स्वावलंबन पर निबन्ध | Essay on Self-Reliance in Hindi

Swavalamban par nibandh

स्वावलंबन पर निबन्ध | Essay on Self-Reliance in Hindi

स्वावलंबन पर निबन्धएक व्यक्ति बहुत दिनों तक बैसाखी के सहारे चला। ज्योंही उसकी बैसाखी छीन ली गई, उसकी गति रुक गई। ठीक यही स्थिति है, जो स्वावलंबी नहीं हैं। जो दूसरे के अवलंब या सहारे कुछ करने के अभ्यासी हैं, वे प्रगति की ऊँची पहाड़ी पर पहुच नहीं पाते। आखिर उस लत्ती से हम क्या आशा रख सकते हैं, जिसका अलान के बिना अस्तित्व ही संभव नहीं ?

मानव की चतुर्दिक उन्नति के लिए कोई एक स्वर्णिम शास्त्रोपदेश नहीं है—’दस-सूत्री शास्त्रोपदेश’  ही नहीं, अनेक शास्त्रोपदेश हैं। उन शास्त्रोपदेश में एक उपदेश स्वावलंबन भी है। केवल अपने सुंदर दाहिने हाथ की शक्ति पर विश्वास रखकर अपनी बुद्धि से जो अपना मार्ग निर्धारित नहीं करते, वे जीवन के पहले ही मोड़ पर भटक जाएँ, तो आश्चर्य की बात नहीं। स्वावलंबन के दो पहलू हैं-अपना काम आप करना और साथ ही आत्मनिश्चय । गीता में भगवान कृष्ण ने स्वावलंबन का ही पाठ पढ़ाते हुए कहा है-नादान, दूसरों से सीख न लेनेवाला और आत्मनिश्चय से हीन व्यक्ति नष्ट हो जाता है। 

संसार के महापुरुषों की जीवनकथाओं के पृष्ठों को उलटें। पता चलेगा कि जिस गुण ने उन्हें प्रगति के कनकाभ शिखर पर ला खड़ा किया, वह स्वावलंबन ही था। 

महान नायक, महान नेता, महान व्यापारी, महान वैज्ञानिक-सबने अपना रास्ता स्वयं तय किया है। किसी की पीठ पर लदकर उन्होंने मंजिलें नहीं तय की। अपनी सशक्त भुजाओं पर आस्था रखकर ही वीरों ने बड़े-बड़े साम्राज्यों की सुदृढ़ आधारशिला रखी है तथा अक्षय कीर्ति अर्जित की है। 

वनवासी श्रीराम की पत्नी का हरण रावण ने किया, तो उन्होंने अयोध्या की विशालवाहिनी का भरोसा न कर अपनी भुजाओं के बल पर ही उस महान शक्तिशाली रावण से वैर साधा और उसका विनाश किया । द्यूतक्रीड़ा में संपूर्ण राजपाट हारनेवाले पांडवों ने स्वावलंबन के बल पर ही पुनः अपना राज्य वापस पाया। स्वामी विवेकानंद का अमेरिका में कौन सहायक था?

 किंतु उनके स्वावलंबन ने ही उन्हें विश्व के विद्वानों में प्रथम पूज्य बना दिया। इधर हाल में, हम अपने चिकित्सक खुराना को जब एक मामूली नौकरी भी नहीं दे पाए, तो स्वावलंबन-मंत्र के साधक उस वैज्ञानिक ने नोबेल-पुरस्कार पाकर केवल अपना ही नहीं, वरन् भारत का सिर गौरव से ऊँचा किया। इतना ही नहीं, बेंजामिन फ्रेंकलिन के माँ-बाप इतने गरीब थे कि वे उन्हें ऊँची शिक्षा तक नहीं दे पाए, किंतु फ्रेंकलिन ने स्वावलंबन का पाठ पढ़कर ही विज्ञान और राजकौशल में नाम कमाया। माइकेल फॅरेडे आल्व में जिल्दसाजी करते थे. किंत आत्मनिर्भरता के बल पर ही वे संसार के महान वैज्ञानिक सिद्ध हए।

ईश्वरचंद्र विद्यासागर दीन ब्राह्मण की संतान थे, सड़क की बत्तियों में वे पढ़ते थे, किंतु उन्होंने जो यश अर्जित किया, उसका रहस्य स्वावलंबन ही है। इसी तरह नेपोलियन, बाबर, शेरशाह. महात्मा गाँधी, कारनेगी, अब्राहम लिंकन, न्यूटन, जेम्स वाट इत्यादि अनगिनत नाम गिनाए जा सकते हैं, जिन्होंने स्वावलंबन के बल पर ही मानवता का त्राण किया तथा सपा काात पाई। इसलिए. जो व्यक्ति अपनी शक्ति पर विश्वास रखकर कार्य में अग्रसर नहीं होता, उसकी पराजय ध्रुव है। अँगरेजी के एक विचारक ने ठीक ही कहा ह-“The supreme fall of falls in this, the first doubt of one’s self.” अर्थात् . पतन सभा बड़ा पतन यह है कि किसी को सबसे पहले अपने पर ही भरोसा न हो। 

इसी प्रकार, जो राष्ट्र परावलंबी होता है, उसकी स्थिति धोबी के कुत्ते की होती ह न घर का, न घाट का । परावलंबी राष्ट्र को दूसरे पर निर्भर रहते-रहते ऐसी आदत हा जाता है कि वह आत्मनिर्भरता सोचना तक भल जाता है, हर मामले में एक गया-गुजरा भिखमंगा-सा हो जाता है। दाता राष्टों के आगे वह हमेशा हाथ फैलाए रहता है, उनकी झिड़की खाता है और उनका ऐसा गुलाम हो जाता है कि युद्ध तक में घसीटा जाता है। 

दाता राष्ट हमेशा तरह-तरह से उसका उपहास करते हैं। उस व कठपुतली की तरह नचाते हैं, पेंडुलम की तरह दोलायमान रखते हैं। यदि हमें भी महान राष्ट्र के रूप में जीना है, तो हमें स्वावलंबी होना चाहिए। दूसरे के सामने भिक्षापात्र नहीं फैलाना होगा। यदि सहायता भी मिले, तो उसे ठुकराना पड़ेगा। तभी हम अपनी शक्ति एवं प्रतिभा का विकास एवं उपयोग कर सकते हैं और संसार में एक सच्चे स्वाधीन राष्ट्र की मर्यादा पा सकते हैं। 

स्वावलंबन ही जीवन है, परावलंबन मृत्यु । स्वावलंबन पुण्य है, परावलंबन पाप । स्वावलंबन अमृत का स्रोत है, परावलंबन गरल का सागर । परावलंबी को भी भगवान ने हाथ, पाँव, आँख और मस्तिष्क सब कुछ दिया है, किंतु वह लूले, लँगड़े, अंधे तथा मस्तिष्कशून्य से भी गया-बीता है। वह मनुष्य नहीं, वरन् पशु है, पशु भी नहीं, वरन् मृतक पशु है। जिस देश में ऐसे मृतक रहते हैं, उसे हम देश कैसे कहेंगे, उसे . तो कब्रिस्तान ही कहेंगे-ऐसा कब्रिस्तान, जहाँ मुर्दे कब्रों में दफनाए नहीं गए हैं, . चलते-फिरते नजर आते हैं।

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