सामाजिक रूढ़ियाँ और युवकों का दायित्व पर निबंध | Essay on social stereotypes and responsibility of youth

सामाजिक रूढ़ियाँ और युवकों का दायित्व पर निबंध

सामाजिक रूढ़ियाँ और युवकों का दायित्व पर निबंध | Essay on social stereotypes and responsibility of youth

हर समाज की कुछ पारम्परिक मान्यताएं होती हैं जिन्हें आने वाली पीढ़ियाँ अपने पूर्वजों से ग्रहण करती जाती हैं. समय की माँग के चलते इन मान्यताओं के कुछ तत्व अनुपयोगी होते जाते हैं और कुछ नए तत्व इनमें जुड़ते जाते हैं. ‘रूढ़ि’ इसी परम्परा का एक अनुपयोगी हिस्सा है, जिसे सड़े हुए अंग की तरह हर समाज को काट फेंकना चाहिए.

आज भारतीय समाज में बाल-विवाह, दहेज प्रथा, जाति प्रथा, ऊँच-नीच, छुआ-छूत, लड़के-लड़की में अन्तर, अन्धविश्वास, आडम्बर, दिखावा आदि कुछ ऐसी ही रूढ़ियाँ हैं जो भारतीय समाज की जड़ों को खोखला कर ही हैं. मनौती मनाना, बलि चढ़ाना, टोना टोटका आदि अन्धविश्वास समाज को सच्ची धर्म-भावना से दूर कर रहे हैं. बिल्ली द्वारा रास्ता काट जाना, छींक आ जाना, दिशा शूल होना, तथा इसी प्रकार के अनेक अपशुकन भारतीय समाज को निकम्मेपन की ओर ले जा रहे हैं. ये ऐसे तत्व हैं जो मनुष्यता की हँसी उड़ा रहे हैं और प्रेम को दफन कर रहे हैं. इन रूढ़ियों से मुक्ति का दायित्व युवकों के कन्धों पर है क्योंकि युवकों द्वारा ही एक व्यापक सामाजिक परिवर्तन की आशा की जा सकती है. प्रश्न उठता है युवक ही क्यों? इसलिए कि इनमें उत्साह अधिक होता है, जबकि पुराने लोगों में अपनी पुरानी चीजों से लगाव अधिक होता है. 

दहेज का दानव 

प्रतिदिन कितनी ललनाओं को आग की लपटों में झोंक रहा है, दहेज का राक्षस इसका कोई हिसाब नहीं सुहागन होने का आशीर्वाद देने वाले सैकड़ों बापों के कन्धे पर बेटी की डोली नहीं अर्थी देखी जा रही है. धिक्कार है उस समाज को जहाँ दूल्हे की बोली लगती है. व्यक्ति जितना ही पढ़-लिखकर ऊँचा उठता जाता है, उसके दहेज की बोली उतनी ही ऊँची होती जाती है. आश्चर्य तो तब होता है जब इस माँग के पीछे युवकों की खुलेआम स्वीकृति होती है. वे यह तर्क तो देते हैं कि उनकी पढ़ाई पर लाखों के खर्च के बदले में ये दहेज लिए जाते हैं, लेकिन वे भूल जाते हैं कि लड़की के घर वाले भी अपनी बेटियों पर उतना ही खर्च करते हैं. इससे बड़ी त्रासदी तो तब दिखाई पड़ती है जब हर लपट के पीछे किसी सास या ननद नाम की स्त्री का हाथ होता है. हमारे देश के युवकों को यह तस्वीर बदलनी होगी. उन्हें दहेज की आग में अकाल मौत का ग्रास बनने वाली युवतियों को बचाना होगा, उन्हें साहसपूर्वक यह कहना होगा कि वह दहेज के नाम पर एक पैसा भी नहीं लेंगे.

बाल-विवाह 

‘बाल-विवाह’ की रूढ़ि भी आज कैन्सर की तरह फैलती जा रही है. लाखों बच्चियाँ को जिन्हें अभी ‘क-ख-ग’ का भी ज्ञान नहीं होगा विवाह के बन्धन में जकड़ दिया जाता है. जो अभी ‘विवाह’ और ‘पति’ का अर्थ भी नहीं जानती हैं, उन्हें एक बन्धन में बाँध 

दिया जाता है. इसका सबसे भयावह परिणाम होता है, असमय गर्भ-धारण और परिणामस्वरूप असमय जच्चा-बच्चा की मृत्यु. इसकी दूसरी समस्या जनसंख्या वृद्धि के रूप में होती है और तीसरी अस्वस्थ बालकों के जन्म के रूप में फिलहाल यह समस्या कुछ हद तक दहेज से भी जुड़ी हुई है, क्योंकि छोटी उम्र में शादी कर देने पर दहेज की माँग कम हो जाती है. इस बाल विवाह की प्रथा को समूल उखाड़ फेंकने में हर नौजवान को आगे आना चाहिए और अपने घर, समाज या देश में हो रहे बाल-विवाह को समाज और कानून के स्तर पर रोकना चाहिए.

