मलिन बस्ती पर निबंध | Essay on Slum in hindi

मलिन बस्ती पर निबंध

मलिन बस्ती पर निबंध | गन्दी बस्तियों पर निबंध | Essay on Slum in hindi

भारत में मलिन बस्तियों की संख्या अच्छी-खासी है। प्रायः देश के सभी शहरों में इन्हें देखा जा सकता है। मलिन बस्ती उस विकृत शहरी क्षेत्र को कहते हैं, जो अपर्याप्त और दयनीय आवासों, दुर्लभ जन सुविधाओं, अति भीड़-भाड़ युक्त व तंग इलाकों द्वारा परिलक्षित होता है। मलिन बस्तियों को गरीब तथा सामाजिक रूप से पंचरंगी (Heterogeneous) लोगों की निवास स्थली के रूप में अभिहित किया जाता है। ये बस्तियां समस्याओं की पर्याय होती हैं तथा इनके अपने दुष्परिणाम भी होते हैं। 

“भारत में आधारभूत सुविधाओं से वंचित मलिन बस्तियों के विस्तार का प्रमुख कारण है बढ़ता हुआ नगरीकरण। यह कहना असंगत न होगा कि शहरीकरण की विविध चुनौतियों में से एक प्रमुख चुनौती मलिन बस्तियां भी हैं।” 

वर्ष 2011 की जनगणना में भारत की मलिन बस्तियों को उन आवासीय क्षेत्रों के रूप में परिभाषित किया गया, जहां निवास स्थान जीर्णावस्था में हों, मकानों की संरचना दोषपूर्ण हो, गलियां अति संकरी हों, प्रकाश व सफाई का अभाव हो, स्वास्थ्य और सुरक्षा की दृष्टि से हानिकारक स्थितियां मौजूद हों तथा अधिसंख्य लोग हों। वर्ष 2011 की जनगणना में देश की मलिन बस्तियों को जिन तीन श्रेणियों में श्रेणीबद्ध किया गया, वे हैं-अधिसूचित मलिन बस्तियां (Notified Slums), मान्यता प्राप्त मलिन बस्तियां (Recognised Slums) एवं अभिज्ञात मलिन बस्तियां (Identified Slums)। इस जनगणना में देश के 2613 शहरों में 1.08 लाख मलिन बस्तियां चिह्नित की गईं। स्पष्ट है कि भारत में मलिन बस्तियों का घना मकड़जाल है। इन मलिन बस्तियों से जुड़ी एक विडंबना यह भी है कि तकरीबन आधी मलिन बस्तियां सरकारी कागजों पर दर्ज – कि तकरीबन आधी मलिन बस्तियां सरकारी कागजों पर दर्ज नहीं होती हैं। इससे जहां इनसे जुड़े सही आंकड़े सामने नहीं आ पाते हैं, वहीं इन्हें सरकारी योजनाओं से मिलने वाले लाभ से भी वंचित रह जाना पड़ता है। 

भारत में आधारभूत सुविधाओं से वंचित मलिन बस्तियों के विस्तार का प्रमुख कारण है बढ़ता हुआ नगरीकरण। यह कहना असंगत न होगा कि शहरीकरण की विविध चुनौतियों में से एक प्रमुख चुनौती मलिन बस्तियां भी हैं। प्रायः रोजगार की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग शहरों की तरफ पलायन करते हैं। इससे जहां नई-नई मलिन बस्तियां अस्तित्व में आती हैं, वहीं पहले से विद्यमान मलिन बस्तियों का विस्तार भी होता है। शहरों में रहने के लिए न तो पर्याप्त आवास हैं और न ही हम नगरीकरण को नियोजित ही बना पाए हैं। ऐसे में मलिन बस्तियों का बढ़ना स्वाभाविक है। 

नगरीकरण के अलावा भी कुछ कारण ऐसे हैं, जो मलिन बस्तियों के विस्तार में योगदान देते हैं। हमारे देश में विद्यमान अस्पृश्यता जैसी कुरीति ने जहां मलिन बस्तियों के विस्तार में योगदान दिया है, वहीं इस विस्तार में सरकार की दोषपूर्ण नीतियों का भी योगदान कम नहीं है। अलग-अलग राज्यों में राज्य सरकारोंकी अलग-अलग नीतियां होने के कारण भी सुधार कार्यक्रमों में एकरूपता नहीं आ पाती। फलतः स्थितियों में कोई विशेष सुधार नहीं दिखता है। मलिन बस्तियों के विस्तार में निजी क्षेत्र का भी योगदान कम नहीं है। निजी क्षेत्र से संबंधित संस्थानों में काम करने वाले कामगारों की संख्या तो अच्छी-खासा होती है, किंत ये संस्थान अपने कामगारों को आवासीय सुविधा नहीं उपलब्ध करवाते हैं। न ही सरकारों द्वारा इन पर ऐसा करने के लिए दबाव ही बनाया जाता है। नतीजतन निजी क्षेत्र के कामगारों को मलिन बस्तियों में ही शरण लेनी पड़ती है। 

