मृदा एवं जल संरक्षण पर निबंध | Essay on Soil and Water Conservation

मृदा एवं जल संरक्षण पर निबंध

मृदा एवं जल संरक्षण पर निबंध | Essay on Soil and Water Conservation |भारतीय  कृषि : मदा एवं जल संरक्षण 

कृषि को उन्नत व प्रगतिशील बनाए रखने के लिए मृदा एवं जल संरक्षण की ओर समुचित ध्यान दिया जाना आवश्यक होता है। यदि मृदा और जल संरक्षण पर समुचित ध्यान न दिया जाए तो इसके व्यापक दुष्परिणाम देखने को मिलते हैं। मसलन, भूमियां बीहड़ या ऊसर में परिवर्तित होने लगती हैं। इसी प्रकार खेतों में जल जमाव के कारण भी फसलों को क्षति पहुंचती है। अक्सर पानी के तीव्र बहाव के कारण भूमि का ऊपरी व उपजाऊ भाग बह जाता है, जिससे कि कृषि को क्षति पहुंचती है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर भारतीय कृषि में मृदा एवं जल संरक्षण की आवश्यकता महसूस की गई। 

विषय की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए पहले मृदा संरक्षण को समझ लेना आवश्यक होगा। वैसे तो मृदा संरक्षण से आशय भूमि को किसी भी प्रकार की क्षति या नुकसान से बचाना होता है, किंतु कृषि वैज्ञानिकों ने इसे कुछ इस तरह से रेखांकित किया है। डॉ. शैली के शब्दों में- “मृदा संरक्षण का अर्थ है कि एक ही समय में भूमि का उचित उपयोग, सभी प्रकार से नष्ट होने से बचाव, मृदा क्षरण को नियंत्रित करना, फसलों के लिए नमी संचयन करना, उपयुक्त कृषि क्रियाएं, आवश्यकतानुसार जल निकासी व सिंचाई, मृदा की उपजाऊ शक्ति में वृद्धि तथा फसलों का उत्पादन व आमदनी, सब एक साथ बढ़ाना।” नेशनल प्लानिंग कमेटी ने मृदा संरक्षण को कुछ इस प्रकार से रेखांकित किया है-“मृदा संरक्षण के अंतर्गत मृदा प्रबंधन की विधियों तथा अन्य सभी तरीकों, जिनके द्वारा मृदा की उपजाऊ शक्ति को आंशिक या पूर्ण नष्ट होने से बचाया जा सकता है, सम्मिलित किया जाता है।” एच.एच. बैनिट ने से इस प्रकार परिभाषित किया है— “मृदा संरक्षण का अर्थ है कि भूमि को उसी कार्य के लिए प्रयोग में लाया जाए, जिसके वह योग्य है। अर्थात् भूमि से उसकी आवश्यकतानुसार व्यवहार करना और उसे उसकी सामर्थ्य के अनुसार उपयोग में लेना।” इस प्रकार हम देखते हैं कि मृदा संरक्षण से आशय भूमि को क्षतिग्रस्त होने से बचाना तथा उसकी उपजाऊ शक्ति को बढ़ाना है। 

मृदा क्षरण कई कारणों से होता है। जहां पानी और वायु का कटाव मृदा क्षरण का कारण बनता है, वहीं इसके लिए कुछ अन्य बातें भी उत्तरदायी हैं, जिन पर दृष्टिपात कर लेना आवश्यक होगा। प्रायः पहाड़ी क्षेत्रों में पानी के तीव्र बहाव के कारण मृदा क्षरण की समस्या पैदा होती है। इसमें भूमि का ऊपरी उपजाऊ भाग पानी के बहाव का हिस्सा बन जाता है, जिसे तल क्षरण कहते हैं। मैदानी इलाकों में अधिक वर्षा के कारण यह समस्या पैदा होती है। तल क्षरण का विकराल रूप होता है परतदार कटाव, जिसमें भूमि पर लकीरें व दरारें पड़ने लगती हैं। यह समस्या जब और उग्र हो जाती है, तो कछारदार कटाव का स्वरूप धारण कर लेती है। यह ज्यादा भयावह समस्या होती है, क्योंकि इसमें पानी के तीव्र बहाव के कारण भूमि टुकड़ों में बंटकर कछार में परिवर्तित हो जाती है तथा इसकी उर्वरा शक्ति का कुछ इस तरह से ह्रास होता है कि यह भूमि कृषि योग्य नहीं रह जाती है। 

