यौन शिक्षा पर निबंध | Essay on Sex Education in Hindi

यौन शिक्षा पर निबंध

यौन शिक्षा पर निबंध | Essay on Sex Education in Hindi

भारत में यौन शिक्षा को लेकर सदैव विवाद की स्थिति रही है। वर्तमान समाज ‘यौन’ अथवा ‘सेक्स’ को केवल ‘लिंग’ (स्त्री या पुरुष) के रूप में ही मान्यता देता है जबकि पूर्व काल में यह जनन स्थानों के सामान्य शब्द से सम्बन्धित था। उस समय भी इसके सम्बन्ध में अनेकानेक भ्रान्तियां थीं और वे आज भी विद्यमान हैं। इसे अतिरिक्त अपनी सामाजिक संरचना के प्रारम्भ से ही मनुष्य अपने यौन-व्यवहार के नियंत्रण एवं उन्मुक्ति की समस्याओं से घिरा रहकर आज तक इसके नियंत्रण एवं खुलेपन को परिसीमित नहीं ही कर पाया है। पाश्चात्य देशों में यदि नियंत्रण की अपेक्षा उन्मुक्तता की मात्रा अधिक है तो कम से कम हमारे देश में इस पर नियंत्रण ही प्रभावी है। हमारे पारम्परिक समाज में यौन-व्यवहार एवं उसकी चर्चा दोनों को ही अतिगोपन की सीमा में जकड़ दिया गया है। किसी भी सभ्य एवं सुसंस्कृत समाज की शालीनता, उसके नैतिक एवं परम्परागत आदर्श तथा नियंत्रित मर्यादाएँ आज भी किन्हीं दो घनिष्ठतम् सम्बन्धों के बीच यौन-व्यवहारों से सम्बन्धित चर्चा को अवांछित ही मानती आ रही हैं। इसमें जिस प्रकार यौन-स्वेच्छाचार को मर्यादाओं का उल्लंघन माना जाता है उसी प्रकार इसकी चर्चा को भाषिक मर्यादाओं का उल्लंघन। 

“हमारे पारम्परिक समाज में यौन-व्यवहार एवं उसकी चर्चा दोनों को ही अतिगोपन की सीमा में जकड़ दिया गया है।” 

हाल में हुए देशव्यापी सर्वे के नतीजों में कहा गया था कि देश में हर चार में से तीन बच्चों के सिर पर बड़ों के हाथों यौन उत्पीड़न की तलवार लटकती रहती है और बहधा दराचार करने वाला कोई रिश्तेदार या कुटुंबी होता है। जो लोग सेक्स एजुकेशन को पब्लिक के बीच कामशास्त्र के शिक्षण की तरह पेश करने की शरारती मुहिम चलाए हुए हैं, उन्हें यह समझना जरूरी है कि सेक्स एजुकेशन का मूल उद्देश्य बच्चों को ऐसे दुराचार की संभावना से ही बचाना होता है। इसके तहत उन्हें समझाया जाता है कि बुरे स्पर्श और अच्छे स्पर्श | में क्या फर्क होता है, किस स्पर्श को किस हद के बाद रोक देना है | और किस तरह के स्पर्श की शिकायत बेझिझक माँ-बाप तक पहुंचा | देनी है। ट्रेजडी यह है कि सेक्स एजुकेशन का विरोध संस्कृति की दुहाई देकर किया जा रहा है, जबकि बच्चों का उत्पीड़न कतई हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है। 

सेक्स एजुकेशन या यौन शिक्षा सही मायनों में अब एक आवश्यकता बनती जा रही है। यह लगभग तय तथ्य है कि समाज में व्याप्त विकृत यौन व्यवहारों के पीछे स्वस्थ यौन चर्चा का अभाव एक प्रमुख कारण है। एड्स जैसी बीमारी का विस्तार, वयस्कों का कुंठित यौन व्यवहार, बच्चों तथा बच्चियों का यौन शोषण, यौन संबंधी बीमारियों का विस्तार, समाज में नीम हकीमों का यौनवेत्ता के रूप में बढ़ता प्रभाव इत्यादि इसी का परिणाम है। ऐसी स्थिति में यौन शिक्षा का नियोजन, उसको पाठ्यक्रम में शामिल करना अनिवार्य रूप से आवश्यक हो गया है। 

“ट्रेजडी यह है कि सेक्स एजुकेशन का विरोध संस्कृति की दुहाई देकर किया जा रहा है, जबकि बच्चों का उत्पीड़न कतई हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है।” 

