स्वावलंबन पर निबन्ध | Essay on Self-Reliance in Hindi

Essay on Self-Reliance in Hindi

स्वावलंबन पर निबन्ध | Essay on Self-Reliance in Hindi

‘स्वावलंबन’ में दो शब्द हैं—’स्व’ और ‘आलंबन’। ‘स्व’ का अर्थ है अपना और ‘आलंबन’ का अर्थ है-सहारा। इस प्रकार स्वावलंबन का अर्थ हुआ अपना सहारा स्वयं बनना। दूसरे शब्दों में अपने आत्मबल को जागृत करना ही ‘स्वावलंबन’ कहलाता है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ स्वावलंबी व्यक्ति के लक्षण बताते हुए कहते हैं 

अपना बल तेज जगाता है, 

सम्मान जगत से पाता है।

स्वावलंबी व्यक्ति के सामने असंभव कार्य भी संभव दिखने लगता है। स्वावलंबन के दो पहलू हैं- पहला, आत्म निश्चय और दूसरा, आत्म निर्भरता। इसे निम्नवत दृष्टांत से अच्छी तरह समझा जा सकता है- 

एक बार विधाता अपनी सृष्टि को देखने निकले। धरती पर पहुंचकर उन्होंने देखा कि एक किसान फावड़ा लेकर विशाल पर्वत की जड़ खोद रहा है। उन्होंने किसान से इसका कारण पूछा। किसान ने बताया, “आकाश में बादल आते हैं और इस पर्वत से टकराकर इसके दूसरी ओर वर्षा कर देते हैं। मेरे खेत सूखे ही रह जाते हैं। अतः आज इसे मैं हटाकर ही दम लूंगा।” 

विधाता किसान के स्वावलंबन से प्रभावित होकर आगे बढ़े।

तभी पर्वत गिड़गिड़ाने लगा, “प्रभु! इस किसान से मेरी रक्षा करें।”

विधाता ने पूछा, “तुम एक छोटे से किसान से इतने भयभीत हो।” 

पर्वत बोला, “किसान छोटा है, तो क्या? वह स्वावलंबी है। उसका आत्म विश्वास अडिग है। इन दोनों के सहारे वह मुझे हटाकर ही दम लेगा।” 

इसके ठीक विपरीत छोटे-छोटे कार्यों के लिए दूसरों पर आश्रित रहना ‘परावलंबन’ कहलाता है। परावलंबी व्यक्ति हाथ रहते हुए भी लूला और पैर रहते हुए भी लंगड़ा रहता है। जिसमें अपने पैरों पर खड़े होने की सामर्थ्य नहीं है, वह दूसरों का कंधा पकड़कर कब तक चलता रहेगा? एक झटका लगते ही धराशायी हो जाएगा। इसे इस दृष्टांत से समझा जा सकता है-मेज के सहारे एक शीशा रखा था। चंचल बालक ने मेज को थोड़ा सा अलग कर दिया और शीशा गिरकर चूर-चूर हो गया। अत: जीवन में जो व्यक्ति दूसरों के सहारे खड़े होना चाहते हैं, उनका अंत भी ऐसा ही करुण होता है। कहा भी गया है-ईश्वर उसी की सहायता करता है, जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं। 

विश्व का इतिहास ऐसे महापुरुषों के उदाहरणों से भरा पड़ा है, जिन्होंने स्वावलंबन का सहारा लिया है। महाकवि तुलसीदास बचपन से ही अनाथ थे। वे दाने-दाने के लिए मुहताज रहते थे, फिर भी अपनी आत्मनिर्भरता के सहारे वे स्वतंत्र लेखन करके भारत के लोककवि कहलाए। वहीं विलासी राजाओं का सहारा लेकर केशवदास ने अपनी ख्याति सीमित कर ली। एक बार अकबर ने सूरदास को वैभव का सहारा देना चाहा, तो उन्होंने इंकार करते हुए कहा 

मोको कहां सीकरी सो काम।

ईश्वरचंद विद्यासागर एक निर्धन परिवार की संतान थे। वे सड़क की रोशनी में पढ़ते थे। उन्होंने जो यश अर्जित किया, उसका आधार स्वावलंबन ही था। अब्राहम लिंकन जूते की सिलाई करते थे, लेकिन अपनी आत्मनिर्भरता और अपने आत्मनिश्चय को जगाकर एक दिन वे अमेरिका जैसे शक्तिशाली राष्ट्र के राष्ट्रपति पद पर जा बैठे। इसी तरह छत्रपति शिवाजी, न्यूटन, अकबर, नेपोलियन, शेरशाह तथा महात्मा गांधी इत्यादि अनगिनत नाम हैं। 

इस प्रकार स्वावलंबन ही जीवन है और परावलंबन मृत्यु। स्वावलंबन पुण्य है और परावलंबन पाप। अतः हर माता-पिता को चाहिए कि वह बचपन से ही अपने बच्चों में स्वावलंबन की भावना भरें। छात्रों को अपने छोटे-छोटे कार्य-कमरे की सफाई, वस्त्रों की धुलाई, भोजन बनाना आदि स्वयं करने की आदत डालनी चाहिए। ऐसे विद्यार्थी स्वावलंबी बनकर देश के योग्य नागरिक बनते हैं और उनके सहयोग से स्वावलंबी राष्ट्र का निर्माण होता है। अतः कवि मैथलीशरण गुप्त की तरह हमें भी ईश्वर से यह प्रार्थना करनी चाहिए 

यह पाप पूर्ण परावलंबन चूर्ण होकर दूर हो,

फिर स्वावलंबन का हमें पुण्य पाठ पढ़ाइए। 

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