भारतीय संविधान के सामाजिक-आर्थिक सरोकार पर निबंध |Essay on Socio-Economic Concerns of Indian Constitution

भारतीय संविधान के सामाजिक-आर्थिक सरोकार पर निबंध

भारतीय संविधान के सामाजिक-आर्थिक सरोकार अथवा भारतीय संविधान का सामाजिक-आर्थिक आधार एवं दर्शन (Socio-Economic Policy of Indian Constitution

भारतीय संविधान सभा में संविधान निर्माण के पूर्व सबसे प्रमुख कार्य था संविधान के आधारभूत सिद्धांतों पर सभी सदस्यों की स्वीकृति। पं. नेहरू ने संविधान सभा में संविधान का उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत करते हुए भावी संविधान के सामाजिक एवं आर्थिक दर्शन को स्पष्ट कर दिया था। इस उद्देश्य प्रस्ताव में पाँच आधारभूत सिद्धांत थे-संघवाद (Federalism), पंथनिरपेक्षता (Secularism), लोकतांत्रिक समाजवाद (Democratic Socialism), संसदीय शासन (Parlia mentary Government) तथा न्यायिक समीक्षा (Judicial Review)। संविधान के आदर्शों पर विभिन्न विचारधाराओं और विभिन्न राष्ट्रीय नेताओं का गहरा प्रभाव पड़ा। पाश्चात्य राजनीति में उनके प्रशिक्षण और व्यवहारवाद ने प्रगतिशील समाजवादी आदर्शों का तालमेल गांधीजी के धार्मिक अराजकतावाद से बैठाया। और इस प्रकार एक सर्वोच्च आदर्शों और अत्यधिक सामाजिक सरोकारों वाले परिष्कृत भारतीय संविधान का निर्माण हुआ। संविधान सभा में बोलते हुए नेहरू जी ने कहा था, ‘इस सभा का पहला काम यह है कि वह नए संविधान द्वारा भारत को स्वतंत्र बनाए, भूख से पीड़ित लोगों को भोजन दे, वस्त्रहीन लोगों को आवरण दे, और प्रत्येक भारतवासी को उसकी क्षमता और योग्यता के अनुसार विकास करने का भरपूर अवसर दे।’ एक अन्य अवसर पर बोलते हुए नेहरू जी ने कहा था कि कोई संविधान यदि लोगों के जीवन के लक्ष्यों एवं आकांक्षाओं से अलग है तो वह खोखला है। यदि वह उन लक्ष्यों से पीछे रह जाय तो वह लोगों को नीचे गिरा देता है। 

“संविधान में गांधीवादी विचारधारा को भी भरपूर स्थान दिया गया। गांधीवाद के कुछ आधारभूत तत्वों, जो सामाजिक सरोकारों के संदर्भ में आज भी प्रासंगिक हैं, को पर्याप्त स्थान और महत्व दिया गया। अस्पृश्यता निवारण, धर्म-जाति आधारित भेदभाव, ग्राम पंचायतों का गठन, मद्य निषेध, गोवध निषेध, घरेलू एवं कुटीर उद्योगों का विकास आदि सिद्धांतों को संविधान में स्थान दिया गया।” 

संविधान में गांधीवादी विचारधारा को भी भरपूर स्थान दिया गया। गांधीवाद के कुछ आधारभूत तत्वों, जो सामाजिक सरोकारों के संदर्भ में आज भी प्रासंगिक हैं, को पर्याप्त स्थान और महत्व दिया गया। अस्पृश्यता निवारण, धर्म-जाति आधारित भेदभाव, ग्राम पंचायतों का गठन, मद्य निषेध, गोवध निषेध, घरेलू एवं कुटीर उद्योगों का विकास आदि सिद्धांतों को संविधान में स्थान दिया गया। 