हवा के तेज झोंकों के कारण वायु द्वारा भी भूमि कटाव की समस्या पैदा होती है। वायु भूमि क्षरण का कारण तब बनती है, जब इसके तेज झोंके भूमि के ऊपरी कणों को हवा में बहा ले जाते हैं। ये कण मृदा की उर्वरा शक्ति की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते हैं। इनके हवा के साथ बह जाने से मृदा की उर्वरा शक्ति का क्षीण पड़ जाना स्वाभाविक ही है। यदि हवा के माध्यम से वहां क्षारीय मिट्टी का जमाव शुरू हो जाता है, तो इससे भी वहां की मिट्टी प्रतिकूल रूप से प्रभावित होने लगती है। 

जल और वायु के जरिये तो मृदा का क्षरण तो होता ही है, कुछ अन्य बातें भी इसके लिए जिम्मेदार होती हैं। जैसे-घास-पात प्राकृतिक रूप से मदा संरक्षण का काम करते हैं। हम कषि कार्यों की वजह से इनके आवरण को हटा देते हैं। अक्सर पशु आदि भी इसे चर जाते हैं। नतीजतन मृदा का क्षरण तेज हो जाता है। जंगलों की कटाई व झूम खेती के कारण भी मृदा क्षरण की समस्या बढ़ी है। इससे भूमि अनावृत्त हो जाती है तथा जल और वायु के जरिये होने वाले मृदा क्षरण की प्रक्रिया तेज हो जाती है। मृदा क्षरण का एक बड़ा कारण गलत ढंग से जुताई करना भी है। अक्सर ढालू भूमि पर दोषपूर्ण जुताई के कारण यह समस्या सामने आती है। यदि मेढ़ें या कृत्रिम अवरोध बनाकर ढालू भूमियों पर जुताई नहीं की जाती है, तो पानी के बहाव से मिट्टी के ऊपर के उपयोगी व उपजाऊ तत्व बह जाते हैं। 

कृषि क्षेत्र में मृदा क्षरण के व्यापक दुष्परिणाम सामने आते हैं। इससे जमीन की उर्वरा शक्ति का तो ह्रास होता ही है, पानी का बहाव भी तीव्र हो जाता है, क्योंकि मृदा क्षरण के कारण भूमि की पानी को सोखने की भी शक्ति कम हो जाती है। चूंकि मिट्टी के अंदर उस नमी का अभाव होने लगता है, जो पौधों के विकास के लिए आवश्यक होती है। भूमिगत जल का स्तर गिरने लगता है। बीहड़ व रेगिस्तानी भूमियां पनपने लगती हैं। पानी के कटाव के कारण होने वाले मृदा क्षरण के जरिये मिट्टी नदियों में मिलती है, जिससे वे उथली हो जाती हैं। इससे बाढ़ की समस्या सामने आती है। 

चूंकि भारतीय कृषि में मृदा क्षरण के व्यापक दुष्परिणाम देखने को मिल रहे हैं तथा ‘राष्ट्रीय भूमि सर्वे’ व ‘भूमि उपयोग ब्यूरो’ द्वारा निरंतर मृदा क्षरण से जुड़े चिंताजनक आंकड़े पेश किए जा रहे हैं, अतएव मृदा संरक्षण की दिशा में व्यापक ध्यान दिये जाने की आवश्यकता महसूस की गई है तथा इस दिशा में यथेष्ट उपाय किये जा रहे हैं। 