जाति प्रथा 

जाति प्रथा हमारे समाज की एक अन्य रूढ़ि है, जिसको हमारे राजनेताओं ने आरक्षण की पद्धति द्वारा जातिवाद का रूप दे दिया है. जातिवाद हिन्दू समाज में वैमनस्य के बीज बो रहा है. अब तो उप-जातियाँ भी ‘कुकुरमुत्ते की तरह फैलती जा रही हैं. आज हमारे राजनेता धोबी सम्मेलन, यादव सम्मेलन, जाट सम्मेलन, केवट सभा, कुर्मी सभा आदि करके इस कुप्रथा को और भी बढ़ावा दे रहे हैं. उनके अनुसार यह चेतना फैलाने के लिए हो रहा है, लेकिन वे भूल जाते हैं कि यह चेतना चाहे जितनी फैलायें, लेकिन वे मनुष्यता को जरूर बाँट रहे हैं. आज हमें एक ऐसे समाज की जरूरत है जहाँ न ब्राह्मण हों, न क्षत्रिय हों, न शूद्र हों न कुर्मी हों, वहाँ सिर्फ मनुष्य हों जो मनुष्यता के लिए जिएं और मनुष्यता के लिए मरें. यह कार्य भी युवा-वर्ग द्वारा ही सम्भव है 

छुआछूत 

ऊँच-नीच और छुआछूत की भावना तो हजारों साल से चली आ रही है और आज भी समाज में कोढ़ की तरह फैली हुई है. जहाँ सारे धर्म और महापुरुष कह गए कि सभी एक ही ईश्वर की सन्तान हैं, सभी में एक ही आत्मा का वास है, सभी की रगों में एक ही रक्त प्रवाहित हो रहा है, वहीं आज के समाज में न जाने कितने अज्ञानी लोग ऊँच-नीच की भावना द्वारा समाज में विष घोलते रहते हैं. यदि समाज को आगे बढ़ना है, मनुष्यता की लाज रखनी है, तो इन कुत्सित विचारों को केंचुल की तरह उतार फेंकना होगा.

लड़के और लड़की में भेद 

लड़के और लड़की में भेद आज के समाज में हर जगह देखा जा सकता है न जाने कितने परिवारों में दूध और पौष्टिक चीजें सिर्फ लड़कों के लिए होती हैं. बचपन से ही लड़कियों को पराई मानकर पाला जाता है. कदम-कदम पर उन्हें लड़की होने का अहसास कराया जाता है. घर का झाडू-पोंछा और चौका-बर्तन सिर्फ लड़कियों के मत्थे होता है. वे लड़कियाँ खुशनसीब होती हैं जिन्हें लड़कों जैसा प्यार मिलता है और लड़कों जैसी शैक्षिक उपलब्धियाँ. मिलती हैं? दुःख तो तब होता है जब एक माँ जैसी स्त्री भी इस भेदभाव को बढ़ावा देती है. इधर कुछ वर्षों से एक विकराल समस्या ने और भी आ घेरा है जिसमें पेट में लड़के या लड़की के भ्रूण की पहचान हो जाती है. इससे हर रोज न जाने कितने लड़कियों वाले भ्रूण पेट में ही नष्ट कर दिए जाते हैं. यह एक ऐसी समस्या है जिससे आज स्त्री-पुरुष अनुपात और सामाजिक सन्तुलन को भयंकर खतरा उत्पन्न हो गया है. चूँकि इस भेदभाव को एक युवक भाई के स्तर पर, बाप के स्तर पर और पति के स्तर पर तीनों ही तरीके से समाप्त करने का बीड़ा उठा सकता है. अतः समाज इस अभिशाप से पीछा छुड़ाने के लिए युवा वर्ग की ओर देख रहा है. 

अन्धविश्वास 

अन्धविश्वास घुन की तरह समाज को चबा रहे हैं. अखबारों में प्रायः ऐसी खबरें पढ़ने में आ जाती हैं कि किसी व्यक्ति ने पुत्र प्राप्ति या देवी की खुशी के लिए बालक की बलि चढ़ा दी. विभिन्न धार्मिक उत्सवों में लाखों की संख्या में जानवर बलि वेदी पर मौत की नींद सुला दिए जाते हैं. बहुत बार किसी जिन्न या प्रेतात्मा को खुश करने के चक्कर में लोग अपना घर-बार तक गिरवी रखकर कर्म-काण्डों का आयोजन करते हैं. समाज को साफ-सुथरा रखने के लिए आज इनके खिलाफ भी युवा वर्ग की आवाज बुलन्द होनी चाहिए. 

शादी-ब्याह के अवसर पर सम्पत्ति का प्रदर्शन 

आज हर जगह देखा जा सकता है. कि सामर्थ्य से अधिक खर्च करने की प्रवृति हर आदमी में बढ़ती जा रही है. पड़ोसी के घर में नई कार देखकर दूसरा पड़ोसी भी चाहने लगता है कि काश उसके पास वह कार आ जाए. इसी के चलते लोगों का नाना प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते हैं. 

इसी दिखावे के चलते भ्रष्टाचार जैसी बुराई का जन्म होता है जिससे आज का समाज कदम-कदम पर जूझ रहा है. प्रदशनीय वस्तुएँ खरीदने के लिए लोग गलत काम का सहारा लेते हैं. यदि नम्बर 1 की आय द्वारा ये चीजें हासिल की जाएं तो कोई बात नहीं, लेकिन समस्या तो तब होती है जब इसके लिए लोग भ्रष्टाचार, चोरी, डकैती आदि 

का सहारा लेते हैं. इन्हें दूर करने के लिए आज बहुत बड़े नैतिक साहस की जरूरत है, बहुत बड़े सन्तोष की जरूरत है जिससे उतना ही खाया जाए, जितना कमाया जाए. 

उपसंहार 

आज के समाज को ऐसे युवा-युवतियों की जरूरत है जो अपने पैरों पर खड़े होकर अपने पसीने की कमाई से कुछ कर-गुजरने का साहस रखते हों, जिन्हें किसी दहेज की, किसी घूस की, किसी लालच की जरूरत नहीं हो. जिनमें नैतिकता, ईमानदारी, सच्चाई और देश में मानवता के प्रचार की ऊर्जा हो. जिनके कन्धे इतने मजबूत हों कि पूरा समाज उनके सहारे एक नई दिशा की ओर चल पडे. 

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