धर्मनिरपेक्षता पर निबंध |Essay on secularism in Hindi

धर्मनिरपेक्षता पर निबंध

धर्मनिरपेक्षता  : एक अवधारणा (Secularism : A Concept) 

यूरोपीय भाषाओं और वहाँ अर्जित ज्ञान के साथ हमारे प्रथम प्रधानमंत्री स्व. पं. जवाहरलाल नेहरू अपने साथ तीन शब्द तथा उनके साथ संलग्न अवधारणाएँ लाये Minority, Socialism और Secularism. इनका हिन्दी रूपांतर क्रमशः है—अल्पसंख्यक, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता, स्वतन्त्र भारत के नव-निर्माण की कल्पना में ये तीन अवधारणाएँ नेहरूजी के सामने प्रकाश-स्तम्भ के समान थीं. उन्होंने इन तीनों अवधारणाओं को भारत के संविधान में समाविष्ट कराया और इन्हें ही लक्ष्य करके भारत के राजनीतिक सामाजिक सांस्कृतिक स्वरूप की स्थापना का मार्ग अपनाया. इतना ही नहीं, धर्म के नाम पर भारत-विभाजन को अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का मुखौटा पहना दिया और दो राष्ट्र के सिद्धान्त को वैध घोषित कर दिया. रूसी समाजवाद को समाजवादी ढाँचे (Socialistic pattern) का रूप देकर भारत की आर्थिक नीतियों को इतना लचीला एवं लचर बना दिया कि प्रत्येक राजनीतिक दल की आर्थिक नीतियाँ समाजवादी कही जाने लगी है. धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा ने धर्म की अनेक व्याख्याओं का मार्ग प्रशस्त कर दिया. अधर्म, धर्म-विरोध सदृश शब्द भी धर्मनिरपेक्षता के तम्बू में निरापद बन गये हैं.

धर्मनिरपेक्षता (Secularism) का सामान्य परिचय 

अंग्रेजी के शब्दकोश के अनुसार ‘Secular’ शब्द का अर्थ इस प्रकार किया जा सकता —Pertaining to the present world concerned with the affairs of this world, worldy, not sacred, temporal, not ecclestical, profane अर्थात् सांसारिक, लौकिक, ऐहिक, जो पवित्र नहीं है. or to things not spiritual, not bound by monastie rules. इसी प्रकार Secularism का अर्थ है—from spiritual to common use तथा Secularist का अर्थ है—one, who discarding religious belief and worship applies himself exclusively to the things of this life, one who holds that education should be apart from religion. इस प्रकार Secular होने के लिए व्यक्ति को समस्त धार्मिक प्रक्रियाओं से सम्बन्ध विच्छेद कर लेना चाहिए यहाँ तक कि धर्म के साथ शिक्षा का भी सम्बन्ध नहीं होना चाहिए. राजनीति पर धर्म का प्रभुत्व 

राजनीति पर धर्म के प्रभुत्व की परम्परा यूरोप के चर्च और मध्य एशिया के इस्लामी देशों की देन है. यूरोप में पोप के प्रभुत्व सम्बन्धी पोप-लीला की कहानियाँ सर्वविदित हैं. इस्लामी देशों में मुल्लाओं द्वारा फतवा देने की परम्परा आज भी विद्यमान है. सलमान रश्दी की जान के लिए स्व. खोमैनी का मौत फतवा आज भी मौजूद है. जनतंत्र के वर्तमान युग में मुल्ला और इमाम आज भी फतवा जारी करके हुक्म करते हैं कि वोट किसे देना है? राजनीति पर धर्म के प्रभुत्व का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि व्यक्ति के मताधिकर को खुलेआम बाधित किया जाता है. 

भारत में राजनीति और धर्म

भारत में राजनीति और धर्म के मध्य उस प्रकार का सम्बन्ध कभी नहीं रहा, जिस प्रकर के सम्बन्ध की चर्चा हमने ईसाई धर्म और इस्लाम धर्म अथवा यूरोप तथा इस्लामिक देशों के सन्दर्भ में की है. भारत में धर्मगुरुओं द्वारा फतवा जारी करने की परम्परा कभी नहीं रही. शासक ने भी अपने धर्म के प्रसार-प्रचार के लिए धर्म-परिवर्तन की प्रक्रिया कभी नहीं अपनाई. आज भी मताधिकार को प्रभावित करने के लिए कोई भी महन्त या पुजारी अपने प्रभाव का प्रयोग नहीं करता है. 

