहो चाहति छांह॥

लेकिन कुछ शरारती बच्चों पर जेठ की दोपहरी का कोई असर नहीं होता। ऐसे में जब उनके अभिभावक कमरे में बंद रहते हैं, तब ये बच्चे चुपके से घर से बाहर निकल पड़ते हैं और अपने साथियों के साथ आम झाड़ते, गुल्ली-डंडा खेलते या नदी-नाले में डुबकियां लगाते देखे जाते हैं। मानो ये बच्चे जेठ की दोपहर की भयावहता को भी चुनौती दे रहे हों। 

जेठ की दोपहरी से प्रत्यक्षतः कोई लाभ नहीं है, लेकिन परोक्ष में कुछ लाभ अवश्य होते हैं। जेठ की गर्मी से पृथ्वी का जल तेजी से वाष्पित होकर वायुमंडल में जा मिलता है। वर्षा ऋतु आने पर यही वाष्पित जल पुनः वर्षा के रूप में बरसकर हमें जीवन प्रदान करता है। इसीलिए यह कहा गया है कि जिस वर्ष जेठ नहीं तपता, उस वर्ष भादों नहीं बरसता।

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