इसकी आवश्यकता के मद्देनजर कुछ प्रश्न स्वाभाविक रूप में उठते हैं जैसे-यौन शिक्षा प्रदान करने का स्वरूप क्या हो? इसको किस आयु वर्ग से प्रारंभ किया जाय? इसके पाठ्यक्रम में किन बिन्दुओं को प्रमुखता दी जाय? समाज पर इसके दूरगामी प्रभाव क्या होंगे? इससे होने वाले सामाजिक परिवर्तन कैसे होंगे? आदि। वैसे देखा जाय तो यौन-शिक्षा समाज में व्याप्त अनेकानेक यौन सम्बन्धी भ्रान्तियों एवं समस्याओं के निराकरण की दिशा में एक प्रभावकारी एवं सामाजिक स्थायित्व के लिए उपयोगी विषय ही है और प्रत्यक्षतः हर व्यक्ति इससे जुड़ा हुआ है। वर्तमान समय में तीव्रता से प्रभावी हो रहे सामाजिक परिवर्तनों का असर बच्चों से लेकर वयस्कों एवं वृद्धों तक के मनोमस्तिष्क पर पड़ रहा है। दृश्य-श्रव्य के पाश्चात्य माध्यमों ने हमारी सोच एवं विचाराधारा के समक्ष एक प्रश्नचिह्न लगा दिया है। फिर जब समाज में इस विषय की सीमित जानकारी के कारण भ्रान्त धारणाएं ही प्रबल हैं तो इस विषय को वैज्ञानिक एवं नियोजित ढग से शिक्षा में शामिल करने में ही भलाई है। इससे व्यक्तिगत एवं सामाजिक स्वास्थ्य पर लाभदायक परिणामों की तो आशा की ही जा सकता है। चूंकि यह प्रत्येक मनष्य की आधारभूत आवश्यकता है सालए इसे सभी के लिए अनिवार्य किया जाना ही हितकारी है। 

वयस्कता की ओर बढ़ता किशोरवर्ग जो देश की तिहाई जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है, में यौन संबंधी समस्याओं एवं विकृतियों की सर्वाधिक संभावना रहती है। इसके प्रमुख उदाहरण हैं-अनैच्छिक गर्भधारण, किशोर मातृत्व, गर्भपात, यौन रोग, यौन अपराध इत्यादि। इस वर्ग के पास ही यौन अंतक्रिया के सर्वाधिक अवसर सुलभ हैं और इसी वर्ग के यौन उत्पीड़ित होने की संभावना भी तुलनात्मक रूप से अधिक रहती है। इस आयुवर्ग में काम भावना के प्रति जुगुप्सा भी रहती है। यही वर्ग देश का भावी नगारिक है और सामाजिक जिम्मेदारी वहन करने वाला प्रमुख वर्ग भी है। यौन शिक्षा के द्वारा हम इस वर्ग को एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में विकसित कर सकते हैं।

इस प्रकार स्पष्ट है कि यौन शिक्षा का प्रारंभ किशोरावस्था में स्कूल स्तर से किया जा सकता है। इस स्तर पर स्कूली पाठ्यक्रम का निम्न प्रकार से निर्धारण किया जाना चाहिए 

1. मानव यौन विकास–(i) शरीर रचना विज्ञान एवं शारीरिक विज्ञान, (ii) यौन-क्रिया एवं गर्भधारण, (iii) किशोरवय के परिवर्तन, (iv) आत्म-जागरूकता, (v) लैंगिक भूमिका। 

2.अन्तर्वैयक्तिक सम्बन्ध–(i) पारिवारिक इकाई (ii) समकक्ष व्यक्ति समूह, (iii) जातीय विभिन्नताओं में सहिष्णुता। 

3.परस्पर प्रभावित करने की योग्यता–(i) निर्णय करना, (ii) आत्मानुशासन, (iii) संचारण प्रवीणता, (iv) बातचीत (v) सहायता पाने की योग्यता। 

4.यौन व्यवहार-(i) यौन को जीवन के अंग के रूप में स्वीकारना, (ii) मिथक एवं भ्रान्तियां, (iii) यौन उत्पीड़न, (iv) मानव यौन प्रतिक्रिया चक्र। 

5.यौन स्वास्थ्य-(i) यौन स्वास्थ्य विज्ञान, (ii) यौन सम्बन्धी गड़बड़ियां, (iii) गर्भनिरोधक, (vi) गर्भपात, (v) यौन संचारी रोग/ एड्स। 

आज सामाजिक तौर पर संवेदनशील होने के बावजूद किशोरों को सेक्स संबंधी गलतफहमियों से बचाए रखने के लिए यौन शिक्षा आवश्यक है। वास्तव में देखा जाय तो यौन शिक्षा पर देश में जो दो मत बने हैं वे इसकी प्रस्तुतिकरण के कारण हैं। सीबीएसई के पाठ्यक्रम में यौन शिक्षा लाइफ स्किल एजुकेशन के तहत दी जा रही है। इसे इसी रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए किन्तु एड्स से बचाव जैसे विषयों पर यौन संबंधी खुली चर्चा जैसा कि नाको द्वारा जारी पुस्तिका में है, की आवश्यकता संभवतः नहीं है। 

वास्तव में अब यौन शिक्षा के कार्यक्रम में एक संतुलित पाठ्यक्रम प्रस्तुत करने की योजना है। इसमें भारतीय समाज की भावनाओं, सामाजिक मर्यादाओं का समादर करते हुए एक सुगठित पाठ्यक्रम तैयार किया जायेगा। आवश्यकता इस बात की है कि सामाजिक जागरूकता को विकसित करके शिक्षकों एवं अभिभावकों को प्रशिक्षित करके व्यवस्थित रूप में इसे लागू किया जाय। जनसंचार के माध्यम भी इस संदर्भ में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, इनका भी प्रयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए। हालांकि समस्याओं और भ्रांतियों के निराकरण के बिना यौन शिक्षा को समग्र रूप में लागू किया जाना असंभव ही है तथापि मानवीय एवं सामाजिक स्वास्थ्य की दृष्टि से इसके महत्व को नकारा भी नहीं जा सकता है। 

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