मलिन बस्तियों के दुष्प्रभाव व्यापक होते हैं। दूषित पेयजल, जल भराव एवं गंदगी के कारण इन मलिन बस्तियों में संक्रामक बीमारियों का फैलना आम बात है। इनका बच्चों पर कुछ ज्यादा ही प्रभाव पड़ता है। यह अकारण नहीं है कि मलिन बस्तियों में रहने वाले परिवारों में बाल मृत्यु दर उन इलाकों की तुलना में तीन गुना ज्यादा होती है, जहां साफ-सुथरे आवास और अच्छा पर्यावरण होता है। इन मलिन बस्तियों में रहने वाले बच्चों के लिए न तो पार्क होते हैं और न ही क्रीड़ांगन। इससे इनका विकास बाधित होता है। हादसों और दुर्घटनाओं की भी बहुलता इन मलिन बस्तियों में देखने को मिलती है, तो स्वास्थ्य केंद्रों के अभाव के कारण समय पर उपचार न मिल पाने से लोगों को दम तोड़ते देखा जा सकता है। अशिक्षा का अंधियारा भी इन्हीं मलिन बस्तियों में सर्वाधिक होता है, तो अपराध एवं नशाखोरी आदि का भी केंद्र ये बस्तियां होती हैं। समग्र रूप से ये सारी बातें राष्ट्रीय प्रगति और विकास को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती हैं। 

ऐसा नहीं है कि हमारी सरकारों ने मलिन बस्तियों के उन्मूलन के लिए प्रयास न किए हों। इन्हीं प्रयासों के तहत वर्ष 1956 म ‘The SlumAreas (Improvement and Clearance)Act’ नामक कानून बनाया गया, तो वर्ष 1996 में ‘राष्ट्रीय स्लम विकास कार्यक्रम’ का सूत्रपात किया गया। इस कार्यक्रम के तहत जल निकासी, सीवर सिस्टम, पेयजल आपूर्ति, सामुदायिक शौचालयों, स्ट्रीट लाइट, स्कूली शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, प्रसूति, बाल स्वास्थ्य एवं प्राथमिक स्वास्थ्य पर ध्यान केन्द्रित कर मलिन बस्तियों की काया पलटने के उपाय किए गए। इसी क्रम में वर्ष 2005 में ‘जवाहरलाल नेहरू शहरी पुनर्वास योजना’ के जरिए मलिन बस्तियों में आधारभूत सुविधाएं बढ़ाने के उपाय किए गए। 

“यदि तहेदिल से प्रयास किए जाएं, तो भारत को मलिन बस्ती मुक्त बनाना मुश्किल नहीं है। आवश्यकता सुचिंतित प्रयासों की है। इसके लिए सबसे पहले तो उन कारणों को दूर करना होगा, जो मलिन बस्तियों में इजाफा करते हैं।” 

मलिन बस्ती मुक्त भारत के स्वप्न को साकार करने के उद्देश्य से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पहल वर्ष 2009-10 में ‘राजीव आवास योजना’ के रूप में की गई। इसकी खास बात यह थी कि एक तरफ तो इसमें उन कारणों को दूर करने का प्रयास किया गया, जो मलिन बस्तियों को बढ़ाते हैं, तो दूसरी तरफ स्लम जनसंख्या को सम्पत्ति के अधिकार भी दिए गए। बाद में इस योजना का समन्वय ‘मलिन बस्ती मुक्त भारत मिशन | (Slum Free India Mission) के साथ कर दिया गया, जिसका मुख्य लक्ष्य देश की सभी मलिन बस्तियों को औपचारिक प्रणाली के अंतर्गत लाकर वहां के निवासियों को वैसी ही मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना है, जो सामान्य बस्तियों को प्राप्त हैं। इस मिशन के तहत वर्ष 2022 तक भारत को मलिन बस्ती मुक्त बनाया जाना है। 

मलिन बस्ती की समस्या से निपटने के लिए ‘प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी क्षेत्र)’ के रूप में भी एक अच्छी पहल की गई है, जिसका उद्देश्य वर्ष 2022 तक देश के शहरी क्षेत्रों में सभी के लिए आवास उपलब्ध करवाना है। इसके तहत जहां भूमि का संसाधन के रूप में उपयोग करते हए निजी विकासकर्ताओं की भागीदारी के साथ स्लम निवासियों का पुनर्वास करना है, वहीं ऋण संबद्ध ल्पाज सब्सिडी के माध्यम से दुर्बल वर्गों के लिए वहनीय आवासों को प्रोत्साहन प्रदान करना है। इस योजना के तहत निर्मित होने वाले मकानों का स्वामित्व परिवार की महिला प्रमुख के नाम होगा अथवा परिवार के पुरुष प्रमुख और उसकी पत्नी के नाम संयुक्त रूप से होगा। 