भारतीय इतिहास में ऐसे उदाहरण अवश्य मिल जाते हैं, जब राजा या शासक के ऊपर किसी धर्म (पंथ सम्प्रदाय) विशेष का प्रभाव रहा हो. उदाहरणतः सम्राट अशोक ने कलिंग विजय के उपरान्त बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया. उसने बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार भी पूरी शक्ति एवं निष्ठा के साथ किया, परन्तु उसने बौद्ध धर्म को राजनीति से दूर ही रखा था और बौद्ध मतावलम्बियों को उसने किसी प्रकार का आरक्षण, संरक्षण अथवा विशेष सुविधाएँ प्रदान नहीं की थीं. उसने बौद्ध मत को न मानने वालों को किसी प्रकार से सताया भी नहीं था और न उन्हें हेय अथवा द्वितीय श्रेणी का नागरिक ही समझा था.

धर्मनिरपेक्षता : प्रयोग और विडंबनाएँ 

भारत के संविधान के अनुसार भारतीय नागरिक के मौलिक अधिकारों में धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार भी सम्मिलित है. विचारणीय यह है कि सेक्यूलर व्यक्ति का धर्म और धर्म सम्बन्धी किसी अधिकार से क्या सम्बन्ध है ? हमारे देश में धार्मिक स्वतन्त्रता की बात भी की जाती है, नैतिक शिक्षा की भी बात की जाती है और साथ ही सेक्यूलरिज्म की भी बात की जाती है|नैतिकता धर्म का व्यावहारिक पक्ष है. इस विरोधाभास ने धर्म और धर्मनिरपेक्षता के प्रति अनेक भ्रांतियाँ उत्पन्न कर दी हैं. कारण यह है कि हमारे कर्णधार जब नैतिकता की बात करते हैं, तब वे धर्म शब्द का प्रयोग भारतीय मान्यतानुसार धर्म के अर्थ में करते हैं और जब वे धर्म को राजनीति के क्षेत्र में ले आते हैं, तब उनका प्रयोग Religion, मत, पंथ, सम्प्रदाय के अर्थ में स्थापित कर देते हैं अर्थात् धर्म शब्द का प्रयोग संस्थागत धर्म (Institutionalised Religion) के अर्थ में किया जाता है. यह सौ फीसदी सच है कि ब्रिटिश शासन ने भारतवासियों के धार्मिक मामलों में कभी हस्तक्षेप नहीं किया, परन्तु इसके साथ यह भी शत-प्रतिशत सत्य है कि भारतीय राजनीति में धर्म को घसीट लाने की सूझ भी उन्हीं की है. धर्मरक्षा की आड़ में साम्प्रदायिकता के बीज भी अंग्रेज शासकों ने ही बोये. इसी के साथ यह भी सच्चाई है कि पाश्चात्य शिक्षा के वातावरण में पालित-पोषित हमारे कर्णधारों ने विशेषकर स्व. पं. जवाहर लाल नेहरू ने अंग्रेज शासकों द्वारा प्रवर्तित उक्त प्रकार के अलगाववाद को स्वीकार भी किया और उसको बल भी प्रदान किया. 

ब्रिटिश राजनीतिज्ञों ने सन् 1909 में हिन्दुओं और मुसलमानों को अलग-अलग प्रतिनिधित्व प्रदान करके भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिकता के बीज बो दिए. पृथक प्रतिनिधित्व की नीति मुसलमानों को विशेष महत्त्व प्रदान करने वाली थी. उन्होंने इसको पल्लवित भी किया और प्रचारित भी किया. इसमें मुस्लिम लीग का विशेष योगदान रहा. फलतः हिन्दू-मुस्लिम दंगों के लिए मार्ग प्रशस्त हो गया और भारत साम्प्रदायिक दंगों के लिए कुख्यात हो गया और अन्ततः भारत का विभाजन हो गया. मुसलमानों को पाकिस्तान मिल गया. आज तक भारत-विभाजन को न तो स्पष्ट कर पा रहे हैं और न उसकी वास्तविकता को आत्मसात् कर पा रहे हैं. स्व. पं. नेहरू और उनके अनुयायी यह कहकर देश के विभाजन की विडम्बना को नकारते रहे हैं कि अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए ऐसा किया गया, परन्तु उनके पास इस बात का कोई उत्तर नहीं रहा है कि तब फिर भारत में मुसलमान क्यों रह रहे हैं? 