हमारे देश में मृदा क्षरण को रोकने के लिए ढालू भूमियों पर व्यापक पैमाने पर वृक्षारोपण किया जा रहा है। इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहे हैं। पेड़ों की जड़ें भूमि को मजबूती प्रदान करती हैं, जिससे पानी के बहाव से होने वाला मृदा क्षरण रुकता है। इसी क्रम में ढालू भूमियों पर घास लगाई जा रही है, जो कि पानी के तीव्र बहाव को रोकने का काम करती है। घास का आवरण भूमि को मिल जाने के बाद पानी के कारण होने वाला भूमि क्षरण रुकता है। इससे पानी की गति तो नियंत्रित होती ही है, घास के रूप में पशुओं को चारा भी उपलब्ध हो जाता है।

भूमि क्षरण को रोकने के लिए दोषपूर्ण जुताई की तरफ भी ध्यान दिया जा रहा है। जुताई में इस तरह से संशोधन किया जा रहा है कि भूमि का क्षरण कम से कम हो। इसके लिए जुताई को ढालू खेतों के ढाल के अनुरूप न करके, ढाल के आर-पार की जा रही है, ताकि पानी का बहाव बाधित हो और भूमि का क्षरण कम से कम हो। भूमि क्षरण को रोकने के लिए नदियों के बहाव क्षेत्र में वनाच्छादन को प्राथमिकता दी गई है, ताकि बाढ़ आदि से होने वाले भूमि कटाव को रोका जा सके।

भूमि क्षरण को रोकने के लिए जहां अनियंत्रित रूप से पशुओं की चराई पर रोक लगाई जा रही है, वहीं इस काम के लिए अलग से विशेष किस्म के चारागाहों की व्यवस्था की जा रही है। इसी क्रम में जल कटाव से भूमि क्षरण को रोकने के लिए जहां मेढ़ों की ऊंचाई बढ़ाई जा रही है, वहीं उन फसलों की पैदावार को वरीयता दी जा रही है, जो भूमि के कटाव को रोकती हैं। भूमि क्षरण की सबसे ज्यादा समस्या पहाड़ी क्षेत्रों में होती है, क्योंकि पहाड़ों के ढालों पर जल बहाव बहुत तेज हो जाता है। इस बात को ध्यान में रखकर पहाड़ों पर सीढ़ीदार खेत बनाए जा रहे हैं, ताकि पानी का बहाव अवरुद्ध हो और भूमि का क्षरण रुक सके। भूमि संरक्षण को ही ध्यान में रखकर देश में भूमि पुनरुद्धार (Land Reclamation) के भी कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इसके तहत बजर व अनुपजाऊ भूमि को सधारने की दिशा में विशेष ध्यान दिया जा रहा है, ताकि उनको सुधार कर कृषि योग्य बनाया जा सके। यह कार्यक्रम राष्ट्रीय स्तर पर चलाया जा रहा है। 