मलिन बस्ती की समस्या से उबरने के लिए समय-समय पर कुछ अन्य प्रयास भी होते रहे हैं, जिनमें प्रमुख हैं—वर्ष 2007 की राष्ट्रीय शहरी आवास एवं पुनर्वास नीति, वाल्मीकि अम्बेदकर आवास योजना (2001), शहरी निर्धनों को स्वास्थ्य मिशन, 2013 एवं राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन आदि।। 

सरकारी प्रयासों के बावजूद भारत को मलिन बस्ती मुक्त बना पाने में अभी तक कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो सकी है। इसके पीछे भी कई कारण हैं। पहला प्रमुख कारण तो यह है कि मलिन बस्तियों के उन्मूलन अथवा इनकी कायापलट के लिए जितनी भी योजनाएं व अभियान चलाए जा रहे हैं, उनमें परस्पर समन्वय का नितांत अभाव है। काम करने वाली एजेंसियां भी समन्वय के स्तर पर पिछडी हई हैं। इस खामी के कारण समग्र सधार नहीं दिखता। केंद्र 

और राज्य सरकारों के बीच भी समन्वय व सहयोग का अभाव देखने को मिलता है, जिससे वांछित परिणाम सामने नहीं आ पाते हैं। इच्छाशक्ति का अभाव और भ्रष्टाचार भी अवरोधक की भूमिका निभाते हैं। एक कारण यह भी है कि शिक्षा और जागरूकता के अभाव में मलिन बस्तियों में रहने वाले उन योजनाओं और अभियानों का लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं, जो उनके लिए संचालित की जा रही होती हैं। 

यदि तहेदिल से प्रयास किए जाएं, तो भारत को मलिन बस्ती मुक्त बनाना मुश्किल नहीं है। आवश्यकता सुचिंतित प्रयासों की है। इसके लिए सबसे पहले तो उन कारणों को दूर करना होगा, जो मलिन बस्तियों में इजाफा करते हैं। सर्वप्रमुख कारण तेज रफ्तार में ग्रामीण जनसंख्या का शहरों की ओर पलायन है, जिसे रोकने के लिए गांवों में ही रोजगार के अधिक से अधिक अवसर सृजित करने होंगे, ताकि इस पलायन को रोका जा सके। ग्रामीण क्षेत्रों में लघु और कुटीर उद्योगों, फूड प्रोसेसिंग, पशु पालन, मछली पालन तथा ग्रामीण पर्यटन को प्रोत्साहन प्रदान कर रोजगार के अधिकाधिक अवसर सृजित किए जा सकते हैं। जब ग्रामीणों को अपने घर में ही रोजगार मिलेगा, तो वे शहरों का रुख क्यों करेंगे। 

निजी क्षेत्र के संस्थानों में काम करने वाले कामगारों के कारण भी मलिन बस्तियों की समस्या विकराल हुई है, क्योंकि ये संस्थान अपने कामगारों को आवासीय सुविधा उपलब्ध नहीं करवाते हैं। ऐसे में सरकारों का यह दायित्व बनता है कि वे निजी क्षेत्र को अपने कामगारों को आवासीय सुविधाएं देने के लिए बाध्य करें। अस्पश्यता जैसी सामाजिक कुरीति, जो कि आज भी हमारे समाज में विद्यमान है, का उन्मूलन कर तथा देश से गरीबी को मिटा कर भी इस समस्या पर अंकुश लगाया जा सकता है। इसके अलावा हमें नियोजित शहरी विकास पर भी ध्यान केंद्रित करना होगा। इस परिप्रेक्ष्य में जरूरत इस बात की भी है कि मलिन बस्तियों में रहने वालों को शिक्षित और जागरूक बनाया जाए। सरकारी स्तर पर संचालित की जाने वाली योजनाओं-परियोजनाओं के मध्य जहां समन्वय की आवश्यकता है. वहीं केंद्र व राज्य सरकारों के मध्य भी पारदर्शी सहयोग और समन्वय बहुत जरूरी है। समग्र व सुचिंतित प्रयासों से हम भारत को मलिन बस्तियों से मुक्त बना सकते हैं। 

नारकीय जीवन का पर्याय मलिन बस्तियां वे स्याह धब्बे हैं, जिन्होंने भारत की तस्वीर को न सिर्फ बदरंग बना रखा है, बल्कि इन मलिन बस्तियों में रहने वालों से जुड़ी विसंगतियों-विद्रपताओं के कारण राष्ट्रीय विकास और प्रगति भी बाधित होती है। यदि मलिन बस्तियों की कायापलट कर इनमें रहने वालों के जीवन स्तर में सधार लाया जाय तो वे राष्ट्र के विकास में कहीं अधिक योगदान दे सकते हैं। खुशी की बात है कि हमने मलिन बस्ती मुक्त भारत की तरफ कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। 

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