इस सन्दर्भ में अल्पसंख्यक शब्द पर भी विचार करना सर्वथा प्रासंगिक प्रतीत होता है. अल्पसंख्यक शब्द प्रथम महायुद्ध के उपरांत होने वाली वार्साय संधि की देन है. जर्मनी का विभाजन करते समय अल्पसंख्यकों के हित-रक्षण की मांग उठाई गई थी. पं. नेहरू इस शब्द को वहाँ से ले आए और इसको एक भिन्न सन्दर्भ में लागू कर दिया. पं. नेहरू के प्रति भय एवं आदरमिश्रित भावना के कारण किसी ने उनका विरोध नहीं किया. उन्होंने इस शब्द का प्रयोग करके मुसलमानों को कांग्रेस की वोट बैंक बना लिया. यह प्रक्रिया वोट देने वाले वर्ग को तथा वोट प्राप्त करने वाले राजनीतिक दल दोनों के लिए हितकर सिद्ध हुई है. इसके कारण व्यापक परिप्रेक्ष्य में देश का कितना अहित हुआ है, इससे उन लोगों को कोई प्रयोजन नहीं है. राजनीतिज्ञों ने अल्पसंख्यक शब्द को राजनीति के साथ धर्म को सम्बन्धित करने का एक सबल अस्त्र बना लिया है. इसके कारण भारत का राजनीतिक जीवन दूषित हो गया है. 

“जहाँ तक धर्म निरपेक्षता और समाजवाद का सवाल है, ये दोनों अवधारणाएँ हमारे संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित हैं. इन दोनों अवधारणाओं का अब हुलिया बिगड़ गया है. आजादी के बाद आज लोग जितने साम्प्रदायिक हो गये हैं, इससे पहले कभी भी नहीं थे. वे हिन्दू, मुसलमान, सिख और ईसाई तो हैं, लेकिन भारतीय नहीं हैं. एक ओर साम्प्रदायिक दलों की राजनीति और दूसरी ओर सरकार की अवसरवादिता ने अनेक लोगों को धर्म निरपेक्षता को तिलांजलि देने को विवश कर दिया है.” 

व्यावहारिक रूप में अल्पसंख्यक होने का आधार केवल ‘धर्म’ है और इसकी ओट में शेष अधिकारों की मांग की जाती है और इसी के नाम पर राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक आदि प्रकार के संरक्षण प्रदान किए जाते हैं. अल्पसंख्यकों को संरक्षण प्रदान करके हमारे कर्णधारों ने एक वर्ग को स्थायी रूप से राष्ट्रीय धारा से अलग कर दिया है, वह वर्ग तथाकथित बहुसंख्यक वर्ग यानी हिन्दू समाज के प्रति अविश्वासी बन गया है. आरक्षित और भयाक्रांत होने का नाटक करना उसके लिए लाभ का व्यवसाय बन गया है. बोडोलैण्ड, गोरखालैण्ड आदि देश को खण्डित करने वाली माँगों के मूल में अल्पसंख्यक की राजनीति का अभिशाप है, सारांश यह है कि धर्मनिरपेक्षता वोट की राजनीति बन गई है और यह देश को खण्डित करने का छद्म माध्यम बन गई है.

धर्मनिरपेक्षता शब्द का दुरुपयोग 

धर्मनिरपेक्ष भारत की परिकल्पना करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि शिक्षा के प्रसार और देश में उद्योगीकरण के बढ़ते चरणों के साथ धर्माधारित साम्प्रदायिक भावनाएँ क्रमशः क्षीण हो जाएँगी, परन्तु परिणाम सर्वथा विपरीत हुआ है. शिक्षा के प्रसार तथा उद्योगीकरण की प्रगति के बाबजूद धर्मनिरपेक्षता ने सम्प्रदायों के मध्य दीवारें ही खड़ी की हैं और यह शब्द वोट की राजनीति का खेल खेलने के लिए एक नारा बनकर रह गया है. 

पं. नेहरू का सोच था कि जिस प्रकार कांसिलियर आन्दोलन ने राज्य एवं शासन को चर्च के प्रभाव से मुक्त कर दिया था, उसी प्रकार धर्मनिरपेक्षता का नारा भारत में राजनीति को 

धार्मिक भावनाओं से मुक्त कर देगा. विडम्बना यह रही कि इसके लिए कोई आन्दोलन तो करना दूर रहा, उन्हें हमारे कर्णधारों ने साम्प्रदायिकता के लिए धर्मनिरपेक्षता को ढाल की तरह इस्तेमाल किया. हम धर्मनिरपेक्ष तो हो गए है, परन्तु मजहब या मतवाद सापेक्ष हो गए हैं. न धर्म की कोई राजनीति रह गई है और न राजनीति का कोई धर्म ही रह गया है. 