मृदा एवं जल संरक्षण को लेकर भारत सरकार गंभीर है तथा इसे ध्यान में रखकर इस प्रकार नीतियां बनाई जा रही हैं, जिनके क्रियान्वयन से मृदा एवं जल संरक्षण को प्रोत्साहन मिल सके। अपनी नीतियों के उचित क्रियान्वयन हेतु सरकार द्वारा जहां ‘समन्वित मृदा एवं जल संरक्षण कार्यक्रम’ की स्थापना की गई है, वहीं कृषि और सहकारिता विभाग के मृदा एवं जल संरक्षण अनुभाग द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित कार्यक्रमों से कई तरह की समस्याओं की विस्तृत जानकारी प्राप्त की जाती है, ताकि इनका उपयुक्त समाधान तलाशा जा सके। इसी क्रम में भूमि उपयोग व संरक्षण कार्यक्रमों को ध्यान में रखकर जहां पहली पंचवर्षीय योजना के तहत केंद्रीय स्तरपर ‘राष्ट्रीय भूमि उपयोग तथा संरक्षण बोर्ड’ (National Land use and Conservation Board) की स्थापना की गई थी, वहीं दूसरी पंचवर्षीय योजना में केंद्र की तरह ही देश के राज्यों व केन्द्रशासित प्रदेशों में ‘भूमि उपयोग तथा संरक्षण बोर्डों’ की स्थापना की गई। इन पर राज्यवार भूमि संरक्षण व भूमि निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी गई। मिट्टी तथा जल संरक्षण के क्षेत्र में प्रगति व विकास को ध्यान में रखकर ‘अखिल भारतीय मृदा एवं भूमि उपयोग सर्वेक्षण संगठन’ (All India Soil and Land use Survey Organisation) की स्थापना की गई, जो कि एक राष्ट्रीय संगठन है और मुख्य रूप से मिट्टी तथा जल संरक्षण संबंधित समस्याओं का अध्ययन कर उनके समाधान भी प्रस्तुत करता है। इसके अलावा यह संगठन न सिर्फ जल विज्ञान की दृष्टि से मिट्टी का वर्गीकरण करता है, बल्कि पानी के रिसाव संबंधी गुण-दोषों का भी पता लगाता है और इस प्रकार यह संगठन देश के प्राकृतिक संसाधनों के बारे में राष्ट्रीय आंकड़ा प्रणाली बनाने में मददगार साबित होता है। 

भारत सरकार की मृदा एवं जल संरक्षण की नीतियां व्यापक हैं, जिनके तहत मुख्य रूप से निम्न बिन्दुओं पर ध्यान केन्द्रित किया गया है –

  • बाढ़ और सूखे जैसे संकटों से फसलों की सामूहिक सुरक्षा को सुनिश्चित करना, ताकि उत्पादकता में कमी न आने पाए।
  • ऐसे प्रयास सुनिश्चित करना, जिनसे भूमि के कटाव और उसकी उर्वरा शक्ति के ह्रास की प्रक्रिया को नियंत्रित किया जा सके।
  • रोजगार के अधिक से अधिक अवसर सृजित करने के उद्देश्य से भूमि के अधिकतम उपयोग को प्रोत्साहित व व्यवस्थित करना।
  • उन भूमियों को खेती योग्य भूमि में तब्दील करना, जो कि उपजाऊ नहीं हैं अथवा बंजर और बीहड़ की श्रेणी में आती हैं।
  • भूमि में फसलों की बुवाई संयुक्त रूप से करके भूमि के उत्पादक क्षेत्र को विस्तार देना तथा जमीन में जैव पदार्थों की पैदावार को प्रोत्साहन देकर कुल पैदावार को बढ़ाना।
  • समुचित सिंचाई की व्यवस्था देश में करना तथा भूमि के नमी क्षेत्र को बढ़ाना।
  • उन क्षेत्रों में कार्बनिक पदार्थों का फिर से उपयोग करके भूमि की भीतरी उर्वरा शक्ति को बनाए रखना, जो संसाधनों से अभावग्रस्त है।
  • ऐसे उपाय करना, जिनसे जल संरक्षण की समुचित व्यवस्था हो सके तथा छोटे-छोटे स्तरों पर सिंचाई क्षमता का विकास किया जा सके।
  • नदियों पर बड़े-बड़े बांध बनाकर कृत्रिम जलाशयों का निर्माण करना, ताकि इन जलाशयों में वर्षा ऋतु के जल को एकत्र करके जहां बाढ़ों को निष्प्रभावी बनाया जा सके, वहीं बाढ़ से होने वाले भूमि कटाव को भी रोका जा सके। 