भारतीय संविधान निर्माता भारत में एक ऐसी संवैधानिक व्यवस्था की स्थापना करना चाहते थे जो सिर्फ प्रशासकीय नियमों का संग्रह न होकर सामाजिक-आर्थिक विकास का एक संपूर्ण दस्तावेज हो। यही कारण है कि संविधान के प्रारूप पर उसके आर्थिक और सामाजिक सरोकारों पर जम कर बहस हुई और इस बहस के उपरांत जो दस्तावेज बनकर तैयार हुआ उसे विश्व के अनेक विद्वानों द्वारा ‘सामाजिक न्याय का चार्टर’ (Charter of Social Justice) कह कर विभूषित किया गया। आस्टिन (Austin) के शब्दों में ‘भारतीय संविधान सर्वप्रथम और प्रमुख रूप से एक सामाजिक प्रलेख है। इसके अधिकांश प्रावधान या तो प्रत्यक्ष रूप से सामाजिक क्रांति के विकास को संभव बनाते हैं अथवा इसके लिए आवश्यक परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं।’ 

प्रत्येक संविधान के कुछ मौलिक उद्देश्य तथा लक्ष्य होते हैं। इन उद्देश्यों तथा लक्ष्यों को प्रायः संविधान की प्रस्तावना में व्यक्त किया जाता है। अमेरिकी संविधान की भांति भारतीय संविधान की भी एक संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित प्रस्तावना है। प्रस्तावना के शब्द इस प्रकार हैं- 

“हम भारत के लोग भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 ई. (मिती मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।” 

सामाजिक और आर्थिक न्याय की प्राप्ति के लिए भारत में प्रजातंत्रात्मक पद्धति को अपनाया गया है। इसीलिए संविधान की प्रस्तावना में ही भारत को लोकतंत्रात्मक, प्रभुत्वसम्पन्न गणराज्य के रूप में घोषित किया गया है। प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय को स्थान देकर संविधान के सामाजिक सरोकारों का स्पष्ट रूप से रेखांकन कर दिया गया है। 

प्रस्तावना में घोषित सामाजिक आर्थिक दर्शन को क्रियान्वित करने के लिए संविधान के भाग 3 एवं भाग 4 में क्रमशः मौलिक अधिकारों और राज्य के लिए नीति निर्देशक तत्वों का उल्लेख किया गया है। वास्तव में संविधान के ये दोनों भाग संविधान के दर्शन हैं। इसमें भाग 3 जहां विधिक प्राधिकार रखता है वहीं भाग 4 राज्य के लिए निर्देश है। राज्य द्वारा विधि के निर्माण के समय इन निर्देशों का पालन करने की अपेक्षा संविधान द्वारा की जाती है। 

संविधान का भाग 3 जिसमें मौलिक अधिकारों का उल्लेख किया गया है, संविधान के सामाजिक आधार एवं दर्शन का न केवल प्रतिनिधित्व करता है, बल्कि इसे विधिक आधार भी देता है। संविधान सभा में इस भाग को लेकर काफी तर्क-वितर्क किये गये थे। संविधान निर्माताओं ने विभिन्न देशों में अपनाए गए मौलिक अधिकार संबंधी संवैधानिक प्रयोगों का भरपूर लाभ उठाया। अमेरिकी संविधान के अधिकार पत्र (Bill of Rights) फ्रांसीसी मानवाधिकारों की घोषणा, संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित मानवाधिकार इत्यादि ने भारतीय संविधान के इस भाग को परिष्कृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वस्तुतः संविधान का यह भाग संविधान को एक विशेष समाजशास्त्रीय अर्थ प्रदान करता है, क्योंकि यह सामाजिक समानता एवं संरक्षण की अभीष्ट रूप-रेखा को प्रस्तुत करता है। 