लोकतंत्र के साथ ‘धर्मनिरपेक्ष’ विशेषण जोड़ने के पीछे धारणा यह थी कि धार्मिक सम्प्रदाय को केवल व्यक्ति तक सीमित रखा जाए, परन्तु परिणाम सर्वथा आशा के विपरीत दिखाई देता है. धार्मिक सम्प्रदायों को अल्पसंख्यक की संज्ञा देकर तथा उसके हितों की दुहाई देकर धर्मनिरपेक्षता पर सीधी चोट की गई है, क्योंकि अल्पसंख्यकों का निर्धारण उनके द्वारा मान्य धार्मिक सम्प्रदाय, मत विशेष के आधार पर किया गया है. अब केवल मुसलमान ही अल्पसंख्यक नहीं है। बौद्ध, सिख आदि भी अल्पसंख्यक के रूप में अपने हितों के आरक्षण की माँग करते हैं. 

धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हमारे कर्णधारों ने जिस साम्प्रदायिक तुष्टीकरण की नीति को अपनाया है, उसके कारण जो दुष्प्रभाव उभर कर आए हैं, वे धर्मनिरपेक्षता को कटहरे में खड़ा करते हैं. फलतः जातिवाद, सम्प्रदायवाद आदि का रूप क्रमशः विकृत और कठमुल्लावादी होता जा रहा है. श्री राम मन्दिर एवं बाबरी मस्जिद विवाद इसका ज्वलंत उदाहरण है.

धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीयता 

भारत को धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र घोषित करने के मूल में हमारे कर्णधारों की अवधारणा यह थी कि शासन पर किसी भी धार्मिक सम्प्रदाय अथवा मतवाद विशेष का प्रभाव नहीं होना चाहिए तथा धर्मनिरपेक्षता द्वारा विविध धर्मावलम्बी एक सूत्र में बंध जाएँ और सम्प्रदायगत् धर्म-भावना से उत्पन्न पारस्परिक संघर्ष सदा सर्वदा के लिए समाप्त हो जाए. इस परिप्रेक्ष्य में जब कभी भी राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता का प्रश्न उत्पन्न होगा तब भारतीय नागरिक को अपने मान्य धर्म की अपेक्षा राष्ट्रीयता को वरीयता देनी होगी, क्योंकि राष्ट्र के सन्दर्भ में प्रत्येक भारतवासी की पहचान मात्र भारतीय के रूप में होनी चाहिए, न कि हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई आदि के रूप में. 

भारत को Secular गणतंत्र के रूप में स्थापित करने का अभिप्राय यह है कि प्रत्येक नागरिक अपनी इच्छानुसार किसी भी मतवाद (Religion) का अनुयायी होने के लिए स्वतन्त्र है, परन्तु किसी मतवाद के आधार पर कोई भी नागरिक अथवा वर्ग विशेषाधिकार का अधिकारी नहीं है, क्योंकि राज्य या शासन की दृष्टि में समस्त मतवाद या धर्म (Religion) समान हैं और शासन किसी भी मत, पंथ, सम्प्रदाय धर्म आदि द्वारा प्रभावित नहीं है. अतः यदि Secular का अर्थ समस्त धर्म समभाव के रूप में ग्रहण किया जाए, तो हमारे विचार से अनेक भ्रांतियाँ दूर हो जाएँ. भारत में सामान्य नागरिक का दृष्टिकोण भी धार्मिक अर्थात् नैतिक हो जाए, धर्म के नाम पर विशेषाधिकार की माँग भी अप्रासंगिक बन जाए और शासन को धर्म विरोधी, धर्मविहीन, अधार्मिक आदि रूपों में देखने समझने की प्रवृत्ति भी कुंठित हो जाए. 

धर्मनिरपेक्ष देश में धर्म के आधार पर बहुसंख्यक (हिन्दू) और अल्पसंख्यक (मुसलमान) का सामाजिक विभाजन और उनके पृथक-पृथक मौलिक अधिकारों की व्याख्या ने हमारे राजनीतिक और सामाजिक जीवन में अनेक विसंगतियाँ उत्पन्न कर दी हैं. धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए सबसे पहले यह कदम उठाया जाना चाहिए कि किसी भी वर्ग की सांस्कृतिक विशिष्टता के आग्रह को हम राजनीतिक आग्रह न बनने दें.

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