उक्त बिन्दुओं के अलावा देश में भूमि तथा जल संरक्षण संबंधी समस्याओं के अध्ययन के लिए जहां आठ क्षेत्रीय अनुसंधान एवं प्रदर्शन केंद्रों की स्थापना देश के विविध भागों में की गई हैं वहीं रेगिस्तानी जमीन की समस्याओं के अध्ययन व उनके समाधान के लिए राजस्थान के जोधपुर जिले में रेगिस्तान वृक्षारोपण एवं अनुसंधान केंद्र की स्थापना की गई है। जल संरक्षण के तहत वर्षा सिंचित खेती पर भी ध्यान केन्द्रित किया गया है, क्योंकि यह खेती ही सबसे ज्यादा जटिल, जोखिम भरी व वैविध्यपूर्ण होती है। केंद्र सरकार द्वारा संभावित जल सम्भरण विकास के माध्यम से वर्षा सिंचित क्षेत्रों के संपूर्ण और निरंतर विकास को प्राथमिकता दी जा रही है। जल सम्भरण विकास में बरसाती पानी के संचय तथा मिट्टी और जल संसाधनों को स्थायी और मितव्ययी तरीकों से बढ़ाने पर जोर दिया जाता है। 

जल संरक्षण की दिशा में एक कदम और बढ़ाते हुए ‘राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक’ (नाबार्ड) द्वारा 200 करोड़ रुपये के एक कोष की स्थापना की गई है, जो कि प्राथमिकता के आधार पर चयनित 18 राज्यों के 100 जिलों में सामुदायिक भागीदारी के आधार पर समन्वित जल सम्भरण कार्यक्रम चला रहा है। दूसरी तरफ जल संरक्षण, उचित कृषि और जीविका प्रणाली के विकास तथा वर्षा सिंचित क्षेत्रों के सतत् व समग्र विकास को ध्यान में रखकर हमारे देश में वर्ष 2006 में ‘राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण’ का गठन किया जा चुका है। यह प्राधिकरण नीति निर्धारण, निगरानी व सलाह तीनों स्तरों पर सक्रिय है। यह प्राधिकरण उन भूमिहीन और सीमांत किसानों पर भी विशेष रूप से ध्यान देता है, जो संसाधन विहीन हैं और मुख्यतः इनकी निर्भरता वर्षा जल पर ही रहती है।

इस तरह से हम देखते हैं कि हमारे देश में मृदा और जल संरक्षण की तरफ व्यापक ध्यान दिया जा रहा है, ताकि भारतीय कृषि उन्नत और प्रगतिशील हो। यह अत्यंत आवश्यक भी है, क्योंकि यदि मृदा ही संरक्षित व सुरक्षित न रहेगी, तो किसानों के चेहरों पर मुस्कान कहां से आएगी। धरती ही सोना उगलती है, यदि वह ही अपनी शक्ति और क्षमता खो देगी, तो हमें व्यापक स्तर पर खाद्यान्न असुरक्षा, भूखमरी, गरीबी और बेरोजगारी का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में यह आवश्यक है कि भूमि और जल जैसे परम् तत्वों के संरक्षण के समग्र प्रयास हों। साथ ही इस बाबत जागरूकता भी बढ़े। यह खुशी का विषय है कि मृदा और जल संरक्षण को लेकर सरकारें तो प्रयत्नशील हैं ही, कृषि जगत भी अब जागरूक हो गया है। इसके सकारात्मक परिणाम सामने आने शुरू हो गए हैं। जेराल्ड ने कहा था-“यहां की भूमि इतनी कृपालु है कि उसे फावड़े से कुरेदो और वह फसलों से भरकर मुस्कराती है।” हमें अपनी मुस्कराहट को बनाए रखने के लिए अपनी भूमियों को संरक्षित रख कर उनके इसी स्वरूप को बनाये रखना होगा, जिसकी ओर जेराल्ड महोदय ने संकेत किया है। 

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