सिर्फ नागरिकों के विकास एवं उन्नयन के लिए ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जीवंतता एवं समृद्धि के लिए स्वतंत्रता को आवश्यक माना गया है। वस्तुतः स्वतंत्रता तो मनुष्य का नैसर्गिक अधिकार है तथा इसके बगैर न तो सामाजिक विकास संभव है, न ही आर्थिक। हमारे संविधान निर्माताओं ने इस बात को ध्यान में रखकर ही संविधान के अनुच्छेद 19, 20, 21 एवं 22 को व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं को समर्पित किया। इनमें से अनुच्छेद 19 तो विशेष रूप से उल्लेखनीय है, क्योंकि इसमें वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण तथा निरायुध सम्मेलन की स्वतंत्रता, संगम या संघ बनाने की स्वतंत्रता, भारत में सर्वत्र स्वतंत्रतापूर्वक भ्रमण करने की स्वतंत्रता, भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में निवास करने तथा बस जाने की स्वतंत्रता तथा वृत्ति, उपजीविका, 

व्यापार या कारोबार की स्वतंत्रता के अधिकार दिए गए हैं। अनुच्छेद 21 में प्रदान किया गया प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। आर्थिक न्याय की प्राप्ति की दृष्टि से जहां संविधान के अनुच्छेद 23 एवं 24 अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं, वहीं अनुच्छेद 25 से 28 नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रताओं को संरक्षित करते हैं। सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकारों की दृष्टि से संविधान के अनुच्छेद 29 एवं 30 अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।

भारतीय संविधान के सामाजिक एवं आर्थिक आधार एवं दर्शन को विधिक आधार देने एवं इनके प्रवर्तन हेतु विशेष प्रावधान अनुच्छेद 32-35 में किया गया है। इसके अंतर्गत इन अधिकारों के प्रवर्तन हेतु न्यायिक कार्यवाही की जा सकती है। 

“सिर्फ नागरिकों के विकास एवं उन्नयन के लिए ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जीवंतता एवं समृद्धि के लिए स्वतंत्रता को आवश्यक माना गया है।” 

इसके अतिरिक्त संविधान के कई अन्य ऐसे उपबंध हैं जो सामाजिक, आर्थिक न्याय की स्थापना करते हैं। समाज के दुर्बल तथा दलित वर्गों के लिए अध्याय 16 में कुछ विशेष उपबंध किए गए हैं। संविधान के अनुच्छेद 335, 16(4) तथा 46 द्वारा लोकसेवा में उनके लिए स्थान आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है। संविधान की छठवीं अनुसूची में कई उपबंधों का समावेश किया गया है यथा स्वायत्तशासी क्षेत्र, जिला तथा क्षेत्रीय परिषदों की स्थापना। संविधान की पांचवी अनुसूची में भी अनुच्छेद 214(1) के द्वारा अनुसूचित जातियों और जनजातियों को न्याय दिलाने की व्यवस्था की गयी है। राज्यपाल को अनुसूचित क्षेत्र के प्रशासन के सम्बन्ध में राष्ट्रपति को प्रतिवेदन देने का अधिकार दिया गया है। राज्यपाल जनजाति परामर्शदात्री समिति (Tribal Advisory Council) की स्थापना कर सकता है। अनुसूचित क्षेत्रों की विशेष समस्याओं और प्रगति के सम्बन्ध में विशेष कानून बनाने की व्यवस्था की गयी है। इस प्रकार अनुसूचित जातियों और जनजातियों के आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लिए संविधान में विशेष रूप से व्यवस्था की गयी है। 

अनुच्छेद 40 में राज्यों को दिए गए नीति निर्देशकों के अनुक्रम में देश में 73वां एवं 74वां संविधान संशोधन कर देश में पंचायती राज व्यवस्था की शुरुआत कर सामाजिक और आर्थिक न्याय के क्षेत्र  में एक क्रांतिकारी कदम उठाया गया है। 

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि हमारे संविधान निर्माता भारत में एक लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करने को कृतसंकल्प थे। वे एक ऐसे संविधान का निर्माण करना चाहते थे जिसका आधार सामाजिक एवं आर्थिक न्याय हो। वे देश को एक ऐसा संविधान देना चाहते थे जो सामाजिक एवं आर्थिक प्रगति के यंत्र के रूप में काम करे और सामाजिक और आर्थिक क्रांति का साधन बने। 

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